वाह! रजीबा वाह!

.............................


रजीबा ने सोचा-
यदि ‘डाॅक्टोरेट’ की उपाधि न लिया
तो....!
...तो क्या बिगड़ जाएगा?

यही कि तनख़्वाह कम मिलेगी
और क्या?
हा...हा...हा!

.........


साला रजीबा, नौटंकी
चूतिए को और कुछ नहीं सूझता
तो अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी चलाता है
चिल्लर....!

हा...हा....हो.....हो...!!!


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