Posts

Showing posts from May, 2017

चाणक्य हमारी परछाई है!

राजीव रंजन प्रसाद
......

हर सेकेंड बदलता है क्षण
समय का चाणक्य
और क्षण मात्र में
नत्थी जिंदगी धूम जाती है आगे की ओर
पिछले कई सालों से
मैंने घंटे की सुई नहीं देखी
सिर्फ देखा-
समय के चाणक्य को
मिनट-दर-मिनट
जिंदगी बदलता हुआ
घंटे की एवज में
इतने रफ्तार से कि
सोचना संभव नहीं,
विचारमग्न होना तो दूर की कौड़ी है
यह इसलिए भी कि-
चाणक्य अतिसुस्त होने के आरोप से बचना चाहता था
बचाव में हैं पूरे लाव-लश्कर
घड़ीनुमा फौज
हर दिनचर्या शुरू होते ही
हो जाती है ख़त्म
साथ के सभी में से
कोई घंटा होना नहीं चाहता
सभी अतिसुस्त होने के आरोप से बचना चाहते हैं
मैं, आप, यह, वह, सब-
उन्हें देख रहा होता है
समय का चाणक्य
अब घंटे में समा जाती है फटाफट खबरें
पचास, सौ...दो सौ तक
लेकिन मैं घंटा होना चाहता हूँ
अतिसुस्त, महासुस्त, सर्वोपरिसुस्त
क्योंकि मेरा सवाल है-
समय के चाणक्य से
वह जो खुद बेहद आक्रामक है, चक्करदार है
जिसकी भाषा बेरंग और चेहरा पाखण्ड की है
जो अंदर-बाहर लिजलिजा और चिपचिपा है
जो केन्द्र में है
जो सत्ता में है
जो हर सुखों का भोक्ता है
जो नेता, मंत्री, नौकरशाह है
जो करोड़पति है, काननूविद् है, प्रोफेसर है
बहुत म…