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Showing posts from March, 2009

जो हाथ हथियार उठाते हैं

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भगत सिंह जीवित तो हैं, किंतु विचारो और व्यवहारो में नहीं। सपनो और उम्मीदो में नहीं। और न ही चिंतन, दृष्टि और दर्शन में। वो जीवित हैं, तो सिर्फ किताबी दस्तावेज़ों में, पोस्टरों में या फिर उपेक्षित स्मारकों में। ये पूर्वकथन किस हद तक सही हैं, यह आकलन का विषय है? अक्सर देखा जाता है, सुध की शुभ घड़ी 23 मार्च को हर साल आती है ‘शहीद दिवस’ के बहाने। छोटे-बड़े शहरों, कस्बों और अंचलों में प्रायः भगत सिंह को याद कर लिए जाने का दस्तूर है। बाद बाकी नील-बट्टा-सन्नाटा। ऐसा क्यों है? आइए, इसकी पड़ताल करें कि 55 फीसदी युवा-आबादी वाले भारतीय युवाओं के जे़हन में भगत सिंह का बिंब-प्रतिबिंब कैसा हैं-अहा! अहो! वाह या फिर कुछ और?
संचारगत साधन से परिचित युवा पीढ़ी को सूचना, तकनीक, कला, विज्ञान, प्रबंधन और प्रौद्योगिकी में तो महारत हासिल है, किंतु वो अपनी ऐतिहासिक विरासत से अनजान है। यह अजनबीपन उस आभासी दुनिया की देन है, जो इन्हें असीमित ‘वर्चुअल स्पेस’ मुहैया करा रही है। जो सोशल-नेटवर्किंग, ब्लॉगिंग और माइक्रोब्लॉगिंग की दुनिया में विचरने के लिए पर्याप्त मौका उपलब्ध करा रही है। बस कमी है, तो विचार की, चे…