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Showing posts from April, 2015

सब्र है बेशुमार, बस सवेरे की दरकार है!

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‘परिकथा’ के इस बार के अंक में पढ़े: राजीव रंजन प्रसाद का लिखा : ‘मेरा नाम मैरी काॅम’ ------------------
राजीव रंजन प्रसाद ------------------------------------  1. Narendra Modi
इस समय भारत में चतुरंगी सरकार है जिसके चतुर सुजानों ने देश-सेवा और राष्ट्र-सम्मान का व्रत लेते हुए चतुरंगी क्रांति का हुंकार भरा है। इस दावे में कितना बल है ‘मैक्सिमम गवर्नेंस, मीनिमम गर्वर्मेंट’ के हजामत बनते हुए हम देख पा रहे हैं। जनता कह रही है-‘सिया राममय सब जग जानी’। यानी जनता यह भांप चुकी है कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं। यह प्रचारू सरकार अपनी ‘मेक इन इंडिया’ का शंखनाद कर रही है।  उधर नेपाल जमींदोज हो रहा है और भारत में स्मार्ट-सिटी का प्लान लिए कमीशनखोर उत्तराधिकारी माननीय प्रधानमंत्री का कान फूंक रहे हैं। बनारस को क्योटो बनाने का उतान-छितान हुक्मरानी फरमान है ऐसा कि पूछिए मत। सुरापान करते हुए शासक, प्रशासक एवं नौकरशाह की आंख जब बाली उमरिया संग-साथ थिरकती है, तो सब जगह एक ही नारा गूंजता है-‘मेक इन इंडिया’;....और चेहरा उभर आता है माननीय नरेन्द्…

एक शोधार्थी पत्रकार के नोट्स

कल सुबह यह स्टोरी पूरी की, तो दिमाग में कनहर में किसानों पर पुलिसया कार्रवाई की बर्बर घटना थी, मुझे क्या पता था कि दोपहर तक विनाश का नया मंजर आने वाला है। भूकम्प से पूरी दुनिया हिली, तो लोगों का बुरा महसूस हुआ होगा। खैर! अब अच्छे दिन गए तेल लेने...क्यों ग्लेशियर....,
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राजीव रंजन प्रसाद

हमारा प्रश्न देश के नेता से है, उन टूटपुंजिए नेताओं से नहीं जो नाम आम-आदमी रखते हैं; लेकिन जिनका काम विचारशून्य, असंवेदनशील और दृष्टिबाधित हुआ करती है! हमारा प्रश्न उस समाजवादी युवा कपोत से नहीं है जो लाल-टोपी पहनने को समाजवादी हो जाने का एकमात्र गुण मानता है। जिसके शासनादेश से बर्बर पुलिस सोनभद्र में कनहर मुद्दे पर गोलियां चलाती है और निहत्थे-बेजुबान जेलों में ठूंस दिए जाते हैं। हमारा प्रश्न न तो शारदा चिटफंड करने वालों से है और न ही व्यापं घोटाला में नाम आने के बाद भी अपनी मर्दानी पर ताव देने वाले मुख्यमंत्रियों से। हमारा प्रश्न दोयम दरजे के नेताओं से नहीं हो सकता; क्योंकि जनता की हैसियत और नाक दुत्तलछन चरित्र वाले राजनीतिज्ञों से कहीं ज्यादा ऊँची है; संस्कारित और मर्यादित भी। 
हम सोल…

मि. पाॅलिटिशियन आपको शर्म आती नहीं या है ही नहीं!!

कसाईबाड़े में किसान ----------------------  राजीव रंजन प्रसाद ------------------
पूरे देश में शैतानी ताकतों की राजनीति गर्म है। आप आम हो या खास, नाम में नहीं रखा कुछ। भगवा वाले भगवान के नहीं होते, तो किसान का क्या होंगे। ‘मेक इन इंडिया’ से देश में पेट्रोल और डीजल के दाम घट रहे हैं। ‘मेक इन इंडिया’ से स्मृति ईरानी भारतीय शिक्षा-जगत का वारा-न्यारा कर रही हैं। ‘मेक इन इंडिया’ से सुषमा स्वराज की बिंदिया बड़े भाव के साथ चमक रही है।
फिर भी सौ टके का सवाल है कि भारतीय किसान मर क्यों रहा है? केजरीवाल से पूछें जो हाल ही में विदेशी पत्रिका के नाम के साथ चमके हैं; या फिर माननीय प्रधानमंत्री से जो चाय बेचते हुए गरीब-गुरबा के साथ कंधामिलाई करते हुए राजनीति के शीर्ष पर काबिज हुए; आज अपने खिलाफ बोलने वाले की जुबान बंद कर देने तक की नियत रखते हैं?
मि. पाॅलिटिशियन शहर-दर-शहर और गांव-दर-गांव स्यापा है, लोग सरकारी उपेक्षा और प्रताड़ना की मार झेल रहे हैं; उनकी समस्या पर सुनवाई बंद है; बस चिन्तन जारी है....वह चाहे कांग्रेस हो या भाजपा; करात हो येचुरी; ममता हो या पवार; रमन सिंह हो या नीतिश कुमार....मि. पाॅलि…

नौकरी की जगी आस, बढ़ा दुआओं का सिलसिला

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लिखित परीक्षा और कंप्यूटर-टंकण में उत्तीर्ण, साक्षात्कार का सफलतापूर्वक सामना किया राजीव रंजन प्रसाद ने।


राहुलीय रिलाॅन्च पर ‘इस बार’ से मुख़तिब राजीव रंजन प्रसाद

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थैलीशाहों ने पहले पुरानी सत्ता को कर्जा दिया, कांग्रेसियों को खरीदा; अब मि. नरेन्द्र मोदी और उसके ‘संघ शक्ति युगे-युगे’ को....नया क्या....ठेंगा?
---------------- गदहे लाख जुगत करें, वे अश्वारोही जमात में शामिल नहीं हो सकते। दिक्कतदारी यह भी है कि अश्व ही नहीं, तो अश्वमेध कहाँ? अतः गदहों के सहारे ही सच्चे अश्वमेध(लोकतंत्र) का स्वप्न देखना हमारी सनातनी मजबूरी है और भाग्यवाद भी। --------------  राजीव रंजन प्रसाद
आप मनोविज्ञान और मनोविज्ञानियों को नहीं जानते, कोई बात नहीं! मन और भाषा का अंतःसम्बन्ध नहीं जानते, तो क्या हुआ? आप शब्द और अर्थ के सन्दर्भ विशेष के लिए प्रयुक्त प्रयोजनवश मनोभाषिकी से परिचित नहीं, तो भी चलेगा?
बस इतना जरूर जान लीजिए कि स्वभाव मनुष्य की आन्तरिक प्रकृति होती है। भीतरी परतों में छुपे-दबे या रचे-बसे उस वस्तुगत चेतन-अचेतन की प्रतिकृति जो बाहर आचरण में उजागर होते ही व्यक्ति क्या है, कैसा है, कौन है...आदि का पोल खोलकर रख देती है। यह बात व्यक्ति क्या किसी संस्था अथवा दल के बारे में, उसकी रचना-बनावट या संरचना-स्वरूप के बारे में भी उतनी ही सत्य साबित होती है;…