‘तोड़ती पत्थर’: संवेदन, संघात एवं सम्प्रेषण

तोड़ती पत्थर
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वह तोड़ती पत्थर;
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर-
            वह तोड़ती पत्थर
कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन, प्रिय कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार-
सामने तरुमालिका, अट्टालिका, प्राकार।

चढ़ रही थी धूप;
गमिर्यों के दिन,
दिवा का तमतमाता रूप;
उठी झुलसाती हुई लू,
रुई ज्यों जलती हुई भू,
गर्द चिनगीं छा गईं;
          प्रायः हुई दुपहर-
            वह तोड़ती पत्थर।

देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार;
देखकर कोई नहीं
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खाई रोई नहीं;
सजा सहज सितार,
सुनो मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार।

एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर;
ढुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा-
            ‘‘मैं तोड़ती पत्थर।’’
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कविता ‘तोड़ती पत्थर’ सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने लिखी है। इस कविता का रचना-काल सन् 1935 ई0 बताया जाता है। यह वह समय है, जब देश गुलाम था। सनद रहे कि इस परतंत्र ज़माने में स्वाधीन-अधिकारों का प्रयोग-प्रदर्शन आज की तरह खुलेआम कर पाना संभव नहीं था। जिन चीजों का चलन आज आम है; उसके लिए उस समय ‘काले पानी की सजा’ मुक़र्रर थी। यथा-सरकार-विरोधी नारे, कटुक्तियाँ, काले ध्वज, आरोप-प्रत्यारोप इत्यादि। देश में कई जगहों पर औपनिवेशिक-शासन विरोधी लहरें थीं भी, तो वे सब के सब छिंटपुट ही थीं। वह भी अपने कार्यपद्धति तथा सांगठनिक ढाँचे में बिल्कुल बेतरतीब और अनियंत्रित। इस कठिन घड़ी में इलाहाबाद राजनीतिक चेतना के उन्नयन का एक प्रमुख राजनीतिक केन्द्र बनकर उभरा था। परिस्थिति-वैपरित्य की उस घड़ी में इस कविता का लिखा जाना अप्रत्याशित अथवा आश्चर्यजनक नहीं है। यह श्रमशील समाज की राजनीतिक संचेतना की मुखर अभिव्यक्ति है जो अपना स्वाधीन-पथ निर्मित करने में कर्मरत है। इस कविता का आरंभिक पंक्ति ही दृश्य में प्रतिरोध की पूर्ण-परिधि रच देता है:

                वह तोड़ती पत्थर
                देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर-
                                वह तोड़ती पत्थर

यहाँ ‘वह’ शब्द का पुरुष-शैली में कर्तरि प्रयोग हुआ है जो अंत तक जाते-जाते मैं-शैली में परिणत हो जाता है। ‘वह तोड़ती पत्थर’ कर्ता, क्रिया और कर्म का बिल्कुल ठस और ठोस प्रयोग है जो अपनी हर दूसरी या अगली आवृति में इसके प्रभाव के गूँज-अनुगूँज को गहरा कर देता है; उसे अत्यन्त मारक बना देता हे। इस पंक्ति में संवेदनात्मक तनाव है जो स्थिर या बद्धमूल नहीं है। स्फोट, संवेदन, संधात इत्यादि का आपसी संयोजन कविता की शैली में जो प्रतिपाद्य प्रस्तुत करते हैं वह-सम्प्रेषणीयता के धरातल पर चेतना की उच्च मनोभूमि है। इस भावबोधि आलिंगन में सामूहिकता-बोध की वास्तविक सम्पृक्ति एवं साहचर्य भी घुलामिला हुआ है। यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि निराला की इस कविता में भाव-फ़लक का पाट व्यापक, विस्तृत और बहुआयामी है, तो भाषा का प्रयोग उतना ही न्यूनतम। भाषा के वातायन से संवेदना की भूमि पर ताँक-झाँक करना निराला को पसंद नहीं है। दरअसल, ‘‘छायावादी काव्य-विधान के अन्तर्गत भाषिक-योजना का यह विशिष्टतम रूप निराला के अद्भुत कवि-व्यक्तित्व की पहचान कराता है। इस सम्बन्ध में कवि-आलोचक विनोद शाही की स्वीकारोक्ति देखी जा सकती है-‘‘सामूहिक-सामाजिक श्रम सृजन की दैहिक-जैविक लयात्मकता की ज़मीन को खो देने वाले अपने इस युग में मैं काव्य की ज़मीन को अगर खोज भी पाऊँगा, तो भी क्या वह पर्याप्त द्वंद्वात्मक जीवन्तता पा सकेगी?...छायावादी दौर में इसीलिए हमने ‘पीड़ा’ में अपनी आत्मा को उद्घाटित होते पाया था। अब हम शोषित या अमानवीयकृत जन की पीड़ा में सहभागी होकर आत्मलय में पुनप्रविष्ट होने के लिए जैसे अपने समय में एक झरोखा-सा बनाते हैं। परन्तु यह कितना अपर्याप्त है-यह कहने की जरूरत नहीं।

गुलामी के बाहरी-भीतरी तीर-तरकश से लहुलूहान भारतीय-मन का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व यह कविता जिस रूप में उभारती है; उसे महसूसने के लिए किसी विशेष आँख, उपकरण अथवा काव्य-सिद्धान्त पढ़े होने की जरूरत नहीं है। ‘तोड़ती पत्थर’ कविता वस्तुतः भारत के सर्वहारा वर्ग की राजनीतिक चेतना का संलयन है। यह प्रतिरोध की ऐसी समीकृत भाषा है जिसमें करुणा का क्रंदन-विलाप बिल्कुल नहीं है। इस कविता में निराला सामूहिकता-बोध के परास को भाषा में आवृत करने का प्रयत्न करते हैं। यह किसी प्रेम-पिपासु प्रेमी का कविता में उद्विगन या विकलतापूर्ण प्रणय-निवेदन हरग़िज नहीं है:

                देखा मुझे उस दृष्टि से
                जो मार खाई रोई नहीं;

दरअसल, सौन्दर्यात्मक अनुभूति भी स्थिर नहीं है। नंदकिशोर नवल की दृष्टि में-‘‘सौन्दर्य-बोध में परिवर्तन के साथ वह भी परिवर्तित होती चलती है, जिसका प्रमाण यह है कि विभिन्न युगों में ही नहीं, विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों में रची गई प्रेम-कविताओं का सौन्दर्यात्मक आस्वाद अलग-अलग है।’’ यहाँ हमें इस कविता के रचना’परिवेश को भी अपने विचार के घेरे में शामिल करना चाहिए। परतंत्र भारत की जिस मनोभूमि की यह कविता है; उस समय सामाजिक अंदरखाने में अन्याय, शोषण, लूट, हिंसा और अराजकता की पटरी पर केवल ब्रिटिशों का कब्जा नहीं था। जाति-भेद तथा वर्ग-विभेद को बढ़ावा देने वाले भारतीय सामंतवादियों ने भी ब्रिटिशों से संधि-गठजोड़ कर ली थी। तद्युगीन राजनीतिक नेतृत्व(महात्मा गाँधी, नेहरू, सुभाष, आम्बेदकर, पटेल इत्यादि) यह समझ रहा था कि सामाजिक खाई, गैर-बराबरी, छुआछूत, असामाजिक-अनैतिक कृत्य इत्यादि का ख़ात्मा किया जाना अत्यावश्यक है; लेकिन इसके लिए किए जाने वाले राजनीतिक प्रयास नाक़ाफी थे। आम जन-जीवन दिन-प्रतिदिन कठिनतम होता जा रहा था। सब लोग भीतर ही भीतर कसमसा रहे थे, टूट और बिखर रहे थे; किन्तु यह छटपटाहट आज़ाद मक़ाम और वाज़िब हक़-हक़ूक हासिल करने के लिए पर्याप्त नहीं थी।

नतीजतन, समय के ऐसे कठिनतम काल में निराला ने विद्रोह, प्रतिरोध तथा चेतना की राग को भास्वरित किया। हम देख पाते हैं कि तनाव के गहरे संघात और व्याकुल-भावविह्नल आन्तरिक संवेदन के भीतरी स्फोट ने निराला के व्यक्तित्व को मानव-मुक्तिधर्मी रचना के पक्ष में प्रक्षिप्त अधिक किया है। निराला अपनी दृष्टि में हर तरह की स्वतंत्रता को जरूरी मानते हैं। इसके लिए वे यथास्थितिवादी बनने का हिमायती नहीं थे। इसीलिए उनकी अंतश्चेतना में विद्रोह का स्वर और नैरन्तर्य मुखर दिखता है। कविता ‘तोड़ती पत्थर’ में इस कवि-रूप का सूक्ष्मतम एवं प्रभावशाली प्रयोग दिखाई देता है। अतः यह सिर्फ मानवीय रुझान की कविता नहीं है। सम्प्रेषणीयता की दृष्टि से देखें, तो इस कविता की लोक-संवेदना व्यापकतर है। रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों को थोड़े बदले हुए लहजे में कहें, तो यह कविता ऐसी है जो मनुष्य के हृदय को स्वार्थ-संबंधों के संकुचित मंडल से ऊपर उठाकर लोक-सामान्य की भावभूमि पर ले जाती है। अस्तु, कविता में जिस श्रमशील स्त्री के बारे में वर्णन है; वह समाज की सच्ची उद्घोषिका है, सिर्फ कविता की पात्रीय नायिका या नेत्री नहीं कही जा सकती है। वह मेहनतकश लोगों की आख्याता(नैरेटर) की भूमिका में है। वह अपने हाथों से देशकाल, समय-समाज, स्थिति-परिस्थिति इत्यादि के भीतर जमे पानी और गाद-खरांद को उबीछना चाहती है। अतएव, संवेदना के संघात और शक्ति-संलयन द्वारा यह स्त्री अभिव्यक्ति का अपना व्यक्तिगत राग गाने को व्याकुल है। अर्थात् वह अपनी ही तरह से हर प्रकार की दासता से मुक्ति का राह तलाश रही है। उसकी यह जीवटता दृश्य में मौन ज़बान के साथ अवतरित होती है जिसका सौन्दर्य पत्थर के टूटने में है; पत्थर के पत्थर बने रहने में हरग़िज नहीं है:

                वह तोड़ती पत्थर
                देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर-
                                वह तोड़ती पत्थर

भौतिक धरातल पर इस कविता में वर्तमान की सत्ता भले ही निहित न हो, पर व्याकरणिक काल-बोध के स्तर पर इसकी सत्ता असंदिग्ध है और वह वस्तुतः ‘अब’ और ‘आज’ की व्यवस्था के महाविनाशक स्वरूप, शिथिल वातावरण-जगत और संज्ञाशून्य संवेदनहीन जड़ लोगों को लक्ष्य  किये हुए है। यहाँ ‘तोडना’ शब्द की अभिव्यंजना उपयुक्त है। यह व्युत्पन्न एकर्मक क्रिया है। मूल शब्द है-‘तोड़ना’। यह क्रिया-रूप इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे अस्तित्वपरक-पूरकसहित संचेतना का शाब्दिक द्योतन होता है जो क्रियाशील और गतिशील दोनों है। इस स्थिति-चित्रण की एक बड़ी विडम्बना यह है कि इसमें कार्य तो हो रहे हैं-लगातार और निरन्तर। लेकिन, वह गणनातीत है; महत्त्व गौण अथवा दूसरे दरजे का है। वैज्ञानिक शब्दावली में कहें, तो कार्य के लिए दूरी तय किया जाना या कि कर्ता की पूर्ववर्ती-परवर्ती स्थिति में फेरफार होना आवश्यक है। इसका लक्ष्यार्थ सिर्फ पत्थर तोड़ने से नहीं है। यह बात सभी जानते हैं। लेकिन इसका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष-स्त्री-संवेदना की मर्मस्पर्शी सूक्ष्म पड़ताल है। यह कविता भाषा की गोलाई में सिर्फ लैंगिक-भेद की जाँच नहीं करती है; बल्कि यह उस समय-समाज की अतिवादी निरंकुश और सामंती चेतना पर भी तेज प्रहार करती है जिनकी वजह से आभिजात्यविहीन स्त्रियाँ दुहरी-तिहरी-चैहरी अनगिनत कष्ट-दुःख झेलती हैं या झेलने को अभिशप्त बनी हुई हैं:

                देखा मुझे उस दृष्टि से
                जो मार खाई रोई नहीं;

निराला इस कविता में यह भी साफ-साफ अभिव्यक्त कर देना चाहते हैं कि यह स्त्री वर्ग-विभेद की दासता और संत्रास को भी समान रूप से झेल रही है। उन्होंने संकेत किया है कि उसके बदन का रंग श्याम है। यानी वह आभिजात्य वर्ग अथवा कथित तौर पर ऊँची जाति की बिरादरी से नहीं आती है। निराला की दृष्टि में जब संवेदना-संघात का तीव्र संपोषण होता है, तो सम्प्रेषण-विधान के अन्तर्गत चयनित शब्द नये अर्थच्छाया, भाव-भंगिमा और जीवन-रूप से तदाकर करने लगते हैं। उन्हें ‘वह’ स्त्री अपनी उम्र और काया के हिसाब से न सिर्फ सम्पूणर्ता लिए दिखती है; बल्कि उन्हें उसका हृदय निर्मल, निष्कलुष और बिल्कुल ही निद्र्वंद्व दिखाई देता है। यह सचाई है कि सौन्दर्यात्मक आभा-कांति उसके शरीर से आभासित/प्रकाशित हो रही हैं; लेकिन कवि उसके सौन्दर्यात्मक-बोध के ऊपर श्रम-बोध का भार/बोझ(सहज दायित्व के नाम पर नानाविध) अधिक देख रहा होता है जिस कार्य में उसने अपना मन, मौन, भावना और हृदय सबकुछ रोप दिया है:

                श्याम तन, भर बँधा यौवन,
                नत नयन, प्रिय कर्म-रत मन,

निराला अपनी इस कविता में प्रकृति का चित्रण जिस मनोभाव से करते हैं, वह सहज अनुगम्य अथवा सामान्य नहीं है। वे प्रकृति को उसकी विकारलता और भयावहता के साथ चित्रित करते हैं। यह चित्रण भावक/बोधक के भीतर के संवेदन-तंत्र को झिंझोड़ कर रख देता है; मानों दाँत के दर्द के बीच कनकना पानी घोंट लिया गया हो। यह पारिस्थितिकी का अमोघ दबाव है जिसे एक स्त्री बराबर दुःख-संत्रास झेलते हुए भी अपने ध्येय को पूर्ण करने में तल्लीन है:

                चढ़ रही थी धूप;
                गमिर्यों के दिन,
                दिवा का तमतमाता रूप;
                उठी झुलसाती हुई लू,
                रुई ज्यों जलती हुई भू,
                गर्द चिनगीं छा गईं;
                         प्रायः हुई दुपहर-
                            वह तोड़ती पत्थर।

प्रकृति के जिस असह्î और कष्टप्रद रूप को निराला अपनी कविता में गहरा कर रहे हैं; उनकी भाव-संवेदना से बनी-बुनी वह स्त्री उसके ऊपर भी हथौड़ा का परोक्ष प्रहार बार-बार करती दिखती है। प्राकृतिक तांड़वों-झंझावतों के बीच वह स्त्री न सिर्फ केन्द्रीय भूमिका में है; बल्कि वह नेतृत्व भी कर रही है। इसीलिए अंतिम पंक्ति में निराला ने दुपहर होने की बात को स्वाभाविक मानते हुए हल्का किया है-‘प्रायः हुई दोपहर’। लेकिन, अगली पंक्ति को उसके साथ संयुक्त कर उसकी शक्ति और कर्मरत होने के संकल्प-विकल्पयुक्त होने की चेतना को धारदार बनाया है-‘वह तोड़ती पत्थर’। प्रकृति और मानव के श्रम-संघर्ष और उनके बीच का चेतनाशील प्रतिरोध कम देखने को मिलती है। आज की रचनाशीलता के सन्दर्भ में विजेन्द्र की यह टिप्पणी महत्त्वपूर्ण है-‘‘आज की कविता में प्रकृति का विलुप्त होना हमारे भाव-विपन्न होने का संकेत है।’’ जबकि निराला की कविता में यह संगति-अन्विति बेजोड़ है। ‘तोड़ती पत्थर’ कविता में निराला की कवि-दृष्टि प्रथमतः दूरतम-स्थिति के साथ पूरे घटना-जीवन पर नुमायां होती है। वह पहले प्रकृति के वैपरित्य-परिवेश को अपनी आसान-पकड़ में लेते हैं; तदुपरान्त ही उनकी दृष्टि उस स्त्री के व्यक्तित्व-बोध का संज्ञान ले पाती है।इसीलिए वह आरंभ सहानुभूतिक वक्तव्य-शैली में करते हैं:

                वह तोड़ती पत्थर;
                देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर-
                                वह तोड़ती पत्थर

किन्तु, जब वह उस स्त्री के साथ संवेदनात्मक सामीप्य-बोध स्थापित कर लेते हैं तो उनके अपने ही व्यक्तित्व-रूप का व्यक्तित्वांतरण हो जाता है। कविता की अंतिम पंक्ति की दृष्टि-रेखा, बिम्ब-बोध, राग-चेतना, लय, नाद, ओज और ध्वन्यातमक माधुर्य अद्भुत रचनात्मक आलम्बन लिए हुये दिखाई देने लगता है। निराला इस पंक्ति में अपने अधिकतम योग, निकटतम-सम्पर्क एवं आनुभाविक-संवेदना के उछाह के साथ मौजूद हैं :

                एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर;
                ढुलक माथे से गिरे सीकर,
                लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा-
                                ‘‘मैं तोड़ती पत्थर।’’

उसे अपने होने और अपने द्वारा किए जाने वाले कर्म का पूर्ण भान है। वह अन्याय के विरुद्ध विरुदावली नहीं गाती है। वह दीर्घकालिक योजना को कार्यरूप में परिणत होते देखना चाहती है। कवि ने ‘गुरु हथौड़ा’ कह शक्ति की केन्द्रीकृत सर्जना एवं उसकी अभिव्यंजना बड़े व्यापक और उच्चतर मनोभाव के साथ की है। हथौड़े के प्रहार में उसकी आज़ादी के साकार होते बिंब है; अन्याय से मुक्ति है, वेदना से छुटकारा है; और सबसे अधिक अपने स्त्री-छवि के शक्ति-स्वरूपा होने का आत्मविश्वास है जो उसे प्रकृति के समान सर्जक और संहारक दोनों होने का गौरव-बोध प्रदान किया है। यहाँ ‘हथौड़ा हाथ’ दो भिन्न शब्द होते हुए भी यहाँ पूरक-संगति भाव का द्योतन करते हैं:
              
                गुरु हथौड़ा हाथ,
                करती बार-बार प्रहार-
                सामने तरुमालिका, अट्टालिका, प्राकार।

 इस तरह हम देख पाते हैं कि अपनी इस कविता में निराला माधुर्य और ओज का गज़ब सहमेल करते हैं। यह उनकी कवि-प्रकृति के सर्वथा अनुकूल है। प्रायः हम देखते हैं कि निराला की कविताओं में प्रयोग सबसे अधिक निर्भीक और बहुलांश है। परम्परा के प्रति वहाँ निष्ठा है, तो विद्रोह भी। इसीलिए छायावाद के रंगमंच पर उनकी ख्याति विद्रोही चेतना के कवि के रूप में मुखरित होती है। निराला की एक बड़ी विशिष्टता यह थी कि वे अपनी ख्यातियों एवं उपलब्धियों से भी समान रूप से विद्रोह करते थे। रामस्वरूप चतुर्वेदी ने कवि-व्यक्तित्व के इस गुणधर्म को बड़ी सूक्ष्मता से पकड़ा है-‘‘निराला का सम्पूर्ण काव्य-व्यक्तित्व ‘विरुद्धों का सामंजस्य’ की उस अवधारणा में से जैसे विकसित हुआ है जिसे कवि के समकालीन और प्रसिद्ध समीक्षक रामचन्द्र शुक्ल ने आनंद की साधनावस्था की उच्चतम रचना-भूमि का कारक तत्त्व स्वीकार किया है। निराला के ये सभी रूप अपने-अपने ढंग से आकर्षक हैं, यद्यपि उनमें से कई एक-दूसरे के प्रतिरोधी दिखाई देते हैं। ये काव्य-स्तर परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया में निराला के कवि व्यक्तित्व को और जीवंत तथा गतिशील बनाए रखते हैं। हिन्दी कविता के इतिहास में वैविध्य की यह काव्य-प्रक्रिया अपने आप में अतुलनीय है।’’

यहाँ ‘तोड़ती पत्थर’ की भाषा-संवेदना, समय से संघात एवं संवाद; भाषाई उर्वरता, सम्प्रेषण एवं सम्प्रेषणीय धरातल इत्यादि रामस्वरूप चतुर्वेदी के विचारों की पुष्टि में सहायक बनती  हैं। वास्तव में, निराला की अनुभूति कई रूपच्छटाओं में अभिव्यक्त हुई दिखती हैं। समझने की दृष्टि से प्रायः उन्हें दो रूपों में देखा जाता है-सामान्य रूप और विशिष्ट रूप। सामान्य रूप भी सहज ग्राह््य नहीं है। उस अनुभूति तक पहुँचने के लिए सहृदयता आवश्यक है।


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