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याद करो ‘जय हिन्द’ को जरा

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दो तारीख़ है, पहली 22 सितम्बर 1920 और दूसरी 22 अप्रैल 1921; हिसाब में दोनों के बीच 12 माह से भी कम का फासला। पहली तारीख को एक काबिल भारतीय नौजवान सिविल सेवा की परीक्षा में चैथे स्थान पर चयनित होता है। परिवार में रौनक का सब्जबाग कि तभी वह दूसरी तारीख़ नमुदार होती है, वह युवा उस नौकरी को ठोकर मार एक नए जमात में शामिल हो जाता है। तत्त्कालीन स्टेट्समैन नामक समाचार पत्र में शीर्षक लगता है-‘कांग्रेस को एक योग्य व्यक्ति मिल गया और सरकार ने एक लायक अफसर गवां दिया।’
यह दिन भारतीय समाज के लिए गर्व का था। भारत को एक ऐसा नौजवान मिला था, जिसके लिए देश से बड़ा कोई सिद्धांत, आदर्श, मूल्य या स्वार्थ नहीं था। आज वह व्यक्ति नेताजी नाम के अलंकरण से सुशोभित है। जी हाँ, सुभाष चन्द्र बोस ने नौकरी छोड़ दी। वैसी नौकरी, जिन्हें उनकी चेतना स्वीकार नहीं कर रही थी। उनके रग का रवा-रवा मानसिक गुलामी की मुखालफत कर रहा था। पराधीन राष्ट्र ललकार रहा था, क्योंकि राष्ट्र को ‘दिल्ली चलो’ का हुंकार भरने वाला नायक चाहिए था। सुभाष के रूप में वह नायक मिल गया, जिसने सशर्त कहा था, ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दंूगा।’
गौरतलब…