Showing posts with label मिथाएल आएसो साय्नाय्ट. Show all posts
Showing posts with label मिथाएल आएसो साय्नाय्ट. Show all posts

Friday, December 3, 2010

उस रात हुआ क्या था...?


तारीख़ 2 दिसबंर 1984। रविवार की रात्रि का आखिरी पहर कि अचानक से लोगों में खलबली मच गई। हर रूह काँपती दिखी। हर शख़्स भयग्रस्त। खाँसी और दम घुटने से तड़फड़ाती साँसंे राहत का ठौर ढूँढने का प्रयत्न कर रही थीं। हवा में उस रात जहरीली गैस घुल गई थी। फ़िजा में मृत्यु की परछाईंयाँ तैरने लगी थी। क्या बूढ़ा, क्या जवान, क्या बच्चा सभी इस काल के घेरे में फँसे थे। आदम जब़ान से मरहूम जानवरों की तो और बुरी गत थी। ठंड से कंपकंपाती रात में भी लोग बदहवास सड़कों पर दौड़ लगा रहे थे। शोर, कोलाहल और चीख-चिल्लाहट से सारा वातावरण सना था। मौत का बवंडर कहाँ से कैसे उठा? यह तहक़ीकात करने की किसी के पास फुरसत नहीं थी। सभी जल्द से जल्द शहर की परिधि से दूर चले जाने की फ़िराक में थे। अफ़सोस हजारों जान उसी ओर दौड़ लगा रहे थे, जहाँ मृत्यु का अदृश्य फंदा टंगा था। मुक-बधिर बना प्रशासन गहरी नींद में सोया था। सही राह बताने के बजाय निरीह आवाम को जानबूझकर मौत के कुएँ में धकेला जा रहा था, चाहे कोई मरता है तो मरे अपनी बला से।
तत्कालीन कलेक्टर मोती सिंह की बयानी जो सच सामने आया, वह भरोसमंद व्यवस्था की पोल खोल कर रख देता है-‘‘ शहर के हालात को देखकर मैंने तुरंत मुख्यमंत्री से बात करने की कोशिश की। लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका। मैं बिना देर किए मुख्यमंत्री आवास पहुँचा। वहाँ भी मुख्यमंत्री से मुलाकात नहीं हो सकी। उस घड़ी बार-बार संपर्क करने के बाद भी स्थानीय थानों से कोई जवाब नहीं मिल रहा था। तब मैंने खुद लोगों के बीच जाने का फैसला किया। शहर में निकला, तो हर तरफ मातम की काली छाया थी। लोग भाग रहे थे, खाँस रहे थे और हांफ-हांफ कर गिर रहे थे।’’
सचमुच बेहद डरावना था यह मंजर। देखते ही देखते झीलों का शहर विषैले मिथाइल आइसो सायनाइट के चपेट में तिल-तिल मरने लगा था। यह करतूत भोपाल की यूनियन कार्बाइड कारखाने की थी, जिससे रिसी जहरीली गैस ने पलक झपकते हजारों लहलहाती ज़िंदगियाँ उजाड़ डालीं। यह महज दुर्घटना भर नहीं थी। सामूहिक नरसंहार था यह। अचानक शहर में कफन की माँग बढ़ गई थी। चहुँओर लाशें ही लाशें। हर तरफ मातम और विलाप। उनींदी प्रशासन और बेतुकी सरकार किंकर्तव्यविमूढ़। दिलासे और आश्वासन की खुराक पीड़ितों के लिए किसी काम के काबिल नहीं थे। इस हादसे ने 8000 लोगों को फौरन चट कर लिया था। आज यह आँकड़ा 22,000 के पार जा चुका है। लाखों लोग बेचारगी में चुप भले हों, पर उस त्रासदी की प्रेतछाया आज भी उनके कुनबे-परिवार के लिए मौत से बद्तर ज़लालत परोस रही है। उन्हें तुरंत प्रभाव से इलाज की सख़्त जरूरत है। पर सत्तासीन सरकार हो या नौकरशाह अफसरशाही। सबकी ठाठ अलग है। पूँजी की गिरफ़्त में जकड़े भारतीय भूगोल का अमेरिकापरस्त राग नया नहीं है। कसूरवार अमेरिकन कंपनी को ‘क्लीन चीट’ दिया जाना तो महज़ बानगी भर है।
सुनने में अज़ीबोगरीब भले लगता हो, लेकिन सच यही है। मुआवजे की राशि और पीड़ितों की व्यथा-कथा सब यों ही निपटा लिए गए। बाद में कार्बाइड कंपनी को अमेरिकी कंपनी डाऊ कैमिकल्स ने अधिग्रहीत कर लिया। सरकार मौन रही। क्योंकि उसे इस ख़ामोशी से अपना हित सधता दिखता है। वैश्विक मानचित्र पर उसे भावी शक्तिमान राष्ट्र होने का अमेरिकन सर्टिफिकेट मिलता है। उसके पूँजीपति घराने ‘टाइम्स’, ‘न्यूज़वीक’ और ‘फोर्ब्स’ जैसे अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं के कवर-पेज पर पदस्थापित होते हैं। यह हिसाब स्वयं को ‘इंडिया शाइनिंग’ का राग अलापने के लिए है, भोपाल गैस पीड़ितों की गुहार सुनने के लिए नहीं। तीन माह तक जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन के बावजूद दिल्ली मौन साधे रही।
कैसी अनोखी़ विडंबना है कि हमारा देश दिल्ली-मुबंई-बंगलौर को देखकर समृ़द्ध प्रतीत होता है। उसे छोटे शहरों की पीड़ा से कोई वास्ता नहीं। राजधानी की तक़दीर-मुकद्दर बदलने को आमदा राष्ट्र महज एक खेल के लिए करोड़ों स्वाहा और अरबों का वारा-न्यारा कर रहा है। हमने देखा कि किस तरह सरकार ने राष्ट्रमंडल खेल पर जी खोलकर पैसे लुटाया।। गुरेज़ इस खेल के आयोजन से नहीं। सवाल राष्ट्र के नीति-नियंताओं से है। लोकतंत्र की बाजू पकड़ आम-आदमी से आरजू-मिन्नत करने वाले उन सत्तासीन लोगों से हैं, जो हर हादसे के बाद एहतियातन इंतज़ाम की रवायत रचते हैं। हताहत लोगों को हर हाल में इंसाफ दिलाने की दुहाई देते हैं। पर ये घोषणाएँ आमआदमी के लिए कभी भरोसेमंद साबित नहीं होती हैं।
आप आश्चर्य करेंगे कि भोपाल गैस त्रासदी का ख़ौफ आज भी मिटा नहीं। और न ही जहरीली गैस का असर ख़त्म हुआ है। वहाँ आज भी बच्चे विकलांग पैदा होते हैं। माँओं के दूध में विशाक्त पदार्थ घुला है। मशहूर फोटोग्राफर रघु राय ने भोपाल गैस त्रासदी के 20 वर्ष पूरे होने पर दिए एक साक्षात्कार में खुलासा किया था कि ‘‘मैं सोचता था कि अब 19-20 साल बाद क्या बचा होगा वहाँ। लेकिन वहाँ जाकर मुझे ताज्जुब हुआ कि आज भी वहाँ लोग मर रहे हैं, क्योंकि जिनके शरीर में कम गैस गई थी, उनके फेफड़े प्रभावित हो गए, उनका हृदय क्षतिग्रस्त हो गया और उसका कोई इलाज नहीं है।’’ मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल के जाँच रिपोर्ट भी इसी बात की पुष्टि करते हैं।
लेकिन राजनीतिक चोंचलेबाज अपनी ऊंटपटांग हरकत से बाज नहीं आ रहे। पिछले साल कार्बाइड कंपनी के दौरे पर आये वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने परिसर की मिट्टी को उठाकर नाटकीय तौर पर कहा था, ‘‘देखो, मैंने इसे छू लिया। कहाँ कुछ हुआ मुझे। यह मिट्टी अब जहरीली नहीं रही।’’ यह तो यही हुआ कि सल्फास की पैकेट को मुट्ठी में बंद कर कहिए कि इसका ज़हर उतर चुका है। इस बात की काट मशहूर पर्यावरणविद् सुनीता नारायण की सीएसई यानी ‘सेंटर फॉर साइंस एण्ड एनवॉयरर्मेण्ट’ रिपोर्ट ने उजागर की। इस विश्वसनीय संस्था के मुताबिक कार्बाइड के कारखाने से तकरीबन साढ़े तीन किलोमीटर दूर की बस्तियों के भी भूमिगत जल में भारतीय मानक से चालीस गुना ज्यादा कीटनाशक है। इनमें पारा, क्लोरीनेटेड बेंजीन जैसे जहरीले तत्त्व हैं। जबकि फैक्ट्री परिसर में भारतीय मानक से 561 गुना ज्यादा कीटनाशक मौजूद हैं।
सरकार की मंशा इस गैस त्रासदी को भूल जाने की है। वह बरसी के मौके पर दिखावटी आह-ऊह से काम चलाने की चालाकी में है। वह नहीं चाहती कि इस मसले पर अमेरिकी कंपनी को और घसीटा जाए। वह अमरिका संग बढ़ते नजदीकी रिश्तों के मद्देनजर इस भीषणतम घटना को तिलांजलि देने से भी नहीं चूक रही है। अफ़सोस की केन्द्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के उस निर्णय की भी परवाह नहीं की जिसमें एक लाख पीड़ितों के बीमा कराने संबंधी सुझाव शामिल थे। केन्द्र सरकार ने सिर्फ 47 करोड़ डॉलर को बतौर हर्जाना स्वीकार कर कंपनी को दोषमुक्त घोषित कर दिया है।
हमारी मंशा अमेरिकन कंपनी को बेवजह कसूरवार ठहराने की नहीं है। दोषी कंपनी पर लांछन मढ़ना गैरवाज़िब होता, अगर यह महज दुघर्टना होती। दरअसल, भोपाल काफी पहले से ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा था। एक सजग पत्रकार राजकुमार केसवानी की इस बाबत 16 जून 1984 को एक शोधपरक लेख ‘जनसत्ता’ में छपा था, जिसका शीर्षक ही था, ‘भोपाल ज्वालामुखी के मुहाने पर’। इससे पूर्व उनका एक लेख 17 सितंबर 1982 को ‘रपट साप्ताहिक’ में छपा जिसका शीर्षक था, ‘बचाइये हुजूर, इस शहर को बचाइए’। यह पत्रकार की स्वयं भुगती पीड़ा की उपज थी। दिसंबर 1981 में कार्बाइड फैक्ट्री में काम करने वाले करीबी मित्र मोहम्मद अशरफ़ की फॉस्जीन गैस से हुई मौत को उन्होंने गंभीरता से लिया। साल भर की खोजी तफ़्तीश से जो चीजें सामने आई। उसे उन्होंने काफी मशक्कत के बाद 1982 में विधानसभा में भी उठवाया। लेकिन यह मसला घोर लापरवाही की भेंट चढ़ गया।
आज भी हम नहीं चेते हैं। हम खुद मौत के आगोश में कब घसीट लिए जाएं, कुछ अता-पता नहीं। हमारा शहर पूरी तरह सुरक्षित है, इस बात की गारंटी भला कौन देगा? भोपाल की गैस त्रासदी भी पहली वारदात नहीं थी और न ही पिछले साल ही इंदौर में हुई दो मजदूरों की मौत दूसरी घटना। 5 अक्तूबर 1982 को भी यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में गैस का रिसाव हुआ था। आस-पास के अंतःवासियों को अस्पताल ले जाने तक की नौबत पैदा हो गई थी। अक्सर हम भूल जाते हैं कि हर बड़ी घटना छोटी-छोटी घटनाओं के पूर्वाभ्यास के बाद ही विस्फोटित होती हैं। लेकिन न तो सरकारी अमला कुछ पुख़्ता करने की सोचता है और न स्थानीय प्रशासन के पास इतनी दूरदर्शिता है कि वह ऐसी त्रासदी से निपटने के लिए कोई ठोस पहल या उपाय कर सके।
सवाल मौज़ूं है, तो क्या हम इसी तरह बेमौत मारे जाते रहेंगे? हमारी जिंदगी से ऐसा घिनौना खिलवाड़ यों ही बदस्तूर जारी रहेगा? आखिर हम खशफ़हमी के चिराग तले कब तक अपनी आवाज को गले के भीतर घोंटते रहेंगे? अपनी चारदिवारी की ताकत को कब तक पैमाना मान इत्मिनान की सांस लेंगे? क्या भोपाल त्रासदी एक शहर विशेष की दुर्घटना थी? क्या यह केवल गरीबों को ही मौत का दावत देने निकली थी? क्या
इसने शहर के धनाढ्य तबके को दर्द और कराह नहीं दी? नहीं, यह पीड़ा सार्वजनिक और सभी वर्ग-समुदाय के लिए एक समान थी। इस दौरान पूरा देश हिल गया था। फिर इसके खि़लाफ भोपाल गैस पीड़ितों को ही क्यों आंदोलन और मुहिम जारी रखना चाहिए? पूरा देश इसके लिए एकजुट क्यों नहीं? हर शहर, जहाँ इस तरह की कंपनियाँ अपना कारोबार कर रही हैं, उन्हें सही तरीके से काम करने के लिए क्यों न मजबूर किया जाए? पर्यावरण में विषैले तत्त्व घोल आम-आदमी का जीवन नरक करते ऐसे औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर तत्काल प्रभाव से रोक और अंकुश क्यों नहीं लगाया जाना चाहिए?
ऐसा किया जाना बेहद जरूरी है, ताकि भविष्य अतीत से सबक ले सके। वह काली तारीख़ फिर से नमूदार न हो। हवा में आफत और बेचैनी न हो। यों तो हमारी उम्मीदें रोज दरकती और टूटती हैं। बावजूद इसके हमें उम्मीद है कि हम उस काली लहर को इतिहास के उस काली रात तक ही नज़रबंद रखेंगे, जिसने कभी न याद करने योग्य ऐतिहासिक वारदात और खौफनाक मंजर को अंजाम दिया था।

हँसों, हँसो, जल्दी हँसो!

--- (मैं एक लिक्खाड़ आदमी हूँ, मेरी बात में आने से पहले अपनी विवेक-बुद्धि का प्रयोग अवश्य कर लें!-राजीव) एक अध्यापक हूँ। श्रम शब्द पर वि...