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Showing posts from August, 2013

प्रिय देव-दीप,

हमारी युवा पीढ़ी ‘स्वयं में’ एक वर्ग बन चुकी है, लेकिन अभी स्वयं के लिए स्वतन्त्र नेतृत्व की भूमिका में नहीं है। बच्चों! देश में युवाओं की कमी नहीं है। लेकिन, आधुनिक भारतीय राजनीति के बैठकखाने में सामान्य युवाओं का प्रवेश लगभग वर्जित-सा हो गया है। ऐसा क्यों है? इस विषय पर हमारा बहसतलब होना बेहद जरूरी है। आज संसद में जितने युवा राजनीतिज्ञ पदस्थ हैं उनमें से अधिसंख्य पैतृक राजनीति की उपज हैं; परिवारवादी सलतनत के बैण्ड-बाज़ा-बारात हैं। इन युवा राजनीतिज्ञों के पास क्या कुछ नहीं है, सिवाय व्यक्तित्व, मूल्य और भारतीय आत्मा के। विडम्बना यह है कि वे ही ताकत में हैं। वे ही सत्ता और नेतृत्व में हैं। इन युवा राजनीतिज्ञों का ज़मीनी जनाधार ठनठन-गोपाल है। ‘मास अपील’ के नाम पर भाषा में लीपापोती अधिक है। इसके बावजूद वंशवादी पैराशूट से ज़मीन के सबसे ऊपरी टीले(संसद) पर काबिज़ यही हैं, हाथ यही हिला रहे हैं; कमल यही खिला रहे हैं; साइकिल यही चला रहे हैं; हाथी यही दौड़ा रहे हैं; यहाँ तक कि ‘आप’ में भी हम शामिल नहीं हैं। हम सिर्फ संज्ञा और सर्वनाम से नवाज़े जा रहे शब्द हैं। इन शब्दों के प्रयोग में भी सत्ता की राज…