Posts

Showing posts from July, 2011

सॉरी, ब्रेक टू बी जारी....,

'इस बार' ब्लॉग के मोडरेटर इन दिनों साथी ब्लोगरों के ब्लॉग को पढने में व्यस्त है..., सो अपनी बात फिर कभी; यदि जरूरत पड़ी तो.

राजनीतिक राजपुत्रों को मीडिया का 'गॉंड ब्लेस यू'

Image
जल्द ही ब्लॉग ‘इस बार’ में प्रकाश्य-राजीव रंजन प्रसाद.

भेंट

Image
हे सावनी शक्ति, आप हो तो मैं हूँ। आपके आधार की भूमि पर ही मैं चेतस हँू। सजग और सचेत हँू। आपके भीतर काल की एकरसता से उपजी तनाव और बेचैनी जिसके प्रति संवेदनशील होना मेरा दायित्व सह धर्म है; को मैं समझता हँू ठीक-ठीक। लेकिन बात समझने से ही नहीं बनती है। बूझ लेने से ही समाधान नहीं हो जाता है। उसके लिए प्रयास की दिशा में निरंतर समय को बोना पड़ता है। पौधे में फलि लगने के बाद भी उसकी निगरानी आवश्यक है। अभिष्ट लक्ष्य हासिल कर लेने की जीद या कहें अभिलाषा मेरी खुद की गढ़ी हुई है; लेकिन मेरे इस स्वप्न में आप समानधर्मा सहभागिनी हैं जिसे मैं अपना ‘बेहतरीन’ भेंट करने का आकांक्षी हँू।

‘कवि के साथ’ काव्य-पाठ कार्यक्रम में अनुज लुगुन

Image
Friday, July 15 · 7:00pm - 8:00pm
Location
गुलमोहर हॉल, इंडिया हैबिटैट सेंटर
लोधी रोड

'कवि के साथ' इंडिया हैबिटैट सेंटर द्वारा शुरू की जा रही काव्य-पाठ की कार्यक्रम- श्रृंखला है. इसका आयोजन हर दूसरे माह में होगा.इसमें हर बार हिंदी कविता की दो पीढ़ियां एक साथ मंच पर होंगी. पाठ के बाद श्रोता उपस्थित कवियों से सीधी बातचीत कर सकते हैं.

'कवि के साथ' के पहले आयोजन में
ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कवि कुँवर नारायण,
युवा कवि अरुण देव और अनुज लुगुन
...


अनुज लुगुन की कविताएँ

जूड़ा के फूल

छोड़ दो हमारी जमीन पर
अपनी भाषा की खेती करना
हमारी जूड़ाओं में
नहीं शोभते इसके फूल,
हमारी घनी
काली जुड़ाओं में शोभते हैं
जंगल के फूल
जंगली फूलों से ही
हमारी जुड़ाओं का सार है,
काले बादलों के बीच
पूर्णिमा की चाँद की तरह
ये मुस्काराते हैं।
---------

सबसे बड़ा आश्चर्य

सबसे बड़ा आश्चर्य वह नहीं
जिसे हम देखना चाहते हों
और देख नहीं पाते
जैसे देश के सबसे पिछड़े क्षेत्र में बैठकर
देखना चाहते हों
ताजमहल या एफिल टावर।

सबसे बड़ा आश्चर्य वह नहीं
जो अंतरिक्ष से भी दीख पड़े
तिनके की तरह ही सही
जैसे दिखाई पड़ता है चीन की दीवार।

सबसे बड़ा आश्चर्य यह नहीं

मुंबई में बम-विस्फोट, 20 जानें गईं

Image
मुंबई में इस वक्त हाई-अलर्ट है। लोगों से शांति बनाये रखने की अपील जारी है। मृतकों की संख्या को ले कर गलतबयानी न हो इसका जिम्मा मुंबई नियंत्रण कक्ष पर है। मुंबई कन्ट्रोल रुम से प्राप्त जानकारी के मुताबिक 20 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि घायलों की संख्या 100 के ऊपर है। दुख और शोक जताने वालों में भारतीय राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से ले कर पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी तक गहरी संवेदना व्यक्त कर रहे हैं।

यह महज संयोग नहीं है कि 13 जुलाई को कसाब का 24वाँ जन्मदिन पड़ता है जो 26/11 मुंबई हमले का मुख्य अभियुक्त है। जन्मदिन की यह तारीख़ खून से सना हो; आतंकी हमलावर इस तथ्य को जानते थे। उन्होंने जानबूझकर इस दिन को चुना; ताकि भारतीय आवाम बौखलाए। लोकतांत्रिक सरकार जिसमें त्वरित निर्णय लेने की क्षमता का घोर अभाव है; ने कसाब मामले में हीला-हवाली की हद कर दी है। सरकार से ज्यादा चेतस दहशतगर्द हैं जो ताल ठोंक कर भारतीय सत्ता के सामने चुनौती खड़ी कर रहे हैं।

जिस मामले में काफी पहले फैसला सुनाया जाना चाहिए था; आज उस आतंकी को बंदीगृह में ऐशोआराम की ऐसी जिन्दगी बख़्शी जा रही है जिस पर सलाना खर्च का बजट…

प्रेमचन्द के गाँव लमही से लौटते हुए

Image
रात को बारिश हुई थी, हल्की बूंदाबूंदी के साथ। सुबह में मौसम का तापमान बिना थर्मामीटर डाले जी को ठंडक पहुँचा रहा था। दिमाग में लगा दिशासूचक यंत्र हमें जल्द से जल्द उस ओर ले जाने को उत्सुक-उतावला था जो साहित्यिक दुनिया में सुपरिचित नाम है अर्थात आमोख़ास सभी जानते हैं-‘लमही’ को। कथाकार प्रेमचन्द का गाँव लमही कितनों को जानता है या किस-किस को जानता है? यह सवाल जरा टेढ़ा है।

5 अक्तूबर 1959 को लमही ग्राम में तत्कालिन राष्ट्रपति डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद का आना हुआ था जिनके साथ में प्रदेश मुख्यमंत्री सम्पूर्णांनंद भी पधारे थे। इस मौके पर बंगभाषा के सिद्धहस्त साहित्यकार ताराशंकर जी वंद्योपाध्याय ने भी शिरक़त की थी। यह जानकारी प्रेमचन्द स्मारक भवन में प्रवेश करने पर मिलती है। नागिरी प्रचारिणी सभा द्वारा विज्ञापित इस सूचना में यह भी जिक्र है कि यह आयोजन गोविन्द वल्लभ पंत और हजारी प्रसाद द्विवेदी की अगुवाई में संपन्न हुआ था जिसका उद्देश्य लमही ग्राम में एक ऐसे स्मारक भवन का शिलान्यास करना था जो इस कलम के सिपाही की सच्ची श्रद्धाजंलि हो। बाद के वसीयतदारों ने इस गाँव को क्या-क्या भेंट दी है; यह नजदीक से …

मैं और मेरा परिवेश

लोक-चितेरा फिल्मकार मणि कौल और बॉलीवुड

Image
क्या फिल्म सिर्फ कथा आधारित अभिनय एवं प्रदर्शन का साधन भर है? क्या फिल्म शहरी-संस्कृति और उसके भौड़े भेड़चाल का नुमांइदा भर है? क्या फिल्मी-संसार अर्थात बॉलीवुड महज एक समर्थं प्लेटफार्म भर है जहाँ से अकूत धन ‘मैजिक रोल’ की तरह रातोंरात बनाया जा सकता है?

गोया! फिल्म यथार्थ में क्या है; इसे लोक-चितेरा निर्देशक मणि कौल ने बखूबी समझा। इस घड़ी उनके निधन पर फौरी श्रद्धांजलि देने वालों का टोटा नहीं है, किंतु आज जरूरत है उनके काम की टोह की; असली मूल्यांकन की, देशकाल और समय सापेक्ष वस्तुपरक विश्लेषण की।

ऐसा इसलिए जरूरी है क्योंकि परदे पर लोक-परिन्दे उतारने का ‘रिस्क’ लिया था मणि कौल ने। ऐसे परिन्दे जिनके पैर ही पर थे जो आसमान में नहीं ज़मीन पर ज्यादा दृढ़ता से टिकते थे। फिल्म ‘आषाढ़ का एक दिन’, ‘नौकर की कमीज़’, ‘दुविधा’, ‘घासीराम कोतवाल’, ‘सतह से उठता आदमी’, ‘इडियट’, ‘सिद्धेश्वरी’ जैसी फिल्में जो रंग उभारती-उकेरती है उसमें सोलह-आना भारतीयता का पुट है। ये फिल्में भारतीय सिनेमा में बढ़ती विदेशी सूट, साइट और लोकेशन की अपसंस्कृति को आईना दिखाती हैं; साथ ही सच का लकीर पकड़ दिर्घायु होने की कामना करती हैं।

व…