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वह कामरेड न हो सका

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वह कामरेड न हो सका उसे  बोझ ढोने से  फुर्सत नहीं मिली  जो बनाता  मुट्ठियाँ लगाता नारे  उठाता झंडा  वह कामरेड न हो सका 
उसके घर का चूल्हा  दो वक्त  जला नहीं कभी  नियमित  जो जा सके वह  किसी रैली में  सुनने किसी का भाषण  ढोने पार्टी का झंडा  वह कामरेड न हो सका 
वह कभी  स्कूल न गया  फिर कैसे पढ़ पाता वह  दास कैपिटल  वह सुनता रहा  मानस की चौपाइयां  कबीर की सखियाँ  वह कामरेड न हो सका 
उसे  बचपन से ही  लगता था डर  लाल रंग से  प्राण निकल जाते थे उसके  छीलने पर घुटने  उसे प्रिय था  खेतो की हरियाली  वह कामरेड  हो न सका -------------------  अरुण चन्द्र राय जी के ब्लाॅग ‘सरोकार’ से इस बार का साभार!

1 अप्रैल, अन्तरराष्ट्रीय मुर्ख दिवस और इस बार

प्रिय देव-दीप,

''शब्दों से कहना
उनकी आहुति का समय आ गया है
कि उन्हे नया शब्द संसार रचना है
अपनी हवि देखकर         माँ की तरह 
इस शब्दमेध यज्ञ में इन शब्दों की हवि देते समय कहना .
शब्द ऊर्जा !
तुम हमारी निःशब्द वाणी में,  हमारे निःशब्द कर्म में
नये शब्दों के रूप में अंकुरित होओ 
बनो एक नया संवाद, एक नया सेतु''
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नोट: सन्् 1989 में लिखी गई यह कविता-अंश प्रसन्न कुमार चैधरी की है।  
इसे पढ़ लेने के बाद मेरे पास कहने को कुछ भी बचता नहीं शेष।

Jean Paul Sartre की आत्मकथा The Words के अंश

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संस्कृति किसी चीज या व्यक्ति की रक्षा नहीं करती। न यह कोई औचित्य प्रमाणित कर सकती है। लेकिन यह मनुष्य से उत्पन्न एक चीज है। मनुष्य इसमें अपने व्यक्तित्व को स्थापित  करता है, इसमें अपने को देखता है। यही एक शीशा है जिसमें वह अपनी छवि देख सकता है। मैं ईमानादारी से कह सकता हूं कि मैंने सिर्फ अपने समय के लिए ही लिखा है

पुरानी फाइल में युवा-2010

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