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Showing posts from December, 2010

कांग्रेसी अनावरण का सवा सौ साल

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‘इस बार’ में अगली बार...पढे़

खुफिया ख़बरों की महाखोज और विकीलीक्स

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चर्चित केबलगेट काण्ड के सूत्रधार जूलियन असांजे चौतरफा विवादों से घिरे हैं। विकीलीक्स खुलासे के बाद से भूमिगत हो गए असांजे पर स्वीडन में यौन-शोषण का कथित आरोप है। दिसंबर के दूसरे सप्ताह असांजे ब्रिटेन के एक थाने में खुद चलकर आए जहाँ उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। असांजे के वकील मार्क स्टीफ़न्स ने लंदन उच्च न्यायालय के उस फैसले का स्वागत किया है जिसमें कोर्ट असंाजे को 2 लाख पाउंड के मुचलके पर रिहा करने को तैयार है। इस दौरान असांजे को न केवल अपना पासपोर्ट कोर्ट को सौंपना होगा बल्कि एक इलेक्ट्रीक टैग भी पहनना आवश्यक होगा। पिछले दिनों असांजे ने अपनी माँ क्रिस्टीन को जेल में एक लिखित बयान सौंपा जिसमें अमरीका की लोकतंत्र विरोधी रवैए और अन्यायपूर्ण साजिशों के प्रति आगाह किया गया है।
कथित यौन-आरोपों के लिए जेल में नज़रबंद 39 वर्षीय असांजे विकीलीक्स द्वारा खुलासा किए जाने के बाद से ही अमरीकी निशाने पर हैं। स्वीडन ने अमरीकी दबाव को देखते हुए इंटरपोल से संपर्क किया है जिसके तहत असांजे के प्रर्त्यपण की मांग की जा रही है। उधर असांजे की वेबसाइट विकीलीक्स को अमरीकी ऑनलाइन सेवा देने वाली कंपनी अमेजन ने अप…

महामना परिसर से बिसरे सुरेन्द्र मोहन

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किसी व्यक्ति को बनाने में विश्वविद्यालयी शिक्षा और परिवेश का योगदान महत्त्वपूर्ण होता है। समाजद्रष्टा सुरेन्द्र मोहन जी सबल उदाहरण हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने उन्हें छात्र-जीवन में गढ़ा और एक प्रखर समाजवादी चिंतक के रूप में पहचान दी, यह कह लेना उचित है। लेकिन..., उनके निधन की सूक्ष्म-ख़बर(माइक्रो न्यूज़) अख़बार में तैरती हुई उड़न-छू हो ली किंतु सर्व विद्या के परिसर को भान तक न हुआ। आयोजनों-समारोहों की बीसियों करतब करते विश्वविद्यालय को इस कर्मयोगी के जाने से भले कोई फर्क न पड़ा हो लेकिन महामना की वे प्रस्तर मूर्तियाँ जो परिसर में यत्र-तत्र-सर्वत्र जमीन से उठी हुई आसमान में टंगी हैं, सुरेन्द्र मोहन जी के जाने से ग़मजदा हैं, विश्वास मानिए। फिलहाल इसी विश्वविद्यालय के विद्यार्थी की हैसियत से मनस्वी सुरेन्द्र मोहन जी को सादर नमन!

राहुल के कहे पर कोहराम

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राहुल गांधी के बयान ने एक बार फिर भाजपा जैसी धर्मान्वेषी विपक्षी पार्टी के जुबान पर मिर्ची रगड़ दिया है। राहुल गांधी का अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर से यह कहना कि ‘हिन्दू चरमपंथी समूहों की बढ़त भारत के लिए लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी समूहों की गतिविधियों से बड़ा खतरा पैदा कर सकती है’ बिल्कुल मुनासिब है। लेकिन कांग्रेस महासचिव का यह बयान कांग्रेस के लिए स्वीकारना और खारिज करना दोनों मुश्किल है। वैसे भी बिहार चुनाव में लुटी-पिटी कांग्रेस आजकल राजनीतिक रार लेने से बचना ही फायदेमंद समझ रही है। 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में विपक्ष ने उसका जो गत बना डाला है वह देखने लायक है। दरअसल, कांग्रेस इस वक्त ‘बौनाग्रंथी’ से शिकार है। अंदरूनी कलह और प्रांतीय राजनीति में ढीली पड़ती केन्द्रीय बागडोर ने कांग्रेसी महारथियों के मानसिक दशा को बिगाड़ दिया है। राहुल खुद अपनी बात पर टीके रहने वाले नहीं हैं। उनके व्यक्तित्व में वो ‘स्टेण्डेबल पार्टिकल्स’ ही नहीं है कि वे सच को सच के रूप में आजमाते रहने का दृढ़संकल्पित साहस दिखा सके। ऐसे में मोर्चे पर तैनात स्पिन डॉक्टर राजनीतिक गुगली फेंकते दिख तो रहे हैं लेकिन ‘नो बॉल’ के लह…

कल की तारीख़ में आज लिखा गया ख़त

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प्रिय देव रंजन,
कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में तुम्हारे दाखिले से प्रसन्न हूँ। यह तुम्हारे श्रम की सिद्धि है। संतुष्टिपूर्वक आगे और अच्छा करो, शुभकामना। तुम्हारी माँ बता रही थी वहाँ तुम्हारे साथ में एक लड़की रह रही है। हिन्दी में धाराप्रवाह बोलती है। वह तो उस बाला पर मोहित है। चलो, सावधानीपूर्वक मैत्री का निर्वाह करना। इन दिनों दीप रंजन कविता लिखने में मगन है। तुम जानते ही हो कि उसका जी जरूरतमंद लोगों की सेवा करने में ज्यादा लगता है। वह बोलता भले कम है, लेकिन उसकी चुप्पी में ढेरों कोलाहल, हलचल और किस्म-किस्म की आवाजें शामिल है। आजकल कनिषा से उसकी खूब बन रही है। दोनों को संग-साथ खुश देख खुशी होती है। तुम्हारी माँ को भी कोई शिकायत नहीं। हमदोनों को पता है कि तुमदोनों अपनी जिंदगी हमारे सलाह-सुझाव के बगैर भी बेहतर तरीके से जीने का गुर सीख चुके हो। दरअसल, खुद से तय मानदण्डों के माध्यम से मिली कामयाबी आदमी को ज्यादा सफल साबित करती है।

तमाम घरेलू संपन्नता के बावजूद तुम्हारी माँ को तुम्हारे ई-मेल का इंतजार रहेगा।
तुम्हारा पिता
राजीव रंजन प्रसाद
01/11/2029

गश्ती पर लौटे काशी के 'भोकाली जांबाज'

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धमाका हुआ तो ये सो नहीं रहे थे. डयूटी पर तैनात थे. बीड़ी-हुक्का भी नहीं पी रहे थे. ठण्ड में चाय की तलब भी इन्हें नहीं सता रही थी. फिर ये क्या कर रहे थे? काशीवासी यह सवाल इनसे पूछ रहे हैं. जवाब तो ये देंगे ही देंगे, पर आज ये क्या करिश्मा करते दिख रहे हैं? उस पर एक चलती नज़र...,

शांत रहे, बनारस में शांति कायम है

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अगाथा आजकल तुम चर्चा से बाहर क्यों?

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असल अभी बाकी है, यह तो केवल झांकी है

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रियल है, तो नियर एंड डियर है

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बचना है, तो बचाना होगा यारों

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उपभोक्ता-मन और विज्ञापन बाज़ार की उत्तेजक दुनिया

राजीव रंजन प्रसाद

विज्ञापन को बाज़ार में उत्पाद-प्रक्षेपण का सशक्त साधन माना जा चुका है। इसका मुख्य लक्ष्य उपभोक्ता की प्रतिष्ठा और जीवन-स्तर में अभिवृद्धि करना है। भारतीय संदर्भों में विज्ञापन सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्व का महत्त्वपूर्ण कारक है। वर्तमान में विज्ञापन और पूँजी दोनों एक दूसरे के पूरक अथवा पर्याय हो चुके हैं। बगैर विज्ञापन के आधुनिक पूँजीवाद का विस्तार या उसके आधिपत्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। आज विज्ञापन ही तय करने लगे हैं कि कोई विचार, सेवा या उत्पाद बाज़ार के हिसाब से बिक्री योग्य है भी या नहीं। पूँजीवाद पोषित इस नवसाम्राज्यवादी विश्व में विज्ञापन का उत्तरोत्तर बढ़ता कारोबार सन् 2020 तक 2 ट्रिलियन डाॅलर हो जाने की उम्मीद है।1 सिर्फ भारत में विज्ञापन का कुल अनुमानित बाज़ार 8000 करोड़ रुपए से ज्यादा है। दो मत नहीं है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को शीर्षाेन्मुखी करने में ‘विज्ञापन युक्ति’ अनंत संभावनाओं से भरा-पूरा क्षेत्र है। ‘एड गुरु’ के नाम से मशहूर प्रहलाद कक्कड़ की मानें तो “जनसंचार माध्यमों का इस्तेमाल करके अपने उत्पाद की पहुंच लोगों तक बनाए रखने के उद्देश्य के मद…

ख़बर में ख़बरची

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आजकल मीडिया ज्यादा, शोख, बदमिज़ाज़ और नकचढे़ किस्म का हो चला है। कहने को तो जनमाध्यम है, पर लोगों से सरोकार लेशमात्र भी नजर नहीं आता। अगर होता
तो क्या बरखा दत्त और वीर सांघ्वी के नाम इस कदर उछाले जाते कि उनकी अपनी ही सफाई में बोलती बंद हो जाती। वैसे ये अकेले नहीं हैं। मेरी राय में, इनकी अकथ कहानी पर चर्चा करना फिजूल में इन नामचीन पत्रकारों को शोहरत भेंट करना है। किसी जमाने की मिशनधर्मी पत्रकारिता अपने मुख्य लक्ष्य से भटकते हुए आज सेक्स, हिंसा तथा हल्के व फुहड़ किस्म के मनोरंजन का ठेकेदार बन चुकी है। इमेजिन टीवी पर चल रहे ‘राखी का इंसाफ’ और कलर्स के ‘बिग-बॉस’ रियलिटी शो इसी श्रेणी के ख्याली-भूप हैं। लिहाजा, सैद्धांतिक मूल्य तथा नैतिक-बोध जैसी कोई स्पष्ट लक्ष्मण-रेखा दूर-दूर तक नजर नहीं आती, जिस से यह अनुमान लगाया जा सके कि हम कहाँ कौन सी भूल कर रहे हैं? हाल के नीरा वाडिया प्रकरण में पत्रकारों की मिलीभगत को इसी नज़रिए से देखा जाना चाहिए।
नये निर्धारित मानदंड के मुताबिक संपादकीय विशेषाधिकार प्रबंधकीय जिम्मेदारी के पाले में चला गया है। पद और रुतबा पाकर बौराए नौसिखिओं की कारगुजारियाँ कितनी भयाव…

आँकड़ों में अख़बार पढ़ता पाठक

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एआईआर (एवरेज इश्यू रीडरशिप) के मुताबिक हिंदी के टॉप टेन अखबारों में ‘दैनिक जागरण’, ‘दैनिक भास्कर’ और ‘हिन्दुस्तान’ पहले तीन पायदानों पर बने हुए है. सर्वे के मुताबिक, टॉप टेन अखबारों में आठवें नंबर तक रैंकिंग में कोई बदलाव नहीं हुआ है। इस बार ‘प्रभात खबर’ दसवें नंबर से उछलकर नौवें नंबर पर पहुंचने में सफल रहा है. पिछली बार टॉप टेन कटेगरी से बाहर रहे ‘हरिभूमि’ ने टॉप टेन में वापसी की है.

‘दैनिक जागरण’ 1 करोड़ 59 लाख 50 हजार की रीडरशिप के साथ पहले नंबर पर जिसके पाठक संख्या में इस तिमाही में 25 हजार की बढ़ोतरी हुई है। टाप टेन में शामिल अखबारों में दैनिक जागरण की बढ़ोतरी संख्या सबसे कम रही है.
दूसरे स्थान पर रहे ‘दैनिक भास्कर’ ने 1 करोड़ 34 लाख 88 हजार की रीडरशिप के साथ जागरण के नजदीक पहुंचने की स्थिति में है. आँकड़ों में बढ़ोतरी 1 लाख 85 हजार की है जो दूसरी तिमाही में पाठक संख्या के मामले में 1 करोड़ 33 लाख 3 हजार थी.
‘दैनिक हिन्दुस्तान’ ने एक बार फिर छलांग लगाते हुए पिछली बार की ही तरह तीसरे पायदान पर रहा। ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ की पाठक संख्या 1 करोड़ 8 लाख 39 हजार पहुंच गई है जो पिछली संख्या
से 6 लाख…

उस रात हुआ क्या था...?

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तारीख़ 2 दिसबंर 1984। रविवार की रात्रि का आखिरी पहर कि अचानक से लोगों में खलबली मच गई। हर रूह काँपती दिखी। हर शख़्स भयग्रस्त। खाँसी और दम घुटने से तड़फड़ाती साँसंे राहत का ठौर ढूँढने का प्रयत्न कर रही थीं। हवा में उस रात जहरीली गैस घुल गई थी। फ़िजा में मृत्यु की परछाईंयाँ तैरने लगी थी। क्या बूढ़ा, क्या जवान, क्या बच्चा सभी इस काल के घेरे में फँसे थे। आदम जब़ान से मरहूम जानवरों की तो और बुरी गत थी। ठंड से कंपकंपाती रात में भी लोग बदहवास सड़कों पर दौड़ लगा रहे थे। शोर, कोलाहल और चीख-चिल्लाहट से सारा वातावरण सना था। मौत का बवंडर कहाँ से कैसे उठा? यह तहक़ीकात करने की किसी के पास फुरसत नहीं थी। सभी जल्द से जल्द शहर की परिधि से दूर चले जाने की फ़िराक में थे। अफ़सोस हजारों जान उसी ओर दौड़ लगा रहे थे, जहाँ मृत्यु का अदृश्य फंदा टंगा था। मुक-बधिर बना प्रशासन गहरी नींद में सोया था। सही राह बताने के बजाय निरीह आवाम को जानबूझकर मौत के कुएँ में धकेला जा रहा था, चाहे कोई मरता है तो मरे अपनी बला से।
तत्कालीन कलेक्टर मोती सिंह की बयानी जो सच सामने आया, वह भरोसमंद व्यवस्था की पोल खोल कर रख देता है-‘‘ शहर के हाला…