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Showing posts from July, 2013

लद्दाख भी आसमान से धरती जैसा ही दिखाई देता है.....: रामजी तिवारी

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(पढ़िए रामजी तिवारी का लिखा लाज़वाब यात्रा-संस्मरण
‘लद्दाख में कोई रैन्चो नहीं रहता’ शीर्षक से;
परिकथा, जुलाई-अगस्त, 2013 अंक में प्रकाशित)

पहाड़ हवा में नहीं होते। वे ज़मीन पर होते हैं। इसीलिए मजबूती से टिके रहते हैं।
उनका ज़मीन से नाभिनाल रिश्ता है। रैन्चोगिरी की ख़ुमारी में डूबे हम पर्यटकों
से प्रायः वे भिन्न महत्व के होते हैं। दरअसल, इस रिश्ते के कई-कई छोर या सिरे होते हैं।
हमारे पाँव इन पहाड़ों को छूते हैं। हमारा देह इन पहाड़ों पर टिकते हैं, तो कई मर्तबा
पर्याप्त आॅक्सीजन न होने का रोना भी रोते हंै। ‘‘साँस उखड़ने की यह कमी लेह में उतरने के
आधे घंटे बाद इतनी शिद्दत से महसूस होने लगती है कि पहली बार आपको अपने स्वस्थ जीवन में यह एहसास भी हो जाता है कि साँस लेना भी एक जरूरी काम है।’’ जरूरी तो पस्त होते तबीयत के साथ पहाड़ों के मन-मिज़ाज को बूझना भी होता है। अक्सर ‘‘हम मैदानी लोगों के दिमाग में पहाड़ों को लेकर कितना भ्रम रहता है। हम सोचते हैं कि पहाड़, रास्ते के हिसाब से बंद जगहें होती हैं …

यह ज़िन्दा गली नहीं है

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माही का ई-मेल पढ़ा। खुशी के बादल गुदगुदा गए।

जिस लड़की के साथ मेरे ज़बान जवान हुए थे। बुदबुदाए।

‘‘बिल्कुल नहीं बदली....’’

अंतिम शब्द माही का नाम था, उसे मन ने कह लिया था। लेकिन, मुँह ने मुँह फेर लिया।
(आप कितने भी शाहंशाह दिल हों....प्रेमिका से बिछुड़न की आह सदा शेष रहती है)

उस घड़ी मैं घंटों अक्षर टुंगता रहा था। पर शब्द नहीं बन पा रहे थे। रिप्लाई न कर पाने की स्थिति में मैंने सिस्टम आॅफ कर दिया था। पर मेरे दिमाग का सिस्टम आॅन था। माही चमकदार खनक के साथ मानसिक दृश्यों में आवाजाही कर रही थी। स्मृतियों का प्लेयर चल रहा था।

‘‘यह सच है न! लड़कियाँ ब्याहने के लिए पैदा होती हैं, और लड़के कैरियर बनाने के लिए ज़वान होते हैं। मुझे देखकर आपसबों को क्या लगता है?’’

बी.सी.ए. की टाॅप रैंकर माही ने रैगिंग कर रहे सीनियरों से आँख मिलाते हुए दो-टूक कहा था। तालियाँ बजी थी जोरदार। उसके बैच में शामिल मुझ जैसा फंटुश तक समझ गया था। माही असाधारण लड़की है। लेकिन, मैं पूरी तरह ग़लत साबित हुआ था। माही एम.सी.ए. नहीं कर सकी थी। पिता ने उसकी शादी पक्की कर दी थी। उस लड़के से जो एम.…

यही सच है!

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आज दीपू
तुम्हारा जन्मदिन
और मैं बेरोजगार
चाहता हूँ
तुम्हारी हँसी उधार.....!

बीएचयू : यह हंगामा है क्यों बरपा?

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बीएचयू में फीसवृद्धि का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। विश्वविद्यालय के
विद्यार्थियों में रोष व्याप्त है। बीएचयू प्रशासन इस सम्बन्ध में
निर्लिप्त है। यह कहना ग़लत होगा। वह जानबूझकर इस मुद्दे को बेपरवाही के
साथ ‘हैंडिल’ करता दिखाई दे रहा है। प्रशासन और अकादमिक अधिकारियों की
अक्षमता या कहें मिलीभगत ने इस मुद्दे को राजनीतिक रंग में रंग दिया है।
परिसर में विरोध-प्रदर्शन, पुतला-दहन, ज्ञापन इत्यादि का सिलसिला हफ़्ते
भर से जारी है। बीएचयू सिंहद्वार के समीप प्राॅक्टर-फोर्स लाठी-डंडे के
साथ तैनात है सो अलग। परिसर में तनाव का बाना इस कदर बुना हुआ है कि
सामान्य विद्यार्थियों में भय और खौफ पैदा होना स्वाभाविक है।

संकट की इस घड़ी में विश्वविद्यालय का प्रशासनिक अमला हाथ पर हाथ धरे बैठा है।
मानों उसने अपनी बुद्धि की बत्ती ही बुझा दी हो। दरअसल, शुल्कवृद्धि की वजह से
आर्थिक रूप से विपन्न विद्यार्थियों के ऊपर बड़ा बोझ डाल दिया गया है।
विश्वविद्यालय प्रशासन यहाँ पढ़ने आने वाले विद्यार्थियों के भूगोल से
परिचित नहीं है; ऐसा नहीं है। यह सबकुछ सोची-समझी रणनीति के साथ हुआ
है। इसका एक संदेश तो यह …

हमारा यह जीवन सिर्फ संज्ञा-सर्वनाम नहीं है....!

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(शोध-पत्र: निष्कर्ष)

जल्द ही....!

चुनावों में मरघटिए का टंट-घंट मत छानिए

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शशि शेखर अख़बार के सम्पादक हैं। समाचारपत्र ‘हिन्दुस्तान’ में उनकी
वैचारिक-टीआरपी जबर्दस्त है। वे जो लिखते हैं, सधे अन्दाज़ में। उनका साधा
हर शब्द ठीक निशाने पर पड़ता है या होगा, ऐसी मैं उम्मीद करता रहा हूँ
(फिलहाल नाउम्मीदगी की बारिश से बचा जाना नितान्त आवश्यक है) लेकिन, कई
मर्तबा वे जो ब्यौरे देते हैं, तर्क-पेशगी की बिनाह पर अपनी बात रखते
हैं; उसमें विश्लेषण-विवेक का अभाव होता है। यानी वे अपने विचार से जिस
तरह पसरते हैं, उनकी तफ़्तीश से कई बार असहमत हुआ जा सकता है। खैर!
पत्रकारिता भाषा में तफ़रीह नहीं है, यह शशि शेखर भी जानते हैं और मैं भी।
बीते ढाई दशक में उनकी कलम ने काफी धार पाया है, चिन्तन में पगे और चेतस
हुए हैं सो अलग। यह मैंने कइयों से सुना है...और उनसे भी।

अब मुख्य बात। शशि शेखर के लोकप्रिय रविवारीय स्तम्भ ‘आजकल’ में आज का
शीर्षक है-‘‘चुनावों को महाभारत मत बनाइए’’। इसमें उनका कौतूहल देखने
लायक है-‘‘पुरजवान होती इक्कीसवीं सदी के हिन्दुस्तानी सियासतदां अपने ही
इतिहास से सबक क्यों नहीं लेते? वे कबतक नफरत के भोथरे तर्कों को नया
जा…

O! Bastard, I'm Dancing Again

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उसके अधरों से फूटे बोल
और वह.....,
चुप आत्मा, मनहूस
आत्महीन, कलपजीवी
गाने लगी अचानक

जैसे बाँस में खिले फूल
और वह....,
बहिष्कृत, शोषित
दुखिहारी, रुदाली
बजाने लगी पैजनियाँ

उसका आज न बर्थ डे है
न फ्रेण्डशिप डे
न वुमेन्स डे
न ह््युमन राइट्स डे
वह गा रही है गीत
नृन्य कर रही है पैजनियाँ
नहला रही है अपने भीतर की पार्वती को
गूँथ रही है गजरा बालों में
लगा रही है मेंहदी हाथों में
बना रही है रंगोली दरवाजे पर

टेलीविजन, अख़बार....जनमाध्यम
जो कभी नहीं रहे शुभचिन्तक
आज ढार रहे हैं उनके लिए ख़बर
उलीच रहे हैं तर्क
परोस रहे हैं भाषा
चमका रहे हैं चेहरा(खाया, पिया, अघाया)

कुल जमा निष्कर्ष
‘महाराष्ट्र में फिर खुलेंगे डांस बार’।

दुनिया का हर घटित हमारे मनःजीवन के दायरे में है...!

धूपगाड़ी

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आओ बाबू
बैठो साथ

निकालो अपना
अंजुरी-हाथ

बिन सीढ़ी
उतरी धूप

आजू-बाजू
पसरी धूप

गहन अन्धेरा
बिल्कुल चुप

सब जागे
जब चमकी धूप

मन...राग

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बहुत हुई भाषा में बातें
अब...नहीं कोई बात कहूंगा
गले मिलूंगा, गले पडूंगा

छोडूंगा चर्चा, बातूनी बहसें
अब....नहीं कोई प्रचार करूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

बहुत चलाया शब्द-धनुष को
अब...नहीं कोई वाक्य गढूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

यह समय है स्वांग-धरण का
अब...नहीं कोई पाँत बैठूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

जो होना-जाना तय था, सीखा
अब नहीं कोई राग रटूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

‘करो या मरो’ दो ही पथ हैं
बस इस पथ का नेह धरूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

इस सबक के कई हैं साथी
उनसे सीधा संवाद जोडंूगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा।

इस मौत को क्या नाम दें....?

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हमारा रूख कई मसलों पर चलताऊ किस्म का होता है। चाहे वह कितना ही गम्भीर क्यों न हों? हम जबतक खुद किसी दुर्घटना या समस्या का शिकार नहीं हो जाते; बुरी तरह उसकी चपेट में नहीं आ जाते; तबतक हमें अपनी ज़िदगी की खुशमिज़ाज रंगीनियाँ ही एकमात्र सचाई मालूम देती है-‘‘ये इश्क़-खुमारी तुमतक...तुमतक, ये सब तैयारी तुमतक...तुमतक’।

आपमें से कितने हैं जो जानते हैं पोस्ट ट्राॅमेटिक स्ट्रेस डिसआॅर्डर(पीटीएसडी) के बारे में। नहीं जानते हैं, तो जानिए ज़नाब!

यह दिमागी महामारी है। तनाव-अवसाद का ऐसा चरम रूप जो हाल के दिनों में युद्ध, हिंसा, अपराध, हत्या, अशांति इत्यादि के साए में जी रहे लोगों को तेजी से लील रहा है। यह तनाव, अवसाद, कुण्ठा, विफलता आदि के लक्षण के साथ हमारी ज़िदगी में सबसे पहले शामिल होता है....फिर आत्महत्या की परिणति के रूप में इंसान की इहलीला ख़त्म करके ही मानता है।

यह मनोविकार/स्नायुविकार है। परिवेश/परिस्थिति की प्रतिकूलताओं के साथ जब हमारा देह-दिमाग सन्तुलन नहीं बिठा पाता है, तो पीटीएसडी का उभार हमारे भीतर दिखने लगता है। हम अंतर्मुखी होते चले जात…

कायाकल्प

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उसे कोई नहीं देख रहा होता है, तब भी उसे लगता है कि कोई उसे देख रहा है, घूर रहा है, बेवजह छू रहा है या छूने की कोशिश कर रहा है।

इस भय का कोई निश्चित कारण नहीं होता, लेकिन वह भयभीत रहती है...या रहने के लिए अभिशप्त है।

14 साल की उस लड़की का नाम उसके पिता ने कीर्ति रखा है। इसके अलावे उसका पिता उसके लिए फूटी कौड़ी न रखा है। जबकि आजकल बेटा-बेटी जन्मते ही स्मार्ट फादर्स-मदर्स लाखों रुपए का बीमा चटपट करा डालते हैं अपने बच्चों के लिए।

खैर! खूब शराब पीने की लत में कीर्ति का पिता तब मर गया या कहें मार दिया गया जब वह छह साल की थी। पिता के मरने के बाद घर का कबाड़ हो गया। ज़मीन दबंगई की भेंट चढ़ गई। विधायक के बेटे ने वहाँ शो-रुम खोल दिया। वहाँ कपड़े बिकते हैं। लेकिन वे सोने की कनबालियों या छूछियाँ से ज्यादा महंगे होते हैं। कीर्ति अपने ही ज़मीन पर खड़े मकान के दूकान से खरीदारी नहीं कर सकती है। यह बाज़ार उसकी ज़मीन पर है। लेकिन उसे बाज़ार के भाव ने बेदखल कर दिया है।

देश में सुप्रीम कोर्ट है। कीर्ति यह नहीं जानती है।

पढ़ने का अधिकार है। कीर्ति नहीं जानती है।

गरीबों के लिए मर मिटने क…

युवा राजनीति में आधी आबादी

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कुकुरमुते जमात में उगते-पनपते हैं। लेकिन, स्त्रियाँ कुकुरमुते की जात नहीं होती।

एक के बाद दूसरी लड़की हुई नहीं कि आदमी के भीतर का अदहन खौलने लगता है। इस अनचाही ताप से समाज का पितृसत्तात्मक चेहरा झुलस जाता है। कोहराम की भाषा में चर्चा के सोते फूट पड़ते हैं। लूटी किस्मत का हवाला दे कर उन नवजात लड़कियों को हीक भर कोसा जाने लगता है जिन्हें सयाने होने तक अनगिनत दुश्वारियाँ झेलनी होती है। राहचलते मजनूओं से निपटना होता है। शोहदों की सीटी की आवाज़ और भद्दे कहकहे सुन चुप्पी में सँवरना होता है। अनचाही आँख जब उनके देह को छूकर निकलती है, तो तन-मन पर क्या कुछ गुजरता है; यह वे क्या जाने जो सिर्फ यह गाना गाना जानते हैं-‘‘लड़की है या छड़ी है, शोला है, फुलझड़ी है....440 वोल्ट है...छूना है मना।’’

ऐसे कठिन परिवेश में पल-बढ़ कर युवा हुई लड़कियाँ भारतीय संसद/राज्य विधानसभाओं में कितनी मात्रा में उपस्थित हैं? अन्दाजिए जनाब! शरमाइए मत, गिनिए। यह सचाई है कि वर्तमान राजनीति आज भी लड़कों की बपौती है। राजनीतिक आकागण अपने बेटों को ही अपना सत्ताधिकारी घोषित करते है…

रजीबा की पाती

प्रिय देव-दीप,

कैसे हो आपदोनों? बिटना का जन्मदिन है 25 जुलाई को। याद है। मैं भूला नहीं हँू तारीख़। राजा बाबा आपका जन्मदिन भी याद था, 27 अप्रैल। आप ही नहीं थे मेरे पास। खैर! इस बार आपदोनों का जन्मदिन साथ-साथ मनाऊँगा। संयुक्त रूप से।

देव-दीप, आपदोनों के पिता होने का सुख मैं काट रहा हूँ। जबकि आपदोनों बेरोजगार पिता के बेटे होने का दंश झेल रहे हैं। इन हालातों का जवाबदेह मैं खुद हूँ। मेरा निकम्मापन जिसपर मुझे लाड़ आता है अक्सर....आपदोनों के लिए करता-धरता कुछ नहीं है। हाँ, बतकही-बकबकी में अव्वल अवश्य है। यह सब वैसे समय में जब प्रतिभावानों का झुण्ड मेरे आगे-पीछे दौड़ लगाता दिख रहा है; मैं अपने फिसड्डीपन का पीठ थपथपाने में अलमस्त हूँ।

देव-दीप, शोध जैसे महत्त्वपूर्ण काम के लिए मेरी पात्रता न के बराबर थी। मेरे गाइड ने हौसला आफजाई की, तो मेरा उत्साह कपार पर और सोच फुनगी पर चढ़ गया। मुझे खुद से ताज्जुब था कि जो लड़का ठीक से अपनी बबरी तक नहीं सँवार सकता है, सलीकेदार कपड़े(मुफ्ती, लिवाइस, काॅटन्स, फ्लाइंग मशीन....ब्रान्डेड) तक नहीं पहन सकता है....वह अपने गुणवान/प्रतिभावान मित्रों के संगत…

चला गया.....जो कहता था यारी है यार मेरी....यार मेरी ज़िन्दगी

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बरखुरदार! प्राण नहीं रहे।

नहीं रहा वह चरित्र अभिनेता जिसने सिनेमा के परदे को डायलाॅग बोलने की तमीज़ और अक़्लमंदी दी। भाषा के परिधान में लिपटी आपकी ज़ुबान बोलते ही कैसे पहचान ली जाती है....यह प्राण की संवाद अदायगी से जाना जा सकता है। प्राण साहब! का गेटअप, मेकअप, चाल-ढाल, उठने-बैठने और चहलकदमी के तौर-तरीके सब लाजवाब थे। नकल नहीं। दुहराव नहीं। बनावटीपन का किनारा या झोल नहीं।

उनके मन ने शौक पाला था फोटोग्राफरी का। बने फिल्म के चरित्र अभिनेता। धाकड़ खलनायक। बेजोड़ अदाकार। 1949 में ‘जिद्दी’ और ‘बड़ी बहन’ फिल्मों में उनकी भूमिका खलनायकी की जमी। सराही गई। 1956 में मीना कुमारी के साथ ‘हलाकू’ फिल्म में हलाकू डाकू की भूमिका से छा गए। फिर दिखें प्राण साहब फ़िल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ में राका डाकू के रूप में। शम्मी कपूर की लगभग सभी फिल्मों में वे नकारात्मक भूमिका में रहे और लोगों के मन में पैठते चले गये। ‘उपकार’ फिल्म ने उनकी भूमिका का ‘फ्लेवर’ बदल दिया। इस फिल्म में प्राण साहब! ने मलंग बाबा की य…

आपदा

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आपदा पर गीत लिखा
गाने लगी मुर्गियाँ

आपदा पर लोरी लिखा
सुनाने लगी गाय अपने बच्चे को

आपदा पर कविता लिखी
कुतों ने ठोंक दिया ताल

आपदा पर कहानी लिखी
बकरियाँ भरने लगी हुंकारी

आपदा पर लिखता रहा कुछ न कुछ
सभी जानवर मनाते रहे उत्सव रोज-रोज

लोग कह रहे हैं
ये सभी आपदा में मृत उन जानवरों की आत्माएँ हैं....
जिन्होंने अभी तक आपदा-प्रबंधन करना नहीं सीखा था।