Posts

Showing posts from September, 2016

हिन्दी नाटक और कविता में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का योगदान

यह आलेख अपने उन विद्यार्थियों के लिए प्रस्तुत है जिन्हें हम किसी विषय, काल अथवा सन्दर्भ विशेष के बारे में पढ़ना, लिखना एवं गंभीरतापूर्वक सोचना सिखा रहे हैं। जिनसे हम मौलिक सर्जना की अपेक्षा कर रहे हैं।हमहिन्दी एवं हिन्दीतरभाषी विद्यार्थी का अंतर मिटाने की दिशा में लगातार प्रयत्नशील हैं। यह और बात है, हम शिक्षण तथा शैक्षणिक आधारभूत सुविधाओं के भयंकर अभाव से गुजर रहे हैं। इसके बावजूद हमारे पास जो है और जितना है उसी को मिलाकर हर रोज बेहतर करने की दिशा में निरंतर गतिमान हैं। हम बेहद संतुष्ट हैं और आशान्वित भी। धन्यवाद! ---------------- https://hindirgu.blogspot.in/ 
राजीव रंजन प्रसाद सहायक प्रोफेसर, हिन्दी विभाग राजीव गाँधी विश्वविद्यालय ------------------------------------
साहित्य की लिखा-पढ़ी की थोड़ी भी जानकारी रखने वालों के लिए भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का नाम अनजाना नहीं है। वही भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जिन्होंने कहा है-‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल/बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।’ इतनी महत्त्वपूर्ण बात भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने तब कही जब भारतीय स्वाधीनता का प्रथम संग्राम 1857 ई…

अपनी दुनिया के बारे में

प्रिय देव-दीप,
एक अध्यापक सबसे अच्छा विद्यार्थी होता है। वह विनम्र होता है और अनुशासित भी। उसकी दृष्टि में ज्ञानानुशासन के लिए बाहरी बल प्रायः आरोपित हुआ करते हैं। इसका अपना महत्त्व है जो विद्यार्थी में धैर्य, सयंम, संतोष आदि की भावना जगाते हैं। लेकिन अन्दर का आत्मबल सबसे अधिक कारगर और लाभकारी होता है। यह आत्मबल जीवन-मूल्य पर टिका होता है। जीवन-मूल्य यानी जीने का वह उचित ‘पैटर्न’ जिससे हमारे स्वभाव, संस्कार, अनुभव, स्मृति, कल्पना, दृष्टि एवं चिन्तन आदि को सही खुराक मिलती है। इस तरह जीवन-मूल्य प्रत्येक व्यक्ति के व्यवहार, विचार एवं व्यक्तित्व में संचित पोषक सामग्री है। शिक्षा से इसी जीवन-मूल्य की संरक्षा होती है; उसे विकसित होने का सुअवसर मिलता है। आजकल विकास का अर्थ बेहद सीमित हो चला है। हम अमीरी अथवा धन-संग्रह को मानव-विकास का सूचकांक मानने लगे हैं। भौतिक सामग्रियों के बटोर को अपने सुख-संधान का प्रतीक मान बैठे हैं। 
देव-दीप, यह ग़लत है, बिल्कुल भ्रान्त अवधारणा है। आज शिक्षा-विधान इसीलिए संकटग्रस्त हैं; क्योंकि उनमें मूल्यहीन कार्यकलापों का प्रचलन सबसे अधिक हो रहा है। पूँजी की संस्कृति…

हिन्दी मेरे तनख़्वाह की भाषा है!

.............. 
प्रिय देव-दीप,
सरकारी कैलेण्डर में 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस पड़ा है। हमारे विश्वविद्यालय में हिन्दी सप्ताह समारोह मनाए जाते हैं। पिछले साल भी मैं शरीक हुआ। बहुत सारी प्रतियोगिताओं में विद्यार्थियों की भागीदारी देख बड़ी खुशी हुई। कईयों ने पुरस्कार पाए। अपनी तैयारी में मदद के लिए हमें धन्यवाद कहा। उनका उत्साह देख कार्यक्रम की सफलता पर मैं भी अभिभूत हो लिया।
देव-दीप, तुम जानते हो कि हिन्दी मेरे तनख़्वाह की भाषा है। हिन्दी का अध्यापक हूँ। सब विषयों की तरह यह भी एक रुचिकर विषय है। इस भाषा में कई लेखकों ने अच्छी कहानियाँ लिखी हैं, उपन्यास भी। कविताएँ तो इतनी सारी कि तुम्हारा घंटों मन रमा रहे। पता नहीं लोग हिंदी-हिंदी क्यों चिल्लाते हैं। इस भाषा को सबसे कम बोलने वाले कुछ ज्यादा ही शोर मचाते हैं। इस बारे में लिखने वालों की भी कमी नहीं है। मैं भी खूब लिखता था। पर अब आदत बदलनी पड़ी। मैं जहाँ पढ़ाता हँू, वहाँ हमसे सटे ही अंग्रेजी विभाग है। वहाँ कभी लोग अंग्रेजी-अंग्रेजी नहीं चिल्लाते हैं। मैं उनसे पूछता हूँ-क्या आपके सारे बच्चे रोजगार पा जाते हैं। वे साफ कहते हैं, इस बारे में सोचना ह…