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Showing posts from May, 2015

पत्रकारिता की उदास नस्लें

प्रिय देव-दीप,

पत्रकारिता दिवस है आज। 30 मई। एक फोन नहीं। इस आशय से। मैं पत्रकार नहीं हूं; लेकिन अकादमिक क्षेत्र में पत्रकारिता का ही, तो शोधार्थी हूं। कहीं ग़लत दिशा में तो नहीं आ गया। लौटना मुश्किल। अब ऐसे ही बादुर की तरह लटके रहना है। तुम सब बड़े हो और अपनी कैरियर देख सको; इसकी कोशिश में जुटना है।

(चुप। राजीव। खमोश। खामोश राजीव।
शांत। शांत राजीव।
कुछ नहीं। नथिंग। नील बट्टा सन्नाटा।
कल सुबह ऐसे उठो, जैसे दुनिया में पहली बार सूर्योदय देख रहे हो।
हवा के चलते हुए। पहर को बीतते हुए। अपनी खुराक पर जाओ। भोजन पर जाओ। कपड़े और चेहरे के रचाव-बनाव पर जाओ। अपने प्रति अधिक उदार बनो। औरों के प्रति ज्यादा ढीलापन नहीं। सीखो।
विश्व में कितने देश हैं। याद करो। राजधानी। महत्त्वपूणर्र स्थल। नेता-परेता। व्यापार-वाणिज्य। भारत-भूगोल। बांध-परियोजना। डिजिटल इंडिया। मेक इन इंडिया। ब्रांड। बाॅडी लोशन। चिप। स्मार्ट फोन... भाषा। भाषा की तकरीरें। भाषाओं में सूचना। सूचनाओं की कैटेगिरी। लोग। मानुष। जल, जंगल, जमीन। अधिग्रहण। बाज़ारीकरण। निजीकरण। पढ़ों और बांचों। लिखों और छाप दो। जुड़ो मत। जुड़ने की शर्त मत लादो। ज्ञान ग…

घड़ी

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एक दिन दीवाल घड़ी के सेकंड की सुई टूट गई। मेहरारू ने देखा कि मैं उसकी चिंता में शामिल नहीं हूं; उसके ‘समय’ पर ध्यान नहीं दे रहा हूं, तो उसने झाड़ू की सींक नापतौल के हिसाब से घड़ी में फिट कर दी। बड़ी कलाकारी; घड़ी चलने लगी।

अब कोई भी समस्या आती है, तो वह कहती है; उनसे मत कहिए वे वेद लिख रहे हैं। अपने सर से भी अधिक ज्ञानी समझते हैं खुद को। उनको गंगा नहाने दीजिए।
आप अपनी समस्या का हल मुझसे पूछिए।

वाह! मेहरारू राम!वाह!

शोध में अवरोध

राजीव रंजन प्रसाद ................ 

(यह पाठकीय प्रतिक्रिया जनसत्ता अख़बार को भेजी गई है)
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सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी ‘दुनिया मेरे आगे’(22 मई) स्तंभ में मौजूदा अकादमिक हाल-स्थिति को लेकर चिंतित दिखाई देते हैं। वाजिब हैं, इस बारे में उनका इस तरह संवेदनशील होकर सोचना। शोध को भारतीय ज्ञान-मीमांसा में ज्ञानोत्पादन की नवाचारी विधा अथवा शाखा कहा गया है। किन्तु आज शैक्षणिक संस्थान पहले भ्रष्ट हुए हैं, सत्ता-शक्तियां बाद में उनसे संक्रमित-प्रभावित हुई हैं। मेरी दृष्टि में उच्चशिक्षा में व्याप्त अनैतिक विधानों ने किसी भी चीज को सम्यक् अथवा विधिसम्मत मानने से इंकार कर दिया है। लिहाजा, मौजूदा व्यवस्था इसका निर्बाध-निर्विघ्न अंतःपाठ करने में जुटी हुई है। अकादमिक अध्येताओं को देखें, तो अधिसंख्य पीएचडीकर्मी स्तरहीन हैं और योग्यता के नाम पर उनके पास डिग्री मात्र है। बाकी सब नील-बट्टा-सन्नाटा। एक शोध-छात्र के रूप में यह कहना खुद को मर्मांहत करना है, पर हकीकत यही है। कौन बोलेगा, यहां तो जो बोलो सो निहाल की स्थिति है। राम-राम, हाय-बाय, हंसी-ठिठोली, गप-शप, चाय-पानी, फैशन-रोमांस आदि पीएचडीधारियों क…

पीकूः रिश्तों में कोई मध्यांतर नहीं!

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समीक्षा, फिर कभी! वैसे इसकी जरूरत किसे है?

नकली आदमी

------------- एक हद के बाद चीजें बेकार पड़ने लगती हैं, खराब होने लगती है। ........

ज़िन्दगी लफ्फाजी से नहीं चलती है, कौन नहीं जानता!

पर मैं बेहद प्रसन्न कमरे में दाखिल हुआ।

‘चाय पिला...सीमा...’
‘हां, मैं नौकर बैठी हूं न...’

‘पी लीजिए खुद बनाकर, हां मैं भी पीउंगी।’
‘और देव-दीप’

कुछ नहीं बोली। यानी जो मन में आए सो करो। मुझसे क्यों पूछते हो। सुनते हो कभी मेरी।...
यह मैं सोच रहा थ...यह शोध-पत्र छप जाए!

‘किस से बात कर रहे हो,’
‘खुद से’
‘क्यों हम सब आदमी नहीं हैं क्या...?’
‘आज मेरा रिसर्च पेपर फाइनल हो गया। चार महीने से जम्भ जैसा उस पर लगा था।'

‘तो..’
‘तो क्या, कुछ भी मत कर...चाय पी!’
‘बस यही न करना है!’
‘अरे! यार चीनी का डब्बा किधर रख दी, तुम अजीब मेहरारू हो...’
‘और तुम जो डब्बे का ढक्कन ऐसे बंद कर देते हो कि किसे से न खुले।’

‘सीमा, सर खुश हैं...अच्छा बन पड़ा है पेपर’
‘इसी से नौकरी भी मिल जाएगी’
‘नहीं, वो अलग बात है!’
‘आयं जी, आपको इ सब करने में अच्छा लगता है; लेकिन इ काहे नहीं सोचते हैं कि बचवन सब बड़ा हो रहा है।’

‘हां यार, कर ही, तो रहा हूं!’
‘कर नहीं रहे हैं, गवां रहे हैं।’
‘तो क्या कह…

अपनी समस्या लिखें सीधे माननीय प्रधानमंत्री को

यह पहली बार है कि आप अपनी बात सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंचा सकते हैं। यह डिजिटल इंडिया का कमाल है। कुछ लोगों ने मुझे कहा कि आप अपनी समस्या गाने की जगह इसे सीधे प्रधानमंत्री से कहिए और अपना काम कीजिए। मुझे लगा, इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। अपने शोध-कार्य के दरम्यान काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने मेरा आनुषंगिक बिल एकतरफा मनमर्जी का कानून मुझ पर थोपते हुए, मेरे बिल को खद्यारिज कर दिया। मैंने कहा कि जब तक मुझे मेरा आनुषंगिक बिल नहीं मिल जाता है, मैं अपनी लड़ाई जारी रखूंगा। दरअसल, लोगों ने सिखाया है, सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं!
16 मई, 2015 को माननीय प्रधानमंत्री को पुनःअनुरोध पत्र भेज रहा हूं। ---------------------- पिछले दिनों आपको लिखा, तो आपने 06 फरवरी, 2015 को मेरी शिकायत को अपने संज्ञान में लेते हुए पंजीकृत किया है और उच्च् शिक्षा मंत्रालय को अग्रसारित किया है। लेकिन अभी तक इस सम्बन्ध में कोई कार्रवाई नहीं की जा सकी है। उसका विवरण निम्न हैः Dated: 06/02/2015 Your Grievance has been lodged vide Registration number PMO/W/NA/14/0107777  and has been forwarded to the D…

नकेल प्रशासन की

राजीव रंजन प्रसाद ................ 

(यह पाठकीय प्रतिक्रिया जनसत्ता अख़बार को भेजी गई है)
हालिया घटना ‘दलित की बरात’ में पत्थरबाजी का है जिसे जनसत्ता ने अपने 14 मई की सम्पादकीय में संवेदनशील ढंग से सामने लाया है। ये फुटकल घटनाएं नहीं हैं। यह समाज की रीढ़ में छेद कर उसमें जातीय वर्चस्व की अंकुशी लगाने वाली ‘अचेतन’ कील है। हमें समझना होगा कि भारत में जातीयता एक दंभ और अहंकार का काॅकटेल तैयार कर वर्गीय-संघर्ष को सदैव दावतखाने पर न्योंतती है। इसके पीछे सामंती मानसिकता के विषाणु-कीटाणु हैं जिसे भारतीय समाज ने कथित पुरोहितवादी ढकोसलों के आधार पर ‘चारमीनार’ के रूप में गढ़ा है, पोसा-पाला और निवाला बनाकर गटका है। आरक्षण-देवता का एक अनुदानिक-प्रपंच खड़ा कर अपनों को अपने से अलगा दिया है, परे टेर दिया है। आरक्षण के बहाने पूरे देश में राजनीतिक षड़यंत्र फल-फूल रहा है; बौद्धिक-सयंत्र प्रयोगशील है, जो यह मानता है कि किसी को योग्य बनाने से अच्छा है कि उसे ‘प्रतिभाशाली’ होने का सर्टिफिकेट थमा दो; किन्तु उसमें कबीर के कथनानुसार ज्ञान, क्रिया और इच्छा के हुनर-कौशल, काबिलियत, साहस एवं संकल्पशक्ति न पनपने दो। 
हद…

युवा राजनीतिज्ञ के नारे और मुहावरे में वंशवादी कुनबे का एक और ‘सेल्फी’

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----------------  राजीव रंजन प्रसाद --------- राजीव रंजन प्रसाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में  युवा राजनीतिज्ञ संचारकों के व्यक्तित्व, व्यवहार एवं नेतृत्व से सम्बन्धित संचारगत प्रणाली एवं मनोभाषिक अनुक्रिया-अनुप्रयोग सम्बन्धी सम्बद्धता पर शोध-कार्य कर रहे हैं। ------------------------- नेता चन्द्रबाबू नायडू के बेटे की हैसियत यह है कि वे अमरिका में पढ़े-लिखे हैं; लेकिन योग्यता इस काबिल भी नहीं कि अपने देशवासियों और गरीब जनता के लिए कोई नवाचार आधारित स्वउद्यमिता कार्यक्रम शुरू कर सकें। जो एनजीओ टाइप न हो। जिसमें लूट-खसोट की समाज-सेवा का दिखावा न हो। हर आदमी के साथ इस प्रयास में तत्पर लोगों द्वारा ऐसा बर्ताव हो कि लोगों के चेहरे खुशी से दमके और प्रसन्नता से लैस नज़र आए; लेकिन विदेशी ‘स्कूलिंग’ भी भारतीय विश्वविद्याालयों की तरह ही अनुपयोगी हो चली हैं। अतः अमेरिका के स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीए किए नारा लोकेश राजनीति करेंगे। वंशवाद की बेल बजाएंगे। अपने पिता के नाम का सिक्का अपने पाॅकेट में धरेंगे। जगन रेड्डी की तरह यह भी सड़क से संसद तक गरजेंगे, तड़केगे और भड़केंगे।
ओह! लोग कैसे कहते हैं…

ACEPHALOUS HUMAN BIENG: In 22nd Century Era

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कई दशक वैज्ञानिक शोध-अनुसन्धान में निवेश के बाद यह निष्कर्ष प्रमाणित हो पाया था कि मनुष्य के दिमाग को ‘डिरेल’ करने के बावजूद दुनिया यथावत बनी रहेगी। इस दुनिया के होने का कारण मनुष्य मात्र नहीं है बल्कि वह पारिस्थितिकी-तंत्र है जिसे प्रकृति अपने स्वनियमन और स्वनियंत्रण द्वारा परिचालित करती है। लेकिन मनुष्य ने हमेशा कुदरती स्वभाव से अधिक मान स्वयं को दिया। उसने यह माना कि वह चरम बदलाव तथा यांत्रिकी-प्रौद्योगिकी-तकनीकी आधारित ज्ञानकाण्ड द्वारा प्रकृति की अहमियत और उसकी नैसर्गिक सत्ता को अर्थहीन साबित कर देगा। लेकिन जब इसके उलट ‘हाइपोथीसिस’ पर काम करते हुए वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने मनुष्य को ही जागतिक सत्ता में सर्वाधिक ‘डाय्लूट’ कर देखा, तो पाया कि मनुष्य तो प्रकृति का एक ‘एक्सपेरिमेंटल टुल्स’ का हिस्सा मात्र है। अर्थात मनुष्य हो या न हो दुनिया विकल्पहीन नहीं है।  --------------------- राजीव रंजन प्रसाद ''वे हमारे हाथ की लकीर देखते हैं और चेहरे पर पसरी हुई आर्थिक कंगालियत; और यह घोषणा कर डालते हैं कि हमारी…
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----------------------  मोहतरमाएं सजे-सजीले ढंग से कांग्रस की राजनीति में हवा देती हैं! राहुल इन्हीं सौन्दर्य-सुंदरियों के बयार में आलोचना उलीचते हैं। मोदी सरकार पर ग़रजते-बरसते हैं। मि. राहुल अपनी सूट-बूटियन को पहले राजनीति के सदाचार वाली ताबीज़ पहनाएं....फिर तड़के-भड़के-गरजे संसद से लेकर सड़क तक।  और आपके बाबू नेताओं के नखरे तो और अजीबोगरीब है; खैर! नाॅनसेंस बेवकूफी, हद है यार! राहुल की दिल्ली युवा टीम:   शर्मिष्ठा मुखर्जी (49 साल)  अमृता धवन (29 साल) रागिनी नायक (32 साल)  अभिषेक दत्त (35 साल)  आले मोहम्मद इकबाल (25 साल)  राहुल ढाका (29 साल)  अमन पवार (26 साल)  रिंकू जयंत (39 साल)  राजेश गोयल (45 साल)  चैतन्य सिंह (25 साल)  प्रेरणा सिंह (30 साल)  अनम हुसैन (25 साल)

झूठे सम्मोहन का वृत्तचित्र

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शताब्दी वर्ष में भारत रत्न महामना मदनमोहन मालवीय जी का परिसर

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----------------- राजीव रंजन प्रसाद --------- संस्कार और मूल्य पैदा करने और उसे बढ़ावा देने का दावा करने वाला बीएचयू परिसर आज शर्मसार है। यह शर्म भी हम जैसे विद्यार्थियों के नाम दर्ज है। कुलगीत गवाने वाले सेमिनारी-प्रोफसरों अथवा इसी तरह के आयोजकी ढकोसलों में सालों भर फांद-कूद करने वाले बुद्धियाए लोगों के लिए यह कोई बड़ा मसला नहीं है। मसला तो उनके लिए भी नहीं है, जो एक ढर्रे पर काम करने के आदी हैं और जिनकी दृष्टि में ज्ञानोत्पादन नितान्त फालतू काम है, समय का गोबर-गणेश करना है। सिर्फ एक माह की घटनाओं का तफ्तीश करें, तो मालमू देगा कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का वास्तविक चरित्र क्या है और रंग-रूप? 
चूंकि इन सब बारे में बोलने का खतरा मोल लेना अपने को असुरक्षित मनोदशा में झोंक देना है या फिर उन शुभचिंतकों तक से मोर्चा ठान लेना है जिनकी निगाह में आप अपनी योग्यता और काबिलियत का लोहा मनाते आए हैं; इसलिए अधिसंख्य की बोलती बंद रहती है; सब अपने कैरियर को उत्कर्ष और चरमसुख की उच्चतर अवस्था पर ले जाने के लिए पेनाहे रहते हैं। 
यह कितना अफसोसजनक है कि माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के संसदीय क्…

अखिलेश यादवः यूपी में लोग मुझे पहचानते नहीं है!

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---------------------------------- राजीव रंजन प्रसादका एक समाजमनोभाषिक रिपोर्ट ------------------------- ''मोदी जी की ‘मेक इन इंडिया’ ने हम शोध-छात्रों की अध्येतावृत्ति में दिसम्बर माह से बढ़ोतरी का घोषणा किया। लेकिन विश्वविद्यालय ने फरवही माह तक के जो शोध-अध्येतावृत्ति प्रदान की है उसमें यह बढ़ा हुआ पैसा नहीं प्राप्त हुआ है। यही नहीं पूछने पर विश्वविद्यालय के लोगकहते हैं कि-'जाइए, मोदी जी से पूछ लीजिए।' यार! आपलोग की हैसियत हो तो मेरी बात उनतक पहुंचा दीजिए कि ऐसी धोखाधड़ी और ग़लत नियत रही, तो आपकी दुकानदारी ज्यादा दिन नहीं चलने वाली।-राजीव रंजन प्रसाद'' ----------------------------------------
भारत युवा देश है। आंकड़ों में सिर-पांव-हाथ मिला दें तो देश की पूरी आबादी की लगभग दो गुनी। यहां प्रत्येक पांच में से एक खुद को दूसरों से भिन्न और असाधारण मानते हैं।प्रत्येक पच्चीस के समूह में सेएक नेता होने का दावा करते हैं। कोई दलीय छात्राधिकारी है, तो कोई पद-विभूषित संयोजक-सचिव-अध्यक्ष।सब के सब अपने दावे में किसी बड़े नामचीन अथवा स्वनामधन्य नेता के बिरादर हैं, रिश्तेदार हैं या फि…

‘सो काॅल्ड कमिटेड’ राहुल

क्या आपने परिकथा के मई-जून अंक में फिल्म ‘मैरी काॅम’ की समीक्षा पढ़ लीः ‘मेरा नाम मैरी काॅम’ .............. 
राजीव रंजन प्रसाद --------------------
(यह पाठकीय प्रतिक्रिया जनसत्ता अख़बार को भेजी गई है)
‘राजनीति की राह’(8 मई) शीर्षक से प्रकाशित समांतर ब्लाॅग में  अर्चना राजहंस मधुकर ने राहुल गांधी के व्यक्तित्व, व्यवहार एवं नेतृत्व के भीतरी परतों को टटोला है और अपनी असहमति के साथ उपयुक्त आशंकाएं जाहिर की है। इस घड़ी राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी में बाहैसियत उपाध्यक्ष पद पर काबिज़ हैं। नेता(?) के रूप में उभरने से पहले वे अज्ञातवास में अध्ययनरत थे। सार्वजनिक ज़िदगी में प्रकट हुए, तो उसे कांग्रेस ने अवतार सरीखा तरज़ीह दिया। व्यक्ति योग्यशाली न हो तो उसे यथाशीघ्र पद देकर ‘योग्य’ घोषित कर दिया जाता है। जबकि ह़कीकत में एम.फिल किए राहुल गांधी राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा(UGC NET) उत्तीर्ण करने तक की काबिलियत रखते हैं, सबका सहमत होना संभव नहीं है। अध्ययनजीवी व्यक्ति भी नेता होता है और वह अपने अध्यापन-कर्म द्वारा नेतृत्व करता है। कहा जाना चाहिए कि राहुल इस नेतृत्व में सफल नहीं हो सकते थे, इसलिए आसान राह च…

Winglish-English

Day 1 Dear friends,
What you say and how you say it!
It‘s matter of conversational control. For conversational control; to listen closely and reply well is the highest perfection we are able to attain in the art of conversation. Conversational control does not mean that you can control your own conversation, and in time be able to influence others and encourage them to respond in a positive and relevant way.  They include how to handle personal criticism, how to put forward a proposal, how to register a protest, how to disagree without being aggressive, how to be creative, how to negotiate, how to buy and sell, how to interview and praise, and how to contribute to a meeting. Such guidelines do not tell us what to say but provide indicators to keep us on track. Conversational control therefore is a skill. It can be learnt. There are principles to separate poor performance from effective high performance.
Conversation: -Positive -Relevant way

Conversational skills: -When to speak and when to lis…

सरोगेसी लिडरशिप: प्रचार की पैदाइश नई पीढ़ी

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राजीव रंजन प्रसाद -------------------------
1. सबके चाल-मोहरे एक जैसे हैं। तिकड़म-जुगाड़ भी लगभग एकसमान। सब के सब नेता हैं और भारतीय नेता जिनके दिन-रात सब पूरे होते हैं; लेकिन जनता या तो खालीपन में जिन्दगी गुजारती है या फिर अधूरेपन में या कि अंधेपन में। भारत में नेतृत्व का मतलब ही है कि लफ्फ़ाज होना। यदि न हुए तो जुगाड़ू होना। वह भी नहीं हुए तो एक्टिविस्ट से अराजकवादी होना। कुछ भी न होना तो सिर्फ यह होना कि आपकी डीएनए में किसी नेता-परेता के गुणसूत्र पड़े हों; बस बाकी काम सरोगसी के नए उपकरण अर्थात पैसा, प्रचार एवं प्रभाव की तिकड़ी से बिल्कुल संभव है।
2. आप सच बोलिए, तो सियासी लोग आपसे आपका बबरी नवाते हुए झूठ बुलवा लेंगे। उनके पास बुलवाने के अनगिनत तौर-तरीकें हैं, ज्ञान और विज्ञान है। उनके पास धन है, संसाधन है और अकूत पैसा के बल पर बटोराया हुआ शक्ति कि उनकी कई पीढि़यां बिना किसी कमाई-धमाई के राज करेगी। यानी हिंग लगे न फिटकरी और रंग चोखा आए तत्काल संभव। यह यांत्रिक युग है और इक्कीसवीं सदी। पैसा, प्रचार और प्रभाव इन्हीं तीनों के बल पर भारत की राजनीति का ‘जन पैक’ मुटाया दिख…