हिन्दी नाटक और कविता में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का योगदान

यह आलेख अपने उन विद्यार्थियों के लिए प्रस्तुत है जिन्हें हम किसी विषय, काल अथवा सन्दर्भ विशेष के बारे में पढ़ना, लिखना एवं गंभीरतापूर्वक सोचना सिखा रहे हैं। जिनसे हम मौलिक सर्जना की अपेक्षा कर रहे हैं। 

हम

 हिन्दी एवं हिन्दीतरभाषी विद्यार्थी का अंतर मिटाने की दिशा में लगातार प्रयत्नशील हैं। यह और बात है, हम शिक्षण तथा शैक्षणिक आधारभूत सुविधाओं के भयंकर अभाव से गुजर रहे हैं। इसके बावजूद हमारे पास जो है और जितना है उसी को मिलाकर हर रोज बेहतर करने की दिशा में निरंतर गतिमान हैं। हम बेहद संतुष्ट हैं और आशान्वित भी। धन्यवाद!

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राजीव रंजन प्रसाद
सहायक प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
राजीव गाँधी विश्वविद्यालय
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साहित्य की लिखा-पढ़ी की थोड़ी भी जानकारी रखने वालों के लिए भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का नाम अनजाना नहीं है। वही भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जिन्होंने कहा है-‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल/बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।’ इतनी महत्त्वपूर्ण बात भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने तब कही जब भारतीय स्वाधीनता का प्रथम संग्राम 1857 ई. में घटित हो चुका था। पूरे हिन्दुस्तान में नवजागरण की अलख जगी हुई थी और ‘हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान’ के लोकप्रिय राग के साथ हिन्दी नई चाल में ढल रही थी। यह वक़्त 1873 ई. का था। दरअसल, नवजागरण काल ने हिंदी साहित्य को नए सिरे से रचा-बुना। नई लीक बनी। भाव, विचार, कहन और लेखन की इस धारा में बेजोड़ और जानदार चीजें बनी। कहानी, कविता, नाटक, कथा, उपन्यास बहुविध विधाओं में प्रभूत लेखन जिस तरीके और मनोयोग से हुआ, उसमें एक नाम अग्रणी है, वह है-भारतेन्दु हरिश्चन्द्र। 

भारतेन्दु की अगुआई में युगांतर बदलाव हुए। साथ ही, इस काल में गद्य और पद्य दो भिन्न किन्तु विशिष्ट धाराओं का प्रादुर्भाव हुआ। भारतीय साहित्य के इतिहास को यह काल भाषा, समाज, संस्कृति, राजनीति आदि की दृष्टि से काफी हद तक प्रभावित करता दिखाई देता है। साहित्य लेखन के स्वरूप, शिल्प एवं शैली में अन्तर्वस्तु के अतिरिक्त तथ्यनिरूपण के स्तर पर भी ढेरों बदलाव आए। और इन सभी बदलावों के केन्द्र में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र थे। किताबी समझ तक अपनी सोच सीमित करने की जगह नई पीढ़ी को भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के योगदान के बारे में अवश्य जानना चाहिए। क्योंकि जब भारत-भूमि परतंत्र और हम सबकी सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना गुलाम थी। ब्रिटिश आकांक्षा भारतीय जन्मभूमि को लूटने-खसोटने में जुटी हुई थी। इंग्लैंड आधारित औद्योगीकरण भारत में अनौद्योगिकीकरण को पैदा कर रही थी। चारो ओर हताशा और निराशा का माहौल था। धनिक यानी आभिजात्य लोग अंग्रेजी सुख-वासना में अनुरत थे। सनातन-शास्त्रीय महापंडितों की जमात ढपोरशंखी क्रियाकलापों और कर्मकाण्डों में जुटी हुई थीं; भारतेन्दु हरिश्चन्द्र सबसे आगे आए। 

यह कहा जाता है कि भाषा जहाँ मौन हो जाए, नाटक का जन्म वहीं होता है। अर्थात् नाटक जनता की चेतना का मूक-नायक होता है। शायद इन्हीं अर्थों में नाटक को आचार्य भरतमुनि ने पंचम वेद की संज्ञा दी है। सचमुच नाटक निरक्षर-ब्रह्म है। नाटक आम-आदमी का अख़बार है जो लिपि में नहीं साक्षात भाव-मुद्रा, मुखाकृति, सजीव भंगिमा, हस्त-संचालन, देहभाषा, मौन आदि में प्रकट होते हैं। हिन्दी नाटकों का मूल संस्कृत से ही है। संस्कृत में विश्व की सबसे प्राचीन नाट्य परम्परा मिलती है। आचार्य भरतमुनि का नाट्यशास्त्र इस विषय का सबसे प्राचीन ग्रंथ है। वास्तव में जो रचना श्रवण द्वारा ही नहीं अपितु दृष्टि द्वारा भी दर्शकों के हृदय में रसानुभूति कराती है; उसे नाटक या दृश्य-काव्य कहा गया है। नाटक में श्रव्य-काव्य अधिक रमणीय होती है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र स्वयं इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। भारतेन्दु जब कविताएँ लिखते थे, तो उसके लिए ब्रजभाषा और वैसे ही सुमेल, सुगठित छंदों का प्रयोग करते थे। परन्तु जब ये नाटकों या प्रहसनों की रचना करते थे, तो उनकी शैली बीच-बीच में कविताएँ लिखने की थी जो प्रायः खड़ी बोली की होती थी। यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है कि भारतेन्दु काल में आधुनिक गद्य साहित्य की परम्परा का प्रवर्तन नाटकों से हुआ। बाद के समय में अभिनयशलाओं के न होने के कारण इस दिशा में अपेक्षित बदलाव नहीं हो सके। साहित्यिक दृष्टि से देखें, तो भारतेन्दु के नाटकों में देशभक्ति का स्वर मुखर और ऊँचा था। हम देख सकते हैं कि नीलदेवी, भारतदुर्दशा आदि नाटकों के भीतर आई हुई कविताओं में देश-दशा की जो मार्मिक व्यंजना है, वह तो है ही; बहुत-सी स्वतन्त्र कविताएँ भी उन्होंने लिखीं जिनमें कहीं देश की अतीत गौरव-गाथा का गर्व, कहीं वर्तमान अधोगति की क्षोभभरी वेदना, कहीं भविष्य की भावना से जगी हुई चिंता इत्यादि अनेक पुनीत भावों का संचार पाया जाता है। हम भारतेन्दु-काल का गंभीर अध्ययन करते हुए पाते हैं कि भारतेन्दु अपनी रचना-यात्रा में अकेले नहीं थे, बल्कि बंधु-बांधव की पूरी मंडली उनके साथ थी। यह मंडली भारतेन्दु मंडली के रूप में चर्चित हुई। इस मंडली में स्वनामधन्य जो महत्त्वपूर्ण लोग शामिल थे, वे थे-उपाध्याय पंडित बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’; पंडित प्रतापनारायण मिश्र; बाबू तोताराम;  ठाकुर जगमोहन सिंह; लाला श्रीनिवासदास; पंडित बालकृष्ण भट्ट, पंडित केशवराम भट्ट; पंडित अंबिकादत्त व्यास; पंडित राधाचरण गोस्वामी। 

प्रतिभा के धनी भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का हिन्दी नाटक की दुनिया और काव्य-संसार में जो अप्रतिम योगदान है; उस पर एक नज़र डालें तो :

उनकी प्रमुख पत्रिकाएँ थीं : कविवचन सुधा, हरिश्चन्द्र मैग्जीन(चन्द्रिका), बालबोधिनी

मौलिक नाट्य जिसकी रचना भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने की  : वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, चन्द्रावली, विषस्य विषमौषाधम्, भारत-दुर्दशा, नीलदेवी, अंधेरनगरी, प्रेमयोगिनी, सतीप्रताप(अधूरा)

अनूदित सामग्री में महत्त्वपूर्ण हैं : विद्यासुन्दर, पाखण्डविडम्बन, धनंजयविजय, कर्पूरमंजरी, मुद्राराक्षस, सत्यहरिश्चन्द्र, भारतजननी

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल अपनी पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को सिद्ध वाणी का अत्यन्त सरस हृदय कवि कहा है। उनकी दृष्टि में प्राचीन और नवीन का सुन्दर सामंजस्य ही उनकी सर्जना-कला का विशेष माधुर्य है। भारतेन्दु की भाषा चाहे जिस ढंग की हो उनके वाक्यों का अन्वय सरल होता है, उसमें जटिलता नहीं होती। उनके लेखों में भावों की मार्मिकता पाई जाती है, वाग्वैचित्र्य वा चमत्कार की प्रवृत्ति नहीं। भारतेन्दु रचित नाटकों एवं कविताओं का भाषा और साहित्य पर गहरा असर पड़ा। दरअसल, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने गद्य की भाषा को परिमार्जित करने उसे चलता, मधुर और स्वच्छ रूप प्रदान करने का श्रमसाध्य कार्य किया। इसीलिए यह माना जाता है कि उन्होंने हिंदी साहित्य को एक नई दिशा, अवस्था अथवा स्थिति प्रदान की। इस प्रकार उनको हिन्दी गद्य के प्रवर्तक के रूप में लोकमान्यता प्राप्त हुई। 

हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने न सिर्फ गद्य की भाषा को माँजा, अपितु पुराने घिसे-पिटे अथवा रिवाजी शब्दों को प्रयोग से अलग करते हुए काव्यभाषा को काफी हद तक परिष्कृत एवं संस्कारित किया। भारतेन्दु का सबसे मुख्य अवदान हिन्दी भाषा को जनता के मुख एवं वाणी की भाषा बनाना था। इस लक्ष्य की षष्ठीपूर्ति में उन्होंने जागरूक जनता को शिक्षा के एक महत्त्वपूर्ण माध्यम के रूप में हिंदी भाषा को अपनाने पर बल दिया। आमजन को उन्होंने अपने भाव, संवेदना, विचार, अनुभव, दृष्टि, कल्पना, स्वप्न आदि को हिंदी भाषा में अभिव्यक्त करने हेतु प्रेरित किया। 

भारतेन्दु बँगला में नए ढंग के सामाजिक, देश-देशांतर सम्बन्धी ऐतिहासिक-पौराणिक नाटक, उपन्यास आदि देखे और हिंदी में वैसी पुस्तकों के अभाव का अनुभव किया। इसका इतना गहरा असर पड़ा कि उन्होंने हिंदी भाषा के लिए हरसंभव उद्यम किया। ‘कविवचन सुधा’ और ‘हरिश्चन्द्र मैग्जीन’(हरिश्चन्द्र चन्द्रिका) निकालकर साहित्य-सेवा में जुटे। ‘कविवचन सुधा’ की लेखन-शैली मनोहर और भाषा प्रभावशाली थी। भारतेन्दु ने नई सुधरी हुई हिंदी का उदय इसी समय से माना है। उन्होंने ‘कालचक्र’ नाम की अपनी पुस्तक में नोट किया है कि हिंदी नई चाल में ढली, सन 1873 ई. में। भारतेन्दु जी स्त्री-शिक्षा को लेकर सजग थे और उन्होंने पीछे ‘बालबोधिनी’ पत्रिका निकाली। भारतेन्दु लिखित ‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’ नाम का प्रहसन लिखा। इसमें धर्म और उपासना की आड़ में किए जा रहे अनाचारों-व्याभिचारों पर करारा व्यंग्य साफ सुनाई पड़ता है। परतंत्रता की बेड़ी तोड़ने और हर तरह की जड़ता को समाप्त करने को लेकर भारतेन्दु में असीम जुनून दिखाई देता है। अपनी साहित्यिक यात्रा में अंग्रेजों की ताड़ना का भी वे शिकार हुए; किन्तु देशवासियों के प्रति उनकी लेखनी सदैव निष्ठावान बनी रही। उदाहरण के रूप में ‘नीलदेवी’ में वर्णित यह पंक्ति रख सकते हैं-‘कहाँ करुणानिधि केशव सोए ?/जागत नाहिं अनेक जतन करि भारतवासी रोए।।’ वह यह भी कहते नहीं चूकते-‘अँगरेज राज सुख साज सजे सब भारी/पै धन बिदेश चली जात यहै अति ख्वारी।।’

हिन्दी नाटक और कविता के क्षेत्र में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के योगदान की इस सम्पूर्ण चर्चा में हम यह पाते हैं कि भारतेन्दु जिस समयकाल में साहित्य रचना कर रहे थे; वह काल आज की तरह स्वतंत्र, आजाद, उन्मुक्त बिल्कुल नहीं था। ‘पराधीन सपनेहूँ सुख नाहिं’ की शब्दावली का सूत्रपात करने वाले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र इसलिए भी नवजागरण काल के प्रवर्तक कहे गए कि उन्होंने हिंदी भाषा को खड़ी बोली में साकार कर नागरी का जो अवलम्ब दिया; पीछे कई मनीषी साहित्यकारों ने उस पथ को अपनी काव्य एवं सर्जना प्रतिभा से गूँजार कर दिया। इस प्रकार भावना के साथ साथ विचारों के सहमेल को पर्याप्त प्रधानता मिली। पद्य के साथ साथ गद्य का भी समुचित विकास हुआ। नाटक इन दो विधाओं के बीच की मुख्य कड़ी थी जिसे भारतेन्दु ने प्रमुखता के साथ आजमाया और इसे लोकमानस से सीधे जोड़ने का काम किया। भारतेन्दु के अतिरिक्त हिन्दीतरभाषी अनेक अन्य लेखकों ने हिन्दी में साहित्य रचना करके इसके विकास का मार्ग प्रशस्त किया। अनुवाद-प्रवीण कई मसीजीवी लेखकों ने प्रभूत मात्रा में अनूदित सामग्री उपलब्ध कराई जिसके कारण भारतीय विचार एवं विचारधारा में नई-नई धाराओं एवं वादों का सहज अवतरण हुआ। अतः हिन्दी नाटक और कविता के क्षेत्र में हिन्दी भाषा के मुख्य उन्नायक तथा प्रस्तावक की भूमिका में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का महती योगदान न सिर्फ महत्त्वपूर्ण है, अपितु अविस्मरणीय है। 
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