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Showing posts from June, 2011

19 जून, जन्मदिन और राहुल गाँधी

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आज राहुल गाँधी का जन्मदिन है। पिछले साल ‘राहुल जन्मदिवस’ पूरे रूआब के साथ मना था। हमारे शहर वाराणसी में भी ‘केक’ कटे थे। अख़बार के कतरन बताते हैं कि 10-जनपथ पर जश्न का माहौल था। लेकिन इस साल स्थितियाँ पलटी मारी हुई दिख रही हैं। राहुल गाँधी मीडिया-पटल से लापता हैं। उन्हें जन्मदिन की बधाईयाँ देने वाले बेचैन हैं। आज के दिन मैंने उनके लिए एक स्क्रिप्ट लिखा है; ताकि वे जनता के सामने अपने जन्मदिन के मौके पर बाँच सके। अगर उनकी ख़बर लगे, तो यह स्क्रिप्ट आप उन्हें पढ़ा देना अवश्य:

‘‘प्यारे देशवासियों, योगगुरु रामदेव अपने किए की सजा भुगत रहे हैं। उन जैसों का यही हश्र होना चाहिए। बाबा रामदेव की मंशा ग़लत थी। वह सत्याग्रह के नाम पर लोकतंत्र को बंधक बनाना चाहते थे। दिल्ली पुलिस ने समय रहते नहीं खदेड़ा होता, तो बाबा रामदेव संघ के साथ मिलीभगत कर पूरे कानून-तंत्र की धज्जियाँ उड़ाकर रख देते। संघ और भाजपा से उनके रिश्ते कैसे हैं? यह देश की जनता जान चुकी है। जनता जागरूक है। वह भारतीय राजनीतिज्ञों का नस-नस पहचानती है।

इस देश के लिए मेरी दादी और पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी ने जान दिए हैं। मेरे पिता ने अपना…

स्वप्न, हक़ीकत और जवाब की टोह

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प्रकृति:

‘‘तेज आँधी। चक्रवाती तुफान। लगातार बारिश। जलस्तर में वृद्धि। बाढ़ग्रस्त क्षेत्र। ज्वालामुखी का भीषण लावा। राख से ढँकता आसमानी परत। बिजली, पानी और भोजन की अभूतपूर्व किल्लत। संचार नेटवर्क ध्वस्त। प्राकृतिक निर्वासन का दुख। जीवन अस्त-व्यस्त। दुनिया संकटग्रस्त।’’

स्त्री:

‘‘यौन हिंसा में वृद्धि। बाल यौन-शोषण का बढ़ता ग्राफ। एमएमएस कांड और साइबर सेक्स। हाइयर सोसायटी में स्त्रियों का देह-बाजार। परोक्ष वेश्यावृति पर जोर। शारीरिक और मानसिक चोट। स्त्रियों के लिए उसूल की सलाखें। अमानवीय प्रतिबंध। दोहरी जिन्दगी जीने को अभिशप्त महिलाएँ। पुरुष समाज में औरतों की स्थिति नारकीय। पितृसत्तात्मक वर्चस्व। ’’

समाज:

‘‘पारिवारिक बिखराव। अवसादपूर्ण अकेलापन। असीम अतृप्त इच्छाएँ। भोग-लिप्सा की संस्कृति। भागमभाग की आभासी दुनिया। स्वयं के सराहे जाने की महत्त्वाकांक्षा। अचानक ‘ब्रेकअप’। मानवीय कटाव, दुराव और छिपाव की बढ़ती प्रवृत्ति। चाय-कॉफी और हैलो-हाय की संस्कृति। उत्सवधर्मी जीवन से विमुख जीवन-परम्परा। लोक-भाषा, लोकवृत्ति और लोक-संस्कृति से पलायन। सामाजिक-सांस्कृतिक विरूपण और टेलीविजन संसार। न्यू मीडिया के फाँ…

कांग्रेस का अवनमन-काल

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आजकल राजनीति में एक नई संस्कृति विकसित हुई है-‘पॉलिटिकल नेकेडनेस’ अर्थात राजनीतिक नंगई। इस मामले में कमोबेश सभी दल समानधर्मा हैं। सन् 1885 ई0 में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जिसके गौरवपूर्ण अतीत की समृद्ध परम्परा हमारे समाज में मौजूद है; वह भी इस संस्कृति की मुख्य किरदार है। उसकी क्षमता अकूत है, तो गति-मति अतुलनीय। भाजपा अपने जिस साम्प्रदायिक चेहरे का ‘फील गुड’ कराती हुई सत्ता से बेदख़ल हुई थी; अब वहाँ पूँजीपति परिजनों, औद्योगिक घरानों और सत्तासीन मातहतों का कब्जा है। समाचार पत्रों में चर्चित राबर्ट बढेरा एक सुपरिचित(?) नाम है। ए0 राजा, कनिमोझी, सुरेश कलमाड़ी और नीरा राडिया खास चेहरे हैं। यानी ‘हमाम में सब नंगे हैं’ और ‘हर शाख पर उल्लू बैठा है’ जैसी कहावत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में चरितार्थ हो चुकी है। ‘हर कुएँ में भांग पड़ी है’ वाली कहावत भी दिलचस्प है। सभी राजनीतिक दलों में ‘रिले रेस’ इस बात को ले कर अधिक है कि किस कुनबे का गार्जियन कितना सौम्य, विनम्र और सहज है? ताकि अपनी लंपटई और लंठई को उस श्ख़्सियत की नेकनियती के लबादे में भुनाया जा सके। भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आसान…

ख़त, आपबीती और मैं

परमआदरणीय पापा एवं मम्मी जी,
सादर प्रणाम!

यूजीसी-नेट का परिणाम आया, तो मेरी बाँछे खिल गई। जनसंचार विषय से जेआरएफ होना मेरी योग्यता की सामाजिक पुष्टि भर नहीं थी। दरअसल, पापा का विश्वास जो मैंने जीत लिया था; मम्मी की आशीर्वाद जो लगी थी; भाईयों के दुलार ने मुझे मेरे परिश्रम का सुफल जो सौंप दिया था। खुशी के इस क्षण में सीमा भी याद आ रही है जिसके अविचल और अगाध प्रेम ने मुझे यह सब कर सकने की हिम्मत दी। देव और दीप की तो मत पूछिए। उनके होने की वजह से जो परोक्ष दबाव(आर्थिक नहीं) महसूस करता था आज उसने मेरे मेहनत करने की लय और त्वरा को बढ़ा दिया है।

पापा, आपके जीवट संघर्ष ने मुझे अकथ प्रेरणा दी है। छोटी-छोटी चीजों का बड़ा ख्याल करने वाले अपने पापा का मैं किन शब्दों में बयान करूँ, मुश्किल है। पैसे की मोल बहुत कीमती है, लेकिन आपने उसे मेरे ऊपर जी भर के लुटाया। शादी के इतने दिनों बाद भी मैं आपके किसी खीज या चिड़चिड़ेपन का शिकार न बना। ऐसे पिता का पुत्र होने का गौरव मिला है, यह सोचते हुए आँखें सजल हो उठती है।

मोती दा, कुलदीप दा, सत्येन्द्र दा, मनोज भैया, श्रीकांत मनु, मेरे चाचा जी, जीजा जी और ससुराल पक…

नौकरी का जुगाड़-‘एक वैवाहिक जिम्मेदारी’

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कलम चलाने वाले बहुतेरे हैं जो इस आस में लिख रहे हैं कि देश के हाल-ओ-हालात सुधरेंगे। उल्टे बाबा रामदेव की हालत बिगड़ रही है। इस अप्रत्याशित समाचार ने मुझे अंदर तक भिंगो दिया.मैं विकल हुआ लिखने को कि यह तो सरकार की ज्यादती है। अचानक उसी घड़ी मोहतरमा का फोन आना था। दो-तीन बार काटा; क्योंकि दिमाग में बाबा-मंथन चल रहा था. मोबाइल कॉल की उधर से ‘रिपिटेशन’ बढ़ते देख, सोचा कि इनको एकाध-शब्द में निपटा ही लूँ।

फोन उठाते ही उनके सवाल से सामना हुआ-‘क्या चल रहा है?’
मैंने झट से कहा-‘यूजीसी नेट की तैयारी।’

सुनकर अच्छा लगा होगा, तभी तो वह बड़े भाव के साथ ‘गुडनाइट’ कहने को उद्धत हुई थी कि मेरे जीभ ने सच बतलाने की नंगई कर दी-‘सच कहूँ, तो अभी जी नहीं लग रहा था। बाबा रामदेव की बिगड़ती हालत के बारे में सुन बेचैन हँू। एक बंदा हमारे लिए सरकार से भिड़ गया है। अन्न-जल छोड़ दिया है। ऐसे दिव्य-संत के समर्थन में मुझ जैसे लिखनेवाले कुछ न लिखें, तो धिक्कार है। नाहक ही पत्रकारिता में ‘गोल्ड मेडल’ ले रखा है। रोज़-रोज़ तो अपना कोर्स-सिलेबस पढ़ना ही है।’’

फोन कट चुका था। सोचा इतना झाँसेदार कहने का असर सकारात्मक ही पड़ा होगा। एक क…

एम0 एफ0 हुसैन के मरने पर फिदा होना देश का!

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कंग्राच्यूलेट एम0 एफ0 हुसैन कि आप हिन्दुस्तान की सरज़मी पर नहीं हुए दफ़न। मरे भी तो इंगलैण्ड में। 95 वर्ष की लंबी उम्र के साथ। आपका मरना आर्यावर्त के लिए न तो खेद का विषय है और न ही राष्ट्रीय क्षति का। आपका मरना तो विश्व-क्षति(भारत छोड़कर) है। यों भी देशनिकाला पाए इंसान के मरने पर भला देश में कैसा शोक और कैसा मातम? फ़िलहाल घड़ियाली आँसू बहाने वालों को अपनी चारित्रिक निष्ठा का डीएनए टेस्ट अवश्य कराना चाहिए। आप वर्षों इस देश में रहे; यहाँ की जमीन, जल, मिट्टी, हवा-बतास और प्रकाश से ताल्लुकात रखा; किन्तु गोया आपने इस देश में पैठे हिन्दू-भूगोल को वस्तुतः समझने की कोशिश नहीं की। आप क्या नहीं जान रहे होंगे कि राष्ट्रप्रेमी हिन्दू अपने देवी-देवताओं का अपमान किन्हीं शर्तों पर बर्दाश्त नहीं करते हैं; वे तो इन देवी-देवताओं की चरणधूली तक को गंगाजल समझकर सहर्ष पी जाते हैं। हुसैन जी! क्या आपको नहीं पता था कि इन महत्त्वपूर्ण देवी-देवताओं का विभिन्न पर्व-त्योहार के मौके पर आत्मिक जुलूस और पदयात्रा निकालना बेहद सुखद और प्रितिकर होता है? आप भले आस्तिक न हों; किन्तु यह एक अटल सचाई है कि हिन्दू देवी-देवताओं …

इस अन्धेरे समय में....!

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‘‘शब्द कितने भी अर्थवान क्यों न हो? उजाले के बिना उनका अस्तित्व नहीं है। लिखे हरफ़ पढ़ने के लिए उजास चाहिए। मन की उजास। आत्मा की उजास। मानवीय मनोवृत्तियों एवं प्रवृत्तियों का उजास। अच्छा कहने और ईमानदार जीने की संकल्पना का उजास। दरअसल, वेद-सूक्ति हो या नैतिक-सुभाषितानी; सभी में उजास ही तो एकमात्र लक्षित भाव है। भारतीय संस्कृति में यह भाव साकार और निराकार दोनों रूपों में उपस्थित है। बस मन के अतल गहराईयों में उतरने का जज़्बा चाहिए। साहस चाहिए अपने देशकाल की परिस्थितियों एवं पारिस्थितिक तंत्र से मुकाबला करने के लिए।’’

इस अन्धेरे समय में गुरुवर आपकी यह सीख मेरे लिए प्रेरणा है। इन्तहान की घड़ी में ‘स्ट्रूमेन्ट बॉक्स’ है। वैसे समय में जब देश का जीवन-दर्शन रीत रहा है। सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का दूसरी ज़बान में विरुपण जारी है। देसी भाषा और बोली-बात निजी शैक्षिक केन्द्रों से बहिष्कृत हो मरघट पहुँचाए जा चुके हैं। मैं आपके इन्हीं प्रेरणा के उजास में स्वयं को सींचा हुआ महसूस कर रहा हँू।

मैं आपके व्यक्तित्व के अनुकरणीय गुणों से गहरे संपृक्त हँू। लेकिन कई अर्थों में भिन्न और विरोधी भी। यह मेरे अर्जि…
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(बाल साहित्यकार वैद्यनाथ झा द्वारा लिखित बाल कहानी-संग्रह ‘छतरी में छेद’ की समीक्षा जल्द ही ब्लॉग ‘इस बार’ में प्रकाश्य-राजीव रंजन प्रसाद)

सिंहावलोकन

राहुल गाँधी का मिशन-2012 हुआ गोलपोस्ट से बाहर

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शीर्षक देख लग रहा होगा कि इस पंक्ति का लेखक अति-उत्साह का मारा है। उसकी राजनीतिक समझ गहरी नहीं है। सोच भी दूरदर्शी न हो कर तात्कालिक अधिक है। जो कह लें; बर्दाश्त है। यह प्राक्कल्पित समाचार है जिसमें सही निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए सभी संभाव्य परिणामों पर विचार करना ही पड़ता है। प्रस्तुत है उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव के लिए विज्ञापित मिशन-2012 की एक ‘हाइपोथेसिस रिपोर्ट’ ।

अगले वर्ष होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सुश्री मायावती पुनश्चः सत्ता पर काबिज होंगी। फिर प्रांतीय शासन में कथित लूट का डंका बजेगा, मूर्तियाँ बनेंगी। हाँ, भाजपा एक बार फिर शंखनाद कर पाने में पिछड़ जाएगी। कांग्रेस का तो सूपड़ा ही साफ। सपा धड़ा को एक बार फिर जनता के विश्वास के लिए दर-दर भटकना होगा। सत्ता से उतर जाने के बाद वापसी कितनी मुश्किल हो जाती है-माननीय मुलायम सिंह यादव से बेहतर भला कौन जान सकता है?

युवा चेहरे के बल पर राजनीति करते पार्टियों में सपा प्रत्याशी अखिलेश यादव सुघड़ चेहरे के धनी हैं। साफ-साफ ढंग से जनता को सम्बोधित भी कर लेते हैं; किन्तु राजनीति की जमीनी समझ में कच्चे हैं। उधर …

आज पत्रकारिता के समक्ष तोप मुक़ाबिल है!

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इस घड़ी बाबा रामदेव के प्रयासों की वस्तुपरक एवं निष्पक्ष आलोचकीय बहस-मुबाहिसे की आवश्यकता है। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि बाबा रामदेव को कई लोग कई तरह से विज्ञापित-आरोपित कर रहे हैं। कोई कह रहा है-संघ के हैं रामदेव, तो कोई उन्हें महाठग कह अपनी तबीयत दुरुस्त कर रहा है। कई तो उन्हें गाँधी के गणवेष में जनता के सामने परोसने के लिए विकल हैं। बदले हुए इस घटनाक्रम में मुद्दे से पलायन कर चुकी सरकार और स्वयं बाबा रामदेव एक-दूसरे के ख़िलाफ जुबानी तलवार भाँज रहे हैं। 4 जून को अचानक बदले घटनाक्रम को केन्द्र सरकार बाबा रामदेव द्वारा भीतरी राजनीतिक स्तर पर किए गए समझौते से साफ मुकर जाने को जिम्मेदार ठहरा रही है।

फ़िलहाल इस पूरे मामले की चश्मदीद गवाह बनी जनता(सर्वाधिक लुटी-पिटी) की हालत नाजुक एवं दयनीय है। कहावत है-चाकू तरबूजे पर गिरे या तरबूज चाकू कर; कटना तो तरबूजा का ही तय है। विद्यार्थी मीडिया का हँू, इसलिए याद आ रहा है मुझे नॉम चोमेस्की का ‘प्रोपगेण्डा मॉडल’। मूल मुद्दे से पलायन कर नए गैरजरूरी मुद्दे को प्रक्षेपित करना इस मॉडल का मूलाधार है। कलतक जो जनता भ्रष्टाचार, काले धन की वापसी, पेट्रोल की बढ़…

हमारी पीढ़ी जानती है-ताजो-तख़्त पलटना

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2014 के लोकसभा चुनाव में बड़े अंतर से पराजित होने वाली सत्तासीन पार्टी कांग्रेस के बारे में यह भविष्यवाणी जल्दबाजी कही जा सकती है; सो मिशन-2012 के तहत यूपी विधानसभा चुनाव में उसे जनता द्वारा हराना जरूरी है। ऐसा मानना है उन राजनीतिक विश्लेषकों, सामाजिक बुद्धिजीवियों, लेखकों एवं साहित्यकारों का जो उड़ती चीड़िया का पर गिन लेने में उस्ताद हैं। लिफाफा देखकर मजमून भाँप लेने वाले इन चुनावी-पण्डितों ने तो यह भी कायास लगाना शुरू कर दिया है कि अब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गिने-चुने दिन ही शेष बचे हैं। ऐसे में प्रश्न उठना लाजिमी है कि क्या राहुल गाँधी का प्रधानमंत्री बनना महज एक दिवास्वप्न साबित होगा? क्या उनके अपने ही सहयोगी-सार्गिदों ने उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावना को दुसाध्य बना डाला है? अगर नहीं तो जनता के बीच उसे नित अप्रासंगिक बनाये जाने के पीछे का मूल रहस्य क्या है? क्योंकर राहुल गाँधी को उन संवेदनशील मौके के इर्द-गिर्द फटकने या उस पर तत्कालिक प्रतिक्रिया देने से रोक दिया जाता है जो जनता खासकर युवाओं के बीच उनकी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए नितान्त आवश्यक है।(जारी....)

भारत में वैचारिक आपताकाल का नया दौर शुरू

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जन-समाज, सभ्यता और संस्कृति के ख़िलाफ की गई समस्त साजिशें इतिहास में कैद हैं। बाबा रामदेव की रामलीला मैदान में देर रात हुई गिरफ्तारी इन्हीं अंतहीन साजिशों की परिणती है। यह सरकार के भीतर व्याप्त वैचारिक आपातकाल का नया झरोखा है जो समस्या की संवेदनशीलता को समझने की बजाय तत्कालीन उपाय निकालना महत्त्वपूर्ण समझती है। बीती रात को जिस मुर्खतापूर्ण तरीके से दिल्ली पुलिस ने बाबा रामदेव के समर्थकों को तितर-बितर किया; शांतिपूर्ण ढंग से सत्याग्रह पर जुटे आन्दोलनकारियों को दर-बदर किया; वह देखने-सुनने में रोमांचक और दिलचस्प ख़बर का नमूना हो सकता है, किन्तु वस्तुपरक रिपोर्टिंग करने के आग्रही ख़बरनवीसों के लिए यह हरकत यूपीए सरकार की चूलें हिलाने से कम नहीं है। केन्द्र सरकार की बिखरी हुई देहभाषा से यह साफ जाहिर हो रहा है कि जनता अब उसे बौद्धिक, विवेकवान एवं दृढ़प्रज्ञ पार्टी मानने की भूल नहीं करेगी। इस घड़ी 16 फरवरी, 1907 ई0 को भारतमित्र में प्रकाशित ‘शिवशम्भू के चिट्ठे’ का वह अंश स्मरण हो रहा है-‘‘अब तक लोग यही समझते थे कि विचारवान विवेकी पुरुष जहाँ जाएंगे वहीं विचार और विवेक की रक्षा करेंगे। वह यदि राजनीत…

राष्ट्र-विकास का कार्यभार बाबा को सौंपे सरकार

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इस घड़ी भ्रष्टाचार का मुद्दा राष्ट्रीय पटल पर है। समस्याओं से त्रस्त लोग वैकल्पिक शासन-ढाँचे की आस में बाबा रामदेव की ओर निगाह टिकाए हुए हैं। हाल के दिनों में अण्णा हजारे और बाबा रामदेव को मिला व्यापक जनसमर्थन इस बात का गवाह है कि भारतीय मानस बदलाव का आकांक्षी हैं। बाबा रामदेव ने अण्णा हजारे के जनलोकपाल विधेयक की तरह ही देश में एक जबर्दस्त मुहिम छेड़ा है जिस मुहिम का मुख्य ध्येय काले धन की देश में वापसी सुनिश्चित करना है जो विदेशी स्विस बैंकों में नजरबंद है।

स्वाधीन भारत में लोकतंत्र का तमाशाई खेल सामने है। कांग्रेस इस खेल का ‘मास्टरमाइंड’ है। अन्य पार्टियों के कारनामे गौण हैं। देश को सर्वाधिक लूटने का काम कांग्रेस ने ही किया है। भाजपा पर साम्प्रदायिक पार्टी होने का तोहमत मढ़ अक्सर उसके प्रयासों को धार्मिक गणवेष पहना दिया जाता है जबकि वह खुद ही अक्षम नेतृत्व की मारी एक विक्षिप्त पार्टी है। बाबा रामदेव भी देश के सामने आज भगवा-गणवेष में प्रकट हैं। करोड़ों-करोड़ अनुयायी संग-साथ है। भयाकुल कांग्रेस अपने तीन आला मंत्रियों को एयरपोर्ट बाबा के आगवानी में भेजती है। लेकिन भारत स्वाभिमान आन्दोलन के प…

बाल-दुनिया

राष्ट्रीय छात्रशक्ति

अपनी माटी

जिंदगी की राहें

मेरी सोच

आइए चलें राम-लीला मैदान

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भारत में भ्रष्टाचार मुक्त आयोजन और कार्यक्रम कैसे किए जा सकते हैं? प्रबंधन कैसे सक्षम-नेतृत्व में अपनी सफल भूमिका निभा सकता है? इस धारणा को अमली जामा पहनाने के ख्याल से ही बाबा रामदेव देश की राजधानी में यह व्यापक अभियान छेड़ रहे हैं। पूरे देश के लोग जो भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रहे इस अभियान में शामिल हैं; उनका अमंगल और अनिष्ट कभी नहीं होगा बशर्ते वे दुरंगी शक्ल वाले न हों। आमीन!

1) दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में अष्टांग योग और सत्याग्रह के लिए ढाई लाख वर्ग फुट का विशालकाय पण्डाल बनाया जा रहा है।

2) 5000 पंखों और कुलर की व्यवस्था होगी।

3) 1300 अस्थाई शौचालय तथा बाथरूम बनाये जा रहे हैं।

4) विराट और भव्य मंच के अलावा विशाल स्क्रीन, पुलीस नियंत्रण कक्ष, मीडिया कक्ष की पूरी व्यवस्था होगी।

5) खोया-पाया विभाग भी बनाया जा रहा है।

6) 650 नल लगाए गए हैं।

7) आयोजन स्थल पर 30-40 सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए हैं।

8) 50-60 डॉक्टर आपात-चिकित्सा के लिए मौजूद रहेंगे।

शून्य भ्रष्टाचार पर ऐसे इंतजमात उसी भारत में जहाँ कहा जाता है-‘100 में 1 शायद ईमानदार, फिर भी मेरा देश महान’।


ऐसे महान लोग क्यों श्रेष्ठ हैं, खु…

विश्वस्तरीय शोधकार्य नहीं चाहते भारतीय विश्वविद्यालय

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भारत में शैक्षिक अनुसंधान के क्षेत्र में होने वाले शोध-कार्य ख़स्ताहाल है। वे शोध-गुणवत्ता के उस मानक को नहीं पूरा करते हैं जिससे यह साबित हो सके कि शोध के क्षेत्र में कृत उक्त कार्य का स्तर विस्वस्तरीय है। किसी ज़माने में वस्तुपरक रिपोर्टिंग की मानक संस्था रही बीबीसी ने यह पड़ताल अपने लोकप्रिय कार्यक्रम ‘बीबीसी इंडिया बोल’ में इस सवाल के साथ किया कि ‘क्या भारत में स्तरहीन शोध होता है?’, तो आमोंख़ास सभी के चेहरे पर हैरत और अविश्वास की लकीर खींच गई। बीबीसी ने अपना यह कार्यक्रम मीडिया में लंबे बोल बोलने के आदी भारतीय कबीना मंत्री जयराम रमेश के उस वक्तव्य को आधार बनाकर प्रायोजित किया था जिसमें उनका मानना था कि भारत में आईआईटी एवं आईआईएम जैसे संस्थान तो विश्वस्तरीय हैं; लेकिन वहाँ हो रहे शोध-कार्य अन्तरराष्ट्रीय स्तर के नहीं हैं।

बीबीसी हिन्दी पर ‘इंडिया बोल’ कार्यक्रम प्रसारित हुआ। विषय था-‘क्या भारतीय विश्वविद्यालयों में स्तरहीन शोध होता है?’। एक अनुसंधित्सु होने के नाते मेरा फ़र्ज है कि मैं अपना पक्ष रखूं और आपसे यह अपेक्षा करूँ कि मेरी बात सुनी जाए....




(यह आलेख आप पढ़ सकेंगे जल्द ही ब्लॉग ‘…

बाबा रामदेव का लोककारी हठयोग

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भारत पर बाबा रामदेव की असीम कृपा है। देश की जनता उनकी अनन्य भक्त है। दैनिक योग-प्रक्रिया के अनुपालन से बाबा रामदेव ने काफी हद तक गरीबों को असाध्य रोगों से मुक्ति दिलाई है। आधे दशक से भी कम समय में भारत रोगमुक्त और लाइलाज बीमारियों के प्रकोप से निजात पा चुका है। ऐसा औरों का नहीं बाबा रामदेव का खुद ही मानना है। अपनी संपति को लोक-संपति घोषित कर चुके बाबा रामदेव पूँजी के अनावश्यक एकत्रण के सख्त खिलाफ हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ हालिया अभियान इसी का प्रमाण है। वे कहते हैं-‘विदेश ले जाए गए काले धन को राष्ट्रीय सम्पति घोषित किया जाना चाहिए और काला धन रखने को राजद्रोह के समान समझा जाना चाहिए।’

योगगुरु का उसूल है कि जो देने योग्य है उससे अधिकतम वसूल करो। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि वे कारोबारी हैं या कि योग-साधना को ‘व्यापार’ की तरह ‘हैण्डल’ करते हैं; जैसा कि कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने अपने ताजा बयान में कहा है। बड़बोलेपन के आदी कांग्रेस महासचिव यह क्यों भूल जाते हैं कि अमीर लोग मुफ्त-सेवा या चिकित्सा के बूते कभी ठीक ही नहीं हो सकते हैं। धनाढ्य वर्ग के लोग शुगर फ्री एक कप चाय के लिए जबतक …

गहरे एकांत में आत्मीय मूरत गढ़ता काव्य-संग्रह ‘सीढ़ियों का दुख’

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काव्य-संग्रह ः सीढ़ियों का दुख
कवयित्री ः रश्मिरेखा
प्रकाशक ः प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली-110002
मूल्य ः 150 रुपए

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समय की शिला पर ऐतिहासिक पदचापों का ठीक-ठीक शिनाख़्त कर पाना आसान नहीं है। तब तो और नहीं जब पत्थरों पर अंकित अमूल्य कलाकृतियाँ, प्राचीन मूर्तियाँ, मिट्टी के भाण्ड, ईंट, सिक्के, आभूषण, तरह-तरह के औजार, प्रस्तर खण्ड; हमारे रक्त में घुले एहसास की तरह शब्द पाने को छटपटा रहे हों। और, हम उन्हें सिर्फ खण्डहरों का अवशेष जान अव्यक्त छोड़ दें। कवयित्रि रश्मिरेखा पत्थरों पर अंकित इस अकथ इतिहास को अपनी पहली काव्य-संग्रह ‘सीढ़ियों का दुख’ में न केवल जगह देती हैं; बल्कि उन्हें बड़ी गहराई और सूक्ष्मता से पकड़ती भी हैं। वह इन्हें सहज एवं सार्थक बिम्ब, मिथ और प्रतीक द्वारा शब्दों में ढालती हैं-‘पृथ्वी की कोख़ में पल रही/पूर्वजों की सृजन-स्मृतियाँ/कालातीत कलाकृतियों के नमूने/आत्मा में गहरे उतर आया/उनका आदिम स्पर्श’।(पृ0 71)

इस काव्य-संग्रह को पढ़ते हुए पाठक कब कविताओं के भीतरी तह में प्रवेश कर जाता है; आभास ही नहीं होता है। मनुष्य के अलावे मनुष्य की जिन्दगी में शा…