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Showing posts from April, 2014

शोध-पत्र: हिन्दुस्तानी अख़बार में छपी औरतें

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2007 से आज तक

जानकीपुल: आम चुनाव में शिक्षा सुधार मुद्दा क्यों नहीं?

जानकीपुल: आम चुनाव में शिक्षा सुधार मुद्दा क्यों नहीं?: वरिष्ठ शिक्षाविद प्रेमपाल शर्मा ने शिक्षा को लेकर राजनीतिक पार्टियों, ख़ासकर 'आप' से अपील की है. उनका यह सवाल महत्वपूर्ण है कि च...

जनपक्ष: 12 इयर्स ए स्लेव - इस फिल्म को देखते हुए आप ‘पापका...

जनपक्ष: 12 इयर्स ए स्लेव - इस फिल्म को देखते हुए आप ‘पापका...:                                 आस्कर पुरस्कारों की घोषणा ने इस बार सबको चौंका दिया है | अपने 86 सालों के इतिहास में आस्कर-अकादमी न...

चोटी गूँथने वाली लड़कियाँ

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अक्सर कहते सुना है
शहराती आवाज़ में
अंग्रेजी पिटपिटाने वाली भाषा में
‘...कि चोटी गूँथने वाली लड़कियाँ
क्या जानती हैं आखिरकार?
न डायटिंग, न डेटिंग, न पार्टी,
न शाॅपिंग, न फैशन, न मूवी, न डीजे,
न लव-शव, न कैरियर
...और न ही इंज्वायबुल लाइफ
...हाऊ डैम्ड यार, ये चोटी गूँथने वाली लड़कियाँ
गले में मोती का माला गाँथे रखने वाली लड़कियाँ
जानती ही क्या है अपने बारे में?
कुछ भी तो नहीं...!’

वहीं मैंने यह सुना है
ठेठ देसी अंदाज में
आँचलिक बोली-वाणी में
इन लड़कियों को बोलते हुए कि
‘हम अपना जांगर खटाते हैं
तो जलता है घर में चूल्हा
पकता है खाना
धुलाते हैं बरतन
बहराते हैं घर-आँगन
दीवालों की पीठ पर होती है मालिश
ज़मीन की देह पर लगते हैं उबटन
पेड़ों की तनाओं में लपेटा जाता है सूत
खेत-खलिहान में खाना पहुँँचता है
नाद में सानी गोताते हैं
जानवरों को मिलता है उनका जरूरी आहार
किसी लड़के की सजती है बारात
लौटते ही द्वार पर होती है परछन
गूँजती हैं किलकारी, तो बँटते हैं पाहुर
चारों तरफ हम और हम ही होते हैं
अतः नहीं चाहिए हमें शहरियों द्वारा
सभ्य होने का प्रमाण-पत्र
क्योंकि हमारे बाहर निकलते ही
मर जाएगी एक नदी
उजड़…

तीन कविताएं : 1, 2, 3

1.

अपने विश्वविद्यालय के नाम ख़त
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मैंने एक चिट्ठी लिखी है
अपने विश्वविद्यालय के नाम
मैंने लिखा है:
'यदि इस विद्यालय में भ्रष्टाचार आम है,
तो मेरा ईमानदार होना
एक झन्नाटेदार थप्पड़ है
अपने विश्वविद्यालय के मुँह पर।

2.

पहचान
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मेरे ई-मेल बाॅक्स में
आते हैं बहुत सारे मैसेज
लेकिन नहीं आता एक भी ई-मेल
कभी-कभार राह-भटके किसी मुसाफिर की तरह
जिसमें लिखा हो-‘प्रिय राजीव, कैसे हो?’
साफ है कि मैं आदमी हूँ, लेकिन पहचानदार आदमी नहीं हूँ!

3.

पंक्षी
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पंक्षी
चाहे जिस दिशा से आते हों
चाहे जितने दिवस भी रहते हों
चाहे करते हों कलरव कितना भी
विदाई की बेला में उनके लिए
नहीं गाता है कोई भी विदाई गीत।

चुनाव

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हमारे आदत-व्यवहार की
एक सामान्य क्रिया है ‘चुनना’
आचरण-स्वभाव में घुली-मिली
एकदम साधारण शब्द है यह
यह एक कामकाजी शब्द है
जिसका रिश्ता हमारे होने से है
वह भी इतना गाढ़ा कि
हम सिर्फ चुनने का बहाना लिए
बचपन से बुढ़ापे में दाखिले हो जाते हैं
बाल सफेद, बात भुलक्कड़, कमर टेढ़ी
और आँख में अनुभव का
आदी-अंत और अनन्त विस्तार

चुनना आमआदमी के करीब का
सबसे सलोना शब्द है  
अपने चुने हर चीज पर अधिकार जताते हैं हम
अपने चुनाव पर सीना चैड़ा करते हैं
मूँछों में तेल चुभोड़ते हैं
गर्वीली मुसकान संग
बार-बार उन पर हाथ फेरते हैं

हम जानते हैं
यह चुनना किसिम-किसिम का है
जैसे हम चुनते हैं
अपने बच्चों के लिए स्कूल
सब्जियों की ढेरी से आलू और टमाटर
अपने लड़के-लड़कियों के लिए
चुन लेते हैं कोई सुघड़-सा रिश्ता
ज़िन्दगी के आखिरी मोड़ आते ही
हम अपनी सुविधानुसार चुन लेते हैं
एक ठिकाना, ठौर या थाह
जहाँ बैठकर तका जा सके
आसमान को हीक भर या भर नज़र

इसी तरह ज़िन्दगी का राहगीर बने हम
चुनते हैं कोई एक रास्ता
और चल पड़ते हैं उस पर
इस विश्वास से कि हमारा यह चुनाव
कुछ और दे या न दे
इतना मौका मयस्सर तो कराएगा ही कि
हम और हमार…

शोध-पत्र : जाति-प्रपंच का लोकतंत्र और भारतीय राजनीति में सामाजिक सहभागिता विषयक प्रश्न

----------------------------------------------- भूमिका : भारत में जातिवादी लोकतंत्र है। वैसा लोकतंत्र जिसमें जाति-विशेष की चैधराहट सदियों से कायम है। सामन्ती वसीयतनामा लोक के मनोजगत में इस कदर बैठ चुकी है कि उससे निज़ात पाना मुश्किल(?) है बनिस्पत उसे यथानुरूप बनाये रखने के। गोकि जाति-विशेष की भाषा बखानते ये लोग सवर्ण-मानसिकता के उपसर्ग-प्रत्यय हैं। ये मूलतः वास्तविक धातु नहीं हैं; लेकिन लोकतंत्र के अर्थ और गरिमा को परिभाषित अथवा व्याख्यायित करने का काम यही (आताताई)लोग करते हैं। लोक-शक्तियाँ स्वयं भी इन्हीं वर्चस्वशाली या प्रभुत्त्वशाली बिरादरियों के खूँटे से बँधी है। इसके लिए सियासी ताकतें इरादतन ‘जीनकोड’ का पूर्णतया इन्हीं आरोप्य अवधारणाओं के अनुलोम होने का हेठी दिखाती हैं। आज जातिवादी/सामन्ती राजनीति न्यूनतम आज़ादी और सुविधा की शर्त पर अपने विरोधी को ज़िन्दा रखने का एक शातिराना उपक्रम बन चुका है। यह इस बात का भी संकेतक हैं कि लोकतंत्र के ढाँचे में राजतंत्र का होना जनता की नियति का परिपोषक है जो कि दो ही स्थिति में संभव है; पहला-विवेक का अपहरण कर लिए जाने की स्थिति में या फिर उसके मृत हो…

‘इस बार’ वोट किया रे साथी/रे बहिनी कि अच्छे दिन आने वाले हैं...!

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(मैं खुद कोई सही और सार्थक विकल्प नहीं दे सकता या बन सकता, तो ऐसी स्थिति में मुझे किसी न किसी भरोसेमंद विकल्प को अंततः चुनना ही पडेगा। ‘इस बार’ मोदी; क्योंकि मेरे अनुसन्धान/शोध की उपकल्पना है कि सही नेता कोई प्रचारक-प्रबन्धन नहीं पैदा कर सकता है। उसके लिए सही व्यक्ति, सही संगठन और सही नेतृत्व का होना आवश्यक है। और इन सबके लिए सबसे जरूरी है सही लोगों की सहभागिता और वास्तकविक समर्थन।)

आजादी से पहले गाँधी का नाम एक सहारा था-उस गरीब आदमी के लिए अच्छे दिन आने का। वह प्रतीक-पुरुष थे लम्बे अर्से से भोगे जाने वाले दुःख-तकलीफों और मुसीबतों से मुक्ति का। वह आश्वासन था ईमानदारी से कमाई गई रोटी पर कमाने वाले के अधिकार का। इसी कारण लोकगीतों में उनके नाम का जबर्दस्त बयार बहता था उन दिनों:

‘‘ई खोटी पैसो नी खरी चाँदी आयऽ
 ई हवा अधोळ नी गाँधी आयऽ
 ई आसमानी बादलों नी सत्याग्रही न की टोळई आयऽ
 ई तो गरीब न का लेणऽ फैलायेल गाँधी बाबा की झोळई आयऽ
 ई मारनऽ की नी मरनऽ की बात करज
 ये काज सो येखऽ अँगरेज भी डरजऽ।।’’

(यह खोटा पै…

मोदी, केजरीवाल और मीडिया फिक्सिंग

उस दिन सुबह-सुबह प्रमोद कुमार बर्णवाल बनारस के सिगरा स्टेडियम पहुँचे, तो वहाँ पहले से आम आदमी पार्टी के कुछ कार्यकर्ता मौजूद थे। पूर्व सूचना के मुताबिक अरविन्द केजरिवाल को वहाँ मार्निंग वाॅकरों से मिलने आना था। एक दिन पहले ही उन पर रोड-शो के दौरान स्याही का छिड़काव हुआ था, काले झण्डे दिखाये गए थे। हमारे सीनियर साथी प्रमोद जी का लगाव और झुकाव ‘आम आदमी पार्टी’ के प्रति बेहद भावनात्मक और निष्ठापूर्ण है। मेरी आलोचनात्मक टिप्पणियों का वे हरसंभव प्रत्युत्तर देते हैं। उस दिन हम दोनों इसी उम्मीद से गए थे कि सच को थोड़े करीब से क्यों न साथ-साथ देखा-परखा जाए। सिगरा स्टेडियम में अरविन्द केजरीवाल तो नहीं मिले; लेकिन वहाँ ‘आप’ के चर्चित नेता सोमनाथ भारती से सीधी बात और मुलाकात हुई। इस दरम्यान कई जानदार, दिलचस्प और अजीबोगरीब वाकया भी देखने-सुनने को मिला। सर्वाधिक मुश्किल था, मीडियावी राजनीति की नंगई, बेशर्मी और साँठ-गाँठ को अपनी नंगी आँखों से देखना। अपने इस अनुभव को प्रमोद कुमार बर्णवाल ने डायरी की शक्ल में ‘इस बार’ को प्रकाशन के लिए भेजा है। मैं उनके ‘मन की बात’ को उन्हीं की भाषा, शैली और शब्दावली म…

...और यह भी विश्वविद्यालय के बारे में

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भारतीय ज्ञान-मीमांसा के अनुसार, मनुष्य का ज्ञान उसके स्वयं के अनुभव पर आधारित है। जहाँ ज्ञान की रिक्तता होती है, वह युग अंधकार युग बन जाता है। भारत में इस घड़ी अंधकार युग के आगमन का शोर और कोलहाल सुनाई दे रहा है। चारों तरफ यह कहा जा रहा है कि वे दिन अब नहीं रहे जब शिक्षा की बात भविष्य के लिए समाजीकरण के रूप में विवेचित किया जा सकता था। चूँकि तब बहुत कम अवसर प्रत्याशित थे और जीवन जी सकने योग्य बनाने के लिए एक बच्चे को अपेक्षित दक्षता प्रदान की जा सकती थी। विज्ञान और प्रौद्योगिकी द्वारा लाए गए आधुनिकीकरण ने विरोधाभासी रूप से एक ओर तो हमारी भविष्य कथन की ताकत को बढ़ा दिया है; वहीं दूसरी ओर भविष्य की अनिश्चितताओं को पैदा कर दिया है। भारत में उच्च शिक्षा के संस्थान ऐसे स्नातकों के उत्पादक हैं जो उच्च योग्यताओं के लिए तथा अंतत्त्वोगत्वा पश्चिम की विकसित अर्थव्यवस्था में समावेशन के लिए चले जाते हैं। इस प्रकार एक स्नातक को प्रशिक्षित करने में विकासशील समाज जो भी निवेश करता है-मौलिक विज्ञानों, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा विज्ञान इत्यादि में वह बेकार चला जाता है; …

ज्ञान, विश्वविद्यालय और युवा

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पश्चिम में, अठारहवीं शताब्दी से ज्ञानोदय की परम्परा शुरू होती है। इसमें बेकन, कांट, देकार्त, ह्युम, हीगेल जैसे विचारक शामिल हैं। फ्रांसिस बेकन को ज्ञानोदय का पितामह ही कहा जाता है। बेकन ने कहा कि ज्ञान के केन्द्र में मनुष्य है। बेकन के अनुसार ज्ञान और शक्ति पर्यायवाची हैं। सन् 1783 ई. में इमैनुअल कांट ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘ज्ञानोदय क्या है?’ में ज्ञानोदय को साहस का पर्याय कहा। मनुष्य में साहस आत्मनिर्भर होने से आता है। आत्मनिर्भरता ज्ञान से आती है। ज्ञान, तर्क और विवेक ने मनुष्य को अंधविश्वास, धार्मिक कूपमंडूता व रूढ़ि के जकड़न से मुक्त करना शुरू किया। ज्ञान-सृजन की प्रक्रिया में प्रेस की भूमिका अभूतपूर्व रही है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का मानना था कि प्रेस ने पुस्तकों को अपूर्व प्रचार-प्रसार और असंख्य पाठक दिए। वस्तुतः प्रेस ने साहित्य को प्रजातांत्रिक रूप दिया। यूरोप में आधुनिक युग, आधुनिक होने का एहसास, आधुनिकता की शुरुआत पन्द्रवहीं सदी के रिनैसां(पुनर्जागरण) से मानी जाती है। यह अंग्रेजी, फ्रंासीसी, जर्मन आदि आधुनिक यूरोपीय जातियों के निर्माण क…

राजनीति, जनतंत्र और युवा

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भारत में राजनीतिक पराभव का यह विषम दौर है। लोकतंत्र के मजबूत पाये खड़े-खड़े ऊंघ रहे हैं। हाल के दिनों में अभद्रता, अवमानना, अन्याय, अपराध, असंगति आदि की घटनाएँ इफरात मात्रा में बढ़ी हैं। वर्चस्व और प्रभुत्तव की वर्तमान राजनीति ने लोकतंत्र की चादर को मैला कर दिया है। हिंसा और दंगे लोक-समाज के धु्रवीकरण, तुष्टिकरण, एकरूपीकरण आदि का जरिया बन चुकी है। लिहाजा, साम्प्रदायिक शक्तियाँ सिर्फ एकजुट ही नहीं हो रही हैं बल्कि अंधे धृतराष्ट्र की भाषा में आत्ममुग्ध वसीयतनाता लिखने पर भी आमादा हैं। वहीं धर्मनिरपेक्षता का नकाब और जुराब पहनी देश की कमोबेश सभी पाटियाँ वैचारिक एकजुटता का भौड़ा प्रदर्शन करते हुए लगातार देश की अस्मिता-बोध को चुनौती दे रही हैं; उपभोक्ता-संस्कृति के सांस्कृतिक-दुराचार के आगे घुटने टेक रही है। लेकिन, यह भी सच है कि इनसे टकराने वाली समूह को भी इस कठिन समय ने ही सिरजा है। प्रतिरोध और प्रतिकार की उर्वर जमीन बनाने में समय की इन दुरभिसंधियों का योग अधिक है। भारतीय जनमाध्यम जिसकी भाषा में छल करना सर्वाधिक आसान है। इस घड़ी जनता-जर्नादन के पक्ष में महमह करत…

इक्कीसवीं सदी, युवा और विश्वविद्यालय

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वर्तमान युवा-पीढ़ी भाव, उमंग, इच्छा, आकंक्षा, रूप, रंग, गंध, रस इत्यादि के उमाड़ पर है। यह उमाड़ जन-ज्वार की सामूहिक चेतना, साहस और युवा-शक्ति के पर्याय रूप में अभिव्यक्त है। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में बुनियादी समस्याओं से लड़ती-भिड़ती यह पीढ़ी भारत के भविष्य का पीठ ठोकती पीढ़ी है। यह इक्कीसवीं सदी की ऊर्जावान, चेतस और परिवर्तनकामी पीढ़ी है जो इस घड़ी विश्वविद्यालय परिसर में मौजूद है। अध्ययनजीवी यह पीढ़ी मुँह में चाँदी का चम्मच लेकर पैदा हुई उन पीढ़ियों में से नहीं हैं जो नेता नहीं होते हैं; लेकिन नेतृत्व उन्हीं के हाथों में नित तरक्की पाता है। दरअसल, देश की असली शक्ति आज प्रोजेक्टेड/प्रमोटेड वंशवादी राजनेताओं का शिकार है। आज जिन युवाओं के पास राष्ट्रीय चेतना, विश्व-दृष्टिकोण और वैश्विक अर्थतंत्र की गहरी समझ है; वह हर जगह है लेकिन राजनीति में नहीं है। व्यक्ति, समाज, राजनीति और संस्कृति से सम्बन्धित गहन विश्लेषण की क्षमता भी इस विश्वविद्यालयी पीढ़ी में अंतर्भूत है; लेकिन वे राजनीति में ‘इंटरेस्टेड’ नहीं दिखते हैं।

हमें देखना होगा कि विश्वविद्यालय में रोपी जा रही…

दो दिन पहले: 10 अप्रैल 2014

किया मतदान 'इस बार' पहली बार
रघुवीर सहाय  के शब्दों में:
....फिर जीवन शुरू हुआ.

आज 09.04.14

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काफी उत्साहित हूँ। कल अहले सुबह गाँव जाना है। मतदान देने का उत्साह चरम पर है। लोकतंत्र की निग़ाह में सर्वसाधारण नागरिक होने का सबसे शुभ सुअवसर है यह। चलो, अच्छा है। शब्दों और भाषाओं में कचोधन या माथापच्ची करने से अच्छा है कि हम चुपचाप मतदान करें। राजनीति पर बात बखनाने और बहसबाजी करने का जिम्मा जिन भाषा-नायकों को है; फिलहाल इसे वही संभालें। वैसे आज काफी दिनों से दिलों-दिमाग में चल रहा आलेख ‘कमण्डल पितृसत्ता और धरती धन स्त्री’; पूर्ण हुआ।


आज 08.04.14

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टी.वी. पर न्यूज़ चैनल। भौचक्क हूँ। केजरीवाल को एक शख्स रोड शो के दौरान थप्पड़ मार देता है। सुना, वह टेम्पो चालक है। आम आदमी इस कदर गुस्सा है। ज़ायज़-सही की बात छोड़ दीजिए, तो भी कांगे्रस, भाजपा, सपा, बसपा आदि अन्य पार्टियों से गुस्सा क्यों नहीं हैं लोग? मेरा गला बैठ गया है। दिमाग को तो कबका मरम्मत के लिए भेज रखा है।

आज 07.04.14

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आज दूध फट गया। गर्मी काफी है, इस कारण। सीमा ने उसे अपने ओढ़नी में बांधकर दरवाजे से टांग दिया। नीचे बाल्टी में पानी गिर रहा था-ठप, ठप...। मैं, सीमा, देव और दीप ने साथ बैठकर छेना की सब्जी और भात खाया। बड़ा ही स्वादिष्ट। कहा, चलो...कुछ तो अच्छा हुआ। बिटना(दीप) तो अपनी थाली में से बिन-बिन कर चट कर गया छेना का टुकड़ा। देव उस पे गुस्सा हो रहा था। सीमा ने कहा कि जाने दो बच्चा है। फिर उसने मुझे चिढ़ाया-तब आपका चाय कल कैसे बनेगा? मैं मुसकरा दिया।