Posts

Showing posts from April, 2016

नामवरी आलोचना के बाद की साहित्यिक प्रवृत्तियाँ और समकालीन हिंदी साहित्य

--------------  विहंगमावलोकन :  राजीव रंजन प्रसाद -------  2018
wait please...///

अरुणाचल की भीत पर अर्थ रचते शब्द

-------------- पता है। कविता कोई स्पष्टीकरण नहीं चाहती। व्याख्या और आख्यान पाठकीय पीढि़याँ स्वयं अपने भीतर से रचती हैं। भीत पर आकुलमना ये कविताएँ जब लगीं, तो वह मुझे दिल से शुक्र्रिया कहती दिखीं और मैं दिल से आभार व्यक्त करता रहा....उनका जिन्हें पढ़कर मुझे सोचने-समझने का तजरबा मिला है; ज्ञान तो बड़ी बात है।
------ 
चौका             - अनामिका
मैं रोटी बेलती हूँ जैसे पृथ्वी
ज्वालामुखी बेलते हैं पहाड़
भूचाल बेलते हैं घर
सन्नाटे शब्द बेलते हैं, भाटे समुंदर।

रोज़ सुबह सूरज में
एक नया उचकुन लगाकर
एक नई धाह फेंककर
मैं रोटी बेलती हूँ जैसे पृथ्वी।

पृथ्वी– जो खुद एक लोई है
सूरज के हाथों में
रख दी गई है, पूरी की पूरी ही सामने
कि लो, इसे बेलो, पकाओ
जैसे मधुमक्खियाँ अपने पंखों की छाँह में
पकाती हैं शहद।

सारा शहर चुप है
धुल चुके हैं सारे चौकों के बर्तन।