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Showing posts from May, 2016

स्त्री

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मेरे भीतर एक स्त्री
बना रही है मेरे लिए नाश्ता
और मैं खाना चाह रहा हूँ उसका गोश्त

मेरे भीतर वही स्त्री
मेरे पस्त हौसले की मालिश कर रही है
और मैं उसकी पीठ पर करना चाहता हूँ प्रहार

मेरे भीतर की स्त्री ने
शायद भाँप ली है मेरे मर्दाना चालाकियों को
इसलिए वह भोजन में मिला रही है जहर की थोड़ी मात्रा
तेल में धीमी असर करने वाले जीवाणु
ताकि वह अपने स्त्रीत्व को मार सके

मैं आक्रांत, भयंकर भयभीत, आकुल, परेशान, हैरान, बेचैन, बदहवाश,
क्योंकि उस स्त्री के मरते ही मर जाएगा यह पूरा विश्व।

असम में हारी केन्द्र सरकार

झूठा-सच गल्प -----------                                                                                                            >>  मैं समय हूँ राजीव रंजन प्रसाद

असम विधानसभा चुनाव का परिणाम लगाए जा रहे कयास से विपरीत साबित हुआ है। एग्जिट पोल फेल हुए हैं और असम एक बार कांग्रेस सरकार के पाले में है। .....बीती रात भाजपा ने बैंड-बाजे की पूरी बंदोबस्त कर रखी थी। आतिश के ढेरों संसाधन जुटाए गए थे। आज वे सब के सब कूड़े के ढेर मालूम दे रहे हैं। यह विचार-मंथन करने की बात है कि भारतीय राजनीति की चुनावी भविष्यवाणी बाँचने वाले एग्जिट पोल कंपनियों को जनता ने ठेंगा दिखा दिया है। एक बात साफ हो गया है कि बिहार के बाद असम की राजनीति में आया यह गंभीर उलटफेर नरेन्द्र मोदी के ‘अच्छे दिन’ के दावे की पोल खोलकर रख देता है। 
इस पर विस्तारपूर्वक बातचीत और विश्लेषण के लिए वाक्पटु और लेखनसिद्ध विश्लेषकों की कमी नहीं है। उन्हें इस पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट पेश करनी चाहिए। एक बात तो साफ हो चली है कि जनता ‘सेंटीमेंटल’ नहीं है। कोरी भावुकता की उम्र छोटी होती है और वह बीत चुकी है। दो वर्ष के उपरांत भी देश की …

अँकवारी में घर-परिवार के भाखा

राजीव रंजन प्रसाद
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अन्तरराष्ट्रीय परिवार दिवस/15 मई

मम्मी हमार भोजपुरी बोलेली। बाकी सब लोगन हिंदी। हमनी के ऊँचा क्लास में पढ़े लिखे-लगलिं जा त इ बुझाइल कि ऊहाँ आपन भोजपुरी नाहीं चली। ओइजिग खाति हिंदी सीखेला पड़ी सबकन के। छोट-बड़ सब रेंगा-बेगारी स्कूल के मास्टर से हिंदी पढ़े शुरू कइलिं जा, त लागल जइसे कलेजा के बात बाहर नइखे आ पावत। एकदम दूजी किसिम के भाषा बुझात रहे हमनी के। बाद में धीरे-धीरे ऐसे सधाइल कि हिंदी त मजे से कह-सुन-पढ़-लिख लिहिंला पर भोजुपरी के खिसा खतम हो गइल एकदम से। पापा जहाँ रहत रहिं ऊहाँ त एगो आऊर नया समस्या रहे। ऊ इ कि एई जगिहा प मगही बोलल जात रहे। हम घरे जात रहिं त जानबूझ के मगही बोलत रहीं। मगही भाषा सुन के लोग कहत रहन जा-‘बाबू एइजिग ना रहेल का..., तबे न अइसे बोलताड़....’। आदमी के पहचान बोले मात्र से हो जाला। ई तखनिए बुझाइल। लगल कि भले हर जगह एकही नाक-मुँह-नाक-नक़्श के आदमी होखस जा पर बोले वाला भाषा सेम हो जरूरी नईखे।

पर चाहे जो हो, एक चीज त जरूर बुझात रहे हमरा कि ई हिंदी में ऊ बात, रस और मिठास नइखे जवन में हमनी के पलल-बढ़ल बानी जा…

समकालीन साहित्य का समाज

--------------------- राजीव रंजन प्रसाद ------ 

यूपी चुनाव में 'सादे ड्रेस' में भाग ले राहुलीय कांग्रेस

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जब हम अपनी आँख बंद कर लेते हैं, तो दूसरे लोग हमें प्रायः डूबो देते हैं ----------------------  राजीव रंजन प्रसाद  युवा राजनीतिक मनोभाषाविश्लेषक






--------------------  राहुल गाँधी: मनोभाषिक रिपोर्ट  विषय/मुद्दे के अनुरूप अथवा अपने कहे की संवेदनशीलता भाँपने की जगह  राहुल गाँधी अक्षरों का हिसाब लगाकर बोलते हैंउनकी भाषा में लय और लहजा किसी भी तरह एक क्रम, संतुलन अथवा अन्विति में नहीं होते हैं जिस तरह दूध अपना रंग बदले बगैर ही दही में बदल जाता है; वैसे ही राहुल का भाषण सहज होते हुए भी नकारात्मक प्रभाव डालता है।राहुल बोलते समय भीतर से बहुत तीव्र प्रतिक्रिया देते हैं जिसे वाणी के माध्यम से तरल/हल्का बनाने में सहज सम्प्रेषणीयता गायब हो जाती हैराहुल गाँधी के दिमाग में बाहरी बातों का दबाव इतना अधिक होता है कि वे अपनी बात कहने से चूक जाते हैंराहुल गाँधी में परिणाम जानने की उत्तेजना और जल्दबाजी अधिक दिखाई देती है जिस कारण वे जनता से संवाद करने की जगह उनसे अपने बारे में समर्थन/सहमति माँगने लगते हैं राहुल गाँधी प्रायः अपनी ही देहभाषा के खिलाफ़ जाकर बोलते है जिससे उसकी प्रभावशीलता अधिक प्रभावी होती हैउनके…

लुटियन की दाँत में दुर्गंध हर जगह, नमक कहीं नहीं

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राजीव रंजन प्रसाद -----------------

ख़ामोशियों के खिलाफ़ : हे, अहो, अबे, अरे...कुछ भी कहो मेरे देश

-------------------------  राजीव रंजन प्रसाद -------------------------- 
'पूरा देश पानी-पानी है, और वातावरण चुप।' 
कुकुरमुते सरेआम उगते हैं, तो कईयों का दिल बाग-बाग हो उठता है। भीतर का दोगलापन कुलाँचे मारने लगती है। और दुष्ट आत्मा शिकार की टोह में खुलेआम घूमती हैं। हिंसा-हत्या-लूट-बलात्कार होने पर सरकारी तकरीरें मिमियाती हैं और अपनी औकात में सच के सिपाहसलार इतने निरीह और बेचारे होते हैं कि शाम ढलते ही मुर्गे बांग देने लगते हैं। आकाश में न्याय और निष्पक्षता के झंडे फहराने लगते हैं। देश जय-जय करता हुआ वामपंथी घर में घुस जाता है, जहाँ सभी दल दावत उड़ाते हैं।। 
यह कांग्रेस का बनाया हुआ भारत है। इस कांग्रेस का एक लाडला पीआरगिरी द्वारा प्रधानमंत्री बनने को आकुल है, पर उसकी अयोग्यता आड़े आ रही है। इस देश के एक प्रदेश का मुखिया नौजवान है और वह विचारधारा में समाजवादी है। देश का प्रधानमंत्री एक चाय वाला है जिसे बच्चे पाठ्यक्रम में चाव से पढ़ रहे हैं। यह वही प्रधानमंत्री है जो ‘अच्छे दिन’ का उद्घोषक रहा है। इसने एक अच्छा काम यह किया है कि हर जगह अक्षर में 'अच्छे दिन' आ जाने का फतवा …

भाषा, मौन से पूर्व एवं पश्चात : एक मनोभाषिक अध्ययन

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राजीव रंजन प्रसाद -----------------  शोध-पत्र
हमारे भीतर भी एक ‘स्मार्ट सिटी’ है। बाहर दिखतीं भिन्न-भिन्न प्रकार की इमारतों, मकानों, घरों, अट्टालिकाओं, बंगलो आदि की तरह उनका भी सजा-धजा रहवास है, रैन-बसेरा है। भाषा इनकी मल्लिका है जो मुखर होती है, तो ध्वनि-रूप में प्रकट होती है और नहीं तो बजती है मौन में अहर्निश। यह नाद-निनाद अखिल है और पूर्णतया सार्वभौम। मनीषी साहित्यकार अज्ञेय का कथन द्रष्टव्य है-‘‘भाषा तादात्मय स्थापित करने तथा आत्माभिव्यक्ति द्वारा संवाद स्थापित करने का माध्यम है। अपने को रखने का, पाठक से बतियाने का, संवाद स्थापित करने का एक क्षण ऐसा भी आता है, जहाँ भाषा पूरी तरह से चूक जाती है और उस क्षण केवल मौन ही पाठक एवं कवि, कलाकार एवं श्रोता तथा दर्शक के बीच माध्यम(संवाद) बन कर खड़ा हो उठता है। यह मौन न स्खलित है और न ही अर्थहीन।'' 
विचारमना अज्ञेय इसीलिए कहते हैं-‘मौन भी अभिव्यंजना है/जितना तुम्हारा सच है/उतना ही कहो।’’....

शेष फिर कभी,