भाषा, मौन से पूर्व एवं पश्चात : एक मनोभाषिक अध्ययन


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राजीव रंजन प्रसाद
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शोध-पत्र

हमारे भीतर भी एक ‘स्मार्ट सिटी’ है। बाहर दिखतीं भिन्न-भिन्न प्रकार की इमारतों, मकानों, घरों, अट्टालिकाओं, बंगलो आदि की तरह उनका भी सजा-धजा रहवास है, रैन-बसेरा है। भाषा इनकी मल्लिका है जो मुखर होती है, तो ध्वनि-रूप में प्रकट होती है और नहीं तो बजती है मौन में अहर्निश। यह नाद-निनाद अखिल है और पूर्णतया सार्वभौम। मनीषी साहित्यकार अज्ञेय का कथन द्रष्टव्य है-‘‘भाषा तादात्मय स्थापित करने तथा आत्माभिव्यक्ति द्वारा संवाद स्थापित करने का माध्यम है। अपने को रखने का, पाठक से बतियाने का, संवाद स्थापित करने का एक क्षण ऐसा भी आता है, जहाँ भाषा पूरी तरह से चूक जाती है और उस क्षण केवल मौन ही पाठक एवं कवि, कलाकार एवं श्रोता तथा दर्शक के बीच माध्यम(संवाद) बन कर खड़ा हो उठता है। यह मौन न स्खलित है और न ही अर्थहीन।'' 

विचारमना अज्ञेय इसीलिए कहते हैं-‘मौन भी अभिव्यंजना है/जितना तुम्हारा सच है/उतना ही कहो।’’....


शेष फिर कभी,
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