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देव, आज दीप का जन्मदिन है!

प्रिय देव,
आज दीप का जन्मदिन है। इस एहसास को तुमने नहीं भूलने दिया। पीएच.डी. के भागदौड़ और लिखापढ़ी में तो मैं भूल ही गया कि 25 जुलाई के मैं करीब आ पहुँचा हूँ। तुमने मनुहार कर उसके लिए शाॅपिंग की। बैलुन खरीदे। चाॅकलेट का पैकेट। गिफ्ट देने के लिए ‘इस्ट्रूमेन बाॅक्स’ लिया। मैंने देखा तुम उससे सिर्फ 2 वर्ष बड़े होने के बावजूद कैसे चिंता करते हो उसकी। यह अच्छी बात है। अपने से छोटे के प्रति आदर स्वयं बड़ा होने की गरिमा को बढ़ा देता है। यह सामाजिकता हमने दूसरों को करते हुए जाना है; और यही वह मूल थाती है जिसे बरकरार रखना है। दीपू के लिए दादा का लाड़-प्यार कभी तुम्हारे जैसा नहीं मिला। अब तुम भी दादा-दादी से इतने दूर हो गए हो कि वे बस बेसब्र होकर तुम्हारी बाट जोहते हैं, कभी शिकवा-शिकायत नहीं करते। शिकायत तो तुम्हारी मम्मी भी नहीं करती जिसे मैंने बहुत कष्ट दिया। तुमलोग कब बड़े हो गए, मुझे पता ही नहीं चला। तुम्हारी माँ सीमा देवता है जिसके आगे मैं कुछ भी नहीं हूँ।
देव, तुम्हारी मम्मी ने मुझे जिस तरीके से पढ़ाया और आगे बढ़ने का हौंसला दिया वह सचमुच अनमोल है। तुम कभी अपनी मम्मी को दुःखी मत होने देना। आज मैं…

वाह! रजीबा वाह!

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रे...रजीबाऽऽ...रे...रजीबाऽऽ.
रे रजीबाऽऽ जिए जा....,
दूध मलाई खाए जा....
मोदी मोदी गाए जा...
रे...रजीबाऽऽ...रे... रजीबाऽऽ.
रे रजीबाऽऽ जिए जा....,

रे...रजीबाऽऽ...रे... रजीबाऽऽ.
रे रजीबाऽऽ जिए जा....,
दूध मलाई खाए जा....
अरविन्द आस लगाए जा...
रे...रजीबाऽऽ...रे... रजीबाऽऽ.
रे रजीबाऽऽ जिए जा....,

रे...रजीबाऽऽ...रे... रजीबाऽऽ.
रे रजीबाऽऽ जिए जा....,
दूध मलाई खाए जा....
अखिलेश ट्यून बजाए जा...
रे...रजीबाऽऽ...रे... रजीबाऽऽ.
रे रजीबाऽऽ जिए जा....,

रे...रजीबाऽऽ...रे... रजीबाऽऽ.
रे रजीबाऽऽ जिए जा....,
दूध मलाई खाए जा....
राहुल बैन्ड बजाए जा...
रे...रजीबाऽऽ...रे... रजीबाऽऽ.
रे रजीबाऽऽ जिए जा....,

कुछ भी कर ससूर!
पर अपना शोध-प्रबन्ध जमा कर
हमें अनुगृहीत कर!!!!

वाह! रजीबा वाह!

.............................


रजीबा ने सोचा-
यदि ‘डाॅक्टोरेट’ की उपाधि न लिया
तो....!
...तो क्या बिगड़ जाएगा?

यही कि तनख़्वाह कम मिलेगी
और क्या?
हा...हा...हा!

.........


साला रजीबा, नौटंकी
चूतिए को और कुछ नहीं सूझता
तो अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी चलाता है
चिल्लर....!

हा...हा....हो.....हो...!!!


चाणक्य हमारी परछाई है!

राजीव रंजन प्रसाद
......

हर सेकेंड बदलता है क्षण
समय का चाणक्य
और क्षण मात्र में
नत्थी जिंदगी धूम जाती है आगे की ओर
पिछले कई सालों से
मैंने घंटे की सुई नहीं देखी
सिर्फ देखा-
समय के चाणक्य को
मिनट-दर-मिनट
जिंदगी बदलता हुआ
घंटे की एवज में
इतने रफ्तार से कि
सोचना संभव नहीं,
विचारमग्न होना तो दूर की कौड़ी है
यह इसलिए भी कि-
चाणक्य अतिसुस्त होने के आरोप से बचना चाहता था
बचाव में हैं पूरे लाव-लश्कर
घड़ीनुमा फौज
हर दिनचर्या शुरू होते ही
हो जाती है ख़त्म
साथ के सभी में से
कोई घंटा होना नहीं चाहता
सभी अतिसुस्त होने के आरोप से बचना चाहते हैं
मैं, आप, यह, वह, सब-
उन्हें देख रहा होता है
समय का चाणक्य
अब घंटे में समा जाती है फटाफट खबरें
पचास, सौ...दो सौ तक
लेकिन मैं घंटा होना चाहता हूँ
अतिसुस्त, महासुस्त, सर्वोपरिसुस्त
क्योंकि मेरा सवाल है-
समय के चाणक्य से
वह जो खुद बेहद आक्रामक है, चक्करदार है
जिसकी भाषा बेरंग और चेहरा पाखण्ड की है
जो अंदर-बाहर लिजलिजा और चिपचिपा है
जो केन्द्र में है
जो सत्ता में है
जो हर सुखों का भोक्ता है
जो नेता, मंत्री, नौकरशाह है
जो करोड़पति है, काननूविद् है, प्रोफेसर है
बहुत म…

जाति का आलोचनात्मक समाजशास्त्र : वर्तमान पूँजीवादी परिप्रेक्ष्य में

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--------------  अजनबी भाषा के तौर पर अंग्रेजी में लिखना और बोलना यदि हमारे राष्ट्रीय चरित्र का प्रमाण-पत्र हो सकता है, तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों और पूँजीवादी ताकतों द्वारा भारतीयता का प्रचार जिस तरीके से किया जा रहा है; वह ग़लत कैसे है...इस कुतर्क पर संवेदनशील होकर विचार करना आवश्यक है। ........................ राजीवरंजनप्रसाद





भारतकीधार्मिकमान्यताएँअतिप्राचीन हैं, इसलिए उनके पूरे सच होने की गारंटी नहीं दी जा सकती है।लोकमान्यताहैकिभारतीयमनीषापंचस्कन्धसेपूरितथीं।यहधार्मिकविलक्षणतापंचस्कन्ध(देशगत, कालगत, आकारगत, विषयगतऔरगतिगत) कहे