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अरुण प्रभा : हिंदी-शोध की मानक और स्तरीय पत्रिका बनाने का संकल्प, इच्छाशक्ति और दृढ़ता

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हम अतिरिक्त कुछ नहीं कहना चाहते, आप यदि शोध तथा शोध-पत्र की गुणवत्ता और स्तरीयता को अकादमिक सेहत के लिए प्राणवायु सरीखा मानते हैं, तो निम्न पता आप ही के लिए है :

सम्पादक
अरुण प्रभा, हिंदी विभाग
राजीव गाँधी विश्वविद्यालय
रोनो हिल्स, दोइमुख
अरुणाचल प्रदेश-791 112
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मैं हिंदू क्यों हूँ!

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प्रिय देव-दीप,

मैं हिंदू हूँ और जिस आवेदन से मुझे नौकरी मिली है; उसमें मैंने अपना धर्म हिंदू ही लिखा है। मैं हिंदू इसलिए हूँ कि जिस परिवार में मेरा जन्म हुआ है, वह हिंदू परिवार है। यह ठीक उसी तरह है जैसे मैं अपने को पूरे हकदारी के साथ भारतीय बताता हूँ। यह भारतीय होना भी सिर्फ इस कारण है कि मेरा हिंदू परिवार जिस जगह पर रहता है उस जनतांत्रिक राष्ट्र का नाम भारत है और उसके पूरे रहवासी स्वतः भारतीय मान लिए जाते हैं। इसी तरह मैं पिछड़े वर्ग से हूँ और मेरा जाति कानू है। इसकी वजह यह मालूम है कि मैं एक जातिवादी समाज में पैदा हुआ हूँ जिसे मनुस्मृतिबोधक शास्त्रीयता प्रमाणित करती है। वह यह सत्यापित करती है कि हर व्यक्ति जाति में पैदा होता है, धर्म में खड़ा होता है और वर्ग में चलता है। व्यक्तिगत तौर पर किसी और पहचान के रूप में एक लैंगिक आधार महत्त्वपूर्ण है जिससे किसी बच्चे का लड़का या लड़की होने की शिनाख़्त कुदरती तौर पर होता है। मैं पुरुष हूँ और यह मेरे लैंगिक जननांग को देखकर प्रमाणित किया जा सकता है। यही एक ऐसा मूल आधार है जिसे कोई भी प्रकृतितः जान सकता है। शेष के लिए कागजों, दस्तावेजों, साक्ष्यों,…

कुछ नहीं !

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कल रात एक अजीब सपना देखा।

सोए में किसी ने पूछा-‘कितना जानते हो?’
झटके से मुँह से निकला-‘कुछ नहीं !’

वह मेरे बाद वाले से पूछने लगे, फिर उसके बाद वाले से, फिर उसके भी बाद वाले से।
सब कुछ न कुछ कह रहे थे। बहुत कुछ कह रहे थे।

मैं रोने लगा, क्योंकि मुझे भी अपने बारे में बहुत कुछ कहना था। इतने सालों से कितना पढ़ा, कितना लिखा...और सबसे अधिक कि मैं क्या नहीं लिख सकता, किस बारे में नहीं लिख सकता, कितना नहीं लिख सकता आदि-आदि ढेरों बातें बतानी थीं।

लेकिन मेरा समय बीत गया और मैं अवसर गँवा चुका था।

सुबह उठने पर मेहरारू ने बच्चों को स्कूल जाने के लिए तैयार करने को कहा और वह रसोई में नाश्ता तैयार करने लगी।

सब सामान्य था, लेकिन मेरे भीतर उस प्रश्नकर्ता को सही जवाब नहीं दे पाने की चिंता खाए जा रही थी।
तभी बड़े वाले बच्चे ने कहा-‘आप अंग्रेजी जानते हैं....मेरा होमवर्क करा दीजिए,’

मेरे मुँह से निकला-‘कुछ नहीं,’

और दोनों बच्चे रोने लगे। रसोई में घुसी उसकी मम्मी भी रोने लगी।
मैं भौचक्क। अचानक यह सब नौटंकी क्यों।

बच्चे ने एक कागज मुझे थमा दिया, मेरा बच्चा अंग्रेजी माध्यम में उत्तर लिखने में अनुत्तीर्…

स्मरणीय

-----  ''मैंने पत्रकारिता का लंबा और टेढ़ा रास्ता चुना। सीधा रास्ता यह है कि अपने विचारों को धड़ाधड़ लिखकर पत्रकारिता में अपनी जगह और पहचान बना लें।लेकिन पता नहीं किन कारणों से मैंने यह रास्ता नहीं चुना।जो रास्ता मैंने चुना,वह जरा कठिन है। यह बात मैं कोई शहीदी मुद्रा या प्रशंसा पाने के उद्देश्य से नहीं कह रहा हूं। मुझे लगा कि मेरे लिए यही रास्ता ठीक है। पाठक तक एक व्यक्ति की बात पहुंचाने की बजाय मैंने सोचा कि हम ऐसा साधन विकसित करें जिससे बात संस्थागत रूप में पाठक तक पहुंचे। मैं रहूं या न रहूं, व्यक्ति रहे या न रहे,लेकिन वह बात लोगों तक पहुंचती रहे। इसमें मेरे लिए यह महत्त्वपूर्ण नहीं था कि मैं क्या लिख रहा हूं बल्कि मेरे लिए यह महत्त्वपूर्ण था कि और लोग क्या लिख रहे हैं। मेरे लिए महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि हम किस तरह की पत्रिका निकाल रहे हैं या हमने किस तरह की टीम बनाई है। पत्रकारिता के अपने शुरुआती दिनों में मैं खूब लिखता था। पर जैसे-जैसे समझ बढ़ी, मुझे लिखने से डर लगने लगा कि मैं यह क्या कर रहा हूं।'' - एसपी यानी सुरेन्द्र प्रतप सिंह;कालजयी पत्रकार संपादक --------- 
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कमलेश्वर: लेखकीय तमीज़ का बेहतरीन सूत्रधार

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राजीव रंजन प्रसाद
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27 जनवरी, 2017 को ‘इस बार’ में प्रकाशित किया जाने वाला एक शोधपरक एवं गंभीर विश्लेषणात्मक आलेख।

तब तक के लिए सबा खैर!