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Showing posts from June, 2013

रजीबा का विकीलिक्स....खुलासा!

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यह ठीक है कि देश की राजनीति रजीबा की राय से नहीं चलती है। पर रजीबा रायबहादुर है। दुनिया भर की राजनीति पर अपनी राय देता है। औकात ‘जीरो’। लेकिन, उसकी अक़्ल के आगे रायसीना हिल्स के लोग पानी भरते हैं...ऐसा उसका मानना है, दावा नहीं। दावा मोदी कर सकते हैं। मोदी के मद में पगलाए हुए लोग कर सकते हैं। राहुल कर सकते हैं जिनका देह राजनीति के नाम पर रोता है; लेकिन वे राजनीति से चिपके रहने को अभिशप्त हैं। मोदी धरम करते हैं। राहुल करम करते हैं। इसी करम-धरम में जनता का बेड़ागरक होता है...हो रहा है। बेड़ागरक का विज्ञापन टीवी पर मत देखिए। अपने आस-पास देखिए। हर महीने ख़त्म होने वाले गैस में देखिए। सब्जी बाज़ार में भाव सुन अपने चेहरे पर आते भाव में देखिए। अपने दुपहिया-चरपहिया के टैंक का ताला खोल तेल में देखिए। उस दिल्ली-शिक्षा में देखिए जो बच्चों का ‘कट आॅफ’ शत-प्रतिशत जारी करती है। उसके नीचे वालों को धकेल-बाहर करती है...जबकि शत-प्रतिशत उसे भी आता कुछ नहीं है।

जनता क्या कभी किसी को धकेल-बाहर कर सकती है...शत-प्रतिशत की तर्ज पर? क्या अपने ज़िन्दगी को चूसते उन जोंकों को खुद से …

सबसे बडा लड़ैया रे.....!

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टीवी लबालब भरे टब की तरह है। आजकल यह भरावट पानी की नहीं राजनीतिक बातों की है। पेट से बात निकलने में ईंधन की खपत नहीं होती है। इसलिए आप बातों की टब में एकल स्नान कीजिए या शाही-स्नान कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। दरअसल, चुनाव-पूर्व बातों का क्रेज विज्ञापन से अधिक टीआरपी देने वाला होता है। और बात का विषय अगर केन्द्र में झण्डे गाड़ने का हो, तो टेलीविज़न की हैसियत उस नई-नवेली बहुरानी की तरह हो जाती है जो चैबीसों घण्टे टीप-टाॅप में ही दिखती है।

इसीलिए आजकल टीवी पर राजनीतिक धींगामुश्ती और मुँहचपौवल का खेल चोखा है। एक बकबका रहा है धुँआधार, तो दूसरा उसकी बोलती बन्द करने की जुगत में जुटा है...। आँख-मुँह के सामने कैमरा हो तो जवाबी बात जबर्दस्त तरीके से मुँह से बाहर आती है....ध्रुवीकरण, तुष्टिकरण, अल्पसंख्यकवाद, बहुजनवाद, समाजवाद, सेक्यूलर, कम्यूनल वगैरह-वगैरह। ज्ञान का पाखण्ड हमेशा पारिभाषिक शब्दावली में प्रचारित/प्रसारित/आरोपित/प्रक्षेपित होता है। शब्दों का उलटफेर है। अर्थ सभी दलों में एकसम है।

टीवी पर बकुआने में राम/रहीम सब के सब माहिर हैं। इनमें से कोई कि…

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प्रिय देव-दीप,

हम जहाँ-जहाँ आबाद(?) हुए....तहाँ-तहाँ बर्बादी हुई। विकास की बकावस और अंधाधुंध दौड़। चुहदौड़। बकरादौड़। घुड़दौड़। हाथीदौड़। सबकुछ ताबड़तोड़। कई बार यह सब हमने आस्था और विश्वास के मुलम्मे में किया। प्रकृति की घेरेबंदी की। यह बिना सोचे-समझे कि इस नाकेबंदी की वजह से नदी, पहाड़, जंगल इत्यादि का क्या होगा? उस शक्ति-सत्ता का क्या होगा जिसके रहमोकरम पर हम जी रहे हैं, जुगाली कर रहे हैं, बनावटी खोल/खोली ओढ़-बिछा रहे हैं; और उसमें विराज भी रहे हैं?

देव-दीप, प्रकृति गुपचुप कुछ नहीं करती है। वह दंड देती है, तो खुल्लमखुल्ला। एकसम। एकरूप। हम अपने निरीह, निर्दोष होने का थाली-तसला पिटते रहे...कोई सुनवाई नहीं। हमारा भोलापन अगर प्रकृति का भला नहीं कर सकती है, तो वह आपके भले के लिए सोचे क्योंकर? आज जिसे हम हिमालय की सुनामी कह रहे हैं...वह दरअसल, हमारे ही किए का ‘ब्लैकहोल’ है। यह यमराज का महाभोज नहीं है। यह कुपित देवताओं का दैवीय-न्याय(पोएटिक जस्टीस) नहीं है। यह हमारे अजर-अमर होने की लालसा(?) पर वज्रपात भी हरगिज़ नहीं है।

देव-दीप, यह तो हमारे उन करतूतों का हर्जाना है जिस पर हमारे सरकार की …

रजीबा का ‘रांझणा’

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अटूट प्रेम पनपता है...जब कोई टूट कर चाहता है।

जात-मज़हब, भाषा-भूगोल, अमीरी-गरीबी इत्यादि से परे एक लौण्डे के भीतर युवा उमरिया में प्यार-व्यार होना स्वाभाविक है.....किसी लौंडिया के लिए ‘रांझणा’ बन जाना जो बिल्कुल ही संभव। खाशकर खाँटी/ठेठ बनारसीपन का भोकाल किसी लौंडे के तन-मन में रचा-बसा हो तो....फिर कहना ही क्या भैये....?

....तो फिर हो जाए ‘रांझणा’....!

भारतीय जनता के नाम....जरूरी सवाल

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1.
मनमोहन सिंह बनाम अमत्र्य सेन
2.
नरेन्द्र मोदी बनाम अरविन्द केजरीवाल
3.
राहुल गाँधी बनाम अरुंधती राय
4.
वरुण गाँधी बनाम आनंद कुमार
5.
मुरली मनोहर जोशी बनाम मेधा पाटेकर
6.
मायावती बनाम पी. साईनाथ
7.
मुलायम सिंह यादव बनाम प्रशांत कुमार
8.
शिला दीक्षित बनाम हिमांशु कुमार
9.
कपिल सिब्बल बनाम प्रो. यशपाल
10.
लालू यादव बनाम परांजपे गुहा ठाकुरता
11.
नवीन जिंदल बनाम सचिन तेन्दुलकर
12.
सचिन पायलट बनाम रविश कुमार
13.
रामविलास पासवान बनाम रामजी तिवारी
14.
दीग्विजय सिंह बनाम दिलीप सी. मंडल
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545.
पूर्व-काबिज़ बनाम नई अंगड़ाई
546.
पूर्व-काबिज़ बनाम नई अंगड़ाई
547.
पूर्व-काबिज़ बनाम नई अंगड़ाई
548.
पूर्व-काबिज़ बनाम नई अंगड़ाई

साहब जी....ये तो फौरी तौर पर लिए गए नाम हैं जिनमें से जनता हमेशा दूसरे को ही चुनेगी.....क्योंकि यहाँ नई अंगड़ाई में शामिल ये वे लोग हैं जो देश के मौजूदा राजनीतिक हालात, संकट और नेतृत्व पर सीधे सवाल खड़ा करते हैं......अपनी स्पष्ट असहमति दर्ज करते हैं.....सार्थक/सुव…

रवीश कुमार को NDTV इंडिया ने लाइव-कार्यक्रम से अचानक किया गायब.....!

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अभी-अभी। NDTV इंडिया ने मूड ख़राब कर दिया।

‘आडवाणी का इस्तीफा’ नाम से प्रसारित हो रहे लाइव-कार्यक्रम में ब्रेक की विवशता को लेकर जाने-माने एंकर रवीश कुमार मामूली टिप्पणी कर गए। उनकी इस टिप्पणी पर स्टुडियो-चर्चा में शामिल अभय कुमार दुबे अपनी हँसी न रोक सके।

ब्रेक के बाद इन दोनों को जैसे लाइन हाजिर कर दिया गया हो......अचानक दोनों गायब।
यह बात आश्चर्यजनक ढंग से हज़म नहीं हो पा रही है।

वैसे इससे किसी को क्या फर्क पड़ता है......!

बोल गए आडवाणी.....इस्तीफा

7.55 AM/10-06-2013

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....और हुआ वही जिसे देखे जाने की उम्मीद हमारी बेचैन आँखें कर रहीं थीं।

वैसे तो यह मतस्य-न्याय नहीं है। यह उसका रिवर्स है। बीमार आडवाणी को ‘बैकफुट’ पर डालते हुए मोदी की प्रचार-कमल सिंहासन विराज उठी है। भाजपा मोदीमय है, तो हर्ष-हुलस की मदिरापान-संस्कृति भाजपामय दिखाई दे रही है। ज्योतिषदार राजनाथ सिंह अपने इस फैसले को न्याय(कृप्या अन्याय न प-सजय़ें) कह रहे हैं। लेकिन आडवाणी की इच्छा-महत्वाकांक्षा के मद्देनज़र देखें, तो यह उनको शीर्ष-भाजापाईयों की ‘एक धक्का और....’ है। हाशिए पर आ खड़े हुए आडवाणी सोच रहे होंगे-‘ये क्या हो गया रामा रे........!’

दरअसल, नरेन्द्र मोदी भाजपा के लोकप्रिय ‘मनी-पर्सन्स’ हैं। अपना नामलेवा वे खुद हैं। वैसे भी बीमार और बुजुर्ग आदमी को राजनीतिक भोज-महाभोज से दूर-दार ही रहना चाहिए। ख़ासकर गोवा जैसे अल्हड़ जगह में पार्टी-मीटिंग हो तो मन-मिज़ाज बिगड़ने के चांसेज अधिक होते हैं। इस मामले में नरेन्द्र मोदी का अय्यारी(भगवा) -हजयक सफेद हैं। वे आधुनिक विकास का पहाड़ा प-सजय़ने वाले व्य…

अपने ख़िलाफ एफआईआर

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इस बार रविवारी(26 मई, 2013) अंक में कृष्णा शर्मा की कविता प्रकाशित हुई
है। बेहद दुरुस्त भाषा में खुद की ख़बर लेती हुई यह एक महत्त्वपूर्ण कविता
है। किसी भी सूरत में खुद से लड़ना आसान नहीं होता है। स्वयं के ख़िलाफ
एफआईआर लिखाने के लिए जीवट जिजीविषा चाहिए जो कविता शर्मा की इस कविता
में पूरे ठाठ संग मौजूद दिखाई देती है। अपने आत्मबल को झकझोरती हुई मानों
वह स्वयं को आईना दिखाती हैं-‘खुद ही तो मैं/बंधती गई/सिमटती गई/सिकुड़ती
गई/सीमित, संकुचित/घिरती गई घरों में/भार-बोझ/परेशानी-जिम्मेदारी/जैसे
शब्द थे/मुझे सम्बोधन के लिए।’ इस कविता में कवियित्री का रूख साफ है।
इसीलिए वह अपनी ओर से पहलकदमी करती दिखाई दे रही है। यह पहलकदमी स्त्री
के स्वयं से बहसतलब होने की चेतना और प्रवृत्ति को जगज़ाहिर करता है। गोकि
यह मानविकी और सामाजिकी के गट्ठर में पलते बौद्धिक-मुँहे साँपों के ऊपर
जबर्दस्त प्रहार भी है और उनके प्रपंचों का खुलासा भी। कवियित्री
मनबहलावे के प्रलापों को तुच्छ लोगों के आत्मप्रियता का हथकंडा मानती
हैं।

वाकई आज का पढ़ा-लिखा तबका अपनी सुविधानुसार संवदेना का खोल बुनने में
उस…

अपनी पत्रकारिता-4

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अपनी पत्रकारिता-2

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