Monday, September 30, 2013

‘इस बार’ बंद



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तकलीफदेह इस समय में मैंने ‘इस बार’ में खूब लिखा। शब्द से पेट नहीं भरते। भाषण से अन्याय खत्म नहीं होते...कविता-कहानी से आदमी का कल्याण नहीं हो सकता....यह सब सुनते-समझाए जाते हुए।

लेकिन, ‘इस बार’ बंद कर रहा हूँ। एक तो मैं तकनीकी अ-जानकारी की वजह से पाठकों को न जोड़ सका और यदि कोई आया भी तो उन्हें प्रभावित न कर सका।

ऐसे में मैं ‘इस बार’ बंद कर औरों की आँख में झाँकना चाहता हूँ कि वे आखिर कैसे रच रहे हैं , शब्दों की दुनिया....बना रहे हैं भाषा के डैने...हमारे उड़ने के लिए।

सबसे अधिक माफी अपने देव-दीप से.....आपदोनों को चिट्ठी लिखते हुए मैंने अपने बचपन को जिया...अपने पापा की चिट्ठी से ‘रेस’ की जो आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं।

इस नई दुनिया ने काफी कुछ खा-चिबा डाला....मेरे पापा अब मुझ चिट्ठी कहाँ लिखते हैं....मम्मी किसी त्योहरी में चिट्ठी के साथ 100 रुपइया कहाँ भेजती हैं......,

खैर, ‘इस बार’ बंद कर रहा हूँ ताकि तल्लीनता से लगकर अपने और अपने घरवालों का सर उठाने लायक कुछ कमाई-धमाई कर सकूँ....मम्मी की भाषा में...कुछ ढंग का काम-वाम।

शुक्रिया!


Friday, September 27, 2013

प्रिय देव-दीप,



हमारी आँखें बाहर के दृश्यों को खूब से खूब 1/10 भाग ही देख पाती है। नेत्र का दिखाव-क्षेत्र सीमित मात्रा में प्रकाशीय कणों को ग्रहण करता है। इसलिए हमारे मानस में बनने वाले दृश्यबिम्ब चयनित/प्रतिनिधि होते हैं। इसी तरह ‘वाक्’ में हम जितना सोचते हैं; उसका कुछ हिस्सा ही अभिव्यक्त हो पाता है; शेष अव्यक्त ही रह जाते हैं। यह अनदेखा दृश्य अथवा अव्यक्त वाणी एक दिन बचावट की बड़ी ढेर बनकर हमारे ही सामने आ खड़ी होती हैं। यह सब हमारे अचेतन का हिस्सा है।

बच्चों, इसी तरह सुनावट की प्रक्रिया घटित होती है। हम जो सुन पाते हैं वे तो एक अंश मात्र हैं; बहुलांश तो अनसुना ही रह जाते हैं। जिन आवाजों को हम नहीं ग्रहण कर पाते हैं, उन्हें प्रकृति अपने संज्ञान में सुरक्षित कर लेती है। यह प्रकृतिगत अचेतन का हिस्सा है। प्रकृति बहुविध आवाजों को न सिर्फ ग्रहण करती है; बल्कि उसे तरंगों में रूपान्तरित कर ब्राह्मण्ड में विस्तारित कर देती है। ये तरंगत्व नाद-अनुनाद के रूप में हमें पूरे जगत में फैले मिल सकते हैं। इस फैलाव में विद्युत्व और चुम्बकत्व दोनों पर्याप्त मात्रा में विद्यमान होते हैं।

बच्चों, तुमदोनों ने रंग-मिश्रण के बारे में कुछ सुना है। प्रकाश, ध्वनि, दृश्य और पदार्थ इत्यादि रंग-मिश्रण की ही तरह आपस में घुलमिल कर जागतिक कार्यकलापों को संभव बनाते हैं। यह अंतःक्रियात्मक मिश्रण मनुष्य के आचरण-व्यवहार को काफी हद तक नियंत्रित-निर्धारित करते हैं। उनके व्यक्तित्व-व्यवहार को बुनते-बनाते हैं। जीवन में घटित हर एक चीज जिन्हें हम समय, समाज और परिस्थिति के आपसी तालमेल और मिलाव-बनाव का परिणााम मानते हैं....वे सभी संचार की गतिविधि, गतिशीलता और गत्यात्मकता के द्धारा मानव एवं मानवेतर जीवन के समक्ष ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’ का अद्भुत कोलाज रचते हैं जिसमें हमारी भूमिका सिवाए पात्रगत-अभिव्यक्ति के विशेष या विशिष्ट कुछ भी नहीं है।

बच्चों, भारतीय चिन्तन में पगे ‘वसुधौवकुटुम्बकम्’ की भावना हो या फिर शेक्सपियर की कविता ‘विश्व एक रंगमंच है!’ का मूलार्थ...यह दुनिया हमारे देखे-सुने-कहे की सार्थकता, महत्ता और पूर्णता को ही अंतिम सत्य मानकर चलती है।

राहुल गाँधी का नाॅनसेंस बयान....न्यूज़ चैनल उड़ा रहे कबूतर


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कांग्रेस(आई) राजनीतिक पार्टी है। इस पार्टी के नेता हर तरह के स्टंट करने में माहिर हैं।

नये-नये उपाध्यक्ष बने राहुल का स्टंट आप सबके सामने है। दागी राजनीतिज्ञों से सम्बन्धित अध्यादेश पर उनका बकवास बोल न्यूज़ चैनलों पर फड़क रहा है। इस बयान में वे जिस अध्यादेश को फाड़ने के लिए कह रहे हैं, यह बात जनता उसी दिन से कह रही है; राहुल ने अपने कान में अभी तक ठेपी लगा रखा था।

युवा राजनीतिज्ञ राहुल गाँधी से पिछले सालों में जनता की उम्मीद यह रहती थी कि वे बोलें, तो सबसे पहले बोलें....साफ और निष्पक्ष बोलें....या फिर बिना बोले सारा कुछ साफ और निष्पक्ष करें। लेकिन उन्होंने आज तलक सबकुछ जनता के चाहे के उलट कहा और किया है।

अजीबोगरीब फर्राटा बोल

राहुल गाँधी का आज का बयान पूरी तरह पूर्व-नियोजित ‘स्टंट’ है। उसी तरह जैसे यूपीए सरकार एक तरफ अनावश्यक खर्चों में भारी कटौती करती है; दूसरी ओर, सातवें वेतन आयोग की घोषणा कर अपने सहज-बुद्धि का कचूमर निकाल देती है। दरअसल, यूपीए के खातेनामे में दागियों, अपराधियों, भ्रष्टाचारियों को प्रश्रय देने का ‘रिकार्ड’ जबर्दस्त है; वह उसे हर हाल में बरकरार रखना चाहती है।

यूपीए जिस राहुल गाँधी को तुरुप का पता समझ रही है; सारा दोष इस समझदारी में ही है। आज अजय माकन राहुल गाँधी के जिस बयान को कांग्रेस का बयान कह रहे हैं...या कि मनीष तिवारी जिसे संज्ञान में लेने की सोच रहे हैं....यह सब उस अध्यादेश के सन्दर्भ में है जिसे राहुल गाँधी बे-सिर-पैर का अध्यादेश करार दे रहे हैं। राहुल गाँधी के इस बयान ने यह साफ कर दिया है कि उपाध्यक्ष पद पर आसीन इस युवा राजनीतिज्ञ की पार्टी में लोकतंत्र नहीं है। सबकी अपनी-अपनी टोपी है जो जनता को अलग-अलग ढंग से पहनाने के लिए स्वतंत्र हैं।

अध्यादेश जैसे संवेदनशील एवं महत्तवपूर्ण विषय सदन में पारित होकर राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए पहुँच जाते हैं...लेकिन राहुल गाँधी को इस बारे में पता नहीं होता...! क्या यह विश्वास योग्य बयान है? ऐसे हल्के बयानों से राहुल गाँधी जनता को क्या संदेश देना चाहते हैं...नहीं पता; लेकिन, इतना अवश्य है कि उनमें राजनीतिक दृष्टिकोण, निर्णय-क्षमता और नेतृत्व का सर्वथा अभाव है। इस तरह के बयानों से वे अपनी प्रचारित छवि का नुकसान ही कर रहे हैं। यह कैसी विडम्बना है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जिस राहुल गाँधी को अगले प्रधानमंत्री के रूप में सबसे योग्य उम्मीदवार बता रहे हैं...उनके बयान अन्तर्विरोध और विरोधाभास से अटे पड़े हैं।

अध्यादेश फाड़ देने जैसे हास्यास्पद बयान में एक बात साफ है कि राहुल गाँधी की चिन्तन को मालिश-मरम्मत की सख्त जरूरत है। एक बात और कि वे जिस पद पर हैं...वहाँ से अपने व्यक्तिगत मत का हवाला देकर नहीं बच सकते हैं। वे नेतृत्वकर्ता हैं और उनकी जिम्मेदारी है कि अपने नेतृत्व की सरकार के किए का नैतिक जवाबदेही लेना भी सीखें। राहुल गाँधी जो अभी तक जनता को सम्बोधित करने लायक भाषा-संस्कार भी नहीं सीखे सके हैं। उनके बोल में या तो पार्टी ‘क्रिया-कर्म’ का गुणगान सर्वाधिक होता है या फिर सरकारी योजनाओं-परियोजनाओं से जिक्र-दर-जिक्र।

यह सच है कि जतना भाषा या भाषण के आसरे किसी राजनीतिज्ञ को नहीं चुनती है, लेकिन आप क्या है...आपकी मंशा क्या है...आपकी समझ और समझदारी का स्तर क्या है? यह सब जानकारी जनता को आखिर भाषा के माध्यम से ही तो मिलती है। क्यों....?

Wednesday, September 25, 2013

अर्पणा हाउस उर्फ अपलाइन रोड 36


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वह ट्रेन हर रोज प्लेटफार्म नंबर 1 से दिल्ली को रवाना होती थी।

पिछले दिसम्बर की 24 तारीख को दिन सोमवार था। एस-4 कोच में दिल्ली जाने को बैठी स्काॅलर अर्पणा किसी हड़बड़ाहट में नहीं थी।

अर्पणा अपने हाॅस्टल की बाॅलकोनी में खड़े होकर मोबाइल से ही ‘रेडियो मिची’, ‘रेडियो मंत्रा’...इत्यादि खूब सुना करती थी। इस वक्त भी सुनने में जुटी थी।

अर्पणा पिछले पाँच सालों तक प्रेम करती रही थी। इज़हार आज किया था कम्बख़्त ने।

‘मैं बीएचयू छोड़ रही हूँ पापा...मुझे बुरा लग रहा है। लेकिन यह करना होगा।’

समय दिलचस्प कहानियाँ बुना करती हैं। इस बुनाव में पारिवारिक-सामाजिक तागे काम आते हैं। अर्पणा खुद इन्हीं तागों से बुनी थी। अर्पणा का काम तो उन तागों का रंग-रोगन करना मात्र था। उसे वह बड़ी ईमानदारी से कर भी रही थी कि ये स्साली ज़िंदगी.....!

मन साथ न दें, तो चीजें ऊब पैदा करने लगती हैं।

अर्पणा एफ. एम. रेडियो बंद कर ली। काफी देर तक ओठंगी रही। सामने तीन साल की एक प्यारी बच्ची थी। बर्थ पर उसके नन्हें-नन्हें पाँव कुदक रहे थे। अर्पणा उस बच्ची के बजते हुए पायल की आवाज़ में खोई थी। अर्पणा ने गौर किया था, वह बच्ची बार-बार अर्पणा की ओर आने के लिए कौउच रही थी। अर्पणा से नहीं ही रहा गया। उसने उसे उसके बर्थ से लोक लिया था।

सफ़र अनगिनत रिश्तों का गवाह बनते हैं। शेरो-शायरी, फूहड़-दोअर्थी चुटकले, मजमेबाजी, बहसबाजी, तू-तकार, मैं-मकार, छेड़छाड़, टोनकसी.....। साथ छूटना तय हो, तो आदमी हर पल टूटकर जीना चाहता है। अर्पणा कई सालों से ट्रेन से आती-जाती रही थी। एक तरह से उसने ट्रेन के साथ अनाम रिश्ता जोड़ लिया था।

ट्रेन की अपनी रौ है, अपनी ही ज़िदगी है। वह जिन्हें अपने गंतव्य तक छोड़ती है...उनसे अपने लिए कोई उम्मीद नहीं करती है...और न ही किसी तरह की इल्तज़ा। ट्रेन समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की सबसे बड़ी पालक है। सामूहिक चेतना का दृश्य-बंध है। सिनेमा की एक ऐसी रील जिसमें पात्रों का आना-जाना लगा रहता है...कहानियाँ बनती रहती हैं...बढ़ती रहती हैं।

अर्पणा को गुलाम अली याद आ रहे थे।

‘‘वो पिछले रुत के साथी...अब की बरस मैं तन्हा हूँ;
अपने धुन में रहता हूँ...मैं भी तेरे जैसा हूँ!’’

पिछले पाँच साल से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में शोधशील अर्पणा आज तन्हा थी। बिसरा कोई नहीं था; लेकिन, बिछुड़ सभी गए थे।

‘एक बार फिर सोच लो....अर्पणा, तुम सड़क पर आ जाओगी....’

‘सोचने का काम आप जैसे बुद्धिजीवी प्राध्यापकों का है सर जी...यह सड़क बीएचयू से सिर्फ बाहर ही नहीं निकलती है...उन सभी जगह जाती हैं...जहाँ मैं जाना चाहती हूँ....’

‘अर्पणा....भावुकता भी एक तरह की उन्माद है; बचो इनसे! ज़िदगी में कई समझौते करने पड़ते हैं...और यह भी....’

‘जी, शुक्रिया! मुझे अधूरे वाक्य के साथ सलाह देने वाले नापसंद हैं। और मैं अपने नापसंदगी का हमेशा विशेष ख्याल रखती हूँ....’

अर्पणा लंका चैराहे पर कैंट जाने के लिए टेम्पू के इंतजार में खड़ी थी।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को अर्पणा की पीठ साफ दिखाई दे रहे थे। अर्पणा सिंहद्वार से सीधे निकलकर सड़क पर आई थी। वह मालवीय जी के गोलम्बर के निकट से होकर बाईं ओर जा खड़ी हुई थी।

सहसा, एक हवा का झोंका करवट बदलने की सुकून माफिक बगल से गुजरा था।

‘वेलडन...वेलडन....वेलडन....!’

एक पल के लिए लगा जैसे महामना मदन मोहन मालवीय जी की मूर्ति अर्पणा का पीठ ठोंकते हुए कह रही थीं।

‘तेरा तुझको अर्पण...क्या लागे मेरा...’ अर्पणा की आँख गिली हो ली थी।

फिलहाल, अर्पणा आते वक्त भी चुप थी और अब भी।

‘‘अरे! इसने तो आपके ऊपर छिया कर दिया...’’

अर्पणा का चेतस मन ट्रेन के डिब्बे में प्रकट हो लिया था। इतने ही देर में काफी लोग आ-बैठे थे इर्द-गिर्द।

वह बच्ची हँस रही थी। अर्पणा उसे देख मुस्कुरा दी। सोचा, बच्चे बड़ो की राजनीति से अनभिज्ञ होते हैं...इसलिए हँसते रहते हैं खुलकर। बड़े बच्चों के मन को थाह पाने में असमर्थ रहते हैं...इसलिए अपना बोझ उनकी हँसी पर लादते-थोपते रहते हैं...चीखते-चिल्लाते रहते हैं।

कुछ देर बाद अर्पणा जब कपड़े बदलकर वापिस अपने बर्थ पर बैठी...ट्रेन चल पड़ी थी।

ट्रेन का खुलना अर्पणा के लिए किसी पुराने गाँठ के खुलने जैसा था। वह लम्बी साँस ली थी

उसने उस बच्ची को फिर से अपनी गोद में बिठा लिया था।

अर्पणा को अपने बर्थ के पीछे से कुछ अस्पष्ट-सी आवाज़े सुनाई पड़ रही थी। कोई किसी सर्वे का हवाला देकर भारत की उच्च शिक्षा संस्थानों की स्थिति का बयान कर रहा था...भारत का एक भी विश्वविद्यालय विश्व के 200 विश्वविद्यालयों की सूची में नहीं शामिल है...,

स्काॅलर अर्पणा उस ओर से अपना कान फेर ली।

बच्ची और अर्पणा एक-दूसरे में मशगूल हो गए।

गाड़ी मड़ुवाडीह स्टेशन के प्लेटफार्म से लगने वाली थी; उधर सुमिजीत का काॅल अर्पणा के मोबाइल में घर्राना शुरू हो गया था।

(जारी...)

Sunday, September 22, 2013

आँख के बारे में: राजीव रंजन प्रसाद का अनुसन्धान रिपोर्ट


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(Eye-Dwell Communication : All things caring out with Eye)

कुछ नोट्स

-आँखें स्कैनिंग मशीन से अधिक ‘पावरफुल’ और ‘रिएक्टिव’ होती हैं....
-हर घटना हमारे दिमाग में तारीख़वार दर्ज होती हैं....
-हमें सम्पर्क में जो कुछ हासिल है...सबकुछ हमारे संज्ञान-बोध का हिस्सा है...
-वे तमाम क्रियाएँ जिसमें शारीरिक क्रियाशीलता शामिल हैं...आँख उन सभी की ‘रिज्यूमे’ तैयार करती है....
-आँखें झूठ का सबसे अधिक प्रतिवाद करती हैं....
-आँख का प्राकृतिक संकल्प या कहे मूल प्रवृत्ति है-सच का उद्बोधन....
-आँखों के माध्यम से पिछले सभी सच बासबूत जाने जा सकते हैं.....
-आँखें मुहावरा नहीं गढ़ती हैं, लेकिन भाषा के मुहावरों से परिचित होती हैं....

इसीलिए शायद हमारी आँखें सबसे अधिक बोलती हैं, भारत के लोक-माधुर्य के कवि बिहारी कहते हैं:
 

 ‘‘कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात।
भरे मौन में करत हैं, नैनन ही सों बात।।’’

आदरणिय महोदय/महोदया

आपके समक्ष अपना शोध-पत्र प्रस्तुत करना मेरे लिए एक सुअवसर है।
आपसभी को अभिवादन!

मित्रो,

आँख हमारी ज़िन्दगी के बहुत करीब है। या यों कह लें कि हमारी ज़िन्दगी आँख के सर्वाधिक निकट है। हम जानते हैं और यह मानते भी हैं कि दुनिया की सारी चीजें आँख से दिखती है और स्मृति में टंक जाती है। इस टंकाव का सीअन कमजोर नहीं होता है। जैसे झमठार पेड़ की जड़े मिट्टी के गहरे तल में अपनी रिश्तेदारी कायम रखती हैं कुछ-कुछ उसी तरह आँखें इस दुनिया-परिवेश से अपने सम्बन्धों को सुमधुर बनाए रखती हैं। शरीर में बहुत सारे अंग है जिनके रोगग्रस्त होने पर हमारे जीने के रंग फीके पड़ जाते हैं कई बार जान पर भी आ बनती है। यानी हमारे शरीर का अंग-प्रत्यंग सब महत्त्वपूर्ण है; लेकिन, दुनिया को जानने-समझने की लिए आँख सबसे उपयुक्त माध्यम है...इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।

मेरा शोध-पत्र इसी विषयवस्तु की परिधि में आपसे संवाद करने का इच्छुक है।

मित्रो,

मेरा स्पष्ट मानना है कि एक व्यक्ति चाहे वह किसी वय का हो....उसके आँख ने
अबतक जो कुछ देखा है वे सबकुछ उसके दिमाग में सुरक्षित हैं। जैसे आप कोई सामग्री ‘डिलिट’ कर देते हैं, तो भी वे आपके ‘सिस्टम’ से नहीं जाती हैं...तकनीकी जानकार उसे भी जो ‘डस्टबीन’ से ‘गेटआउट’ की जा चुकी हैं....उन्हें खोज निकालता है।

आँखों के साथ भी यही प्रक्रिया चलती है। अनवरत। अहर्निश। निरन्तर।

आपकी आँख ने कोई मृत्यु देखा हो, किसी को चोरी करते देखा हो, भगदड़ होते देखा हो...या कोई भी ऐसी चीज जिसकी तीव्रता, गति और प्रभाव मनुष्य के सम्पर्क-क्षेत्र के दायरे में आता हो...उसे हमारी आँखें अनबोले-अनकहे ढंग से अपने दिमाग में कैद कर लेती हैं। अचेतन, अर्द्धचेतन और चेतन की सामूहिक क्रियाशीलता चाहे कितनी भी परदेदारी कर ले, लेकिन उसे जाना-देखा कभी भी जा सकता है।

मित्रो,

इस दिशा में चैंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं। ‘लाई डिटेक्टर’ की अवधारणा आज चलन में है। यह शरीर से प्राप्त संकेतों के आधार पर झूठ पकड़ने में हरसंभव मदद करती है। हमें ‘आई डिटेक्टर’ से यह जानने में आसानी होगी कि जिस घड़ी यह घटना घटी...उस समय सम्पर्क-क्षेत्र में शामिल लोगों की आँखें अपने दिमाग को क्या संकेत दे रही थीं? दृश्य-बिम्बों को वे दिमाग के स्तर पर कैसे चित्रित कर रही थी। चित्रण की विधा कौन-सी रही होगी? यानी म्यूरल, पोट्रेट, पेंटिग या कुछ और।

समय की बेहद कमी की वजह से मुझे अपनी बात तीन मिनट में ख़त्म करनी पड़ रही है। आशा है, इन बिन्दुओं पर आप सभी गंभीरतापूर्वक विचार करेंगे...हो सकता है हम आने वाले भविष्य को सकरात्मक ढंग से बदलने में आँखों को भी एक जरूरी योद्धा के रूप में शामिल करें।

आप सभी को धन्यवाद!

Saturday, September 21, 2013

चींटी का साहस

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कई दिनों से धूप नहीं निकले थे। बुढ़ा पेड भूखा था।

देव-दीप, तुमदोनों को तो पता ही है कि धूप में ही पेड़ की पतियाँ खाना बनाया करती हैं। धूप नहीं, तो समझों पेड़ों के घर में सुख-साधन नहीं। उनकी पतियाँ धूप के इंतजार में रसोई में बैठी रहती हैं। अब तुम्हीं बताओ कि मैं अगर कुछ खरीदकर न लाऊँ, तो तुम्हारी मम्मी कुछ बना पाएगी।

देव और दीप मुझे टुकुर-टुकुर देखते हैं।


बेटे, बुढ़ा पेड़ जिस रजवाड़े की ज़मीन पर था। उस प्रदेश का राजा अपनी प्रजा का ही एक नहीं सुन रहा था। फिर बुढ़े पेड़ की क्या सुनता भला?

ऐसा क्यों पापा?-देव ने पूछा।

बेटे, सुनने के लिए सिर्फ आवाज़ नहीं चाहिए होती है। दिल और दिमाग भी कोई चीज है। यदि यह राजा के पास न हुआ, तो उसे कुछ भी नहीं दिख सकता है। आजकल राजा ऐसे ही होते हैं। कहने को तो अब आदमी का राज है। लेकिन, आजकल आदमी का आदमी, आदमी की ही एक न सुन रहा है।

पापा, उस पेड़ को खाना कैसे मिला-देव जिज्ञासा से पूछा।

बेटे, बुढा पेड़ विचारमग्न था। वह सोच रहा था कि कुछ तो उपाय करने ही होंगे। ऐसे तो मरने की नौबत आ जाएगी।

खाना न खाने से हम भी मर जाएंगे-देव ने कहा

हाँ, बेटे! लेकिन, पेड़ आदमी नहीं था। इसलिए उसमें लेशमात्र भी लालच नहीं थी। लालची आदमी चोरी-चकारी कर जी लेते हैं। अपना भूखा पेट भर लेते हैं। बुढ़ा पेड़ ऐसा नहीं था। वही क्या आदमी को छोड़कर दुनिया में कोई दूसरा लालची नहीं है। जहाँ तक बुढ़े पेड़ की बात है...वह तो चोरी कर ही नहीं सकता था।

उसने अपने सभी छोटे-बड़े पेड़ों को सीखाया था कि हमारे जीने के लिए जो चीजें चाहिए...वह सबकुछ हमें मिला है। अतः ज़िन्दा रहने की शर्त पर हमंे दुनिया में हरियाली बनाए रखना है; हवाओं के साथ झूमना है; बारिश की बून्दों के साथ ‘छपा-के-छई’ रेन-गेम खेलना है। हमें ऐसा कोई बुरा काम नहीं करना है जिससे दुनिया का नुकसान हो; दूसरे लोगों के काम में बाधा आए। हम मरते दम तक आॅक्सीजन छोड़ेंगे जो अन्य प्राणियों के साँस लेने के काम आता है। हम शुद्धता का ख्याल रखेंगे, तो वे भी बदले में हमारा भरपूर ख्याल रखेंगे। हम मर जाएंगे, लेकिन चोरी नहीं करेंगे।

ऐसा क्यों पापा?-देव ने आश्चर्य से पूछा। उससे छोटा दीप जो अबतक शांत था, मेरे पेट पर सर रख मेरी बात हँसने लगा था।

बेटे, चोरी करना दुष्टों की संस्कृति है। आदमी ने उसे सीख लिया है। चोरी में कठिनाई यह है कि हमें हर समय डरे-सहमे रहना पड़ता है। भय हमारे सर पर सवार हो जाता है। इस भय को जाहिर होने से कमजोर कहे जाने का एक अतिरिक्त भय होता है। ऐसे में आदमी अपने इस भय से बचाव के लिए हरदम झुठ बोलता है; बहाना बनाता है। एक सही बात छुपाने के लिए कई-कई ग़लत बातें कहता जाता है।

फिर क्या हुआ पापा...?-देव ने दीप के गाल और आँख को छूते हुए कहा था।

बेटे, उस बुढ़े पेड़ के पास गिने-चुने उपाय थे। एक तो यह कि चुपचाप धूप की प्रतीक्षा करे या किसी तरह अपने लिए भोजन जुटाने का प्रयत्न करे। अचानक एक चींटी उस पेड़ के निकट से गुजरी। बुढ़े पेड़ को उदास देख वह चकरा गई। धूप न निकलने से चिंतित तो वह भी थी, लेकिन उसे कोई तकलीफ नहीं थी।

क्या चींटी को पेड़ की भाषा आती थी?-देव चैंककर पूछा।

देव-दीप, आँख को जो चीजें नज़र आती है। सबमें सारी बात समायी होती है। यानी बुढ़ा पेड़ बिना कुछ कहे चींटी से सबकुछ कह दिया और चींटी ने समझ भी लिया था।
बुढ़े पेड़ की पेट में कलछुल फिर रहे थे। वह कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं था। चींटी जो बहुत छोटी थी, धूप का टुकड़ा ला नहीं सकती थी; लाती भी तो कितनी मात्रा में। लेकिन, उसने वादा किया िक वह चुप नहीं बैठेगी। कोई न कोई उपाय वह अवश्य करेगी।

सभी ने चींटी को कहा, बुढ़े पेड़ के भूखे होने से तुम्हें क्या परेशानी है? एक जगह कोई मरता है, तो उसकी चिन्ता में दूसरी जगह दुबला होना कैसे ठीक है? आफत को तभी आफत कहना चाहिए जब अपनी गले पड़े।

चींटी ने इस विचार से साफ असहमति जता दी। वे चींटियाँ जो जमाखोर प्रवृत्ति की थीं; जिनके पास इफरात भोजन की सामग्री थी; जिन्होंने कई-कई सेवक अपनी सुख-सुविधा में बटोर रखे थे...सभी ‘हो-हो’ कर हँसने लगी। आजकल ताकत की तूती बोलती है। जो चुटकी भर खाता है; वह भी आज सेर-सवासेर बटोर कर रखता है। ऐसे लोग खाते कम और दिखाते ज्यादा हैं।

उस चींटी ने क्या किया पापा?-देव की उत्सुक्ता बढ़ चुकी थी। उसे मेरी भाषणबाजी अच्छी न लग रही थी। वह सीधे मूल बात जानने को व्यग्र था।

चींटी दिन भर घूमती रही। सबसे मनुहार-विनती करती रही थी। लेकिन, सबको अपनी पड़ी थी। कोई अपना काम छोड़ने को तैयार नहीं था। चींटी ने सोचा कि भलाई-सेवा, दान-पुण्य और धर्म की बातें, तो मनुष्य ग्रन्थों-शास्त्रों से सुन-सुनकर भी भला नहीं बन सका है, सेवापरायण नहीं हुआ है; फिर उसके पास तो न कोई धर्मग्रन्थ है और न ही अपना कोई देवी-देवता।

फिर-देव ने यह शब्द जोर देकर कहा था।

फिर चींटी खुद पास के नदी में गई, डूबकी लगाई। मुँह में पानी भरा और बुढ़े पेड़ की ओर चल पड़ी। वह खुद भी थक गई थी। उससे चला न जा रहा था। आज उसने एक पल भी सांस नहीं लिया था। सबके सामने गिड़गिड़ाने और प्रार्थना करने में ही उसके सारे बल निकल गए थे। अंतिम आस उसके पास आत्मविश्वास था। वह उसी के आसरे बुढ़े पेड़ की ओर बढ़ रही थी।

चींटी पेड़ के पास पहुँची, तो चकित रह गई। ढेरों लोग बुढ़े पेड़ को घेरकर खड़े थे। उसमें छोटे-बड़े सभी जानवर थे। हाथियों के झुण्ड ने तो अपनी सूढ़ों में पानी लाकर बूढ़ू पेड़ को पूरा नहला दिया था। पानी मिलने से उस पेड़ की झुरायी हुई पतियों में जान दौड़ गए थे।

पेड़ सभी लोगों का अभिनन्दन कर रहा था। सबसे छोटी चींटी के कार्य और संकल्प की प्रशंसा कर रहा था।

पापा, चींटी तो बेहद खुश होगी?-देव का जरूरी प्रश्न था। दीप केवल हँस रहा था।
हाँ, बेटे! चींटी अपनी प्रशंसा से खुश नहीं थी। वह सबको खुश देखकर खुश थी। यही तो अन्तर है हममें और उनमें। हम अपनी खुशी से खुश होते हैं या दुःख से दुःखी। जबकि पेड़-पौधे, पशु-पंक्षी, जीव-जन्तु, नदी-पहाड़, बारिश-धूप, चन्दा-सूरज आदि एक-दूसरे को खुश देखकर काफी प्रसन्न होते हैं।

पापा, मैं भी पेड़ को पानी दूँगा।

अच्छा! भाई, अभी सो जाओ। कल देखते हैं कि आप अपना कहा कितना याद रखते हैं....आपमें चींटी जितना साहस है भी या नहीं।

गुडनाइट पापा-देव बोला।

गुजनाइत-दीप के बोलने की बारी थी, उसने भी बोला था।

अगले दिन देव-दीप सोकर उठे, तो देखा कि पूरा आँगन टहकार धूप से रंगाया हुआ है।
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Friday, September 20, 2013

पार्टी कार्यकर्ता


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पार्टी का राजतंत्र
जिस किसी को चुन लेता है
वास्तविक चुनाव वही है

पार्टी का आलाकमान
जिस किसी को कर देता है नामित
असली चुनाव वही है

उम्मीदवार चुनने में
जनता का मत स्वीकृत नहीं है
अधिकार तो उन टोपीदारों को भी नहीं है
जो सालो भर पार्टी का झण्डा-बैनर ढोते हैं
किसी आयोजन में
कुर्सीया बिछाते, पोंछते और बटोरते हैं
पार्टी-आवाज़ पर बिन खाए-पीए रेंकते हैं
दौड़ते, भागते और धुँआधार खटते हैं

जबकि उनका अपना घर टूटा है
छत लम्बा-लम्बा चूता है
सीढ़ियाँ जर्जर है
खेत बंजर है
बिटिया सयानी है
बिटवा जवान है
तब भी ज़बान पर
‘पार्टी नेता’ का ही नाम है

इस बार फिर
चुनावी रस्म निभाना है
गीतगउनी बन ‘पार्टी गीत’ गाना है
‘फँलाने’ को जिताना है
‘चिलाने’ को हराना है
अपनी टूटही साईकिल छोड़
चरचकिया पर आँख नचाना है

इस बार फिर
हूमचना है, गरियाना है
‘सरउ तेरी त...’ कहते हुए
विपक्षी से लपटना है
बतचप्पों में निपटना है

वे पार्टी कार्यकर्ता हैं
उन्हें ताज़िदगी यही सब करना है।

Wednesday, September 18, 2013

शामली: द स्पाइडर गर्ल


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यह कहानी प्रेम की है...प्रेम-प्रसंग की नही।

उस दिन वह नीले रंग की बटनदानी वाली कुर्ती पहने हुए थी। परिधान उस पर जम रहे थे। वह आकर्षक लग रही थी। लड़कियाँ जब आकर्षक लगती हैं, तो मन के भँवरे अपनी आवाज की ट्यून बढ़ा देते हैं। मुझे अपने भीतर के भँवरों की गुनजाहट साफ सुनाई पड़ रही थी। ये भँवरे डोरे डालने वाले नहीं थें, लेकिन थे तो भँवरे ही।

शामली ने आते ही मुझे दस हजार रुपए थमाए थे।

‘‘इतनी जल्दी थी....,’’

‘‘हाँ...,’’ छोटा सा, लेकिन प्यारा-सा जवाब।

मैं और शामली चाय की दूकान से चाय लेकर घुटकने लगे। वह बड़ी मुश्किल से अपना नया सूट दिखाते हुए कुछ बोली थी।

मैं शामली को सुन रहा था। इस सुनाहट में ताजगी थी।

‘‘पापा निक हो गए हैं, माँ भी खुश है। लोग आजकल हरी सब्जियाँ बिना कहे ले आते हैं...कभी शक्कर और मसाले भी।’’

मैं शामली को देख रहा था। उस शामली को जिसने एक तिनके के सहारे खुद को बदल देने का ज़ज्बा दिखाया था।
................

शामली जिसकी उम्र 26 साल है; यही कोई तीन माह पहले मुझे मिली थी।

वह बड़ी थी, लेकिन इतनी भी बड़ी नहीं कि मैं उसे अपनी छोटी बहन न कह सकूँ। शामली का स्वभाव बिंदासता के महीन तागे से बुना हुआ था। आँख जो हमारी जिंदगी के सर्वाधिक करीब होते है; वे ज़िन्दगी के सच को ऐसे देखते हैं जैसे किसी फुलझड़ी को जलाकर बच्चे देखा करते हैं...पूरे हुलस, उत्साह और उमंग के साथ। शामली अपनी ज़िन्दगी को ऐसे ही देखती थी।

मुझे पिछली बातें याद आ रही थी।

जिस दिन शामली को मैंने मंदिर की सीढ़ियों के पास पहली बार देखा, उसके आँख में आँसू थे। मैंने आगे बढ़कर उससे बात की थी।

शामली के पिता सूत-कारोबारी थें। पिछले कई महीनों से उन्हें बीमारी ने तोड़ दिया था। माँ दो-चार घरों में बर्तन-बासन कर गुजारा करने लायक कमा-धमा ले रही थीं, लेकिन शामली के पढ़ने के सपने को बलि देकर।

यह सच था। चंद रुपल्ली से ज़िदगी नहीं बदला करती हैं। सो मैंने शामली के घर में बात की। हमसब मिलकर घरेलू तंगी से निपटने का कोई न कोई उपाय सोच रहे थे।

‘‘शामली....हमलोग टिफिन पैक कर लोगों को देंगे...!’’

सब चुप। शामली भी चुप।

‘‘हाँ, शामली! सुुबह-सुबह स्कूल के बच्चों को टिफिन देने का काम करेंगे...बिना लेकिन...परन्तु के।’’

सभी हँस पड़े। लेकिन, इस सुझाव में हामी सबकी थी।
..................

उस दिन के बाद से शामली रूकी कहाँ?

वह बच्चों की टिफिन में रोटियाँ जेवर की तरह तहियाकर रखती थी। खाने में स्वाद हो, इसका जायज़ा लेने के लिए वह भोजन पहले खुद ही चख लेती थी। शामली पूरे मुहल्ले की ‘प्यारी दीदी’ बन गई थी।

मुझे शामली का चेहरा फुलदानी-सा दमक रहा था। वह मुझे बार-बार अपने घर चाय के लिए आमंत्रित कर रही थी। मैंने उसे प्रामिश किया कि मैं, सीमा और बच्चों के साथ आऊँगा जल्द ही।

शामली संतोष के भाव से मुझे देख रही थी...और मैं शामली जैसी साहसी लड़की का कहानी अपने दिमाग में बुन रहा था।
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Monday, September 16, 2013

बर्फपात


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आसमान के बरास्ते

यात्रा कर
लम्बी दूरी तय कर
पहुँचता है बर्फ
मेरे पास
मैं दोहरा हो जाता हूँ
खुशी से मुटा जाता हूँ

जब भी आता है बर्फ
बर्फपात के दिनों में
मेरी हथेली पर
उसके आँख में चमक
और मेरे चेहरे पर मुसकान होती है
मैं पुकारता हूँ
-आ गए बर्फ
बर्फ प्रसन्नभाव से कहता है
-हाँ राजीव!

एक बात
मैंने नहीं पूछा कभी
बर्फ तुम्हारे घर में
कौन-कौन हैं?
चाहकर भी नहीं
सोचकर भी नहीं

मैं नहीं पूछ पाया कभी
बर्फ तुम्हारे देश में
चिड़ियाँ ही उड़ती है आसमान में
या एरोप्लन, हेलिकाॅप्टर, लड़ाकू विमानें
तुम्हारे देश में नदियों में सिर्फ पानी ही बहता है
या खूनी समुन्दर भी हैं
जिसमें चलते हैं
जंगी बेड़ों के युद्धवाहक पोत

मैंने नहीं जानना चाहा कभी
क्या तुम्हारे देश में भी नेता चुनावी दौरा करते हैं
और भाषण देते हैं, सुशासन का, रामराज्य का
वैसे पूछना अवश्य चाहिए मुझे
कि वहाँ सरकार, लोकतंत्र, बाज़ार-व्यापार आदि में
धंधेबाजी, गुटबाजी, कब्ज़े और लूट की धाक किस हद तक अमानुषिक है?

इस बार
मैं सूची तैयार कर रहा हँू

मैं शान्तिपूर्वक पूछूँगा यह सब
यह जानते हुए कि
हमारे यहाँ शान्ति के रंग कम दिखते हैं
अपराध और आतंक ही असली रंगरेज है
मैं पूछूँगा
यह सब कुछ
साथ-साथ यह भी
कि कौन है उनका लोकप्रिय कवि
कि कौन है उनका प्रिय साहित्यकार
कि कौन-सी भाषा बोलते हैं वे लोग
कौन-सी है लिपि उनके यहाँ लिखे-छपे का
उनके यहाँ कौन सुखिया है और कौन दुखिया?
गाँव, शहर, महानगर में बिजली टिकती है कितनी देर?
शादी-विवाह में मंडप या बैन्ड-बाजे के लिए
कितना महँगा तय करते हो किराया
और कौन कितना अधिक देता है बयाना?
पर्व-त्योहार के मौके पर कैसे करते हो हँसी-हुल्लड़
या तुम्हारे यहाँ भी अपना अलग-अलग राग है

इस बार
मैं सूची तैयार कर रहा हँू

मैं यह भी पूछूँगा
तुमलोग कैसे करते हो पहचान अपने और पराए की
मित्र और दुश्मन की
सीमा अन्दर और सीमा बाहर की
कौन किससे लड़ता है युद्ध
कौन जीतता और कौन होता है परास्त
कैसे लूटते हो खजाने
टाँगते हो आधिपत्य के तम्बू-कैनात
सभ्यता, संस्कृति, परम्परा, विरासत इत्यादि को
ध्वस्त करने में कितना लगता है आखिर वक़्त
वर्चस्व अपना हो जाने पर किसी क्षेत्र में
कैसे करते हो अपने प्रभुत्व की घोषणा
कभी मुसीबत गले फँसने पर
अपनी बचाव में
तोप, बम, रासायनिक हथियार का कैसे और कितनी मात्रा में करते हो इस्तेमाल?

इस बार
मैं सूची तैयार कर रहा हँू

यह जानते हुए कि
ये सवाल
बर्फ के किसी एक टुकड़े से हो ही नहीं सकते हैं
क्योंकि बर्फपात में होती है
सामूहिकता की चेतना
अलगाव-विलगाव से विपरीत
एक स्वभाव, रूप, गति, अवस्था इत्यादि का गुणधर्म
धर्म, भाषा, वर्ग, समुदाय, वर्ग, लिंग इत्यादि का अद्भुत ऐक्य
जबर्दस्त साम्य
गलनांक एक
सूचकांक एक
भूगोल एक
संविधान एक
ज़्ाबान एक
सोच और संकल्प एक
और एक ही जीवन

बर्फपात के दिनों में
आप कभी बर्फ को देखिए, तो सही
अनुपस्थिति में
मैं उसकी स्मृति से भी बेइंतहा प्यार करता हूँ।

Sunday, September 15, 2013

सेमिनार-प्रस्तुति संग राजीव रंजन प्रसाद

विषय : ‘वर्तमान युवा राजनीति: चित्तवृत्ति और लोकवृत्त'
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10 सितम्बर, 2013; समय: 3 बजे दोपहर बाद; हिन्दी विभाग


युवा राजनीति पर बात करना मेरे लिए भाषा में सत्याग्रह करना नहीं है।

राजनीति सिनेमा नहीं है कि इसका उद्देश्य या ध्येय मनोरंजन मान लें। राजनीति आदमी की भाषा में आदमी होने की वैध तहज़ीब है। विधान का एक ऐसा वितान जिसमें हर आदमी को अपने हिसाब से सोचने, बोलने और करने की स्वतन्त्र और समान छूट प्रदान की जाती है। इस छूट की तमाम अर्थच्छवियाँ हो सकती हैं; लेकिन इससे किसी को तकलीफ हो, नुकसान हो या वे सामाजिक चरित्र के लिए ख़तरनाक साबित हों...इसकी सख़्त मनाही है। ऐसी विडम्बनापूर्ण स्थिति में रोकथाम के लिए बीसियों तरीके हैं जिससे समाज अपनी राजनीतिक चेतना को उत्तरोत्तर बड़ा और समृद्ध करता है। बशर्तिया विधान-नायक जनता के बीच का आदमी हो। बीच का आदमी कहने का तात्पर्य सामाजिक संस्कार-व्यवहार से पगे उस आदमी से है जो अंतिम आदमी की खै़रख़्वाही के लिए फिक्रमंद होना जानता है। राजनीतिक फिकरे कसने या प्रतिस्पर्धी कहकहे लगाने की कुचेष्टा वह नहीं कर सकता है, तो नहीं कर सकता है। खैर!

हाल के दिनों में भारतीय राजनीति ने राजलिपि विकसित करने में अभूतपूर्व सफलता पा ली है जिसमें
राजनीतिक वसीयत लिखे जा रहे हैं। मौजूदा लोकतंत्र में इसी वसियत को वंशानुगत आधार मानकर युवा राजनीतिज्ञ भारतीय जनतंत्र में विराज रहे हैं; यह निर्णय कर रहे हैं कि जनता आधी रोटी खाएगी या पूरी। जिस जनता के साथ इनका बचपन से युवा होने तक सोना-बिछौना कुछ नहीं लगा; उस जनता की भूख को इतिहास बनाने का नारा ये युवा राजनीतिज्ञ लगा रहे हैं। ये ऐसे ही भाषा में तफरी मारते हुए मीलों आ गए हैं...अभी और मीलों जाने की हेठी इनमें बेशुमार हैं। राजनीतिज्ञ जब बेशर्म होते हैं, तो धर्म, जाति, भाषा, वर्ग, क्षेत्र इत्यादि के जन-बैंकर में घुस जाते हैं। सवाल है, जनता की जरूरत क्या सिर्फ पेट की भूख से निपट जाएगी? क्या मंदिर की घंटियाँ टुनटुनाने से उनके घरों में ‘सुजलाम्-सुफलाम’ हो जाएगा? अगर नहीं, तो जनता धृतराष्ट्र और दुर्योधन को ढो क्यों रही है? वह लोकतंत्र की बिनाह पर महाभारत क्यों नहीं लड़ रही है? ये सवाल जितने आसानी से पूछे जा सकते हैं...जवाबदारों को उतनी आसानी से उत्तर नहीं प्राप्त हो सकते हैं।

एक तमाशा यह भी कि हम जिस वर्ग को युवा-मानस कहते हैं; वह सिनेमा हाॅलों, रेस्तराँआंे, जिमखानों, बियरबारों, डिस्कोथिकों आदि में ‘चकाचक राग बसन्ती’ गा रहा है, लेकिन लोकतंत्र की ज़मीन पर वह
यहाँ-वहाँ कहीं नहीं है। आश्चर्य यह है कि जिन युवा राजनीतिज्ञों का भारत के किसी विश्वविद्यालय में पढ़ना-लिखना नहीं हुआ है; वहाँ से युवा राजनीति का ‘क-ख-ग’ भी नहीं सीखा है; आज वे उन्हीं विश्वविद्यालयों में जाकर छात्र-राजनीति का बिगुल फँूक रहे हैं; छात्र-संघ की वकालत कर रहे हैं।

आइए, इस पूरी वस्तुस्थिति का मूल्यांकन-विश्लेषण करने के लिए अपने निर्धारित विषयवस्तु ‘वर्तमान युवा राजनीति: चित्तवृत्ति और लोकवृत्त' में प्रवेश करें---,

Saturday, September 14, 2013

व्यक्तित्व की भाषा


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अंग्रेजी में एक शब्द है-‘व्यक्तित्व’। लोकप्रिय और बहुचर्चित भी। इंटरनेट जो अक्षरों, शब्दों, वाक्यों, लिपियों, भाषाओं इत्यादि का खजाना है; में एक इंटर पर इफरात सामग्री(टेक्सट, इमेज, पीएडएफ, पीपीटी, आॅडियो, विडियो इत्यादि) मिल जाएंगे व्यक्तित्व के बारे में। वहाँ यह सूचना आसानी से मिल सकती है कि साधारण बोलचाल में प्रयुक्त शब्द ‘व्यक्तित्व’ को अंग्रेजी में ‘Personality’ कहा जाता है जो लैटिन शब्द ‘Persona’ से बना है। अपनी बोली में हम कुछ बोले नहीं कि सामने वाला व्यक्ति फौरन यह जान लेगा कि हम कैसे हंै? हमारे व्यवहार की प्रकृति क्या है? हमारा स्वभाव कैसा होगा? हम मिलनसार हैं या उजड्ड। अक्लमंद हैं या हमारे दिमाग में सिर्फ भूसा भरा हुआ है। कई बार तो हम किसी का हाव-भाव और हरकत देखकर यह सटीक अनुमान लगा सकते हैं कि फलांना व्यक्ति इस वक्त क्या सोच रहा है; उसके दिमाग में क्या चल रहा है। चाहे वह स्त्री हो या पुरुष।

व्यक्तित्व का नाता हर आदमी के चाहे वह छोटा हो या बड़ा; देह और दिमाग दोनों से अंतःसम्बन्धित होता है। मन की हलचलों से, भाव-तरंगों से, सूझों से या फिर देखने-सुनने के उन सभी तौर-तरीकों से जो हमारे व्यवहार और आचरण का हिस्सा हैं; हमारे व्यक्तित्व की अमूल्य निधि हैं। बिल्कुल भाषा की माफिक। उस भाषा की तरह जो हमारे ज़बान के लार से पुष्ट-संपुष्ट होकर जवान होती है; समृद्ध होती है। मैं भाषा के मुद्दे पर आऊँगा, लेकिन उससे पहले व्यक्तित्व की बात। यदि कोई हँसोड़ है, तो यह उस व्यक्ति-विशेष का अपना व्यक्तित्व है। इसी तरह किसी आदमी की प्रसन्नता को भाँपकर जब हम कहते हैं, वह बहुत हँसमुख है, तो यह भी उस व्यक्ति के व्यक्तित्व पर की गई टिप्पणी ही होती है। दुनिया में बहुतेरे ऐसे लोग मिल जाएंगे जो खुशी हो या ग़म सब स्थिति में संतुष्ट और स्थिर बने रहने की चेष्टा करते हंै और अपने सचेतन प्रयत्न में सफल भी होते हैं; ऐसे लोगों को हम ज़िन्दादिल शख़्स कह उनके आगे सर नवाते हैं। उदाहरण कई-कई हो सकते हैं। जैसे-कोई उदारमना व्यक्तित्व का हो सकता है, तो कोई महामना। पण्डित मदन मोहन मालवीय जी स्वयं उदाहरण हैं जिनका व्यक्तित्व विराट चेतना, विशाल हृदय और विमल मन से आपूरित था। धैर्यवान, सयंमशील, उग्र, निंदक, आलसी, ईष्र्यालु आदि-आदि मनोवृत्ति-अभिवृत्ति के लोग भी होते हैं जिनके सम्पर्क-संगति में आते ही हमारा दिमागी एंटीना/एरियल उनके बारे में ख़बरें देने लग जात हैं। उद्दीपन, संवेदन, प्रत्यक्षीकरण और आत्माधारणा जैसी मनोवैज्ञानिक शब्दावली इसीलिए लोकप्रिय हैं क्योंकि वे हमारे मनोजगत और मनोचेतना को देखते ही पढ़ लेने में अव्वल हैं।

ध्यातव्य है कि चारित्रिक गुण हमारे व्यक्तित्व का अहम भाग है। इसके माध्यम से व्यक्तित्व को काफी हद तक जाना-समझा जा सकता है। जब किसी के काम को मौलिक कहा जाता है, तो यह मौलिकता कहीं बाहर से आरोपित अथवा प्रक्षेपित नहीं होती हैं, बल्कि यह उस व्यक्ति-विशेष के व्यक्तित्व का अंग-उपांग होती हैं जो उसका प्रयोक्ता होती हैं। यह मनुष्य के व्यक्तित्व का आन्तरिक गुणधर्म है जो भिन्न-भिन्न कई रूपों में देखने को मिलती हैं। यथा-अंतःमुखी व्यक्तित्व, बाह््यमुखी या विकासोन्मुखी व्यक्तित्व। दरअसल, खाना, पीना, सोना, रोना, हँसना, बोलना इत्यादि को जिस तरह मनोविज्ञानियों ने मुलप्रवृत्ति कहा है; उसी तरह व्यक्तित्व हमारे जीवन का सूचक/संकेतक है। व्यक्तित्व स्वाभाविक जीवन-प्रणाली की अभिव्यक्ति है। यह चेतना का वास्तविक और मूर्त स्वरूप है। व्यक्तित्व को जानने के लिए अगर हम जिज्ञासा की खुरपी लगाएँ, तो आश्चर्यजनक चीजें प्राप्त होंगी। हम यह जानकर चकित होंगे कि-‘‘मानव का निर्माण पाँच पदार्थों से हुआ है। प्रथम तो उसे भौतिक शरीर मिला है जो अन्नमय कोष है। दूसरे उसे प्राणवायु प्राप्त हुई है, वही प्राणमय कोष है। तीसरे उसे मन प्राप्त हुआ है। उसी को मनोमय कोष कहा जाता है। चैथे उसे बुद्धि मिली है जो विज्ञानमय कोष के अन्तर्गत आती हैं और पाँचवें उसे पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ प्राप्त हुई हैं जिनके द्वारा वह आन्नदोपभोग करता है। अतः ये ही अन्नदमय कोष हैं। इस तरह हमारा मानव-शरीर जिसे व्यावहारिक भाषा में व्यक्तित्व कहा जा रहा है उक्त पाँचों कोषों से मिलकर पंचकोष के रूप में समन्वित है।

व्यक्तित्व या भौतिक-शरीर से सम्बन्धित यह व्याख्या भारतीय दृष्टिकोण से सम्बन्धित है। उपनिषदों में वर्णित इन प्रामाणिक तथ्यों को पश्चिमी विद्वान, विज्ञानी, शिक्षाशास्त्री सभी स्वीकार करते हैं; लेकिन इन्हें हम मानना तो दूर ‘आउटडेटेड नाॅलेज’ कह इस पूरे ज्ञान-मीमांसा से ही पल्ला झाड़ ले रहे हैं। दूसरी तरफ ज्ञान-तकनीकी की पश्चिमी विचारधाराएँ जिन्हें हम अंग्रेजी पोथियों में पढ़ने को बाध्य हैं; के प्रति हमारा दृष्टिकोण प्रायः बिल्कुण भिन्न किस्म का होता है। उदाहरणार्थ-पानी की यौगिकीय-संरचना के बारे में वैज्ञानिक जब यह कहते हैं कि-जल के कण मूलतः 2 भाग हाइड्रोजन और 1 भाग आॅक्सीजन से मिलकर बने हैं; तो हमें प्रथम द्रष्टया घोर आश्चर्य होता है। हम सेाचते हैं-पानी के कणों को कैसे अलग-अलग विभाजित किया जा सकता है? चूँकि यह वैज्ञानिक सिद्धान्त के रूप में यह रूढ़-कथन है; इस कारण एक सीमा के बाद हम अधिक जिरह नहीं करते हैं। न्युटन की गति नियम हो या आइंस्टीन की सापेक्षिकता का सिद्धान्त; हम इन्हें वैज्ञानिक सत्य कह कर स्वीकार कर लेते हैं प्रायः। ऐसा क्यों है कि हम इन प्रस्थापनाओं के भीतरी खण्डों को अलग-अलग न देखते हुए भी उसे सच मान लेने को बाध्य होते हैं? उस पर जरूरी तर्क-वितर्क नहीं करते हैं? कई बार द्वंद्व या आन्तरित असंगति उत्पन्न होने की स्थिति में भी चिन्तन करने को उद्धत नहीं होते हैं? या फिर चिन्तन की प्रतिमाएँ इतनी सघन नहीं होती हैं कि वे इन सिद्धान्तों से सीधे टकराने की चुनौती मोल ले सकें।

जबकि हमारे यहाँ शास्त्रार्थ की संस्कृति हजारों वर्ष पहले तक मौजूद थीं। आज तो उनका जिक्र भी फ़साने में नहीं। आज की नवपीढ़ी को इस सत्य से साक्षात्कार कराना बिल्ली के गले में घंटी बाँधने जैसा है कि हमारी परम्परा आज तक जीवित इसलिए नहीं है कि हम एक महान परम्परा के नागरिक हैं; बल्कि इसलिए कि हमारी सांस्कृतिक क्रियाशीलता में परिवर्तनीयता के गुण विद्यमान हैं। भारतीय ज्ञान-परम्परा नवीनताओं को हमेशा समय के कोख में ढोती है और उसे उपयुक्त अवधि के पश्चात जन्मती भी है, बशर्ते नवीन-धारा अपनी प्रकृति और चेतना में दीर्घजीवी हो। आज यह कसौटी हमारी आधुनिक भारतीय चित्तवृत्ति से गायब हैं जो सचमुच तकलीफदेह है और चिन्ताजनक भी।

इसके विपरीत पश्चिमी ज्ञानतंत्र या अकादमिक जगत से जुड़े लोग अच्छी से अच्छी चीज को हमेशा ‘काउंटर’ करते हैं। वे यह मानने के लिए न तो बाध्य होते हैं और न ही किए जाते हैं कि फलांना सत्य सार्वभौमिक सत्य है या कि उनमें परिष्कार/परिवर्धन की चेष्टा समय की फ़िजूलखर्ची है। भारतीय शिक्षालयों में ऐसी अध्यापकीय हिदायतें अटी पड़़ी हैं। वस्तुतः पश्चिमी शोधक भीतरी प्रयोग को लेकर पगलाए होते हैं। कई नई खोजें तो इसी पागलपन की देन हैं। ऐसे सुधीजनों के प्रति निःसंदेह हमारी कृतज्ञता व्यक्त होनी ही चाहिए जिन्होंने अपनी इस तर्क-वितर्क की चेतना से समय के पूरे ‘पैराडाइम’ को ही बदल देने का लाभकारी उपक्रम किया है। पश्चिमी अनुसन्धानकत्र्ताओं की इन चेष्टाओं  पर निसार होने का यह अर्थ नहीं है कि हम अपने दरो-दीवार के भूगोल, रंग, आकार, प्रकृति, भाषा और ज़ुबान भूल जाएँ। संवादी रूप में अपनी भाषा को अभिव्यक्ति प्रदान करने वाले व्यक्तित्व को ही खो दें सदा-सर्वदा के लिए।

बहरहाल, आज हम पश्चिमी जगत के उस दौर को अपना सार्थक अतीत मानने को अभिशप्त हैं, जो औद्योगिकीकरण के बाद उपनिवेश की खोज में विकसित हुई साम्राज्यवादी सत्ता का ज्ञानोदय-काल है। गोरे अंग्रेजे मैकाले की काली शिक्षा नीति आज भी प्रभावी और बेखटक प्रयोग में है, तो सिर्फ इसलिए कि स्वाधीन भारत की चेतना अपनी भाषा से कटकर उस भाषा से संयुक्त हो गई है जो अधिनायकवादी प्रवृत्ति और वर्चस्व की नीति से परिचालित है। स्मरण रहे, सीखने की भाषा अपनी या परायी नहीं होती है, लेकिन अपनी मर्म, वेदना, संवेदना, मौन और चिन्तन की भाषा परायी कैसे हो सकती है? जिस तरह हम अपनी जान को किसी बीमा-कम्पनी के भरोसे नहीं छोड़ सकते हैं, वैसे ही अपनी भाषा को अपनी ही ज़बान से बेदखल कर देना कहाँ की और कैसी समझदारी है? यह एक यक्ष प्रश्न है जिस पर भावुक विलाप करने की जगह वस्तुपरक संवाद-विमर्श की आवश्यकता है। वर्तमान भाषा-बोध की कमी और हिन्दी भाषा को लेकर फैलाई गई भ्रामक संकीर्णता के बाबत साहित्यकार प्रभाकर श्रोतिय दो-टूक कहते हैं-‘‘यह आर्थिक प्रभुत्त्ववाद अपने बहुत बड़े और महीन संजाल से मनुष्य के मन, बुद्धि, संवेग, इच्छा, यहाँ तक कि उसकी राष्ट्रीय राजनीति और व्यवस्थाओं को भी नियंत्रित कर रहा है; साहित्य, संस्कृति और भाषा का, मनुष्य के मन में नए ढंग से अर्थांतर और मूल्यांतर कर रहा है; प्रतिरोध और विद्रोह की आवाज़ों को तत्काल बिकने वाले साहित्य की ऊँची कीमत पर माँग से कुचल रहा है। घटिया साहित्य की विपुलता से वह विचारशील और गहरे साहित्य को विस्थापित कर रहा है। सब कुछ इतनी नफ़ासत और क्रमिक प्रक्रिया से होता है कि पाठक-मन को जरा धक्का न लगे।’’

Friday, September 13, 2013

प्रचारित ज्ञानकाण्ड नहीं है हिन्दी


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हमें अपने कल के कार्यक्रम('वर्तमान समय और हिन्दी भाषा' विषयक गोष्ठी) के लिए हिन्दी-विलापी ज़बानकारों की जरूरत नहीं है। ऐसे नकारे लोग कोई दूसरे नहीं हैं; वे हम ही में से हैं यानी हिन्दीभाषाभाषी शोधक-अन्वेषक; अध्यापक-प्राध्यापक, अकादमिक या राजभाषिक बुद्धि-सेनानी वगैरह-वगैरह जिनकी चेतना और संस्कार दोनों में से हिन्दी-भाषा के प्रत्यय, प्रतिमा, अनुभव, स्मृति, कल्पना, चिन्तन, संवेदन इत्यादि सब के सब गायब हो चुके हंै। इन दिनों हिन्दी-प्रदेशों में अंग्रेजी को ही ज्ञान के गहन प्रकाश के रूप में देखने का चलन बढ़ा है। इसे भूख-निवारण, कुण्ठा-निवारण, बेराजगार-मुक्ति, भाषाई-प्रतिरूप, चेतना-विकास और संस्कृति-बोध की वास्तविक, एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ कसौटी मानकर प्रचारित-प्रसारित करने वाले हमहीं-आपहीं जैसे ज्ञान-आयोगिया लोग हैं। क्या इस सचाई को हम झुठला सकते हैं कि आजादी के इत्ते बर्षों बाद भी भारत में बनी अंग्रेजी की एक भी धारावाहिक, वृत्तचित्र, सिनेमा आदि ने भारतीय जनमानस को आलोडि़त-आन्दोलित करने में सफलता हासिल नहीं की है। कितने लोग मानेंगे कि अंग्रेजी में प्रकाशित किसी पुस्तक ने भारतीय मन की सामूहिक अभिव्यक्ति की दिशा में अकल्पित अथवा अप्रत्याशित दखल देने का जिम्मा उठाया है। दरअसल, हम भूल जाते हैं कि अंग्रेजी भाषा में तैयार उत्पाद, साहित्य, तकनीक, प्रौद्योगिकी इत्यादि को भारतीय बाजार में बेचा-खपाया जा सकता है; लेकिन, लोगों में प्रतिरोधी संचेतना पैदा करने की कूव्वत अपनी भाषा को छोड़कर दूसरी भाषा में हो ही नहीं सकती है। फिर ऐसा क्यों है कि यशोगान उसी भाषा का, जयगान उसी भाषा का, दर्शन-साहित्य सम्बन्धी पिच्छलग्गूपन उसी भाषा का, ज्ञान-विज्ञान सम्बन्धी आकर्षण उसी भाषा का हमारे मन-मस्तिष्क पर काबिज़ है। अंग्रेजी को प्रायोजित ढंग से नम्बर वन या सर्वश्रेष्ठ घोषित करने के पीछे मुख्य वजहें क्या हैं जबकि दुनिया भर में ज्ञान की इकलौती भाषा वही नहीं है? आखिर ऐसी स्थिति क्योंकर है; यह हम-सबके लिए निःसन्देह विचारणीय है? क्योंकि यह हमारी मातृभाषा हिन्दी के लिए ही नहीं, अपितु देश की उन सभी भाषाओं के लिए यक्ष प्रश्न है जो अपनी भाषा को लेकर सवाल खड़े करना चाहते हैं, सोचना, विचारना और खुले रूप से संवाद करना चाहते हैं।

वर्तमान समय की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि हिन्दी के अकादमिक जगत के लोग इस मुद्दे पर प्रायः सार्थक कम बोलते हैं; घिसी-पिटी बातों को दुहराते ज्यादा हैं। दरअसल, हमारी भाषा के जानकारों के पास स्पष्ट समझ और निष्पक्ष नेतृत्व का संकट गहरा है। भाषिक अभिव्यक्ति के लिए शब्द-भण्डार विपुल मात्रा में उपलब्ध हंै; लेकिन, सहृदय ज्ञान-संचारकों, वात्र्ताकारों, मार्गदर्शकों की भारी कमी है। मौजूदा स्थिति यह है कि जो विद्धान हैं वे चुप हैं। वे प्रायः अपनी विद्वता के आलोक में ही विचरते रहते हैं-‘अजगर करे न चाकरी...’ के दर्शन के साथ। लेकिन जो नई पीढ़ी के हमारे जैसे भाषाई शावक हैं वे संभाव्य-चेतना से बिल्कुल खाली नहीं हैं। हम विद्यार्थीजन इस कमी को पाटने की दिशा में लगातार प्रयत्नशील हैं। हम यत्नपूर्वक और पूरे मनोयोग से अपनी भाषा में स्वस्थ और सार्थक जवाब देने के लिए कटिबद्ध और संकल्परत हैं। स्मरण रहे, हम फिल्मी अंदाजे-बयाँ की तरह तड़क-भड़क से भरपूर मनोरंजनयुक्त कार्यक्रम करने के हामी नहीं हैं; हम भाषाई विचार-विमर्श के स्तर पर सतही और बासी चिन्तन सामग्री भी नहीं परोसना चाहते हैं। वास्तव में, हम किसी भाषा-विशेष के सन्दर्भ में कोई राजनीतिक नारा या जुमला उछालने की बजाए अपनी भाषा के बारे में अपनी भाषा में बात करने को पूरी शिद्त और शाइस्तगी के साथ इच्छुक हैं। हमारा मुख्य ध्येय निज संकल्प, चिन्तन, दूरदृष्टि, देसी ज्ञान, देसी आधुनिकता, लोक कला, योजना, तकनीक, प्रौद्योगिकी, इंटरनेट इत्यादि के बहुआयामी तथा समग्र प्रयोग-प्रसार के माध्यम से हिन्दी भाषा को समुन्नत, विकासशील और सार्वदेशिक ज्ञान-मीमांसा का सर्वतोमुखी क्षेत्र घोषित करना है। हम पूरी ताकत से उस आन्तरिक-बाह्î संक्रमण को अपनी संज्ञानात्मक बोध, चेतना, व्यक्तित्व और व्यवहार से अलग कर देना चाहते हैं जो ज्ञान की भाषा होने की बजाए वर्चस्व और प्रभुत्त्व की महिमामण्डित भाषा बनती जा रही है।

यह आवश्यक है क्योंकि आज पूरी दुनिया बाज़ार पूँजीकरण के दबाव और चपेट में है। हमें ‘पेट्रोडाॅलर’ और ‘मार्केट कैप’ से दबते रुपए की तरह अपनी भाषा को शिकस्त खाने नहीं देना है। हम रवीन्द्रनाथ टैगोर के उस विचार से पूर्णतया सहमत हैं जिसका आह्वान उन्होंने उस दौर में किया था जब देशकाल-परिवेश औपनिवेशिक मानसिकता से जकड़ा था-‘‘मैंने बहुत दुनिया देखी है। ऐसी भाषाएँ हैं जो हमारी भाषाओं से कहीं कमजोर हैं परन्तु उनके बोलनेवाले अंग्रेजी विश्वविद्यालय नहीं चलाते। हमारे ही देश में ये लोग परमुखापेक्षी हैं...देशी भाषाओं को कच्चे युवकों की जरूरत है। लग पड़ोगे, तो सब हो जाएगा। हिन्दी के माध्यम से तुम्हें ऊँचे से ऊँचे विचारों को प्रकट करने का प्रयत्न करना होगा। क्यों नहीं होगा? मैं कहता हूँ जरूर होगा।’’


कल 14 सितम्बर है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का हिन्दी विभाग आपके आगमन का आकांक्षी है। हम उन सभी अनुभवी प्राध्यापकों, अध्यापकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, शुभचिन्तकों इत्यादि से यह आस और उम्मीद लगाए बैठे है कि आपसबों के आगमन से ही हमारी भाषा में उजियारा होगा...निश्चय जानिए।
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विषय: वर्तमान समय और हिन्दी भाषा
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समय: 12 बजे दोपहर
स्थान: हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय। 

Saturday, September 7, 2013

वर्तमान भारतीय युवा राजनीति : चित्तवृत्ति और लोकवृत्त


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मान्यवर,

आपसी संवाद, बहस और विकल्प की अधुनातन संचेतना को लक्षित करते हुए भारतीय युवा राजनीति की चैहद्दी को ‘वर्तमान युवा राजनीति: चित्तवृित्त और लोकवृत्त’ विषयक राजीव रंजन प्रसाद की सेमिनार-प्रस्तुति के बहाने खुले विषय के रूप में प्रश्नांकित किया जा रहा है। सम्प्रति राजीव रंजन प्रसाद, हिन्दी विभाग में प्रो0 अवधेश नारायण मिश्र के मार्गदर्शन में ‘संचार और मनोभाषिकी(युवा राजनीतिज्ञ संचारकों के विशेष सन्दर्भ में)’ विषयक शोधकार्य में संलग्न हैं।

इस सेमिनार-प्रस्तुति के अन्तर्गत वर्तमान युवा राजनीति के दो पक्ष विचारार्थ प्रस्तुत हैं-1) चित्तवृत्ति और 2) लोकवृत्त। चित्तवृत्ति के रूप में युवा राजनीतिज्ञों के व्यक्तित्व, भाषा एवं व्यवहार से सम्बन्धित विभिन्न बिन्दुओं पर प्रकाश डाला गया है; वहीं लोकवृत्त के अन्तर्गत युवा राजनीतिज्ञों के राजनीतिक समाजीकरण, संभाव्य राजनीतिक संचेतना, नेतृत्व, निर्णय-क्षमता इत्यादि से सम्बन्धित विविध पक्षों पर सम्यक् विवेचन-विश्लेषण प्रस्तुत है।

आप सभी इस अवसर पर सादर आमंत्रित हैं!

स्थान: हिन्दी विभाग       मंगलवार: 10 सितम्बर, 2013                 
समय: अपराह्न 3 बजे

Monday, September 2, 2013

हमारा यह जीवन सिर्फ संज्ञा-सर्वनाम नहीं है....!


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(शोध-पत्र प्रस्तुति)

पश्चिम वाले हमारी ओर मुँह करके सूर्य-नमस्कार करते हैं;
और हम पश्चिम की ‘चियर्स लिडरों’ को देखकर आहे भरते हैं।
वे हमारी आस्था की ड्योढ़ी पर सर नवाते हैं,
हमारी पवित्र गंगा में घंटों खड़े हो कर जल ढारते हैं;
वहीं हम अपने देसी रेस्तरां में विदेशी डिश चखते हुए अपनी गर्लफ्रेण्ड को
शानदार ‘प्रपोज’ मारते हैं, या सड़कछाप मंजनूओं की तरह
उनकी स्कूटी पर बैठकर  हैंडिल सम्भाल रहे होते हैं।
वे देह की साँस से ऊब चुके होते हैं। हम पूरबवासी देह की साँस लेते हुए अपना जीवन-पबितर कर रहे होते हैं; हमारे घर की स्त्रियां भी ऐसा ही कुछ कर रही होंगी फिलहाल....!  धन-दौलत को दुनियादारी निभाने का जरिया मात्र मानते हैं; और हम अपने काले धन को सफेद करने के लिए अपने भगवान के दरबार में
सोने का कंगन, चेन, लाॅकेट, बिस्कीट, अशर्फी, गिन्नी.....बना रहे होते हैं।

महोदय/महोदया,

मानव-जीवन सिर्फ पश्चिम-पूरब या उत्तर-दक्षिण नहीं है।
हमारा यह जीवन हम-वे, मैं-तुम-वह भी नहीं है।
मैं स्पष्ट शब्दों में यहाँ अपनी बात रखना चाहता हूँ कि
हमारा यह जीवन सिर्फ संज्ञा-सर्वनाम नहीं है.....!

तो सवाल उठता है....क्या है हमारा यह जीवन?

दरअसल हम और हमारा व्यक्तित्व सांख्यिकी की भाषा में चर-सरीखा है।
हमारा समस्त जीवन-व्यापर इन चरों के व्यवहार पर ही आधृत है।
ये चर स्वतन्त्र चर भी हैं, और आश्रित चर भी।

(इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में राजीव रंजन प्रसाद से बार-बार सिर्फ अबस्ट्रेक्ट पढ़ने के लिए कहा जा रहा है, फिर भी वे अपनी बात जारी रखे हुए हैं...)

मनुष्य का आन्तरिक व्यक्तित्व स्वतन्त्र चर है जबकि उसका बाह््य व्यक्तित्व आश्रित चर है।
बाह््य व्यक्तित्व हमेशा आन्तरिक व्यक्तित्व से ‘इंटरलिंक’ होता है। यह ‘कनेक्शन’ ही दोनों के आपसी अंतःक्रिया का मूलधन है। व्यवहार अथवा भाषा/वाक् में प्रकाशित हमारे सारे करतब/कर्तव्य/अधिकार इत्यादि तो प्राप्त ब्याज मात्र हैं जिन पर हमारा समस्त वाक्-व्यापार एवं जीवन-व्यवहार टिका होता है। यहाँ मैं अपनी बात थोड़े विस्तारपूर्वक कहना चाहता हँू। उम्मीद है, आपसब धैर्य के साथ सुनेंगे....,
 
(कार्यक्रम संचालक का अनुरोध, मुख्य वक्ता को हवाई मार्ग से दिल्ली पहुँचना है। वक़्त कम बचे हैं। इसलिए उन्हें बोलने के लिए आमंत्रित किया जाता है। राजीव रंजन प्रसाद अपना कृशकाय शरीर लिए अपनी जगह आकर धँस जाते हैं। श्रोताओं का एक बड़ा वर्ग जो उन्हें आज सुनना चाहता था....वंचित रह जाता है।)

Wednesday, August 21, 2013

प्रिय देव-दीप,



हमारी युवा पीढ़ी ‘स्वयं में’ एक वर्ग बन चुकी है, लेकिन अभी स्वयं के लिए स्वतन्त्र नेतृत्व की भूमिका में नहीं है। बच्चों! देश में युवाओं की कमी नहीं है। लेकिन, आधुनिक भारतीय राजनीति के बैठकखाने में सामान्य युवाओं का प्रवेश लगभग वर्जित-सा हो गया है। ऐसा क्यों है? इस विषय पर हमारा बहसतलब होना बेहद जरूरी है। आज संसद में जितने युवा राजनीतिज्ञ पदस्थ हैं उनमें से अधिसंख्य पैतृक राजनीति की उपज हैं; परिवारवादी सलतनत के बैण्ड-बाज़ा-बारात हैं। इन युवा राजनीतिज्ञों के पास क्या कुछ नहीं है, सिवाय व्यक्तित्व, मूल्य और भारतीय आत्मा के। विडम्बना यह है कि वे ही ताकत में हैं। वे ही सत्ता और नेतृत्व में हैं। इन युवा राजनीतिज्ञों का ज़मीनी जनाधार ठनठन-गोपाल है। ‘मास अपील’ के नाम पर भाषा में लीपापोती अधिक है। इसके बावजूद वंशवादी पैराशूट से ज़मीन के सबसे ऊपरी टीले(संसद) पर काबिज़ यही हैं, हाथ यही हिला रहे हैं; कमल यही खिला रहे हैं; साइकिल यही चला रहे हैं; हाथी यही दौड़ा रहे हैं; यहाँ तक कि ‘आप’ में भी हम शामिल नहीं हैं। हम सिर्फ संज्ञा और सर्वनाम से नवाज़े जा रहे शब्द हैं। इन शब्दों के प्रयोग में भी सत्ता की राजनीति है; अर्थतंत्र का अर्थबोध-निरोधक खेल है। युगचेतना के कवि धूमिल की सीधी किन्तु सधी भाषा में कहें, तो-‘‘उन्होंने कभी किसी चीज को/सही जगह नहीं रहने दिया है/न संज्ञा/न विशेषण/न सर्वनाम/एक समूचा और सही वाक्य/टूटकर बिखर गया है/उनका व्याकरण इस देश की/शिराओं में छिपे हुए कारकों का हत्यारा है.../वे जिसकी पीठ ठोंकते हैं/उसके रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है’’ 

देव-दीप, निज स्वार्थ की कड़ाही में देश की जनता को पकौड़े की तरह छानते ये राजनीतिज्ञ(यदि तुम्हें हँसी आ रही हो, तो हँस लो) कहीं किसी मौके पर ‘क’ भी बोलते हैं तो वह मैनेजमेंट थ्योरी के किसी न किसी सिद्धान्त पर टिका होता है। वे चुनावी-सीज़न में कहीं किसी घर-बस्ती, जवार-इलाका, कुँआ-तालाब, स्कूल-संस्था आदि को छू-छा भी रहे होते हैं, तो वह आधुनिक प्रचार के किसी न किसी जुगाड़-तकनीक से मेल खाता है। चूँकि नैतिकता का दमन है, शोषण का बाहुल्य है; अतः इन्हें अधिकार है कि ये मंच से बोलें, टेलीविज़न में दिखें और अख़बार में छपें। अपने पुरनिए सत्तासीनों की तरह जनता को ये मूर्ख मानंे, उन्हें भोला और भालू कहें। वे पूँजी के लम्बरदारों की माफ़िक हम को भेड़, गड़ेरिया, हेडलेस चिकेन, मैंगोज पिपुल इत्यादि कहें और हम चुपचाप हँेसे...मौन विहंसे। ख़्यातनाम कवि रघुवीर सहाय की कविता की तर्ज़ पर-‘हँसो-हँसो, जल्दी हँसों।’


देव-दीप, यहाँ सचाई का एक पहलू यह भी है कि वर्तमान राजनीति से लड़कियाँ बुरी तरह बेदख़ल हंै। दिल्ली से लेकर जम्मू-काश्मीर तक लैंगिक भेदभाव की मानसिकता में लिपटे राजनीतिज्ञ अपने बेटों को ही अपना सत्ताधिकारी घोषित करते हैं। उनके गुणगान-बखान में रैली-रेला आयोजित होते हैं। और लड़कियाँ...? उनके लिए राजनीति में आने की सोच तक पर पहरा जमा होता है। हाँ, जिन सियासी राजनीतिज्ञों के लड़के नहीं होते....वे अपने बेटियों को ‘प्रमोट/प्रोजेक्ट‘ अवश्य करते हैं। यह स्वभाव और चरित्र का उदारीपन नहीं है, बल्कि यह समझ के स्तर की काइयाँगिरी है जिसमें उनका लक्ष्याार्थ अपनी राजनीतिक वंशावली के ‘डीएनए’ को हर हाल में ‘सेफ-साउंड’ रखना होता है। यह एक कुटनीतिक चाल है जिसमें विकल्पहीनता की स्थिति में ही लड़कियों को राजनीतिक दावेदार के रूप में ‘बाई-प्रोडक्ट’ की भाँति इस्तेमाल किया जाता है। इस मुद्दे पर पूरी संवेदनशीलता के साथ अलग से विचार किए जाने की जरूरत है।

देव-दीप, यह स्थिति तब है जब भारतीय युवक-युवतियाँ जीवन के विविध क्षेत्रों में विभिन्न विकल्पों का सामना करते हैं; उन्हें कार्यान्वित करते हैं। यथा-पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक, व्यावसायिक, वैश्विक इत्यादि। युवजन के लिए ये सभी जीवन के सक्रिय स्वभाव और व्यवहार हैं जिसका तात्पर्य है-ज्ञान, कुशलता और प्रतिबद्ध कार्रवाई एवं इन तीनों की परस्पर गहन अंतःक्रिया। आज भारतीय समाज इस अंतःक्रिया का अनुसमर्थक है; और हितचिन्तक भी। इस समर्थन या पैरोकारी की वजहे हैं-समाज में युवकों की विशिष्ट स्थिति, इसके मूल्यों एवं आदर्शों का सक्रिय आत्मसातीकरण, जीवनानुभव, यथार्थबोध, संचार की अभिप्रेरणा, पारस्परिक सम्बन्धों के विभिन्न पहलुओं से जुड़ी प्रयासें इत्यादि। युवजन चेतना की ये विशिष्टताएँ राजनीतिक समाजीकरण की प्रक्रिया को समझने और युवजन आन्दोलनों और संगठनों के विकास की गत्यात्मकता की खोज करने के लिए बहुत जरूरी है।

चलो...., विस्तार से चर्चा होगी इस पर फिर कभी!

Monday, July 29, 2013

लद्दाख भी आसमान से धरती जैसा ही दिखाई देता है.....: रामजी तिवारी


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(पढ़िए रामजी तिवारी का लिखा लाज़वाब यात्रा-संस्मरण
‘लद्दाख में कोई रैन्चो नहीं रहता’ शीर्षक से;
परिकथा, जुलाई-अगस्त, 2013 अंक में प्रकाशित)

पहाड़ हवा में नहीं होते। वे ज़मीन पर होते हैं। इसीलिए मजबूती से टिके रहते हैं।
उनका ज़मीन से नाभिनाल रिश्ता है। रैन्चोगिरी की ख़ुमारी में डूबे हम पर्यटकों
से प्रायः वे भिन्न महत्व के होते हैं। दरअसल, इस रिश्ते के कई-कई छोर या सिरे होते हैं।
हमारे पाँव इन पहाड़ों को छूते हैं। हमारा देह इन पहाड़ों पर टिकते हैं, तो कई मर्तबा
पर्याप्त आॅक्सीजन न होने का रोना भी रोते हंै। ‘‘साँस उखड़ने की यह कमी लेह में उतरने के
आधे घंटे बाद इतनी शिद्दत से महसूस होने लगती है कि पहली बार आपको अपने स्वस्थ जीवन में यह एहसास भी हो जाता है कि साँस लेना भी एक जरूरी काम है।’’ जरूरी तो पस्त होते तबीयत के साथ पहाड़ों के मन-मिज़ाज को बूझना भी होता है। अक्सर ‘‘हम मैदानी लोगों के दिमाग में पहाड़ों को लेकर कितना भ्रम रहता है। हम सोचते हैं कि पहाड़, रास्ते के हिसाब से बंद जगहें होती हैं लेकिन यहाँ तो इस जगह(लद्दाख) का अर्थ ‘बहुत सारे रास्ते’ के रूप में खुलता है।’’ इसी के साथ खुलता है लोकरंग। ‘‘कुमायूँनी हो या गढ़वाली, हिमाचली हो या डोगरी या फिर लद्दाखी, सभी पहाड़ी लोक धुनों में एक खास किस्म की मस्ती, उल्लास, उमंग और रवानी पाई ही जाती है।’’ अगर आप घूमने निकले हों, तो ‘‘घूमने के लिहाज़ से यह आवश्यक होता है कि आप उस क्षेत्र के गाँवों और दूर-दराज के इलाकों से परिचित हों। विविधताएँ और खासपने की तलाश आपकी वहीं पूरी होती है। वहीं उस समाज का लोक भी बचा होता है, और संस्कृति भी। अन्यथा आप दिल्ली में हों या लन्दन में, न्यूयार्क में हों या मेलबोर्न में, सारे जगहों के पाँच-सितारा होटल एक ही जैसी विशेषताओं से सुसज्जित मिलेंगे।....मेरी राय में लेह जैसे जगहों पर शहरों की कुलाँचे भरती बदहवाश दुनिया को भी जरूर आना चाहिए कि वह इस तथ्य का प्रत्यक्ष अनुभव कर सके कि पृथ्वी की छाती पर मूँग दलते हुए वह अपनी भौतिकता की खातिर जो खेल खेल रही है, आने वाले समय में उसका क्या हश्र हो सकता है। लेह में तो यह काम प्रकृति ने किया है, लेकिन शेष दुनिया में....?’’

Friday, July 26, 2013

यह ज़िन्दा गली नहीं है


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माही का ई-मेल पढ़ा। खुशी के बादल गुदगुदा गए।

जिस लड़की के साथ मेरे ज़बान जवान हुए थे। बुदबुदाए।

‘‘बिल्कुल नहीं बदली....’’

अंतिम शब्द माही का नाम था, उसे मन ने कह लिया था। लेकिन, मुँह ने मुँह फेर लिया।
(आप कितने भी शाहंशाह दिल हों....प्रेमिका से बिछुड़न की आह सदा शेष रहती है)

उस घड़ी मैं घंटों अक्षर टुंगता रहा था। पर शब्द नहीं बन पा रहे थे। रिप्लाई न कर पाने की स्थिति में मैंने सिस्टम आॅफ कर दिया था। पर मेरे दिमाग का सिस्टम आॅन था। माही चमकदार खनक के साथ मानसिक दृश्यों में आवाजाही कर रही थी। स्मृतियों का प्लेयर चल रहा था।

‘‘यह सच है न! लड़कियाँ ब्याहने के लिए पैदा होती हैं, और लड़के कैरियर बनाने के लिए ज़वान होते हैं। मुझे देखकर आपसबों को क्या लगता है?’’

बी.सी.ए. की टाॅप रैंकर माही ने रैगिंग कर रहे सीनियरों से आँख मिलाते हुए दो-टूक कहा था। तालियाँ बजी थी जोरदार। उसके बैच में शामिल मुझ जैसा फंटुश तक समझ गया था। माही असाधारण लड़की है। लेकिन, मैं पूरी तरह ग़लत साबित हुआ था। माही एम.सी.ए. नहीं कर सकी थी। पिता ने उसकी शादी पक्की कर दी थी। उस लड़के से जो एम. सी. ए. का क...ख...ग भी नहीं जानता था। माही ने एकबार भी इंकार नहीं किया था।(अपने माता-पिता या अपने अभिभावक का सबसे अधिक कद्र आज भी लड़कियाँ ही करती(?)हैं।)

माही का पति बिजनेसमैन है। स्साला एकदम बोरिंग। हमेशा नफे-नुकसान की सोचने वाला। शादी के बाद भी माही से जिन दिनों बात होती थी। वह बताती थी-‘‘राकेश की सोच अज़ीब है, वह मानता है कि सयानी लड़कियों को लड़कों से दोस्ती नहीं करनी चाहिए; लड़कियाँ ख़राब हो जाती है।’’

‘‘ये सामान बेचने वाले हमेशा ख़राब-दुरुस्त और नफे-नुकसान की ही सोचते हैं...,’’

मैंने कहा। माही तुरंत फुलस्टाॅप लगा दी। विवाहित लड़कियाँ चाहे कितनी भी पढ़ी-लिखी हों अपने सुहाग(?)के बारे में ज्यादा खिंचाई बर्दाश्त नहीं कर सकती हैं। वैसे हम दोनों हँसे खूब थे।

अब तो उसकी हँसी सुने अरसा हो गया है। आज उसने ई-मेल किया है। वह भी यह बताने के लिए कि बच्ची हुई है...और स्वभाव में बिल्कुल मुझ पर गई है।

माही के बिल्कुल न बदल सकने वाली बात ऊपर के पैरे में मैंने इसीलिए कहा था।

‘‘ओए मंजनू के औलाद...सो गए,’’

‘बोल न कम्बख़्त, क्या मैं किसी को चैन से याद भी नहीं कर सकता...., दो मिनट!’’

‘‘खुद तो माही महरानी बन गई...अब माताश्री भी; मजे लो...।’’

पार्टनर जीवेश और मेरी खूब बनती थी। उसने मुझे माही पर एतबार करते हुए, उसके लिए अपना सबकुछ लुटाते हुए देखा था...अब उन्हीं आँखों से मुझे लूटते हुए भी देख रहा था।.....
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(कहानीकारों की ज़िन्दा कौमे हैं....अफ़सोस गलियां ज़िन्दा नहीं हैं.....खै़र! फिर कभी...)

Thursday, July 25, 2013

यही सच है!


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आज दीपू
तुम्हारा जन्मदिन
और मैं बेरोजगार
चाहता हूँ
तुम्हारी हँसी उधार.....!

Tuesday, July 23, 2013

बीएचयू : यह हंगामा है क्यों बरपा?


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बीएचयू में फीसवृद्धि का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। विश्वविद्यालय के
विद्यार्थियों में रोष व्याप्त है। बीएचयू प्रशासन इस सम्बन्ध में
निर्लिप्त है। यह कहना ग़लत होगा। वह जानबूझकर इस मुद्दे को बेपरवाही के
साथ ‘हैंडिल’ करता दिखाई दे रहा है। प्रशासन और अकादमिक अधिकारियों की
अक्षमता या कहें मिलीभगत ने इस मुद्दे को राजनीतिक रंग में रंग दिया है।
परिसर में विरोध-प्रदर्शन, पुतला-दहन, ज्ञापन इत्यादि का सिलसिला हफ़्ते
भर से जारी है। बीएचयू सिंहद्वार के समीप प्राॅक्टर-फोर्स लाठी-डंडे के
साथ तैनात है सो अलग। परिसर में तनाव का बाना इस कदर बुना हुआ है कि
सामान्य विद्यार्थियों में भय और खौफ पैदा होना स्वाभाविक है।

संकट की इस घड़ी में विश्वविद्यालय का प्रशासनिक अमला हाथ पर हाथ धरे बैठा है।
मानों उसने अपनी बुद्धि की बत्ती ही बुझा दी हो। दरअसल, शुल्कवृद्धि की वजह से
आर्थिक रूप से विपन्न विद्यार्थियों के ऊपर बड़ा बोझ डाल दिया गया है।
विश्वविद्यालय प्रशासन यहाँ पढ़ने आने वाले विद्यार्थियों के भूगोल से
परिचित नहीं है; ऐसा नहीं है। यह सबकुछ सोची-समझी रणनीति के साथ हुआ
है। इसका एक संदेश तो यह जा रहा है कि बीएचयू प्रशासन गरीबों को बेहतर
शिक्षा दिए जाने का पक्षधर नहीं है। दूसरा यह क़यास भी लगाया जा रहा है कि
यह फैसला चुनाव से ठीक पहले छात्र-राजनीति या छात्रसंघ बहाली की मांग को
धार देने के लिए किया गया है। फिलहाल, फीसवृद्धि के फैसले को लेकर
छात्र-छात्राओं में एकजुटता बढ़ी है। वे फीसवृद्धि के ख़िलाफ अपनी आवाज़
बुलन्द करने में जुटे हैं।

यह विडम्बना ही है कि फीसवृद्धि का लिहाफ़ लेकर विश्वविद्यालय-प्रशासन सड़कों का मरम्मतीकरण और खाली जगहों का उद्यानीकरण करना चाहता है। महामना मदनमोहन मालवीय ने इस गुरुकुल की परिकल्पना जिस महान उद्देश्य को आधार बनाकर की थी आज वे हाशिए पर हैं। यह विश्वविद्यालय ज्ञान, साहित्य, समाज, कला, वाणिज्य, नवाचार, शोध, सर्जनात्मकता इत्यादि में उच्चस्तरीय नेतृत्व की भूमिका निभाने में अक्षम है। परिसर के ‘आउटलुक’ को बनाने या उसे सजाने-सँवारने में जो धन अपव्यय हो रहा है; उसे यदि विद्यार्थियों के मानसिक विकास, स्वतन्त्र चिन्तन, ज्ञानात्मक प्रबन्धन, कला-कौशल, जीवनबोध व मूल्य-संवर्द्धन इत्यादि के लिए किया जा रहा होता, तो आज फीसवृद्धि को लेकर यह हंगामाखेज दृश्य शायद! ही देखने को मिलता।


Sunday, July 21, 2013

हमारा यह जीवन सिर्फ संज्ञा-सर्वनाम नहीं है....!


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(शोध-पत्र: निष्कर्ष)

जल्द ही....!

चुनावों में मरघटिए का टंट-घंट मत छानिए


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शशि शेखर अख़बार के सम्पादक हैं। समाचारपत्र ‘हिन्दुस्तान’ में उनकी
वैचारिक-टीआरपी जबर्दस्त है। वे जो लिखते हैं, सधे अन्दाज़ में। उनका साधा
हर शब्द ठीक निशाने पर पड़ता है या होगा, ऐसी मैं उम्मीद करता रहा हूँ
(फिलहाल नाउम्मीदगी की बारिश से बचा जाना नितान्त आवश्यक है) लेकिन, कई
मर्तबा वे जो ब्यौरे देते हैं, तर्क-पेशगी की बिनाह पर अपनी बात रखते
हैं; उसमें विश्लेषण-विवेक का अभाव होता है। यानी वे अपने विचार से जिस
तरह पसरते हैं, उनकी तफ़्तीश से कई बार असहमत हुआ जा सकता है। खैर!
पत्रकारिता भाषा में तफ़रीह नहीं है, यह शशि शेखर भी जानते हैं और मैं भी।
बीते ढाई दशक में उनकी कलम ने काफी धार पाया है, चिन्तन में पगे और चेतस
हुए हैं सो अलग। यह मैंने कइयों से सुना है...और उनसे भी।

अब मुख्य बात। शशि शेखर के लोकप्रिय रविवारीय स्तम्भ ‘आजकल’ में आज का
शीर्षक है-‘‘चुनावों को महाभारत मत बनाइए’’। इसमें उनका कौतूहल देखने
लायक है-‘‘पुरजवान होती इक्कीसवीं सदी के हिन्दुस्तानी सियासतदां अपने ही
इतिहास से सबक क्यों नहीं लेते? वे कबतक नफरत के भोथरे तर्कों को नया
जामा पहनाते रहेंगे? वे कबतक हमारे शान्ति पसन्द समाज को बाँटने की कोशिश
करते रहेंगे? वे हम पर तरस क्यों नहीं खाते? हम हिन्दुस्तानी हैं, सिर्फ
वोट बैंक नहीं।’’

ऐसे कुतूहल शशि शेखर जी जैसों के लिए सेहतमंद नहीं है। आप किस पर तरस
खाने की बात कर रहे हैं? भारतीय जनता के ऊपर जो चुनावों में हर एजेण्डे,
साँठ-गाँठ, जोड़-तोड़, जाति-धर्म, संस्था-समुदाय, भाषा-तहजीब इत्यादि से
ऊपर उठकर(तमाम षड़यंत्रों अथवा कुचक्रों के अस्तित्वमान होते हुए भी) अपना
निर्णय सुनाती आई है; जिसने भाजपा के ‘इंडिया शाइंनिग’ से लेकर बसपा के
‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ तक को अप्रत्याशित पटखनी दी है? उस कांग्रेस
को ठेंगा दिखाया है जिसके मीडिया-युवराज राहुल गाँधी पर पार्टी की ओर से
लाख एतबार-पेशगी के बावजूद जनता की दिलचस्पी लेशमात्र नहीं है।(वैसे
कांग्रेस में उनसे बेहतर कई युवा राजनीतिज्ञ हैं) तभी तो, आप इस बात का
जिक्र करना नहीं भूलते हैं-‘‘राहुल गाँधी ने पिछले अप्रैल में जब सीआईआई
को सम्बोधित किया, तो एक वर्ग(पंक्तिलेखक युवा लिखना भूल गए) ने सोशल
मीडिया पर उन्हें ‘पप्पू’ की उपाधि से नवाज दिया।’’

अतः उपर्युक्त उदाहरणों से ज़ाहिर है कि भारतीय आबादी ‘मुर्दों का टीला’
नहीं है, लिहाजा चुनावी मौके पर हमें भी मरघटिए का टंट-घंट नहीं छानना
चाहिए। यह ख़्याल रखा जाना आवश्यक है कि हमारे किए-धरे, कहे-सुने पर आज भी
जनता सबसे अधिक विश्वास करती है, अपनी आत्मा में सच के ज़िन्दा होने का
ढ़िढोरा पिटती है। इसलिए हमारे लिखे का वैचारिक-अर्थ निकसे न कि
वैचारिक-अर्थी; ऐसी निगाहबानी जरूरी है।

और जहाँ तक नरेन्द्र मोदी का सवाल है, तो उनका व्यक्तित्व निश्चित ही
नेतृत्व-सम्पन्न है। उनके उवाच में प्रभाव का रंग है। राजनीति की उनकी
समझ(चालाकियाँ) इतनी साफ/निखरी हुई है कि वे जर्रे-जर्रे का इस्तेमाल
अपने पक्ष, हित अथवा वोट-बैंक भुनाने के लिए कर सकते हैं।(यह मान लेना भी
अतिरेक से भरा और भ्रामक है) बकौल शशि शेखर-‘‘बड़े जतन से
उन्होंने(नरेन्द्र मोदी) खुद को इस लायक बनाया है कि उनकी प्रसिद्धि
गुजरात और देश की सीमाओं से लांघकर समूची धरती पर फैलने लगे। लोग उन्हें
पसन्द करें या नापसन्द, पर राजनीति के जंगल में उन्होंने अपनी जगह बनाने
में कामयाबी हासिल कर ली है।’’

यहाँ भी शशि शेखर जी को याद रखना चाहिए कि भारतीय राजनीति जंगल नहीं है।
अगर जंगल-राज होता, तो आप पिछले वर्ष यूपी में बेहद रचनात्मक ढंग से
चुनावी-तैयारी, अभियान, जनमुहिम, संघर्ष या व्यावहारिक परिवर्तन(चुनाव
ख़त्म अब काम शुरू) इत्यादि का ‘अपना मोर्चा’ नहीं ठानते; इस ज़मीन में खुद
को नहीं गोड़ते; आप वह सब नहीं करते जिससे भारतीय लोकतंत्र की गरिमा
‘पुनर्नवा’ होती है।

शशि शेखर जी की सलाहियत दुरुस्त है। हमें अपने चुनावों को महाभारत बनने
से रोकना होगा। इससे ईश्वरवाद और भाग्यवाद के कुकुरमुते पनपते हैं। इससे
हमारा नागरिकपना ख़त्म होता है। हम यूटोपिया-चिन्तन में दाखिल अवश्य होते
हैं, लेकिन उसे साकार करने का औजार भूल गए होते हैं। मेरी समझ से, अतीत
की बात पर श्रद्धा ठीक है। परन्तु उसका बेवजह इस्तेमाल ख़तरनाक है। हमें
चुनावों में अपने विवेक-कौशल, बुद्धि-व्यवहार, दृष्टि-चेतना इत्यादि के
सहारे चुनावी लड़ाई लड़नी चाहिए जिसका हिमायती खुद आप भी हैं। हमें उन बौने
युवा राजनीतिज्ञों(वंशवाद के उत्तराधिकारी) को राजनीतिक-पास देने से बचना
चाहिए जिनसे जनता को रू-ब-रू कराने का जिम्मा कई बार समाचारपत्रों के ऊपर
भी लाद दिया जा सकता है।

अतएव, हमें चुनावी सरगर्मियों का आकलन-विश्लेषण करते समय भारतीय नागरिकों
की ओर से सहृदयता बरतने की हरसम्भव कोशिश करनी चाहिए; ताकि हमारे ये
प्रयत्न तमाम भूलों के बावजूद भारतीय चिन्तन, विचार, दृष्टि, परम्परा,
तहज़ीब, उसूल इत्यादि को दृढ़ सम्बल प्रदान कर सके; भाग्य की लेखी कहे जाने
वाले पाखण्ड का नाश कर सके...और हम बढ़ सके लोकतंत्र के जनपथ पर अपनी
भारतीय जीवन-राग एवं जीवन-मूल्यों को गाते-गुनगुनाते हुए; ‘वीर तुम बढ़े
चलो, धीर तुम बढ़े चलों की टेक पर। आमीन!

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Wednesday, July 17, 2013

O! Bastard, I'm Dancing Again


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उसके अधरों से फूटे बोल
और वह.....,
चुप आत्मा, मनहूस
आत्महीन, कलपजीवी
गाने लगी अचानक

जैसे बाँस में खिले फूल
और वह....,
बहिष्कृत, शोषित
दुखिहारी, रुदाली
बजाने लगी पैजनियाँ

उसका आज न बर्थ डे है
न फ्रेण्डशिप डे
न वुमेन्स डे
न ह््युमन राइट्स डे
वह गा रही है गीत
नृन्य कर रही है पैजनियाँ
नहला रही है अपने भीतर की पार्वती को
गूँथ रही है गजरा बालों में
लगा रही है मेंहदी हाथों में
बना रही है रंगोली दरवाजे पर

टेलीविजन, अख़बार....जनमाध्यम
जो कभी नहीं रहे शुभचिन्तक
आज ढार रहे हैं उनके लिए ख़बर
उलीच रहे हैं तर्क
परोस रहे हैं भाषा
चमका रहे हैं चेहरा(खाया, पिया, अघाया)

कुल जमा निष्कर्ष
‘महाराष्ट्र में फिर खुलेंगे डांस बार’।

Tuesday, July 16, 2013

दुनिया का हर घटित हमारे मनःजीवन के दायरे में है...!



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(शोधपत्र निष्कर्ष)

यह स्वयंसिद्ध तथ्य है कि यदि प्रत्येक व्यक्ति
आसमान देख सकता है, तो आसमान भी प्रत्येक
व्यक्ति को देख सकता है....! घट-घट व्याप्त राम की
तर्ज़ पर.....! या कण-कण, क्षण-क्षण विराजे शिव की आध्यात्मिक भावना को समो कर....!

यहाँ आसमान से आशय उस
समष्टि-चेतना से है जिसके पास चेतन मन असंख्य है,
चिन्तनशील, क्रियाशील आत्मा अनगिनत हंै,
व्यावहारमूलक व्यक्तित्वों के बारे में क्या कहना उनके आपसी समूहन ने सोशल नेटवर्किंग
के रूप में जो करिश्मा कर दिखाया है उससे हम-आप सभी परिचित हैं।
जैसे सर्च इंजन के माध्यम से इन्टरनेट
पर देय सामग्री कोई भी कहीं भी देख सकता है। एक क्लिक में
जिस तरह आॅनलाइन विडियो से लिंकअप हुआ जा सकता है, अपने परिचिति-परिजनों
से साक्षात्कार किया जा सकता है। वैसे ही दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति
‘फ्रैक्शन इन सैकण्ड’(नैनो सेकेण्ड) की सुपरजेट गति में अपने को वहाँ प्रकट कर सकता है
जहाँ उसका चेतस(प्रेरित/परीक्षित) मन जाना या पहुँचना चाहता है।

आसान-सी बात है। आपकी आवाज सैकड़ों-हजारों मिल दूर कैसे चली जाती है
इतनी जल्दी? कैसे आप ‘विडियो विजुअल्स’ देख लेते है...चटपट इतनी आसानी से?
जब इतना कुछ अपनी नज़रों से सत्य प्रकाशित होते देख रहे हैं...
और हमको चक्कर नहीं आ रहे....मतलब हम सहज विश्वास करने लगे हैं, चाहे यह
विज्ञान के लिहाफ में ही क्यों न हो तो फिर हमें इस नवीन संकल्पना से जुड़े
नए खोज, नवीन अनुसन्धान का अवश्य स्वागत करना चाहिए।
आज भले इसकी संगति करना थोड़ा अटपटा लग रहा है। लेकिन
कल देखिएगा, हमारा कोई परिजन/परिचित बीमार होगा और हम
वहाँ सशरीर उपस्थित न होकर भी उन्हें सांत्वना दे रहे होंगे,
डाॅक्टर से सिमटम-डिस्कस कर रहे होंगे।
इर्द-गिर्द की गतिविधियों/हलचलों, शहर के वातावरण से अवगत हो रहे होंगे।

यही नहीं हमारा सांसद संसदीय-सत्रों के दौरान संसद में बैठकर कैसी भागीदारी कर रहा है, अपना मित्र देर रात जगकर किस विषय पर प्रोजेक्ट तैयार कर रहा है,
हमारी गर्लफ्रेण्ड मोबाइल पर बात करने के बाद अपनी रूममेट को
हमारे बारे में क्या कुछ बता रही है....यह सब आसानी से देखा-सुना-महसूसा
जा सकता हैं। यह अत्याधुनिक तकनीक गूगल-मैप पर अपना गाँव-ज्वार,
घर-द्वार पाकर खुश-प्रसन्न होने से आगे की कड़ी है
जिसमें दुनिया का प्रत्येक कण प्रकाशित है, तरंगित है....उस तक
हम कभी भी किसी समय पहुँच सकते हैं।

दरअसल, यह वायवीय निगरानी है। स्वाभाविक। प्रकृति सापेक्ष।
निर्वात में प्रकाश की की गति है। माध्यम में ध्वनि की पहुँच है।
तो मन तो इन सबसे शक्तिशाली है....फिर वह पलक झपकते दिल्ली से दौलताबाद
क्यों नहीं पहुँच सकता है। हम आश्चर्य कर सकते हैं, लेकिन यह सत्य है।
कोई भी यंत्र/मशीन अपना काम सुचारू ढंग से करे, तो अपेक्षित परिणाम मिलते ही
मिलते हैं। आज मन को साधने, उसकी सूक्ष्म स्फूरण को पकड़ने की तकनीक विकसित कर ली गई है। परखनली शिशु, सरोगेट मदर, क्लेनिंग के बारे में एक समय
सोच पाना भी संभव नहीं था....आज ये अफसाने नहीं हकीकत हैं।

आज जब मन के संप्रत्ययों को विभिन्न ज्ञान-मीमांसा से जुड़े विशेषज्ञों
यथा-मनोविज्ञानियों, संचारविज्ञानियों, समाजविज्ञानियों, मनोभाषाविज्ञानियों, जैवविज्ञानियों, नुविज्ञानियों इत्यादि ने अबूझ मानना छोड़ दिया है, तो हमें भी इसके पराक्रम से परिचय करना
चाहिए। यदि विश्वमानव की अवधारणा है तो निश्चित जानिए कि
हम-सबका मन विश्वमन है। हम पूरे विश्व को अपने मन के
आन्तरिक-बाह््य प्रभाव से हर क्षण देख सकते हैं,
अनसुनी आवाज़ों को सुन सकते हैं, उनतक आसानी से
पहुँच बना सकते हैं।

यदि अमेरिका हमारी निगरानी कर सकता है तो हम भी
अपने मनःशक्ति के प्रभाव से यह जान सकते हैं कि
अमेरिका का राष्ट्रपति भारत के बारे में क्या फैसला लेने के बारे में सोच रहा है, विचार-विमर्श कर रहा है। गुप्त सूचना, गोपनियता और वर्चस्वपूर्ण जासूसी का एकाधिकार
जिस संयुक्त राज्य अमेरिका के पास आज है उस प्रभाव-घेरे को तोड़ने के लिए
मनःजीवन की ऊर्जस्वी-तेजस्वी ताकत ही मुख्य रूप से काम आ सकती है।

आइए, इस बाह्मण्ड में अपनी लौकिक उपस्थिति को मजबूती से दर्ज करें। संकल्प-शक्ति के बूते अपने मनःजीवन को और पारदर्शी, क्रियाशील और विश्व-हृदय के सापेक्ष संवेदनशील और विवेकी बनाए। आमीन!!!

धूपगाड़ी


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आओ बाबू
बैठो साथ

निकालो अपना
अंजुरी-हाथ

बिन सीढ़ी
उतरी धूप

आजू-बाजू
पसरी धूप

गहन अन्धेरा
बिल्कुल चुप

सब जागे
जब चमकी धूप

Monday, July 15, 2013

मन...राग


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बहुत हुई भाषा में बातें
अब...नहीं कोई बात कहूंगा
गले मिलूंगा, गले पडूंगा

छोडूंगा चर्चा, बातूनी बहसें
अब....नहीं कोई प्रचार करूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

बहुत चलाया शब्द-धनुष को
अब...नहीं कोई वाक्य गढूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

यह समय है स्वांग-धरण का
अब...नहीं कोई पाँत बैठूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

जो होना-जाना तय था, सीखा
अब नहीं कोई राग रटूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

‘करो या मरो’ दो ही पथ हैं
बस इस पथ का नेह धरूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

इस सबक के कई हैं साथी
उनसे सीधा संवाद जोडंूगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा।

Sunday, July 14, 2013

इस मौत को क्या नाम दें....?


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हमारा रूख कई मसलों पर चलताऊ किस्म का होता है। चाहे वह कितना ही गम्भीर क्यों न हों? हम जबतक खुद किसी दुर्घटना या समस्या का शिकार नहीं हो जाते; बुरी तरह उसकी चपेट में नहीं आ जाते; तबतक हमें अपनी ज़िदगी की खुशमिज़ाज रंगीनियाँ ही एकमात्र सचाई मालूम देती है-‘‘ये इश्क़-खुमारी तुमतक...तुमतक, ये सब तैयारी तुमतक...तुमतक’।

आपमें से कितने हैं जो जानते हैं पोस्ट ट्राॅमेटिक स्ट्रेस डिसआॅर्डर(पीटीएसडी) के बारे में। नहीं जानते हैं, तो जानिए ज़नाब!

यह दिमागी महामारी है। तनाव-अवसाद का ऐसा चरम रूप जो हाल के दिनों में युद्ध, हिंसा, अपराध, हत्या, अशांति इत्यादि के साए में जी रहे लोगों को तेजी से लील रहा है। यह तनाव, अवसाद, कुण्ठा, विफलता आदि के लक्षण के साथ हमारी ज़िदगी में सबसे पहले शामिल होता है....फिर आत्महत्या की परिणति के रूप में इंसान की इहलीला ख़त्म करके ही मानता है।

यह मनोविकार/स्नायुविकार है। परिवेश/परिस्थिति की प्रतिकूलताओं के साथ जब हमारा देह-दिमाग सन्तुलन नहीं बिठा पाता है, तो पीटीएसडी का उभार हमारे भीतर दिखने लगता है। हम अंतर्मुखी होते चले जाते हैं। जरूरी चीजों से अरुचि होने लगती है। बार-बार अतीत को टटोलते हैं। भयावह/भयानक सपने देखकर डरते हैं, बेवजह भयभीत होते हैं। इस स्थिति में चैन की साँस कैसे ली जाए, जब कई-कई दिनों तक नींद ही नहीं आते आँखों को।

एरिक फ्राम ने जोर देकर कहा था कि स्नायुविकारों की उत्त्पति सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों से होती है। आज हमारा सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण अत्यधिक डरावना हो चला है। हिंसा-प्रतिहिंसा के खेल ने हत्या और मौत को हमारे लिए रसभूमि(वैटिल फिल्ड) बना दिया है। विषम परिस्थितियों ने इसे ख़ासोआम के साथ ऐसे नत्थी कर दिया है जैसे यह हमारी नियति का अभिन्न हिस्सा हो। अतः भारत में जम्मू-काश्मीर का युद्धक्षेत्र हो, नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्र हो; गैंगवार का इलाका हो.....आज लोगों में असुरक्षा की भावना बुरी तरह व्याप्त है। वे किसी न किसी मनोरोग या फिर पीटीएसडी से पीड़ित हैं। बचाव के लिए लोग नशीली दवाओं का सेवन कर रहे हैं। ग़लत राह चुन रहे हैं। कई बार आत्महत्या जैसे जघन्य अपराध को भी अंजाम दे रहे हैं।

यह स्थिति हमारे द्वारा उपार्जित है। हमने विज्ञान, तकनीक, यंत्र, मशीन, पूँजी, साम्राज्य, वर्चस्व, प्रभुत्त्व आदि की जो अंतहीन लड़ाई शुरू की है। यह उसी का मिश्रधन है। ज़िदगी गणित नहीं होती। लेकिन आजकल हम ज़िदगी में गणित के फार्मूले ही बेहिसाब आजमा रहे हैं। दुनिया भर में बाज़ार की खोज/कब्जे के लिए अनचाहे/अनावश्यक ढंग से युद्ध लड़ रहे हैं। बदले में हम स्वयं ऐसी घातक/लाइलाज बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं जो हमारे जीवन की बुनियादी ताकत ही ख़त्म कर दे रही है। और हम विजेता होकर भी ज़िदगी का दाँव हार जा रहे हैं। ब्रिटेन में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक अफगाानिस्तान और तालिबान में जितने सैनिक युद्ध के दरम्यान मारे गए...उससे अधिक वहाँ से बचकर लौटे सैनिक आत्महत्या कर मर गए। मुख्य वजह, पीटीएसडी जैसी संहारक बीमारी।

क्या इस विषय पर हम गम्भीरता से विचार करेंगे? अपने देश के दिन-ब-दिन ख़राब होते जा रहे माहौल को समय रहते दुरुस्त करने के बारे में कुछ बेहतर सोचेंगे?

आशा है, इस मसले पर आपसब बहसतलब नज़रिए से विचार-विमर्श एवं संवाद करेंगे।

Saturday, July 13, 2013

कायाकल्प


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उसे कोई नहीं देख रहा होता है, तब भी उसे लगता है कि कोई उसे देख रहा है, घूर रहा है, बेवजह छू रहा है या छूने की कोशिश कर रहा है।

इस भय का कोई निश्चित कारण नहीं होता, लेकिन वह भयभीत रहती है...या रहने के लिए अभिशप्त है।

14 साल की उस लड़की का नाम उसके पिता ने कीर्ति रखा है। इसके अलावे उसका पिता उसके लिए फूटी कौड़ी न रखा है। जबकि आजकल बेटा-बेटी जन्मते ही स्मार्ट फादर्स-मदर्स लाखों रुपए का बीमा चटपट करा डालते हैं अपने बच्चों के लिए।

खैर! खूब शराब पीने की लत में कीर्ति का पिता तब मर गया या कहें मार दिया गया जब वह छह साल की थी। पिता के मरने के बाद घर का कबाड़ हो गया। ज़मीन दबंगई की भेंट चढ़ गई। विधायक के बेटे ने वहाँ शो-रुम खोल दिया। वहाँ कपड़े बिकते हैं। लेकिन वे सोने की कनबालियों या छूछियाँ से ज्यादा महंगे होते हैं। कीर्ति अपने ही ज़मीन पर खड़े मकान के दूकान से खरीदारी नहीं कर सकती है। यह बाज़ार उसकी ज़मीन पर है। लेकिन उसे बाज़ार के भाव ने बेदखल कर दिया है।

देश में सुप्रीम कोर्ट है। कीर्ति यह नहीं जानती है।

पढ़ने का अधिकार है। कीर्ति नहीं जानती है।

गरीबों के लिए मर मिटने का दावा करने वाली सरकार है। कीर्ति को नहीं पता है।

देश में लेखक हैं, साहित्यकार हैं, बुद्धिजीवी हैं जो उस जैसों के लिए हर रोज शब्द लिख रहे हैं, नवलखा(वैचारिक) बोली बोल रहे हैं, जुबानी चोंच लड़ा रहे हैं, शोध-परिशोध कर रहे हैं। कीर्ति को यह सब नहीं पता है।

कीर्ति जिसे अब सब कूतिया बोलाते हैं क्योंकि वह किसी से ज़बान लड़ा देती है, एक बूँद नहीं डरती है, तमाचा मारने वाले के मुँह पर थूक देती है। भगवान को ठेंगा समझती है।

पूजा में उसका जी नहीं लगता है। वह दिनभर अपनी माँ के साथ भड़सार में दाना भूँजती है। वह दाने-दाने को भगवान मानती है। किसी रोज पेट में अनाज का दाना नहीं जाता है, तो उसकी अंतड़ियाँ ऐंठने लगती है। सोचती है, पत्थर पूजने से ज्यादा जरूरी है पेट पूजा करना।

फुर्सत में रहे तब भी कीर्ति टेलीविज़न नहीं देखती है। बगल के ढाबेनुमा होटल में टीवी है। माँ उसे मना नहीं करती है। वह कीर्ति से कहती है कि टीवी देखने से मन बहल जाता है। जी आन-मान हो जाता है। कीर्ति माँ की बात पर कान नहीं देती है।

कीर्ति खुद कहानी है। वह दूसरों की मनगढ़त कहानी पर क्या आँख-कान दे।

वह तो उन लड़कियों को भी पलटकर नहीं देखती है जो उसी के उम्र की है। लेकिन वेशभूषा में उस जैसी नहीं हैं। फरार्टेदार अंगेजी बोलती हैं। ‘थैंक्स’, ‘वेलकम’, ‘वाऊ’, ‘शिट’ जैसे बात-बात में शब्द बोलती है। ये लड़कियाँ जिस घराने से हैं वहाँ लव-सब धुँआधार चलता है। जवानी दिवानी होती है। मामला घनचक्कर होता है। अमीर लाडले फुकरे की फूँक मारते हैं।

अभी-अभी उसके भड़सार में एक लड़की आई है। उसने अपना नाम आयशा बताया है। वह कीर्ति से बात करना चाहती है। कीर्ति भड़सार में आग बोझने का काम कर रही है। कीर्ति को पता है कि यह लड़की पास की काॅलोनी में रहती है। वह काॅलोनी बड़े-बड़े पार्कों वाला है। वहाँ कार रखे जाते हैं। उसमें तल्ले पर तल्ला वाला कतारबद्ध मकान है। वहाँ सबको जाना मना है। कीर्ति वहाँ से दूध का पैकेट लाने कई बार गई है। पिछले दिनों उसका भाई बीमार था, तो वह हफ्ते भर लगातार आती-जाती रही थी।

कीर्ति अंधी नहीं है। वह कानी, गूंगी, बहरी नहीं है। वह दुनिया के सभी रंग देख रही है। वह सभी रंगों का नाम भी जान रही है। लेकिन उन रंगों में उसका अपने कलेजे का रंग नहीं है। उसकी माँ का असमय बटलोही बना चेहरा नहीं है। दुःख-तकलीफ, ज़िल्लत-ज़लालत से सना उसका खुद का रंग-रूप नहीं है।

कीर्ति को क्या कोई आईएएस बना सकता है? कीर्ति से क्या कोई ऐसा लड़का ब्याह रचा सकता है जिससे कि उसके और उसकी माँ की जिन्दगी सँवर जाए? क्या कोई उदारमना उसके लिए ऐसा कुछ उपाय कर सकता है जिससे उसकी ज़िन्दगी जो इस कदर बेपटरी है, वह पटरी पर आ जाए? क्या ऐसा कोई आसरा है जो यह विश्वास दिला सके कि गरीब के घर पैदा भले हुई है...लेकिन उसे अमीर लाडली बनाने वाले सैकड़ों, हजारों, लाखों, करोड़ों हाथ हैं, हमदर्द साथी हैं, शुभचिन्तक समाज है?

नहीं....नहीं.....नहीं.....!!!

हाँ, अगर आप लेखक-साहित्यकार हैं, तो कीर्ति के इस नारकीय ज़िन्दगी पर एक धांसू कहानी लिख सकते हैं और सेटिंग-गेटिंग ठीक रही तो लोकप्रिय सम्मान पा सकते हैं।

हाँ, अगर आप विशेषज्ञ-आलोचक हैं, तो कीर्ति का उदाहरण सामने रख ‘जीने का अधिकार’, ‘खाने का अधिकार’, ‘पढ़ने का अधिकार’ इत्यादि शीर्षकों से चोखा आलेख लिख और चर्चा अवश्य बटोर सकते हैं।

हाँ, अगर आप समाजसेवी या सामाजिक कार्यकत्र्ता हैं तो जंतर-मंतर पर आमरण अनशन कर लोगों की नज़र में चढ़ सकते हैं, देश का दूसरा-तीसरा-चैथा गाँधी बन सकते हैं।(पहले की कद्र अब बची नहीं सो अन्यों की तलाश हिन्दुस्तान को बेसब्री से है)

आज देश की अटारी पर चढ़कर बांग देने वाल हम-आप जैसे तीसमारखाँओं की कमी नहीं है........लेकिन हमारे इन कौआनहान हरकतों से कीर्ति या कीर्ति की माँ जैसे अनगिनत लोगों का क्या और कितना उद्धार हो रहा है....इसपर रजीबा को शोध अवश्य करना चाहिए।(राहुल गाँधी, अखिलेश यादव जैसों पर शोध करने से ठेंगा न होगा कुछ)

भारतीय मानुष : बाज़ार से इतर का व्यक्तित्व

  ----------------- राजीव रंजन प्रसाद ------------------ यह समय का फेर है कि इन दिनों फ़रेब, जालसाजी, षड़यंत्र, धोखा, ईष्र्या, कटुता...