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‘इस बार’ बंद

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तकलीफदेह इस समय में मैंने ‘इस बार’ में खूब लिखा। शब्द से पेट नहीं भरते। भाषण से अन्याय खत्म नहीं होते...कविता-कहानी से आदमी का कल्याण नहीं हो सकता....यह सब सुनते-समझाए जाते हुए।

लेकिन, ‘इस बार’ बंद कर रहा हूँ। एक तो मैं तकनीकी अ-जानकारी की वजह से पाठकों को न जोड़ सका और यदि कोई आया भी तो उन्हें प्रभावित न कर सका।

ऐसे में मैं ‘इस बार’ बंद कर औरों की आँख में झाँकना चाहता हूँ कि वे आखिर कैसे रच रहे हैं , शब्दों की दुनिया....बना रहे हैं भाषा के डैने...हमारे उड़ने के लिए।

सबसे अधिक माफी अपने देव-दीप से.....आपदोनों को चिट्ठी लिखते हुए मैंने अपने बचपन को जिया...अपने पापा की चिट्ठी से ‘रेस’ की जो आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं।

इस नई दुनिया ने काफी कुछ खा-चिबा डाला....मेरे पापा अब मुझ चिट्ठी कहाँ लिखते हैं....मम्मी किसी त्योहरी में चिट्ठी के साथ 100 रुपइया कहाँ भेजती हैं......,

खैर, ‘इस बार’ बंद कर रहा हूँ ताकि तल्लीनता से लगकर अपने और अपने घरवालों का सर उठाने लायक कुछ कमाई-धमाई कर सकूँ....मम्मी की भाषा में...कुछ ढंग का काम-वाम।

शुक्रिया!


प्रिय देव-दीप,

हमारी आँखें बाहर के दृश्यों को खूब से खूब 1/10 भाग ही देख पाती है। नेत्र का दिखाव-क्षेत्र सीमित मात्रा में प्रकाशीय कणों को ग्रहण करता है। इसलिए हमारे मानस में बनने वाले दृश्यबिम्ब चयनित/प्रतिनिधि होते हैं। इसी तरह ‘वाक्’ में हम जितना सोचते हैं; उसका कुछ हिस्सा ही अभिव्यक्त हो पाता है; शेष अव्यक्त ही रह जाते हैं। यह अनदेखा दृश्य अथवा अव्यक्त वाणी एक दिन बचावट की बड़ी ढेर बनकर हमारे ही सामने आ खड़ी होती हैं। यह सब हमारे अचेतन का हिस्सा है।

बच्चों, इसी तरह सुनावट की प्रक्रिया घटित होती है। हम जो सुन पाते हैं वे तो एक अंश मात्र हैं; बहुलांश तो अनसुना ही रह जाते हैं। जिन आवाजों को हम नहीं ग्रहण कर पाते हैं, उन्हें प्रकृति अपने संज्ञान में सुरक्षित कर लेती है। यह प्रकृतिगत अचेतन का हिस्सा है। प्रकृति बहुविध आवाजों को न सिर्फ ग्रहण करती है; बल्कि उसे तरंगों में रूपान्तरित कर ब्राह्मण्ड में विस्तारित कर देती है। ये तरंगत्व नाद-अनुनाद के रूप में हमें पूरे जगत में फैले मिल सकते हैं। इस फैलाव में विद्युत्व और चुम्बकत्व दोनों पर्याप्त मात्रा में विद्यमान होते हैं।

बच्चों, तुमदोनों …

राहुल गाँधी का नाॅनसेंस बयान....न्यूज़ चैनल उड़ा रहे कबूतर

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कांग्रेस(आई) राजनीतिक पार्टी है। इस पार्टी के नेता हर तरह के स्टंट करने में माहिर हैं।

नये-नये उपाध्यक्ष बने राहुल का स्टंट आप सबके सामने है। दागी राजनीतिज्ञों से सम्बन्धित अध्यादेश पर उनका बकवास बोल न्यूज़ चैनलों पर फड़क रहा है। इस बयान में वे जिस अध्यादेश को फाड़ने के लिए कह रहे हैं, यह बात जनता उसी दिन से कह रही है; राहुल ने अपने कान में अभी तक ठेपी लगा रखा था।

युवा राजनीतिज्ञ राहुल गाँधी से पिछले सालों में जनता की उम्मीद यह रहती थी कि वे बोलें, तो सबसे पहले बोलें....साफ और निष्पक्ष बोलें....या फिर बिना बोले सारा कुछ साफ और निष्पक्ष करें। लेकिन उन्होंने आज तलक सबकुछ जनता के चाहे के उलट कहा और किया है।

राहुल गाँधी का आज का बयान पूरी तरह पूर्व-नियोजित ‘स्टंट’ है। उसी तरह जैसे यूपीए सरकार एक तरफ अनावश्यक खर्चों में भारी कटौती करती है; दूसरी ओर, सातवें वेतन आयोग की घोषणा कर अपने सहज-बुद्धि का कचूमर निकाल देती है। दरअसल, यूपीए के खातेनामे में दागियों, अपराधियों, भ्रष्टाचारियों को प्रश्रय देने का …

अर्पणा हाउस उर्फ अपलाइन रोड 36

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वह ट्रेन हर रोज प्लेटफार्म नंबर 1 से दिल्ली को रवाना होती थी।

पिछले दिसम्बर की 24 तारीख को दिन सोमवार था। एस-4 कोच में दिल्ली जाने को बैठी स्काॅलर अर्पणा किसी हड़बड़ाहट में नहीं थी।

अर्पणा अपने हाॅस्टल की बाॅलकोनी में खड़े होकर मोबाइल से ही ‘रेडियो मिची’, ‘रेडियो मंत्रा’...इत्यादि खूब सुना करती थी। इस वक्त भी सुनने में जुटी थी।

अर्पणा पिछले पाँच सालों तक प्रेम करती रही थी। इज़हार आज किया था कम्बख़्त ने।

‘मैं बीएचयू छोड़ रही हूँ पापा...मुझे बुरा लग रहा है। लेकिन यह करना होगा।’

समय दिलचस्प कहानियाँ बुना करती हैं। इस बुनाव में पारिवारिक-सामाजिक तागे काम आते हैं। अर्पणा खुद इन्हीं तागों से बुनी थी। अर्पणा का काम तो उन तागों का रंग-रोगन करना मात्र था। उसे वह बड़ी ईमानदारी से कर भी रही थी कि ये स्साली ज़िंदगी.....!

मन साथ न दें, तो चीजें ऊब पैदा करने लगती हैं।

अर्पणा एफ. एम. रेडियो बंद कर ली। काफी देर तक ओठंगी रही। सामने तीन साल की एक प्यारी बच्ची थी। बर्थ पर उसके नन्हें-नन्हें पाँव कुदक रहे थे। अर्पणा उस बच्ची के बजते हुए पायल की आवाज़ में खोई थी। अर्पणा ने गौर…

आँख के बारे में: राजीव रंजन प्रसाद का अनुसन्धान रिपोर्ट

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(Eye-Dwell Communication : All things caring out with Eye)

कुछ नोट्स

-आँखें स्कैनिंग मशीन से अधिक ‘पावरफुल’ और ‘रिएक्टिव’ होती हैं....
-हर घटना हमारे दिमाग में तारीख़वार दर्ज होती हैं....
-हमें सम्पर्क में जो कुछ हासिल है...सबकुछ हमारे संज्ञान-बोध का हिस्सा है...
-वे तमाम क्रियाएँ जिसमें शारीरिक क्रियाशीलता शामिल हैं...आँख उन सभी की ‘रिज्यूमे’ तैयार करती है....
-आँखें झूठ का सबसे अधिक प्रतिवाद करती हैं....
-आँख का प्राकृतिक संकल्प या कहे मूल प्रवृत्ति है-सच का उद्बोधन....
-आँखों के माध्यम से पिछले सभी सच बासबूत जाने जा सकते हैं.....
-आँखें मुहावरा नहीं गढ़ती हैं, लेकिन भाषा के मुहावरों से परिचित होती हैं....

इसीलिए शायद हमारी आँखें सबसे अधिक बोलती हैं, भारत के लोक-माधुर्य के कवि बिहारी कहते हैं:

 ‘‘कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात।
भरे मौन में करत हैं, नैनन ही सों बात।।’’

आदरणिय महोदय/महोदया

आपके समक्ष अपना शोध-पत्र प्रस्तुत करना मेरे लिए एक सुअवसर है।
आपसभी को अभिवादन!

मित्रो,

आँख हमारी ज़िन्दगी के बहुत करीब…

चींटी का साहस

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----------------- कई दिनों से धूप नहीं निकले थे। बुढ़ा पेड भूखा था।

देव-दीप, तुमदोनों को तो पता ही है कि धूप में ही पेड़ की पतियाँ खाना बनाया करती हैं। धूप नहीं, तो समझों पेड़ों के घर में सुख-साधन नहीं। उनकी पतियाँ धूप के इंतजार में रसोई में बैठी रहती हैं। अब तुम्हीं बताओ कि मैं अगर कुछ खरीदकर न लाऊँ, तो तुम्हारी मम्मी कुछ बना पाएगी।

देव और दीप मुझे टुकुर-टुकुर देखते हैं।

बेटे, बुढ़ा पेड़ जिस रजवाड़े की ज़मीन पर था। उस प्रदेश का राजा अपनी प्रजा का ही एक नहीं सुन रहा था। फिर बुढ़े पेड़ की क्या सुनता भला?

ऐसा क्यों पापा?-देव ने पूछा।

बेटे, सुनने के लिए सिर्फ आवाज़ नहीं चाहिए होती है। दिल और दिमाग भी कोई चीज है। यदि यह राजा के पास न हुआ, तो उसे कुछ भी नहीं दिख सकता है। आजकल राजा ऐसे ही होते हैं। कहने को तो अब आदमी का राज है। लेकिन, आजकल आदमी का आदमी, आदमी की ही एक न सुन रहा है।

पापा, उस पेड़ को खाना कैसे मिला-देव जिज्ञासा से पूछा।

बेटे, बुढा पेड़ विचारमग्न था। वह सोच रहा था कि कुछ तो उपाय करने ही होंगे। ऐसे तो मरने की नौबत आ जाएगी।

खाना न खाने से हम भी मर जाएंगे-देव ने कहा

हाँ, बेटे! लेक…

पार्टी कार्यकर्ता

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पार्टी का राजतंत्र
जिस किसी को चुन लेता है
वास्तविक चुनाव वही है

पार्टी का आलाकमान
जिस किसी को कर देता है नामित
असली चुनाव वही है

उम्मीदवार चुनने में
जनता का मत स्वीकृत नहीं है
अधिकार तो उन टोपीदारों को भी नहीं है
जो सालो भर पार्टी का झण्डा-बैनर ढोते हैं
किसी आयोजन में
कुर्सीया बिछाते, पोंछते और बटोरते हैं
पार्टी-आवाज़ पर बिन खाए-पीए रेंकते हैं
दौड़ते, भागते और धुँआधार खटते हैं

जबकि उनका अपना घर टूटा है
छत लम्बा-लम्बा चूता है
सीढ़ियाँ जर्जर है
खेत बंजर है
बिटिया सयानी है
बिटवा जवान है
तब भी ज़बान पर
‘पार्टी नेता’ का ही नाम है

इस बार फिर
चुनावी रस्म निभाना है
गीतगउनी बन ‘पार्टी गीत’ गाना है
‘फँलाने’ को जिताना है
‘चिलाने’ को हराना है
अपनी टूटही साईकिल छोड़
चरचकिया पर आँख नचाना है

इस बार फिर
हूमचना है, गरियाना है
‘सरउ तेरी त...’ कहते हुए
विपक्षी से लपटना है
बतचप्पों में निपटना है

वे पार्टी कार्यकर्ता हैं
उन्हें ताज़िदगी यही सब करना है।

शामली: द स्पाइडर गर्ल

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यह कहानी प्रेम की है...प्रेम-प्रसंग की नही।

उस दिन वह नीले रंग की बटनदानी वाली कुर्ती पहने हुए थी। परिधान उस पर जम रहे थे। वह आकर्षक लग रही थी। लड़कियाँ जब आकर्षक लगती हैं, तो मन के भँवरे अपनी आवाज की ट्यून बढ़ा देते हैं। मुझे अपने भीतर के भँवरों की गुनजाहट साफ सुनाई पड़ रही थी। ये भँवरे डोरे डालने वाले नहीं थें, लेकिन थे तो भँवरे ही।

शामली ने आते ही मुझे दस हजार रुपए थमाए थे।

‘‘इतनी जल्दी थी....,’’

‘‘हाँ...,’’ छोटा सा, लेकिन प्यारा-सा जवाब।

मैं और शामली चाय की दूकान से चाय लेकर घुटकने लगे। वह बड़ी मुश्किल से अपना नया सूट दिखाते हुए कुछ बोली थी।

मैं शामली को सुन रहा था। इस सुनाहट में ताजगी थी।

‘‘पापा निक हो गए हैं, माँ भी खुश है। लोग आजकल हरी सब्जियाँ बिना कहे ले आते हैं...कभी शक्कर और मसाले भी।’’

मैं शामली को देख रहा था। उस शामली को जिसने एक तिनके के सहारे खुद को बदल देने का ज़ज्बा दिखाया था।
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शामली जिसकी उम्र 26 साल है; यही कोई तीन माह पहले मुझे मिली थी।

वह बड़ी थी, लेकिन इतनी भी बड़ी नहीं कि मैं उसे अपनी छोटी बहन न कह सकूँ। शामल…

बर्फपात

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आसमान के बरास्ते
यात्रा कर
लम्बी दूरी तय कर
पहुँचता है बर्फ
मेरे पास
मैं दोहरा हो जाता हूँ
खुशी से मुटा जाता हूँ

जब भी आता है बर्फ
बर्फपात के दिनों में
मेरी हथेली पर
उसके आँख में चमक
और मेरे चेहरे पर मुसकान होती है
मैं पुकारता हूँ
-आ गए बर्फ
बर्फ प्रसन्नभाव से कहता है
-हाँ राजीव!

एक बात
मैंने नहीं पूछा कभी
बर्फ तुम्हारे घर में
कौन-कौन हैं?
चाहकर भी नहीं
सोचकर भी नहीं

मैं नहीं पूछ पाया कभी
बर्फ तुम्हारे देश में
चिड़ियाँ ही उड़ती है आसमान में
या एरोप्लन, हेलिकाॅप्टर, लड़ाकू विमानें
तुम्हारे देश में नदियों में सिर्फ पानी ही बहता है
या खूनी समुन्दर भी हैं
जिसमें चलते हैं
जंगी बेड़ों के युद्धवाहक पोत

मैंने नहीं जानना चाहा कभी
क्या तुम्हारे देश में भी नेता चुनावी दौरा करते हैं
और भाषण देते हैं, सुशासन का, रामराज्य का
वैसे पूछना अवश्य चाहिए मुझे
कि वहाँ सरकार, लोकतंत्र, बाज़ार-व्यापार आदि में
धंधेबाजी, गुटबाजी, कब्ज़े और लूट की धाक किस हद तक अमानुषिक है?

इस बार
मैं सूची तैयार कर रहा हँू

मैं शान्तिपूर्वक पूछूँगा यह सब
यह जानते हुए कि
हमारे यहाँ शान्ति के रंग कम दिखते हैं
अपर…

सेमिनार-प्रस्तुति संग राजीव रंजन प्रसाद

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विषय : ‘वर्तमान युवा राजनीति: चित्तवृत्ति और लोकवृत्त'
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10 सितम्बर, 2013; समय: 3 बजे दोपहर बाद; हिन्दी विभाग


युवा राजनीति पर बात करना मेरे लिए भाषा में सत्याग्रह करना नहीं है।

राजनीति सिनेमा नहीं है कि इसका उद्देश्य या ध्येय मनोरंजन मान लें। राजनीति आदमी की भाषा में आदमी होने की वैध तहज़ीब है। विधान का एक ऐसा वितान जिसमें हर आदमी को अपने हिसाब से सोचने, बोलने और करने की स्वतन्त्र और समान छूट प्रदान की जाती है। इस छूट की तमाम अर्थच्छवियाँ हो सकती हैं; लेकिन इससे किसी को तकलीफ हो, नुकसान हो या वे सामाजिक चरित्र के लिए ख़तरनाक साबित हों...इसकी सख़्त मनाही है। ऐसी विडम्बनापूर्ण स्थिति में रोकथाम के लिए बीसियों तरीके हैं जिससे समाज अपनी राजनीतिक चेतना को उत्तरोत्तर बड़ा और समृद्ध करता है। बशर्तिया विधान-नायक जनता के बीच का आदमी हो। बीच का आदमी कहने का तात्पर्य सामाजिक संस्कार-व्यवहार से पगे उस आदमी से है जो अंतिम आदमी की खै़रख़्वाही के लिए फिक्रमंद होना जानता है। राजनीतिक फिकरे कसने या प्रतिस्पर्धी कहकहे लगाने की कुचेष…

व्यक्तित्व की भाषा

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अंग्रेजी में एक शब्द है-‘व्यक्तित्व’। लोकप्रिय और बहुचर्चित भी। इंटरनेट जो अक्षरों, शब्दों, वाक्यों, लिपियों, भाषाओं इत्यादि का खजाना है; में एक इंटर पर इफरात सामग्री(टेक्सट, इमेज, पीएडएफ, पीपीटी, आॅडियो, विडियो इत्यादि) मिल जाएंगे व्यक्तित्व के बारे में। वहाँ यह सूचना आसानी से मिल सकती है कि साधारण बोलचाल में प्रयुक्त शब्द ‘व्यक्तित्व’ को अंग्रेजी में ‘Personality’ कहा जाता है जो लैटिन शब्द ‘Persona’ से बना है। अपनी बोली में हम कुछ बोले नहीं कि सामने वाला व्यक्ति फौरन यह जान लेगा कि हम कैसे हंै? हमारे व्यवहार की प्रकृति क्या है? हमारा स्वभाव कैसा होगा? हम मिलनसार हैं या उजड्ड। अक्लमंद हैं या हमारे दिमाग में सिर्फ भूसा भरा हुआ है। कई बार तो हम किसी का हाव-भाव और हरकत देखकर यह सटीक अनुमान लगा सकते हैं कि फलांना व्यक्ति इस वक्त क्या सोच रहा है; उसके दिमाग में क्या चल रहा है। चाहे वह स्त्री हो या पुरुष।

व्यक्तित्व का नाता हर आदमी के चाहे वह छोटा हो या बड़ा; देह और दिमाग दोनों से अंतःसम्बन्धित होता है। मन की हलचलों से, भाव-तरंगों से, सूझों से या फिर देखने-सुनने के उ…

प्रचारित ज्ञानकाण्ड नहीं है हिन्दी

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हमें अपने कल के कार्यक्रम('वर्तमान समय और हिन्दी भाषा' विषयक गोष्ठी) के लिए हिन्दी-विलापी ज़बानकारों की जरूरत नहीं है। ऐसे नकारे लोग कोई दूसरे नहीं हैं; वे हम ही में से हैं यानी हिन्दीभाषाभाषी शोधक-अन्वेषक; अध्यापक-प्राध्यापक, अकादमिक या राजभाषिक बुद्धि-सेनानी वगैरह-वगैरह जिनकी चेतना और संस्कार दोनों में से हिन्दी-भाषा के प्रत्यय, प्रतिमा, अनुभव, स्मृति, कल्पना, चिन्तन, संवेदन इत्यादि सब के सब गायब हो चुके हंै। इन दिनों हिन्दी-प्रदेशों में अंग्रेजी को ही ज्ञान के गहन प्रकाश के रूप में देखने का चलन बढ़ा है। इसे भूख-निवारण, कुण्ठा-निवारण, बेराजगार-मुक्ति, भाषाई-प्रतिरूप, चेतना-विकास और संस्कृति-बोध की वास्तविक, एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ कसौटी मानकर प्रचारित-प्रसारित करने वाले हमहीं-आपहीं जैसे ज्ञान-आयोगिया लोग हैं। क्या इस सचाई को हम झुठला सकते हैं कि आजादी के इत्ते बर्षों बाद भी भारत में बनी अंग्रेजी की एक भी धारावाहिक, वृत्तचित्र, सिनेमा आदि ने भारतीय जनमानस को आलोडि़त-आन्दोलित करने में…

वर्तमान भारतीय युवा राजनीति : चित्तवृत्ति और लोकवृत्त

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मान्यवर,

आपसी संवाद, बहस और विकल्प की अधुनातन संचेतना को लक्षित करते हुए भारतीय युवा राजनीति की चैहद्दी को ‘वर्तमान युवा राजनीति: चित्तवृित्त और लोकवृत्त’ विषयक राजीव रंजन प्रसाद की सेमिनार-प्रस्तुति के बहाने खुले विषय के रूप में प्रश्नांकित किया जा रहा है। सम्प्रति राजीव रंजन प्रसाद, हिन्दी विभाग में प्रो0 अवधेश नारायण मिश्र के मार्गदर्शन में ‘संचार और मनोभाषिकी(युवा राजनीतिज्ञ संचारकों के विशेष सन्दर्भ में)’ विषयक शोधकार्य में संलग्न हैं।

इस सेमिनार-प्रस्तुति के अन्तर्गत वर्तमान युवा राजनीति के दो पक्ष विचारार्थ प्रस्तुत हैं-1) चित्तवृत्ति और 2) लोकवृत्त। चित्तवृत्ति के रूप में युवा राजनीतिज्ञों के व्यक्तित्व, भाषा एवं व्यवहार से सम्बन्धित विभिन्न बिन्दुओं पर प्रकाश डाला गया है; वहीं लोकवृत्त के अन्तर्गत युवा राजनीतिज्ञों के राजनीतिक समाजीकरण, संभाव्य राजनीतिक संचेतना, नेतृत्व, निर्णय-क्षमता इत्यादि से सम्बन्धित विविध पक्षों पर सम्यक् विवेचन-विश्लेषण प्रस्तुत है।

आप सभी इस अवसर पर सादर आमंत्रित हैं!

स्थान: हिन्दी विभाग       मंगलवार: 10 सितम्बर, …

हमारा यह जीवन सिर्फ संज्ञा-सर्वनाम नहीं है....!

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(शोध-पत्र प्रस्तुति)

पश्चिम वाले हमारी ओर मुँह करके सूर्य-नमस्कार करते हैं;
और हम पश्चिम की ‘चियर्स लिडरों’ को देखकर आहे भरते हैं।
वे हमारी आस्था की ड्योढ़ी पर सर नवाते हैं,
हमारी पवित्र गंगा में घंटों खड़े हो कर जल ढारते हैं;
वहीं हम अपने देसी रेस्तरां में विदेशी डिश चखते हुए अपनी गर्लफ्रेण्ड को
शानदार ‘प्रपोज’ मारते हैं, या सड़कछाप मंजनूओं की तरह
उनकी स्कूटी पर बैठकर  हैंडिल सम्भाल रहे होते हैं।
वे देह की साँस से ऊब चुके होते हैं। हम पूरबवासी देह की साँस लेते हुए अपना जीवन-पबितर कर रहे होते हैं; हमारे घर की स्त्रियां भी ऐसा ही कुछ कर रही होंगी फिलहाल....!  धन-दौलत को दुनियादारी निभाने का जरिया मात्र मानते हैं; और हम अपने काले धन को सफेद करने के लिए अपने भगवान के दरबार में
सोने का कंगन, चेन, लाॅकेट, बिस्कीट, अशर्फी, गिन्नी.....बना रहे होते हैं।

महोदय/महोदया,

मानव-जीवन सिर्फ पश्चिम-पूरब या उत्तर-दक्षिण नहीं है।
हमारा यह जीवन हम-वे, मैं-तुम-वह भी नहीं है।
मैं स्पष्ट शब्दों में यहाँ अपनी बात रखना चाहता…

प्रिय देव-दीप,

हमारी युवा पीढ़ी ‘स्वयं में’ एक वर्ग बन चुकी है, लेकिन अभी स्वयं के लिए स्वतन्त्र नेतृत्व की भूमिका में नहीं है। बच्चों! देश में युवाओं की कमी नहीं है। लेकिन, आधुनिक भारतीय राजनीति के बैठकखाने में सामान्य युवाओं का प्रवेश लगभग वर्जित-सा हो गया है। ऐसा क्यों है? इस विषय पर हमारा बहसतलब होना बेहद जरूरी है। आज संसद में जितने युवा राजनीतिज्ञ पदस्थ हैं उनमें से अधिसंख्य पैतृक राजनीति की उपज हैं; परिवारवादी सलतनत के बैण्ड-बाज़ा-बारात हैं। इन युवा राजनीतिज्ञों के पास क्या कुछ नहीं है, सिवाय व्यक्तित्व, मूल्य और भारतीय आत्मा के। विडम्बना यह है कि वे ही ताकत में हैं। वे ही सत्ता और नेतृत्व में हैं। इन युवा राजनीतिज्ञों का ज़मीनी जनाधार ठनठन-गोपाल है। ‘मास अपील’ के नाम पर भाषा में लीपापोती अधिक है। इसके बावजूद वंशवादी पैराशूट से ज़मीन के सबसे ऊपरी टीले(संसद) पर काबिज़ यही हैं, हाथ यही हिला रहे हैं; कमल यही खिला रहे हैं; साइकिल यही चला रहे हैं; हाथी यही दौड़ा रहे हैं; यहाँ तक कि ‘आप’ में भी हम शामिल नहीं हैं। हम सिर्फ संज्ञा और सर्वनाम से नवाज़े जा रहे शब्द हैं। इन शब्दों के प्रयोग में भी सत्ता की राज…

लद्दाख भी आसमान से धरती जैसा ही दिखाई देता है.....: रामजी तिवारी

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(पढ़िए रामजी तिवारी का लिखा लाज़वाब यात्रा-संस्मरण
‘लद्दाख में कोई रैन्चो नहीं रहता’ शीर्षक से;
परिकथा, जुलाई-अगस्त, 2013 अंक में प्रकाशित)

पहाड़ हवा में नहीं होते। वे ज़मीन पर होते हैं। इसीलिए मजबूती से टिके रहते हैं।
उनका ज़मीन से नाभिनाल रिश्ता है। रैन्चोगिरी की ख़ुमारी में डूबे हम पर्यटकों
से प्रायः वे भिन्न महत्व के होते हैं। दरअसल, इस रिश्ते के कई-कई छोर या सिरे होते हैं।
हमारे पाँव इन पहाड़ों को छूते हैं। हमारा देह इन पहाड़ों पर टिकते हैं, तो कई मर्तबा
पर्याप्त आॅक्सीजन न होने का रोना भी रोते हंै। ‘‘साँस उखड़ने की यह कमी लेह में उतरने के
आधे घंटे बाद इतनी शिद्दत से महसूस होने लगती है कि पहली बार आपको अपने स्वस्थ जीवन में यह एहसास भी हो जाता है कि साँस लेना भी एक जरूरी काम है।’’ जरूरी तो पस्त होते तबीयत के साथ पहाड़ों के मन-मिज़ाज को बूझना भी होता है। अक्सर ‘‘हम मैदानी लोगों के दिमाग में पहाड़ों को लेकर कितना भ्रम रहता है। हम सोचते हैं कि पहाड़, रास्ते के हिसाब से बंद जगहें होती हैं …

यह ज़िन्दा गली नहीं है

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माही का ई-मेल पढ़ा। खुशी के बादल गुदगुदा गए।

जिस लड़की के साथ मेरे ज़बान जवान हुए थे। बुदबुदाए।

‘‘बिल्कुल नहीं बदली....’’

अंतिम शब्द माही का नाम था, उसे मन ने कह लिया था। लेकिन, मुँह ने मुँह फेर लिया।
(आप कितने भी शाहंशाह दिल हों....प्रेमिका से बिछुड़न की आह सदा शेष रहती है)

उस घड़ी मैं घंटों अक्षर टुंगता रहा था। पर शब्द नहीं बन पा रहे थे। रिप्लाई न कर पाने की स्थिति में मैंने सिस्टम आॅफ कर दिया था। पर मेरे दिमाग का सिस्टम आॅन था। माही चमकदार खनक के साथ मानसिक दृश्यों में आवाजाही कर रही थी। स्मृतियों का प्लेयर चल रहा था।

‘‘यह सच है न! लड़कियाँ ब्याहने के लिए पैदा होती हैं, और लड़के कैरियर बनाने के लिए ज़वान होते हैं। मुझे देखकर आपसबों को क्या लगता है?’’

बी.सी.ए. की टाॅप रैंकर माही ने रैगिंग कर रहे सीनियरों से आँख मिलाते हुए दो-टूक कहा था। तालियाँ बजी थी जोरदार। उसके बैच में शामिल मुझ जैसा फंटुश तक समझ गया था। माही असाधारण लड़की है। लेकिन, मैं पूरी तरह ग़लत साबित हुआ था। माही एम.सी.ए. नहीं कर सकी थी। पिता ने उसकी शादी पक्की कर दी थी। उस लड़के से जो एम.…

यही सच है!

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आज दीपू
तुम्हारा जन्मदिन
और मैं बेरोजगार
चाहता हूँ
तुम्हारी हँसी उधार.....!

बीएचयू : यह हंगामा है क्यों बरपा?

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बीएचयू में फीसवृद्धि का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। विश्वविद्यालय के
विद्यार्थियों में रोष व्याप्त है। बीएचयू प्रशासन इस सम्बन्ध में
निर्लिप्त है। यह कहना ग़लत होगा। वह जानबूझकर इस मुद्दे को बेपरवाही के
साथ ‘हैंडिल’ करता दिखाई दे रहा है। प्रशासन और अकादमिक अधिकारियों की
अक्षमता या कहें मिलीभगत ने इस मुद्दे को राजनीतिक रंग में रंग दिया है।
परिसर में विरोध-प्रदर्शन, पुतला-दहन, ज्ञापन इत्यादि का सिलसिला हफ़्ते
भर से जारी है। बीएचयू सिंहद्वार के समीप प्राॅक्टर-फोर्स लाठी-डंडे के
साथ तैनात है सो अलग। परिसर में तनाव का बाना इस कदर बुना हुआ है कि
सामान्य विद्यार्थियों में भय और खौफ पैदा होना स्वाभाविक है।

संकट की इस घड़ी में विश्वविद्यालय का प्रशासनिक अमला हाथ पर हाथ धरे बैठा है।
मानों उसने अपनी बुद्धि की बत्ती ही बुझा दी हो। दरअसल, शुल्कवृद्धि की वजह से
आर्थिक रूप से विपन्न विद्यार्थियों के ऊपर बड़ा बोझ डाल दिया गया है।
विश्वविद्यालय प्रशासन यहाँ पढ़ने आने वाले विद्यार्थियों के भूगोल से
परिचित नहीं है; ऐसा नहीं है। यह सबकुछ सोची-समझी रणनीति के साथ हुआ
है। इसका एक संदेश तो यह …

हमारा यह जीवन सिर्फ संज्ञा-सर्वनाम नहीं है....!

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(शोध-पत्र: निष्कर्ष)

जल्द ही....!

चुनावों में मरघटिए का टंट-घंट मत छानिए

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शशि शेखर अख़बार के सम्पादक हैं। समाचारपत्र ‘हिन्दुस्तान’ में उनकी
वैचारिक-टीआरपी जबर्दस्त है। वे जो लिखते हैं, सधे अन्दाज़ में। उनका साधा
हर शब्द ठीक निशाने पर पड़ता है या होगा, ऐसी मैं उम्मीद करता रहा हूँ
(फिलहाल नाउम्मीदगी की बारिश से बचा जाना नितान्त आवश्यक है) लेकिन, कई
मर्तबा वे जो ब्यौरे देते हैं, तर्क-पेशगी की बिनाह पर अपनी बात रखते
हैं; उसमें विश्लेषण-विवेक का अभाव होता है। यानी वे अपने विचार से जिस
तरह पसरते हैं, उनकी तफ़्तीश से कई बार असहमत हुआ जा सकता है। खैर!
पत्रकारिता भाषा में तफ़रीह नहीं है, यह शशि शेखर भी जानते हैं और मैं भी।
बीते ढाई दशक में उनकी कलम ने काफी धार पाया है, चिन्तन में पगे और चेतस
हुए हैं सो अलग। यह मैंने कइयों से सुना है...और उनसे भी।

अब मुख्य बात। शशि शेखर के लोकप्रिय रविवारीय स्तम्भ ‘आजकल’ में आज का
शीर्षक है-‘‘चुनावों को महाभारत मत बनाइए’’। इसमें उनका कौतूहल देखने
लायक है-‘‘पुरजवान होती इक्कीसवीं सदी के हिन्दुस्तानी सियासतदां अपने ही
इतिहास से सबक क्यों नहीं लेते? वे कबतक नफरत के भोथरे तर्कों को नया
जा…

O! Bastard, I'm Dancing Again

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उसके अधरों से फूटे बोल
और वह.....,
चुप आत्मा, मनहूस
आत्महीन, कलपजीवी
गाने लगी अचानक

जैसे बाँस में खिले फूल
और वह....,
बहिष्कृत, शोषित
दुखिहारी, रुदाली
बजाने लगी पैजनियाँ

उसका आज न बर्थ डे है
न फ्रेण्डशिप डे
न वुमेन्स डे
न ह््युमन राइट्स डे
वह गा रही है गीत
नृन्य कर रही है पैजनियाँ
नहला रही है अपने भीतर की पार्वती को
गूँथ रही है गजरा बालों में
लगा रही है मेंहदी हाथों में
बना रही है रंगोली दरवाजे पर

टेलीविजन, अख़बार....जनमाध्यम
जो कभी नहीं रहे शुभचिन्तक
आज ढार रहे हैं उनके लिए ख़बर
उलीच रहे हैं तर्क
परोस रहे हैं भाषा
चमका रहे हैं चेहरा(खाया, पिया, अघाया)

कुल जमा निष्कर्ष
‘महाराष्ट्र में फिर खुलेंगे डांस बार’।

दुनिया का हर घटित हमारे मनःजीवन के दायरे में है...!

धूपगाड़ी

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आओ बाबू
बैठो साथ

निकालो अपना
अंजुरी-हाथ

बिन सीढ़ी
उतरी धूप

आजू-बाजू
पसरी धूप

गहन अन्धेरा
बिल्कुल चुप

सब जागे
जब चमकी धूप

मन...राग

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बहुत हुई भाषा में बातें
अब...नहीं कोई बात कहूंगा
गले मिलूंगा, गले पडूंगा

छोडूंगा चर्चा, बातूनी बहसें
अब....नहीं कोई प्रचार करूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

बहुत चलाया शब्द-धनुष को
अब...नहीं कोई वाक्य गढूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

यह समय है स्वांग-धरण का
अब...नहीं कोई पाँत बैठूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

जो होना-जाना तय था, सीखा
अब नहीं कोई राग रटूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

‘करो या मरो’ दो ही पथ हैं
बस इस पथ का नेह धरूंगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा

इस सबक के कई हैं साथी
उनसे सीधा संवाद जोडंूगा
गले मिलूंगा, गले पड़ूंगा।

इस मौत को क्या नाम दें....?

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हमारा रूख कई मसलों पर चलताऊ किस्म का होता है। चाहे वह कितना ही गम्भीर क्यों न हों? हम जबतक खुद किसी दुर्घटना या समस्या का शिकार नहीं हो जाते; बुरी तरह उसकी चपेट में नहीं आ जाते; तबतक हमें अपनी ज़िदगी की खुशमिज़ाज रंगीनियाँ ही एकमात्र सचाई मालूम देती है-‘‘ये इश्क़-खुमारी तुमतक...तुमतक, ये सब तैयारी तुमतक...तुमतक’।

आपमें से कितने हैं जो जानते हैं पोस्ट ट्राॅमेटिक स्ट्रेस डिसआॅर्डर(पीटीएसडी) के बारे में। नहीं जानते हैं, तो जानिए ज़नाब!

यह दिमागी महामारी है। तनाव-अवसाद का ऐसा चरम रूप जो हाल के दिनों में युद्ध, हिंसा, अपराध, हत्या, अशांति इत्यादि के साए में जी रहे लोगों को तेजी से लील रहा है। यह तनाव, अवसाद, कुण्ठा, विफलता आदि के लक्षण के साथ हमारी ज़िदगी में सबसे पहले शामिल होता है....फिर आत्महत्या की परिणति के रूप में इंसान की इहलीला ख़त्म करके ही मानता है।

यह मनोविकार/स्नायुविकार है। परिवेश/परिस्थिति की प्रतिकूलताओं के साथ जब हमारा देह-दिमाग सन्तुलन नहीं बिठा पाता है, तो पीटीएसडी का उभार हमारे भीतर दिखने लगता है। हम अंतर्मुखी होते चले जात…

कायाकल्प

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उसे कोई नहीं देख रहा होता है, तब भी उसे लगता है कि कोई उसे देख रहा है, घूर रहा है, बेवजह छू रहा है या छूने की कोशिश कर रहा है।

इस भय का कोई निश्चित कारण नहीं होता, लेकिन वह भयभीत रहती है...या रहने के लिए अभिशप्त है।

14 साल की उस लड़की का नाम उसके पिता ने कीर्ति रखा है। इसके अलावे उसका पिता उसके लिए फूटी कौड़ी न रखा है। जबकि आजकल बेटा-बेटी जन्मते ही स्मार्ट फादर्स-मदर्स लाखों रुपए का बीमा चटपट करा डालते हैं अपने बच्चों के लिए।

खैर! खूब शराब पीने की लत में कीर्ति का पिता तब मर गया या कहें मार दिया गया जब वह छह साल की थी। पिता के मरने के बाद घर का कबाड़ हो गया। ज़मीन दबंगई की भेंट चढ़ गई। विधायक के बेटे ने वहाँ शो-रुम खोल दिया। वहाँ कपड़े बिकते हैं। लेकिन वे सोने की कनबालियों या छूछियाँ से ज्यादा महंगे होते हैं। कीर्ति अपने ही ज़मीन पर खड़े मकान के दूकान से खरीदारी नहीं कर सकती है। यह बाज़ार उसकी ज़मीन पर है। लेकिन उसे बाज़ार के भाव ने बेदखल कर दिया है।

देश में सुप्रीम कोर्ट है। कीर्ति यह नहीं जानती है।

पढ़ने का अधिकार है। कीर्ति नहीं जानती है।

गरीबों के लिए मर मिटने क…