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Showing posts from December, 2014

कटौती: नववर्ष की बधाई!

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सिर्फ उन्हीं को
जो मेरे बच्चों का नाम जानते हैं!

हत्या-पूर्व एक मशविरा

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कितना अच्छा हो अपने ब्लाॅग में किसी वर्ष कोई तारीख न दर्ज हो...!!
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जब बेहद चालाक हो समय
मित्र बन पीठ पर थाप दे
घुस आए धड़धड़ाते हुए
तुम्हारे मकान के भीतर
अभाव में जीते तुम्हारे बच्चों को दुलारने लगे
तुम्हारी मेहरारू के भाग्य को कोसने लगे
निःसंकोच छूने लगे तुम्हारे सत्त्व को
करने लगे व्यंग्य, उड़ाने लगे उपहास
उसकी अट्टहास देख
यदि तुम्हारा चेहरा फ़क पड़ने लगे
एकबारगी भकुआ जाओ तुम
तो इस घड़ी सावधान होओ...
यह डरने का नहीं मुकाबला का समय है!
पीछे हटने का नहीं प्रतिरोध का समय है!
कमबख़्त यह रोने का नहीं गीत गाने का समय है!
अपने पिता के टोन में निहत्था किन्तु निर्भीक-
‘आव गाईं जा झूमर हो हमार सखिया....’

यह समय अपनी भाषा में तेज-तेज स्वर में बोलने का है
ताकत भर अपनी चेतना को आज़माने का है
ताकि तुम्हारी हत्या भी हो...,
तो सारा ज़माना तुम्हारी आह! सुने
और बरबस कहे, ‘हाय हत्भाग्य हमारा जड़-मूक, स्पंदहीन, संवेदनहीन बेजान शरीर;
दुनिया से कुछ न चाहने वाले को दुनियावालों ने ही लील लिया।’
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पत्नी

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रोज की तरह आज भी बाबू को स्पीच थेरेपी क्लास से लेकर लौटा, तो शाम के साढ़े पांच हो गए थे। कुछ देर बाद मेहरारू भी सब्जी लेकर मकान में दाखिल हुई। दीप, देव के साथ टीवी देखने लगा था; और मैं प्रथम प्रवक्ता के दिसम्बर, 2009 अंक में आंख-मुंह-नाक सहित धंसा हुआ था।

आते ही मुंह बिचका दी थी वह। उसे मुझपर लाड़ आता है; लेकिन उसकी आंख किताबों, पत्र-पत्रिकाओं पर बज़र गिराते हैं। वह पगलेट नहीं है लेकिन मैं समझता हूं। वह कहती है कि आदमी को इतना ही पढ़ना चाहिए कि सहुर भर बोल-बतिया सके; बाकी सब फिज़ूल है। वह अंदर चली गई।

आधे घंटे बाद मैं किचेन में गया, तो बच्चों ने ख़बर भेंट की-‘‘मम्मी, किताब में से खाने के लिए बना रही है...’

वह मंचूरियन बना रही है; उसने बताया।

‘‘ठीक है बनाओ, मैं नीचे कमरे में जा रहा हूं।’’

मेरा स्टडी रूम नीचे है। इसका किराया पन्द्रह सौ अलग से देता हूं। सीमा को उस कमरे से भारी चीढ़ है। और मुझे इकतरफ़ा प्यार।

खैर! नीचे नहीं आ सका। सोचा थोड़ा उसका सहयोग कर दूं।

मैं, सीमा, देव और दीप ने आज वेज-मुचूरिअन खाया। अच्छा लगा।

अपनों द्वारा अपनेपन से परोसी…

मेरे शोध-निर्देशक : जिनसे मैंने खुद का ‘होना’ जाना

वह पिछले पांच सालों में से कोई एक दिन रहा होगा। सदानीरा भगीरथ गंगा शब्दों से हमें शीतल कर रही थी हम ज्ञान-प्रवाह में हमेशा की तरह बह रहे थे....दीप्त आंखें तृप्त मन के साथ चुपचाप झर रहे थे  ----------------------  मेरे नोटबुक के एक पन्ने में  प्रो. अवधेश नारायण मिश्र
विश्वविद्यालय में संवादधर्मी माहौल नहीं है। बहसतलब मिज़ाज के लोग कई गुटों, खण्डों, भागों में बंटे हुए हैं या जानबूझकर विभाजित हैं। यह सब मेरी सोच और चेतना के विपरीत है। फिर मैं क्यों बीएचयू में हूं? किसने रखा है? कोई जोर-दबाव तो है नहीं। वैसे भी मैं स्वभाव से ‘शार्ट टेम्पर्ड’ हूं। कब कोई बात मुझे बुरी लग जाए। लेकिन अगर लग गई तो प्रतिक्रिया होनी है। अब चाहे परिणाम जो हो। फिर मेरे तुनकमिज़ाजीपन को किसने इस कदर साध दिया कि कुल प्रतिकूलताओं के बावजूद मैं इस विश्वविद्यालय में हूं। छात्रवृत्ति; हो ही नहीं सकता। राजीव रंजन प्रसाद के लिए यह कोई कामना का विषय नहीं है। मुझे पता है, कुछ लोगों में प्रतिभाएं जन्मजात होती हैं। मैं तो श्रमशक्ति युगे-युगे का आह्वानकर्ता हूं। तो मैं कहना क्या चाहता हूं आखिरकार...!

यही कि मुझे प्रो. अवधेश नार…

वाह! रजीबा वाह!

बतकही/जनता की अड़ी -----------
सरकार का सरकारी नेतृत्व करने वाला शख़्स उस मंत्रिमण्डल विशेष का प्रधानमंत्री हो सकता है। देश का असली प्राइम मीनिस्टर वहां की जनता है भाई जी-बहिन जी! जो प्राइम मीनिस्टर होना नहीं चाहती; लेकिन वह चाह जाए तो तेरह महीने क्या तेरह दिन में प्राइम मीनिस्टर पर सुशोभित व्यक्ति को दर-बदर कर सकती है।  धत् महराज! ‘भारत के प्रधानमंत्री’ वाला बचवन का मनोहर पोथी नहीं पढ़े हैं क्या? उसमें देख लीजिए जनता ने किसको और कितने दिनों तक प्रधानमंत्री बनाया है; और ज्यादा हूमचागिरी करने पर अगले चुनाव में पटखनी भी दे दिया है। जनता की डीएनए में से कांग्रेस जैसे गायब हो गई न! भाई जी, बहन जी! यूपी में से बहन जी का हाथी करवटिया गया न! समाजवादियों और वामपंथियों ने कहां क्या भुगता है यह भी बताना पड़ेगा? और लालूजी और पासवान जी के बारे में तो बच्चा-बच्चा जानता है कि उन्हें जनता ने जितना ही आदर दिया वे उतने ही आसमानी और हवाई हो गए; अब उनसे ज़मीन धरायेगा...ई त भाई जी-बहिन जी! मेरी समझ से कवनो ज्योतिष, पंडित ही बता सकता है; है कि नहीं! मेन बात ई है कि सरकार में ‘वन फेस सुपर हेजेमनी’ प्रधानमंत्…

महाआफत है वर्फबारी...विश्व का एक बड़ा हिस्सा हो सकता है ‘ममी’ में तब्दील

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यह बात सौ फीसद झूठ है। इस पर जरा भी विश्वास न करें। लेकिन मैं शोध-विद्याार्थी हूं ऐसी उपकल्पना यानी हाइपोथीसिस पर विचार तो कर ही सकता हूं।

शुभ-रात्रि!

ओह! प्रोमीथियस मुझे तुम्हारे मन की व्यथा-कथा कहनी है

दैवीय-सत्ता के अमानुष और बर्बर  होने  की  प्रतीकात्मक नाट्य  का  पुर्नपाठ ----------------- समकाल के बरास्ते एक मनोवैज्ञनिक: मनोभाषिक पड़ताल
राजीव रंजन प्रसाद



no wait pls...! it's personal write up

‘आप’ जनता की गुनाहगार है, निर्णय वही करे!

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राजीव रंजन प्रसाद 




wait pls...!

कृपया मेरी मदद करें : Please Help me

परआदरणीय महोदय/महोदया,
सादर-प्रणाम! मेरा शोध-कार्य संचार और मनोभाषाविज्ञान के अंतःसम्बन्ध पर है। मैं युवा राजनीतिज्ञों के संचारक-छवि और लोकवृत्त के अन्तर्गत उनके व्यक्तित्व, व्यवहार, नेतृत्व, निर्णय-क्षमता, जन-लोकप्रियता इत्यादि को केन्द्र में रखकर अनुसन्धान-कार्य में संलग्न हूं। मैंने अपने व्यक्तिगत प्रयास से अपने शोध-विषय के लिए हरसंभव जानकारी जुटाने की कोशिश की है। जैसे मनोविज्ञान के क्षेत्र में सैकड़ों मनोविज्ञानियों, मनोभाषाविज्ञानियों, संचारविज्ञानियों, समाजविज्ञानियों, राजनीतिविज्ञानियों, नृविज्ञानियों आदि को अपनी जरूरत के हिसाब से टटोला है, जानने-समझने की कोशिश की है। लेकिन भारतीय सन्दर्भों में ऐसे अन्तरराष्ट्रीय जानकारों-विशेषज्ञों का मेरे पास भारी टोटा है। अर्थात जितनी आसनी से हम कैसिरर और आई. ए. रिचर्डस का नाम ले लेते हैं; फूको, देरिदा, एडवर्ड सईद, ज्यां पाॅल सात्र्र को अपनी बोली-बात में शामिल कर लेते हैं वैसे हिन्दुस्तानी ज्ञानावलम्बियों(जिनका काम उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में उल्लेखनीय रहा है और जिन्हें भारतीय अकादमिक अनुशासनों में विषय-विशेषज्ञ होने का विशेषाधि…

‘थोक में निजीकरण नहीं’: यह कारपोरेट दलालों की शब्दावली है, जनता की नहीं

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मान लीजिए, अमेरिकी चार्टर के अन्तर्गत लोकतांत्रिक सुधार की पेशकश सामने आये तो सामान्य जनता क्या प्रतिक्रिया देगी? यदि यूरोपीय संघ इस बात का दावा करता है कि भारत में विकराल होती भ्रष्ट्राचार की समस्या से निपटने के लिए आवश्यक है कि उसे विदेशी शासन-व्यवस्था के अन्तर्गत(थोंक में नहीं आंशिक रूप से) शासित किया जाये, तो क्या भारतीय अवाम इसके लिए सहर्ष राजी होगी?

यदि आप यह सब नहीं सोचते हैं और सोचना भी नहीं चाहते हैं, तो चैन की नींद सोइए; क्योंकि हमारे देश का अभिजात्य घराना और नवप्रबुद्ध युवा पीढ़ी इन सब के लिए पूर्णतया तैयार है और भारत की बहुमत सरकार भी इसी दिशा में त्वरित कार्रवाई और पहलकदमी करती दिखाई दे रही है जिसे जन-प्रचारित रूप में जिस प्रकार परोसा जा रहा है या समझाया जा रहा है; वह बेहद खतरनाक है। भारतीय समाज का एक खास तबका स्वयं को लाभान्वित किए जाने की शर्त पर यह सब नवसाम्राज्यवादी प्रोपेगेण्डा अपना रहा है जिसमें जनता के लिए सिर्फ सपने हैं; यथार्थ में हासिल होने वाला कुछ भी नहीं।

ताजा उदाहरण माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का रेलवे के निजीकरण को लेकर ह…

नागार्जुन: लोकतंत्र का जनकवि

हार नहीं मानूंगा,
रार नहीं ठानूंगा,
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं
...मैं गीत नया गाता हूं...गीत नया गाता हूं!!!

-अटल बिहारी वाजपेयी ---------------------
जनकवि नागार्जुन बाबा आदम से भले न सही; लेकिन स्वातंन्न्योत्तर भारत के जननायक हैं और जननेता भी। उनकी अंतश्चेतना में लोक-जन की छवि कैसी है? एक लेखक उनका परिचय देते हुए कहते हंै-‘‘नागार्जुन ने अपनी काव्य-कृतियों और कथा-कृतियों में जीवन को उसके विविध रूपों में, जटिल संघर्षों को, राजनीतिक विकृतियों को, मजदूर आन्दोलनों को, किसान-जीवन के सामान्य दुःख-सुख को पहचानने और उसे साहित्य में अभिव्यक्त(एक संचारक की सफलता इन्हीं रूपों में अधिक प्रेरक, प्रभावी और प्रकाशमान होती है-पंक्तिलेखक ) करने का सृजनात्मक उत्तरदायित्व बखूबी निभाया है। वे प्रगतिशील चेतना के वाहक, जनचेतना के पक्षधर, निम्नवर्गीय व्यक्तियों के प्रति करुणाशील, उदार मानवतावाद के पोषक, स्वस्थ प्रेम के व्याख्याता, प्रखर व्यंग्यकार और जीवन के प्रति आस्थावान होने के कारण सच्चे प्रगतिशील, सर्जनात्मक क्रांति के संवाहक, मानवता के प्रतिष्ठापक और अशिव के ध्वंस पर शिव का निर्माण करने …

अवांछित पोस्ट : एक ख़त महामना के नाम

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परमआदरणीय महामना,
सादर-प्रणाम!


कायदे से होना तो यह चाहिए कि मुझे तत्काल काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पिछले पांच सालों से जारी शोध-कार्य छोड़ देना चाहिए। विश्वविद्यालय प्रशासन हमें बंधुआ मज़दूर समझता हैं। अपनी मेहनत और यत्न के बदौलत जो शोध-अध्येतावृत्ति हमारे नाम आता है उसे वे इस तरह दे रहे हैं जैसे हम इनकी गुलामी खट रहे हों। मैं दो बच्चों सहित सपरिवार शोध-कार्य में संलग्न हूं। माहवारी खर्च कम से कम 12 से 15 हजार है। एकदम सामान्य, साधारण रंग-ढंग में रहने पर। तिस पर छोटे बच्चे को सुनने की परेशानी है और उसके स्पीच-थेरेपी में ढाई से तीन हजार माहवारी खर्च हो रहे हैं।

ऐसे में अब आप बताओ कि उन्होंने मुझे मेरा शोध-अध्येतापृत्ति सितम्बर से नहीं दिया है। शोध-कार्य की गुणवत्ता और अपनी निष्ठा-समर्पण का हवाला दो तो कहते हैं; यह सब कुछ नहीं देखा जाता है। यानी मनमर्जी का रामराज है। सबतर शांति-शांति है। हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फ़ारसी क्या वाली तर्ज़ पर कहें तो हम रोज अपने काम में लट रहते हैं। उसके अलावे अपने संगी-साथी और रिश्तेदारों के हर किस्म की जरूरत में हरसंभव साथ खड़े …

आखि़री बात इस वर्ष की ‘इस बार’

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वह 20 रुपए की पत्रिका हैइंडिया टुडे...एकदम ताजा अंक; पत्रिका को मैंने ‘संकल्प के सितारे’ आवरण-कथा के लिए खरीदा था। हद पिछली बारसे यह हुई कि उसने इस बार पूरा ‘पेड न्यूज़’ ही मुख्यपृष्ठ पर रंगीन-चटकीले पृष्ठों में प्रकाशित कर दिया। मानों ह कवर-स्टोरी हो...! यानी  बात हो रही है उस विज्ञापन की जिसमें बग्घी पर नेताजी का उत्तर प्रदेश और उनका लाडला अखिलेश संग-साथ विराजमान हैं।
...क्या माननीय अखिलेश यादव की मंशा, घोषणा और उद्देश्य ही यह हो चली है कि :
उत्तर प्रदेश का नक्शा क्या कुछ बदला है यह अब यहां की जनता/मतदाता नहीं बोलेगी बल्कि यह सब वह प्रचार-सामग्री द्वारा कहे जाने चाहिए जो हम अकूत/इफ़रात खर्च कर तैयार कर रहे हैं; छोटे-बड़े सभी प्रचार माध्यमों से बंटवा- भिजवा रहे हैं और अपनी सफलता का और अपने बुलंद नज़रिए को अधिकाधिक नज़राना पेश कर रहे हैं.... (यह न भूलें श्रीमान् अखिलेश यादव कि हमारे पास आपके राजनीति में ककहारा सीखने वाले दिनों की ‘ब्लैक एण्ड व्हाइट’ कतरनें भी सुरक्षित हैं जब आपने मंचों से बोलना शुरू किया था...जनमुद्दों और सत्ताधारी जनप्रतिनिधियों को अपनी भाषा में घेरना श…

समाज, लोकतंत्र और एक तानाशाह की नियति

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आज का ‘हिन्दुस्तान’ समाचारपत्र(वाराणसी संस्करण) खोलिए।  आखिरी पृष्ठ पर जाइए और यह ख़बर पढ़िए....
-----------  16 दिसम्बर, 2014 प्रिंसिपल ने दीवार में दे मारा बच्चे का सिर, मौत  बरेली। देवरनिया के डीएसआर ग्रुप के स्कूल में मजदूर पिता फीस जमा नहीं करा सका तो स्टाफ ने उसके बच्चे की जान ले ली। आरोप है कि स्कूल प्रिंसिपल ने यूकेजी में पढ़ने वाले बच्चे(7 साल) को पीटते हुए उसका सिर दीवार पर दे मारा। इससे मासूम की मौत हो गई।... ------------------ आगे दो-तीन पंक्ति और लिखी गई है; और ख़बर ख़त्म। यह बानगी है हमारे उस समाज की जिसके गौरव-गाथा को हम अपने सीने से चिपकाएं हुए पूरे भारतीय और भारतीयता से लैस होने का गुमान रचते हैं। यह घटना एक उदाहरण है। यदि इस बारे में थोड़ी सी दिलचस्पी दिखाएं, तो देशभर से सैकड़ों ऐसी ख़बर आपके खोज में सामने होगी। हम सुभाषितानी सुनने वाले लोग हैं। राम और कृष्ण पूजक लोग हैं। हमारे यहां बच्चे भगवान का रूप होते हैं। लड़कियां तो साक्षात देवी की अवतार होती हैं...पार्वती, शक्ति; और भी पता नहीं क्या-क्या?
ओह! ऐसे बदेलगा समाज! ऐसे दूर होगी सामाजिक असमानता और व…

निर्णय की स्वतंत्रता, जनता और भारतीय लोकतंत्र

‘जनसत्ता’ समाचारपत्र को भेजी गई राजीव रंजन प्रसाद की प्रतिक्रिया एक पाठकीय टिप्पणी पर
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15 दिसम्बर को जनसत्ता में प्रकाशित शिबन कृष्ण रैणा का पत्र गौरतलब है।
पत्र-लेखक महोदय ने लिखा है कि-‘‘राजनीति अथवा कूटनीति में समझदारी और
सावधानी का यही तो मतलब है कि जनता के मन को समझा जाए और फिलहाल उसी के
हिसाब से आचरण किया जाए। जनता के विपरीत जाने से परिणाम सुखद नहीं
निकलते, ऐसा राजनीति के पंडितों का मानना है।’’ प्रश्न है कि जनता के
बारे में बोलने वाले टेलीविजन-उवाचू या समाचारपत्रपोषी राजनीतिक
पंडितों(विश्लेषक नहीं) के कथन की सत्यता सम्बन्धी प्रामाणिकता क्या है?
अधिसंख्य तो फरेब की कारामाती भाषा बोलते दिखते हैं या फिर राजनीतिक
शब्दावली में अपनी बात आरोपित करते हुए जिनसे जनता का सामान्य ज्ञान भी
दुरुस्त होना कई बार संभव नहीं लगता है। परस्पर विरोधी बातें कहते-सुनते
ऐसे पंडे/पंडितों की बात मानने से अच्छा है कि जनता स्वयं स्वतंत्र मनन
करे; वह अपने स्तर पर यह विचार और निर्णय करे कि नई सरकार के बारे में
उसकी धारणा और विश्वास कहीं ‘मन खट्टे’ करने वाले तो नहीं है? क्य…

नेल्सन मंडेला: एक अपराजेय आत्मा

प्रिय देव-दीप,

आज तुम्हें एक ऐसी शख़्सियत के बारे में, उसके जीवन-संघर्ष के बारे में बताने जा रहा हूं जिसने गांधी से बहुत कुछ सीखा ही नहीं कर के दिखाया भी। आज के स्वार्थी और दिखावटी युग में जहां अकादमिक ‘वर्क शाॅप’ देश भर में हजारों प्रति वर्ष की संख्या में हो रहे हैं; सचमुच कुछ करने की नियत कितने लोग पा पाते हैं...थोड़ा ठहरकर सोचना होगा। खैर! आज अपने पिता से सुनों नेल्सन मंडेला के बारे में जिस अपराजेय आत्मा को दक्षिण अफ्रीका का गांधी कहा जाता है।

तुम्हारा पिता
राजीव
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मबासा नदी के किनारे ट्राँस्की का मवेजों गाँव। नेल्सन रोहिल्हाला मंडेला इसी गाँव में 18 जुलाई, 1918 को पैदा हुए। यह अफ्रीका का दक्षिणी पूर्वी हिस्सा है। नेल्सन मंडेला का जन्म जिस वर्ष(1918 ई.) हुआ; रूस में ‘बोल्शेविक क्रान्ति’ हो चुकी थी। यह लड़ाई गैर-बराबरी और असमानता के खि़लाफ लड़ी गई निर्णायक लड़ाई थी। प्रतिरोध इस क्रान्ति के मूल में था। समाजवादी विचार की चेतना में प्रतिरोध का अर्थ व्यापक और बहुआयामी होता है जिसे इस क्रान्ति ने आधार और दिशा दोनों प्रदान की थी। जनसमूहों के इस विद्रोह में शोषित,…

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