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Showing posts from February, 2011

अमर चित्र कथा के संस्थापक का निधन

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प्रेरणा-पुरुष को श्रद्धांजलि
लाखों भारतीय बच्चों का भारतीय संस्कृति और महापुरुषों के जीवन से परिचय कराने वाले अनंत पै का निधन हो गया है. अनंत पै चाचा के नाम से मशहूर रहे अमर चित्र कथा के संस्थापक और लेखक का निधन दिल का दौरा पड़ने के कारण हुआ, वे 81 वर्ष के थे. अमर चित्र कथा की अब तक 10 करोड़ से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी हैं, आज भी कई भाषाओं में उसका प्रकाशन होता है और प्रति वर्ष उसकी 30 लाख से अधिक प्रतियाँ बिकती हैं.
कर्नाटक में 1929 में जन्मे अनंत पै ने रसायन विज्ञान में मुंबई से उच्च शिक्षा प्राप्त की थी. अनंत पै ने अपने करियर की शुरुआत टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से की थी जहाँ वे इंद्रजाल कॉमिक्स के प्रकाशन से जुड़े रहे थे, उसके बाद उन्होंने अमर चित्र कथा के प्रकाशन के इरादे के साथ नौकरी छोड़ दी थी. अमर चित्र कथा का प्रकाशन 1967 में शुरू हुआ था. भारत के महापुरुष, वीर महिलाएँ, प्रख्यात वैज्ञानिक, स्वतंत्रता सेनानी और पौराणिक पात्र जैसी अनेक श्रृंखलाओं के माध्यम से उन्होंने न सिर्फ ज्ञान बढ़ाया बल्कि बच्चों को प्रेरित भी किया.
1980 में उन्होंने हिंदी और अँगरेजी में बच्चों की एक लोकप्रिय पत्रिका टिंक…

सिर्फ मैं-तुम

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आज
चाय बनी होगी कल की तरह ही
एकदम ‘फर्स्ट क्लास’।
परसों की भाँति शक्कर भी डाला होगा
तुमने अपने अनुभव और अभ्यास के अंदाज से
ठीक-ठीक।
चाय न पीने की तुम्हारी लत
बिल्कुल उलटा
हमारे घर की रोज की आदत में शुमार है।
मैं रहूँ या न रहँू
चाय रोज बनती है पिछले कल की तरह
आगे कल की बाट जोहती हुई।

प्रिय...!
चाय की घूंट साथ-साथ न पी पाना
मेरी विवशता है और तुम्हारी मर्यादा।
घर में चैन है कि
चाय रोज बन रही है
और बनाने वाली सही-सलामत है।
उन्हें यह भान है कि
चाय बनने के लिए पानी को खौलना होता है
स्वाद के लिए चायपती को देनी पड़ती है आहुति।
चीनी को घूलना होता है दूध के रंग में
समय को अंदाजना होता है कि
‘चाय पक जाने’ का सायरन बजे उचित समय पर।

इस बीच तुम्हारा और मेरा
जलना आग की तरह
चाय की दुरुस्त सेहत के लिए अनिवार्य है।
तुम धीमी जलो या तेज
मैं मद्धिम जलूँ या ज्वाला बन
मेरे तुम्हारे बीच बना रहेगा फाँक, याद रखो।

अतः बामुलाहिजा-होशियार

तमाम दुश्वारियों के बावजूद
तुम्हें घर के कहे-मुताबिक ही
चाय बनाना पड़ेगा एकदम ‘टैम’(समय) पर।

और मैं,
तुमसे करता रहँूगा बात
दूर-तरंगों की आवाज़ बन।
लेता रहूँगा हाल-चाल
कहता रहूँगा हर रोज एक ही बात
‘छोड़ो’, ‘हटाओ’, ‘ज…

सांस्कृतिक क्रांति के अग्रदूत : लोहिया संस्कृति-समाज और भाषा के अन्तःसम्बन्धों की पड़ताल

राजीव रंजन प्रसाद

समाजवादी विचारधारा के मूल-स्तंभ डाॅ0 राममनोहर लोहिया का जीवन श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों एवं अनुपम योग्यता से पूरित था। भारतीय राजनीति में उनकी छवि एक ऐसी राजनेता की थी जो ठोस सामाजिक परिवर्तनों के प्रति समर्पित थे। वे महात्मा गाँधी की भाँति सर्वजनसुलभ थे। सप्तक्रांति सिद्धांत के जनक डाॅ0 राममनोहर लोहिया को आज भी लोग ‘जनतंत्र’, ‘न्याय’ और ‘समानता’ का सबसे बड़ा हिमायती मानते हैं। सन् 1942 में जब महात्मा गाँधी समेत अन्य नेताओं को बन्दी बना लिया गया तब प्रतिरोध की मशाल को राममनोहर लोहिया और उनके समानधर्मा साथियों ने प्रज्ज्वलित रखा। गाँधी के इस मानस पुत्र के विषय में गणेश मन्त्री का कथन है, ‘‘लोहिया गाँधी नहीं थे। वे किसी की अनुकृति हो भी नहीं सकते थे। गाँधी संत योद्धा थे। एक ऐसा संत जिसे युग की परिस्थितियों ने योद्धा बना दिया था। अथवा, फिर ऐसा योद्धा जो संघर्षों में तपते-तपते संत बन गया। किंतु लोहिया बिना कुटी के हो कर भी संत नहीं थे। वे माक्र्स भी नहीं थे। माक्र्स ऋषि या द्रष्टा थे। 19वीं सदी के यूरोपीय वर्तमान की दहलीज पर खड़े, अतीत के व्याख्याकार और भविष्य के प्रवक्ता थे …

उहौ काऽ दिन रहल!

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पंकज तिवारी

उहौ काऽ दिन रहल गुरु!
लकड़ी के पटरी
दुद्धी से लिखाई
ऊ टूटहा ब्लेड
नरकट कऽ कलम
बसवारी के करकट में
बैटरी कऽ खोजाई
सायफन पर बइठके
दुद्धी घोराई
चवन्नी कऽ चूस, अठन्नी कऽ पाचक
लइकन में मेठ बनके
बगइचा में घुमाई
टिकेरा कऽ चोरी
लइकन से लड़ाई
ऊ चोरवा कऽ आती-पाती
हुर्री कऽ खेलाई
पंडी जी कऽ सिटकुन
छुट्टी कऽ जोहाई
सांझी कऽ नंगई
माई से पिटाई
दादी कऽ दुलार
रामनाथ कऽ ठोर
दद्दा के कान्हे पर
बजारी में टहराई

कहाँ गईल ऊ दिन
हो ऽ ता ऽ जोहाई
बस करा गुरु
आँख भर आईल।

(प्रसन्नचित्त शैली के बेहद संवेदनशील कवि हैं पंकज तिवारी। उनके अंदर की बोल कभी-कभार ही फूटती है। कहनशैली में आत्मीय आकुलता है, संवेदनशीलता की मर्मस्पर्शी प्रवाह है। विशेष आग्रह पर उन्होंने अपनी दो कविताएँ ‘इस बार’ को उपलब्ध करायी हैं। आज प्रस्तुत है पहली कविता।)

आओ बच्चों तुम्हें दिखाए....झांकी हिंदुस्तान की

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जानता हंू कि शब्दों से जिंदगी का भरण-पोषण नहीं हो सकता। पर बच्चों, शब्द की रोशनी अंधकार में डूबने नहीं देती। ज्ञान से मन-मस्तिष्क पर नियंत्रण होता है। शब्द उसी ज्ञान की कुंजी है। पहले के ऋषि-महर्षि ज्ञान पाने के लिए कठोर तपस्या करते थे। कष्ट और तकलीफ सहते थे। लेकिन अब का जमाना वो नहीं रहा। अब तो शिक्षार्जन एक पेशा है। पहले शिक्षकों का दर्जा भगवान तुल्य था। समाज के लिए आदरणीय था यह पद। अब सभी को पैसे ने एक ही खूंटे से टांग दिया है। जो जितना अमीर यानी धनवान है, उसे उतनी ही बढ़िया और मुफीद शिक्षा मिलेगी। सरकारी स्कूल में तुम क्यों नहीं पढ़ रहे? कभी सोचा है तुमने? सोचना चाहिए। क्योंकि सरकारी स्कूल महज तमाशा बनकर रह गया है। वहां सबकुछ मिल जाता है सिवाय ज्ञान के। वहां ककहरा और ‘एबीसी’ सीखने में पांच साल लगते हैं। पर सही उच्चारण का सहूर नहीं सीख पाता बच्चा। जो शिक्षक या शिक्षिका हैं, उन्हें भी ऐसे स्कूलों में पढ़ाने में जी नहीं लगता है। वो कक्षा लेने से आनाकानी करते हैं। ज्यादातर समय गप और इधर-उधर की बातें करने में बीत जाता है।
कहने का तात्पर्य है कि हमारे शिक्षा प्रणाली में काफी लोचा है। लोग ब…

सर पर 'सवार' पेट के सपने

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एक दिन खूब मजा आया था, तुम्हारे साथ जंगल जाकर।

लेकिन लकड़िया तूने ही काटी थी सारी।

मैंने तो बस अपने हिस्से का बैर चुना था।

रास्ते में एकबार भी नहीं
करने दिया था अदला-बदली।

अपने माथे की बोझ को, लकड़ियों के गट्ठर को।

लेकिन सबसे पहले पकी रोटियाँ मैंने ही खायी थी।

तुम्हारे हिस्से का हँसी, तुम्हारे हिस्से की धूप।

आजतक सबकुछ मैंने ही सेवन किया है।

कभी तुम दूध की छाली नहीं खायी, दूध नहीं पी।

ये अलग बात की मैं घी नहीं खाता।

पर मेरे हिस्से की घी भी तुम्हें कभी नहीं मिली।

फिर भी तुम्हें कभी रोते नहीं देखा, बिलखते या गिड़गिड़ाते भी कभी नहीं।

देखा है तो बस, तुम्हारे सर पर सवार पेट के सपने।

हमारे भूख के सपने।

1...3......6.........9 में तब्दील 5 मार्च

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अगले माह की 5वीं तारीख़ करीब है।
तुम कह रही हो, किसके?
मैं निरुत्तर।
जवाब की टोह में गहरे उतरना होगा।
तुम कह रही हो, कहाँ?
मैं निरुत्तर।
सालों के बढ़ते अंतराल ने आपसी समझ और साझेदारी को पुख्ता किया है।
तुम कह रही हो, कैसे?
आजकल इंतजार को दिन से माह, और माह से वर्ष में बदलना सीख गया हँू।
तुम कह रही हो, कब?
मुझे समझ नहीं आता कि तुम्हारा मेरे हर पूर्णविराम के बाद सवाल पूछना जरूरी है।
फिर तुम पूछ रही हो, क्यों?

मेरे अंदर का चालाक मर्द सोच रहा है-‘‘कह दूं क्या, हैप्पी इनवर्सिरी डे’।

सौरी पीएम, आपसे बेपनाह उम्मीदें हैं

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उम्मीदें हैं इसलिए कि स्कूल में आपके बारे में पढ़ा था 9वीं कक्षा में। उसी समय जाना था कि भारतीय प्रधानमंत्री देश का वास्तविक मुखिया होता है। मंत्रीमण्डल को वही रचता-बुनता है। योग्य और अयोग्य की कसौटी तय करता है। अधिकारों में कटौती और उससे छिन लेने वाला नियोक्ता-प्रयोक्त भी वही होता है। अम्बेडकर जी वाली मोटी किताब जिसे संविधान कहते हैं; और अधिकांश शिक्षक जिसे ‘होलीबुक ऑफ सोसायटी एण्ड इंडियन नेशन’ कहते थे, उसमें भी आपके नाम की स्तुति-संस्तुति है। उसमें जो अंकीय मात्रा लगी थी, वह थी-अनुच्छेद 74(1)। उसे पढ़कर मैंने 9वीं में प्रश्नपत्र हल किया था जो आज भी कंठस्थ है। सचमुच पीएम, आपको पढ़-पढ़कर बड़ा हुआ हँू....इसी कारण आपसे बेपनाह उम्मीदें हैं। औरों को भी होंगी...और न भी होंगी...तो मैं अपनी उम्मीदें क्यों छोड़ूं....है न! पीएम।