Posts

Showing posts from October, 2015

चुनाव में सब जीतेंगे, हारेगा सिर्फ बिहार

रजीबा की राय ------------------------
इन दिनों बिहार की जनता धर्मसंकट में है। इस बार चुनावी दंगल ‘कथित विकास’ और ‘प्रायोजित विकास’ के बीच है। यह संकट इसलिए भी गहराता जा रहा है, क्योंकि जंगलराज के ‘मास्टरमाइंड’ इन दिनों नए गठजोड़-गठबंधन के साथ बिहार की जनता के आगे ‘वोट’ के लिए हथेली पसारे खड़े हैं। केन्द्र की भकुआहट भी बढ़ी हुई है। येन-केन-प्रकारेण विजयी लहर देखने-दुहराने की लालसा केन्द्र सरकार में जबर्दस्त दिखाई दे रही है। लिहाजा, वह सबकुछ कर रही है या करना चाह रही है जिससे बिहार में भाजपा की वापसी सुनिश्चित हो सके। छोटे मोदी यानी सुशील कुमार मोदी स्वयं इस ताक में हैं। उनका स्वप्न नाजायज़ भी नहीं है। भारत पिछले वर्ष ‘घर-घर मोदी’ के नारे पर ‘विजयी शंखनाद’ या ‘विजयी हुंकार’ कर चुका है। वैसे असली बिहार के रहवासियों से ‘मेक इन इंडिया’ और ‘डिजिटल इंडिया’ के किरदारों का पासंग/घलुआ भर भी रिश्ता-नाता नहीं है। लेकिन आज की ‘आभासी दुनिया’ में स्वस्थ एवं जीवंत रिश्ते-नातों को तव्वज़ों भी कौन देता है? चूँकि मोदी सरकार अपनी छवि-प्रोत्साहन को लेकर बेहद आतुर एवं आक्रामक रवैया अपनाती है; इसलिए बिहार क…

मेहरारू के नाम ख़त

रजीबा की पाती .................................... प्रियमोहतरमा,
कलदशहराथा, लेकिनआपसाथमेंनहींथी।कितनाअकेलाहोगयाहूँ...मैं;  आपकोदेखेचारमहीनेहोगएऔरयहपाँचवाबीतजानेकोहै।मैंयहभीजानताहूँ...आपकहेंगी, यहआपहीकाकिया-धराहै।हाँ, मैंनेआजतकजोकुछकिया-धराहै...अपनीघमंडऔरगुमानकेबिनाहपरही।आपशुरूसे ‘माइनस’ मेंरही, घाटेमें।तवज्ज़ोछोड़िए, साधारणध्यानभी

इसी शिक्षा-व्यवस्था में मोक्ष

---------------  रजीबा की क्लास
चिढ़, ऊब, निराशा, तनाव, कुंठा, असंतोष, आक्रोश इस व्यवस्था की देन है। यह उपज आजकल चक्रवृद्धि ब्याज पर है। शिक्षा-व्यवस्था के पालने में इसे और भली-भाँति पाला-पोसा जा रहा है। अकादमिक स्तर पर शैक्षणिक गुणवत्ता, दक्षता, कौशल, मूल्य-निर्माण, नैतिकता, चरित्र-गठन आदि बीते ज़माने की बात हो गई हैं। आप प्रश्न नहीं पूछने के लिए अभिशप्त हैं। सवाल खड़े करने पर चालू व्यवस्था पर गाज गिरती है वह असहज होने लगती है। वह सहज है जब चारों तरफ मौन पसरा है, सर्वत्र शांति है। पाठ और पाठ्यक्रम की भयावह परिस्थितियों को निर्मित कर विद्यार्थियों की चेतना को निष्प्राण बनाया जा रहा है तो उनकी क्रियाशीलता को बाधित किया जा रहा है। अकादमिकजनों की पुरातनपंथी पुरखों ने हमेशा दूसरों के किए को आदर्श माना। वह स्वयं करने से बचते रहे। वह हर सुविधाओं की मौज में शामिल होने को लालायित और व्यग्र दिखाई पड़ते हैं; किन्तु अपनी मौलिकता अथवा व्यक्तिगत प्रतिभा को उन्होंने तिलाजंलि दे रखा है। ऐसे में आज का यक्ष मौनधर्मा नहीं तमाशबीन और किंकर्तव्यविमूढ़ है।
ऐसी शिक्षा-व्यवस्था में जो नए लोग जु़ड़ रहे हैं य…

माक्र्सवाद की कार्बन काॅपी और भारतीय जनसमाज

रजीबा की क्लास -------------------------
अक्सर यह देखने में आता है कि आप गरीबी के बारे में बात कर रहे हैं, आमजन के रोजमर्रा के अभाव, संकट अथवा चुनौतियों पर विचार कर रहे हैं या फिर भारतीय जनसमाज की स्वतन्त्रता, समानता, न्याय आदि के बारे में बहस-मुबाहिसे कर रहे हैं, तो लोग कहेंगे कि आप ‘काॅमरेड’ हैं, ‘लाल-सलामी’ हैं, माक्र्सवादी हैं या और कुछ न हुआ तो माओवादी या नक्सली हैं। हे भगवान! माक्र्सवाद कोई बुनियादी एवं मौलिक सैद्धान्तिकी या वैचारिकी न होकर बल्कि  चिनिया-बादाम जैसे हो गया कि निखोरा-तोड़ा और मूँगफली की तरह गटक लिया।
छिपा अब किससे है कि राजनीति भारतीय समाज को लील रही है। और हम(खाए-पिए-अघाए लोग) लोकतंत्र का कंठीमाला फेर रहे हैं....जन-गण-मन गा रहे हैं....वन्दे-मातरम्...सुजलाम-सुफलाम चिल्ला रहे हैं(मेक इन इंडिया वाले इस घड़ी अवसादग्रस्त हैं, सो उनकी बात छोड़ दीजिए...)। भारतीय समाज भजनार्चन में तल्लीन है। आजकल यह भजनार्चन सभी को बेहद सुहा रहा है। लिहाजा, सर्वत्र शान्ति है। सुकून-चैन बिंदास-बेलौस है। ऐसे में माक्र्सवाद, समाजवाद की बात महत्त्वपूर्ण हो जाती है। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा …