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Showing posts from March, 2015

नौजवान अखिलेश तूझे हुआ क्या है....?

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राजीव रंजन प्रसाद (इस पंक्तिलेखक की इस बार जो पोस्ट दी जा रही है; हो सकता है अब आगे वेबजगत पर न मिले...। यह निर्णय आमजन से ज़मीनी संवाद और व्यावहारिक सम्पर्क स्थापित करने के लिहाज़ से लिया गया है। यह इसलिए भी कि जिस जनता के लिए हम शब्द, लिपि, भाषा, विचार, तथ्य एवं आंकड़े आदि के नज़रिए से एक वैकल्पिक ‘स्पेस’ गढ़ने की कोशिश में जिस तरह जुटे हैं; यह देखना जरूरी है कि यह सही तरह ध्वनित भी हो रहा है या नहीं। विभिन्न उतार-चढ़ावों के बीच ‘इस बार’ ने कई वर्षों तक लगातार अपनी वेब-उपस्थिति बरकरार रखी। यह भी कि कई बार बिल्कुल बचकाने तरीके से पेश आया। कभी-कभी अतिभावुकतापूर्ण पोस्ट डाल इस पंक्तिलेखक ने यह भी जताया दिया कि इस बच्चे का दिल कमजोर है और उसमें सियासी दुष्चक्रों-राजनीतिक षड़यंत्रों से सामना कर सकने की हिम्मत अथवा आत्मविश्वास नहीं है। लेकिन इन्हीं सब चीजों ने अंततः इस पंक्तिलेखक को ‘मैच्योर’ भी किया है। वह जान गया है कि अधिक या कम बोलने से ज्यादा जरूरी होता है, उचित समय पर उपयुक्त ढंग से बोलना। अतः यह चुप्पी हमारी कायरता नहीं है...यह प्रस्थान है उस दिशा में जहा…

आभिजात्य-पूंजीवादी ली कुआन यू ने सिंगापुर को बनाया अमीर, इसी नक्शेकदम पर नरेन्द्र मोदी

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-------------------------------------------------  कुछ आप भी विचारिए। आखिर सम्पादकीय पुष्ठ पर यह समाचार इतने महत्त्व के साथ प्रकाशित क्यों हुआ है? किसी समाचारपत्र का सम्पादक पत्रकारीय दायित्व से बंधा होता है। वह कुछ भी नहीं लिख सकता है। यदि वह सच को नकारते हुए ग़लत के पक्ष में सकारात्मक चीजों को ‘प्लांट’ करता है, तो यह हमारे बहस, संवाद और विमर्श का हिस्सा होना चाहिए। और यदि नहीं, तो यह बेहूदगी की हद है जो हम खुद को पत्रकार कहने का गुमान पालते हैं, नैतिकता की दुहाई देते हैं। शब्दों के हेरफेर द्वारा शास्त्रों ने सर्वाधिक नरंसंहार और अत्याचार किया है। अब इस ‘डिस्कोर्स’ को बदले जाने की जरूरत है।  ------------------------
कथन: मेरा मानना है कि दैनिक समाचारपत्र ‘हिन्दुस्तान’ में प्रकाशित आज का सम्पादकीय ‘पेड एडोटोरियल’ का नमूना है। 
सम्पादकीय सारांश : ली कुआन यू आधुनिक सिंगापुर के संस्थापक हैं। उन्होंने इस देश का कायाकल्प किया। वे तीसरी दुनिया के देशों की तरह स्वतन्त्रता सेनानी नहीं रहे थे, तीसरी दुनिया के नेताओं की तरह वे थोड़े या ज्यादा वामपंथी नहीं थे। वे पूंजीवाद के समर्थक थे। वह सिंगापुर क…

हिमालिया

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कल 24 मार्च, 2015 है। हिमालिया पूरे 14 वर्ष की हो जाएगी। उसकी शादी पिता ने ठीक कर दी है। उसकी मां बताती है कि वह तो अपनी बेटी की शादी खुद से दुगने उम्र में कर रही है। हिमालिया अबूझ-निरक्षर नहीं है।वह सोचती है, पहले शादी-विवाह समझ में नहीं आता है, कैसे इतने छुटपन में हो जाता था।

हिमालिया जिस मिस से पढ़ती है। वह उससे भी दुगनी उम्र की होगी। फोन में गाना बजते ही उस पर हाथ रख देती है और अंग्रेजी पिटपिटाने लगती है। वह शादी की बात नहीं करतेी; लेकिन बात करते हुए खूब खुश दिखती है। वह एक दिन पूछ ली थी-‘मिस आप अपने मेहर से बात करती हो?; हिमालिया को उसकी मिस डपट दी।
‘अरे! यह भी कोई शादी रचाने की उम्र है। इट्स टाइम टू फुल इंज्वायमेंट!’

हिमालिया आज खूब चहकते हुए घर लौटी थी। मां को कहा था-‘‘मां यह भी कोई शादी करने की उम्र है...’’

मां ने हिमालिया को एक तमाचा खींच दिया था। वह मुंह फुलाए दिन भर बैठी रही। सोचा, शाम को पिता से शिकायत करेगी। उसे बहुत बुरा लग रहा था। सब लड़की एक जैसा कपड़ा-लता क्यों नहीं पहनती है? सब लोगन को एक जैसा शिक्षा क्यों नहीं दी जाती? हम शादी कर लें और हमारी मिस ह…

राजनीति, मीडिया और न्याय

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...........  अमीरों का, अमीरों द्वारा, अमीरों के लिए, अमीरों जैसा ....................  देशभक्ति सीखने के लिए चारित्रिक अनुशासन, आत्मिक उदात्तता और मनस्वी चेतना आवश्यक है; वाचालों को देशभक्ति सीखना नहीं होता, उन्हें तो बस जनमानस को नजरअंदाज करना और अपने गोलबंदियों के बीच मजमाई कहकहा लगाना आना चाहिए! ---------------------- राजीव रंजन प्रसाद 

भारत में राजनीतिज्ञ अमीर ही होते हैं, गरीब एकाध होते हैं। भूले-भटके; अपनी मन के सुनने वाले और अपनी बनाई दुनिया में रमने वाले। यहां बात उन बहुसंख्यंक अमीरों की हो रही है जो जनता की जरूरीयात की सौदेबाजी कर जनादेश बटोरते है और हरसंभवा सत्ता पर काबिज हो जाने में सफल  होते है। यह दुनियावी एवं अनुभवसाध्य सचाई है कि अमीर बेईमान, भ्रष्ट और दुष्चरित्र होते हैं। यह दोष उनमें पैदाइशी व्याप्त होती है। दुनिया भर में कुछ प्रजातियां, नस्ल, वंश अथवा जाति-विशेष के नुमाइंदे इस पैमाने का मनसबदार हैं। उनकी हेठी या ढिठई उनकी वाचालता और बोल-बर्ताव के नंगईपन से जगजाहिर है। उनका रात-दिन पर अधिकार-सा होता है; क्योंकि वे रात रंगीन और दिन की उजलाई में सफेद/काला या काला/सफेद कु…
प्रिय जन,

दुखी होना मनुष्य का सहज-स्वाभाविक गुण है। लेकिन, बाबला के जाने से अकथित व्यथा की प्राप्ति हुई है। नाम से नारायण देसाई जो बापू की गोद में पला-बढ़ा और अंत तक जो शाश्वत-मूल्यों का संवाहक बना रहा; जो भारत की ही नहीं विश्व की तरुणाइयों के बीच सत्य-अहिंसा की अलख जगाता रहा; इस संसार से विदा हो लिया। उसका जाना हतप्रभ करता है; तो नहीं! लेकिन उसके न रहने से जो पीड़ा जन्मी है; वह असह्य है। युक्लिड ने कहा था कि रेखा वही है सकती है जिसमें चैड़ाई-मुटाई न हो। मेरे देखते ऐसी लाइन या लकीर न तो आज कोई बना पाया, न बना पाएगा। लेकिन, नारायण ऐसी ही परिकल्फना रख जिया और अंतिम सांस ली। मैं अपना कहा फिर दुहराता हूं कि आजतक हम आखिरी दरजे की बहादुरी नहीं दिखा सकें, मगर उसे दिखाने का एक ही रास्ता है, और वह यह कि जो लोग उसे मानते हैं वे उसे दिखायें। मेरा अपना मानना है कि जिस तरह आजादी के दिनों में स्वतंत्रता-सेनानियों ने जेलों का डर छोड़ दिया था, इस घोर प्रकम्पित भौतिकवादी युग में उसी तरह नारायण ने मृत्यु का डर छोड़ दिया था। पह गांधी-कथा का राग-गान गाता रहा; कहता-सुनाता रहा। देश की चेतना में उसकी भूमिका क्या…

It's exam time

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Please write in only English!

प्रिय देव-दीप,

आइए, इस बार समन्दर को अपने घर आमंत्रित करें; उसके साथ ‘कूल-चिल’ पार्टी-सार्टी करें। ऐश-मौज, धूम-धड़ाका। गंजी-बनियान पर सोए। क्योंकि यह आराम का मामला है और इसी रास्ते हमें सदा के लिए सो जाने के लिए तैयार रहना है, तो गुनगुनाइए...मचिंग ड्राइव!!’ --------------
कैसे हो? आज भारत और जिम्बाॅम्बे के बीच क्रिकेट मैच है। चारों तरफ सुन-सन्नाटा है। सारा हो-हो या तो टीवी में क्रिेकेट स्टेडियम में हो रहा है या तो टीवी देखते उन चिपकू लोगों के बीच; जो अपने माता-पिता को रोज दी जाने वाली दवाइंयों के नाम, खुराक और समय भले न जानते हों; लेकिन वे हरेक खिलाड़ी का पूरा रिपोर्ट कार्ड जानते हैं और आपसी बातचीत के दौरान बघारते भी हैं। 
बाबू, किसी चीज के बारे में जानना या जानकारी रखना ग़लत नहीं है। जानकारी चाहे जिस भी विषय के बारे में हो उसके तथ्य, आंकड़े और उससे सम्बन्धित सूचनाएं बेहद महत्त्वपूर्ण होती हैं। मुझे तो हाईस्कूल में पढ़ा पाइथोगोरस प्रमेय भी याद है और हीरो का सूत्र भी। मुझे तो रसायन में पढ़ा इलेक्ट्राॅनों की निर्जन जोड़ी; मेंडलिफ की आवर्त सारणी, सिंदर का सूत्र और पारा का परमाणु भार और परमाणु संख्या भी …

जनसत्ता के पेटेंट लेखक अपूर्वानंद के लिखे पर पाठकीय प्रतिक्रिया

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------------------------------- Rajeev RanjanMon, Mar 9, 2015 at 1:25 PMTo: Apporva Anand Reply | Reply to all | Forward | Print | Delete | Show original -------------------------
परमआदरणीय अपूर्वानंद जी, सादर-प्रणाम!
आपका जनसत्ता में लिखा ‘अप्रासंगिक’ स्तंभ पढ़कर बेचैनी हुई। ‘प्रश्न परम्परा’(8 मार्च) शीर्षक से लिखे अपने इस स्तंभ के बहाने आपने माकुल और वज़नी सवाल उठाया है। पहली बात आप जैसे सार्वजनिक बुद्धिजीवियों के लिए रोमिला थापर के सवाल का मथना ही यह सिद्ध कर देता है कि आप अकादमिक फूहड़पन और बेहयाई से परे हटकर अपनी चिंता जाहिर कर रहे हैं। इसके लिए आप अतिरिक्त प्रशंसा का पात्र हैं; यह बात बेमानी है। दरअसल, समय, समाज और सवाल के सन्दर्भ में हमारा चिंतातुर होना लाज़िमी है; क्योंकि स्थितियां दिन-ब-दिन विकट और विकराल होती जा रही हैं। कथित बौद्धिकजनों का कुनबा बौराया हुआ है और जिन बहसों में वे तल्लीन-संलग्न हैं; उससे आम-आदमी का भला होना संभव नहीं; कुरीतियों का नाश होना संभव नहीं; मौजूदा शिक्षा-व्यवस्था(टेरी ईगल्टन जिस ओर संकेत कर रहे हैं और आप जिन्हें नोटिस ले रहे हैं) में जरूरी बदलाव मुमकिन …

कुछ लोग थे पेशे में जिन्हें देख पत्रकार होना चाहा मैं....!

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पत्रकार विनोद मेहता का निधन -------------- तुम्हारे जाने के बाद भी हम लड़ेगे, साथी। दीया और तुफ़ान की जंग यह जारी रखेंगे, साथी...!!!   ----------------------------

अनुवाद भरोसे प्रधानमंत्री का सम्बोधन...हिंदी में मौलिक प्रस्तुति देने वाले कहां बिला गए?

------------------------------- हिंदी-दुर्दशा का हाल-ए-हक़ीकत
मूल भाषण-स्रोत -------------------------------- सभी महानुभाव! मैं सबसे पहले तो आपकी क्षमा याचना करता हूं, क्‍योंकि पहले यह कार्यक्रम आज सुबह तय हुआ था। लेकिन मुझे आज कश्‍मीर जाना पड़ा और उसके कारण मैंने Request की थी कि अगर समय बदला जाए तो ठीक होगा। आपने समय बदला और मुझे आप सबको मिलने का अवसर दिया, इसलिए मैं NASSCOM का बहुत आभारी हूं। शायद ही कोई संगठन इतना जल्‍दी एक Movement बन जाए, आमतौर पर Membership होती है, सब Meetings होती है, सरकार को Memorandum दिये जाते हैं, सरकार से अपेक्षाएं की जाती है, कभी राजी-नराजी प्रकट की जाती है, लेकिन NASSCOM का Character वो नहीं रहा। यह संस्‍था से ज्‍यादा एक बड़ा आंदोलन बन गया और प्रारंभ में जिसने कुछ मोतियों को NASSCOM के धागे के साथ जोड़ दिया। आज धीरे-धीरे भारत का गौरवगान करने वाली एक बहुत बड़ी सुंदर माला बन गया है । जब NASSCOM की चर्चा आएगी तो Dewang की जरूर चर्चा आएगी। मेरा Dewang से अच्‍छा परिचय था और जब Y2k को लेकर के बड़ा तूफान खड़ा हो गया था, सारी दुनिया चिंतित थी और उस समय अटल जी …

माननीय प्रधानमंत्री जी, जनता की भाषा में प्रचार-सामग्री और संदेश बनवाएं, तो सबका भला...सबका अच्छा!

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-------------------- भारतीय जनता निगोड़ी/मुर्ख/बेवकुफ/अपढ़ नहीं है, उसे अपनी भाषा से बेइंतहा लगाव है! ---------------------------------------- स्वदेशी ‘शाखा’ वाली भारतीय जनता पार्टी ने अब अपने कार्यकर्ताओं को कहना शुरू किया है: ‘Dear Member,’। यह क्या बात हुई? क्या भाषा के मामले में भारतीय जनता पार्टी की अपनी मौलिक सोच, भाषा और दृष्टि फिसड्डी है? यदि हां, तो ‘घर-घर मोदी’ का क्या होगा?
क्या यह आपके सोच और चिंता का विषय नहीं है? जनता-जनार्दन की भाषा में बोल-बतिया कर जनादेश हासिल करने वाली सरकार इतनी जल्दी अपनी वैचारिक सूरत से पलटी मार ली है। क्या इससे कोई फर्क नहीं पड़ता? अरे महराज! आपका बिटिया-बिटवा इंटरनेट पर चैटिंग-सैटिंग करता है, तो आपको फर्क नहीं पड़ता; नंगी तस्वीरों का दिग्दर्शन करता है, तो फर्क नहीं पड़ता; सिगरेट और व्हीस्की पीता है, तो फर्क नहीं पड़ता; आये दिन सड़कों पर गाली-गलौच करता है, तो फर्क नहीं पड़ता; आपको झांसा देता हुए लड़के या लड़कियों के संग-साथ ‘टूर’ मचाता है, तो फर्क नहीं पड़ता; वह अपनी बेरोजगारी में रात-दिन घुलता है, तो आपको फर्क नहीं पड़ता? आपका पसंदीदा चैनल टेलीव…

‘हाथ’ को सिर मानने की भूल न करें राहुल

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'लैसेज फेयर'(Laissez Faire) शब्द राहुल गांधी के लिए उपयुक्त है। यह फ्रेंच भाषा का वाक्यांश है जिसका अर्थ होता है-‘जैसा चाहे, वैसा करने दो।’ इस समय राहुल गांधी के थाइलैंड में होने और ‘विपश्यना’ करने की ख़बर गुब्बार पर है। विपश्यना यानी अपने भीतर झांकना और अपने को वास्तविक अर्थों में खोजना। यह खोज आत्मावलोकन के पश्चात आत्म-परिष्कार के लिए होता है। यह एक आध्यात्मिक उपकरण है जिससे व्यक्ति एंकांत में स्वयं से बात करता है; अपने होने पर विचार करता है; फिर यह सोचता भी है कि वह जो काम कर रहा है उसके प्रति उसकी निष्ठा, ईमानदारी और प्रतिबद्धता कैसी है? युवा राजनीतिज्ञों के मनोभाषिक आचरण एवं मनोव्यवहार पर संचारगत दृष्टि से  शोध कर रहे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के शोधार्थी  राजीव रंजन प्रसाद   की  एक X-Ray रिपोर्ट  -------------
गिरो, फिर उठो न,
यह पराजय है!

झुको, फिर खड़े न हो
यह सचमुच पराजय है!

इन दिनों कांग्रेस चुनावी हार के बाद आत्ममंथन की स्थिति में है। वह अपने उघड़े हाथों का सीअन जोड़ रही है। उसकी व्यग्रातुर चिंता इस बात को लेकर है कि अगला …