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नदी

भाषा, संस्कृति औ समयचक्र पर किताब लिखना मुश्किल नहीं है, मुश्किल है जितना स्वयं को समझना। और राजीव रंजन प्रसाद यह ढोंग-प्रपंच करें इससे अच्छा है उसे गोली मार दी जाए।
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उस दिन हम-तुम एक नदी के किनारे बैठ गए। घंटो बाद हमने एक-दूसरे को देखा। मुसकाए। फिर खामोश हो गए। नदी बहती रही। शांत, बिल्कुल स्थिर-चित्त। ऐसा क्यों होता है प्रायः। फुरसत के क्षणों में हमारे भीतर आवाज़ ही नहीं होती। हम दोनों इस मामले में बददिमाग हैं। इस तरह कहीं होता है, हम साथ हों; पर बात न हो। वह भी घंटों चुपचाप वक़्त गुजर जाने दें। लम्हा-दर-लम्हा। यह कौन-सा सुकून और इंतमिनान है जो मौन को सिराहने रख जि़न्दा होता है।
मैं नहीं बोलता, ठीक; तुम क्यों नहीं बोलती। कोई भी या कैसी भी बात क्यों नहीं शुरू करना चाहती तुम। और कुछ नहीं, तो नदी के बहाने कुछ कहना चाहो। आस-पास बजते सुमधुर संगीत के सहारे कुछ कहना चाहो। और कुछ नहीं तो पूछ लो सही, ‘क्या सोच रहे हो....,’
यार! इस मुल्क में राजनीति के आगे भी जि़ंदगी है, बहारें हैं, तो और ऐसी ढेरों बात जो अख़बार के ख़बर की तरह झूठी, गलाबाज और भ्रामक नहीं है। टेलीविजन की तरह नकली…

ओसिगा: गल्प में नवग्रह

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ओसिगा एक ग्रह का नाम है। इस ग्रह पर बसी आबादी बहुत अधिक तो नहीं; लेकिन तकरीबन साढ़े पाँच लाख है। लोग धरतीनुमा नगर-महानगर या गाँव-कस्बे की जगह गुफाओं में करीने से रहते हैं। उनकी सज-धज से आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता लजा जाए। ओसिगा की भाषा और लिपि सांकेतिक और चित्रात्मक है। ध्वनियों का बहुत कम इस्तेमाल होता है। मूक भाषा-प्रयोग के पीछे मुख्य वजह आॅक्सीजन की मात्रा का वायुमंडल में कम होना है।
यहाँ की साम्राज्ञी आनियो आना हैं। उनकी देा बेटियाँ हैं। बड़ी का नाम आना ओरि है, तो छोटी का नाम आनो आया। दोनों साम्राज्ञी की बेटी होने का तनिक गुरूर नहीं रखती हैं। वह सबसे सामान्य व्यवहार करती हैं और लोग भी उसी तरह उनसे लाड़पूर्वक बातचीत करते हैं। वह अन्य बच्चों से जरा भी विशेष नहीं दिखाई देती हैं। यह खासियत वहाँ के राजशाही के चरित्र को दर्शाता है जिसमें वह कायदे से रचे-बुने गए हैं।
ओसिगा में जनतंत्र है और लोग सामूहिकता को वरीयता देते हैं। खून-खराबा का नामो-निशान नहीं है तथा प्रकृति ही एकमात्र देवता है। खान-पान में हरी पतियों का प्रयोग सर्वाधिक होता है जिन्हें वे उबाल कर खाते हैं। वह वि…

मेरी गौरेया

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पढ़ती है गौरेया
कहाँ अक्षर.....?
लिखती है गौरेया
कहाँ लिपि.....?
भाषा और माध्यम की भेद भी
कहाँ जानती है गौरेया?
मेरी गौरेया
नहीं माँगती है दाना-पानी के सिवा कुछ भी ‘एक्स्ट्रा’
अपने लिए, खुद के लिए
पिछले 12 सालों से मेरी गौरेया
मेरे साथ है
और मैं अपनी गौरेया से बेफिक्र
सुबह से शाम तक
आरम्भ से अनन्त तक
लस्त-पस्त हूँ
अक्षर, लिपि और भाषा में
आज गौरेया ने पिराते मन से कहा है-
यह बियाबान जंगल
जिससे तुम आदमी होने की तमीज सीखते हो
जार दो, फेंक दो, बहा दो पानी में
और उड़ चलो आकाश में
उस असली राह पर
जहाँ रोशनाई रहती है
अनन्त...अनन्त....अनन्त बनी हुई!!
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-राजीव रंजन प्रसाद

चुनाव में सब जीतेंगे, हारेगा सिर्फ बिहार

रजीबा की राय ------------------------
इन दिनों बिहार की जनता धर्मसंकट में है। इस बार चुनावी दंगल ‘कथित विकास’ और ‘प्रायोजित विकास’ के बीच है। यह संकट इसलिए भी गहराता जा रहा है, क्योंकि जंगलराज के ‘मास्टरमाइंड’ इन दिनों नए गठजोड़-गठबंधन के साथ बिहार की जनता के आगे ‘वोट’ के लिए हथेली पसारे खड़े हैं। केन्द्र की भकुआहट भी बढ़ी हुई है। येन-केन-प्रकारेण विजयी लहर देखने-दुहराने की लालसा केन्द्र सरकार में जबर्दस्त दिखाई दे रही है। लिहाजा, वह सबकुछ कर रही है या करना चाह रही है जिससे बिहार में भाजपा की वापसी सुनिश्चित हो सके। छोटे मोदी यानी सुशील कुमार मोदी स्वयं इस ताक में हैं। उनका स्वप्न नाजायज़ भी नहीं है। भारत पिछले वर्ष ‘घर-घर मोदी’ के नारे पर ‘विजयी शंखनाद’ या ‘विजयी हुंकार’ कर चुका है। वैसे असली बिहार के रहवासियों से ‘मेक इन इंडिया’ और ‘डिजिटल इंडिया’ के किरदारों का पासंग/घलुआ भर भी रिश्ता-नाता नहीं है। लेकिन आज की ‘आभासी दुनिया’ में स्वस्थ एवं जीवंत रिश्ते-नातों को तव्वज़ों भी कौन देता है? चूँकि मोदी सरकार अपनी छवि-प्रोत्साहन को लेकर बेहद आतुर एवं आक्रामक रवैया अपनाती है; इसलिए बिहार क…

मेहरारू के नाम ख़त

रजीबा की पाती .................................... प्रियमोहतरमा,
कलदशहराथा, लेकिनआपसाथमेंनहींथी।कितनाअकेलाहोगयाहूँ...मैं;  आपकोदेखेचारमहीनेहोगएऔरयहपाँचवाबीतजानेकोहै।मैंयहभीजानताहूँ...आपकहेंगी, यहआपहीकाकिया-धराहै।हाँ, मैंनेआजतकजोकुछकिया-धराहै...अपनीघमंडऔरगुमानकेबिनाहपरही।आपशुरूसे ‘माइनस’ मेंरही, घाटेमें।तवज्ज़ोछोड़िए, साधारणध्यानभी

इसी शिक्षा-व्यवस्था में मोक्ष

---------------  रजीबा की क्लास
चिढ़, ऊब, निराशा, तनाव, कुंठा, असंतोष, आक्रोश इस व्यवस्था की देन है। यह उपज आजकल चक्रवृद्धि ब्याज पर है। शिक्षा-व्यवस्था के पालने में इसे और भली-भाँति पाला-पोसा जा रहा है। अकादमिक स्तर पर शैक्षणिक गुणवत्ता, दक्षता, कौशल, मूल्य-निर्माण, नैतिकता, चरित्र-गठन आदि बीते ज़माने की बात हो गई हैं। आप प्रश्न नहीं पूछने के लिए अभिशप्त हैं। सवाल खड़े करने पर चालू व्यवस्था पर गाज गिरती है वह असहज होने लगती है। वह सहज है जब चारों तरफ मौन पसरा है, सर्वत्र शांति है। पाठ और पाठ्यक्रम की भयावह परिस्थितियों को निर्मित कर विद्यार्थियों की चेतना को निष्प्राण बनाया जा रहा है तो उनकी क्रियाशीलता को बाधित किया जा रहा है। अकादमिकजनों की पुरातनपंथी पुरखों ने हमेशा दूसरों के किए को आदर्श माना। वह स्वयं करने से बचते रहे। वह हर सुविधाओं की मौज में शामिल होने को लालायित और व्यग्र दिखाई पड़ते हैं; किन्तु अपनी मौलिकता अथवा व्यक्तिगत प्रतिभा को उन्होंने तिलाजंलि दे रखा है। ऐसे में आज का यक्ष मौनधर्मा नहीं तमाशबीन और किंकर्तव्यविमूढ़ है।
ऐसी शिक्षा-व्यवस्था में जो नए लोग जु़ड़ रहे हैं य…