नदी


भाषा, संस्कृति औ समयचक्र पर किताब लिखना मुश्किल नहीं है, मुश्किल है जितना स्वयं को समझना। और राजीव रंजन प्रसाद यह ढोंग-प्रपंच करें इससे अच्छा है उसे गोली मार दी जाए।

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उस दिन हम-तुम एक नदी के किनारे बैठ गए। घंटो बाद हमने एक-दूसरे को देखा। मुसकाए। फिर खामोश हो गए। नदी बहती रही। शांत, बिल्कुल स्थिर-चित्त। ऐसा क्यों होता है प्रायः। फुरसत के क्षणों में हमारे भीतर आवाज़ ही नहीं होती। हम दोनों इस मामले में बददिमाग हैं। इस तरह कहीं होता है, हम साथ हों; पर बात न हो। वह भी घंटों चुपचाप वक़्त गुजर जाने दें। लम्हा-दर-लम्हा। यह कौन-सा सुकून और इंतमिनान है जो मौन को सिराहने रख जि़न्दा होता है।

मैं नहीं बोलता, ठीक; तुम क्यों नहीं बोलती। कोई भी या कैसी भी बात क्यों नहीं शुरू करना चाहती तुम। और कुछ नहीं, तो नदी के बहाने कुछ कहना चाहो। आस-पास बजते सुमधुर संगीत के सहारे कुछ कहना चाहो। और कुछ नहीं तो पूछ लो सही, ‘क्या सोच रहे हो....,’

यार! इस मुल्क में राजनीति के आगे भी जि़ंदगी है, बहारें हैं, तो और ऐसी ढेरों बात जो अख़बार के ख़बर की तरह झूठी, गलाबाज और भ्रामक नहीं है। टेलीविजन की तरह नकली और सनसनीखेज नहीं है। क्यों हमारा समय दूसरे के कहने पर शुरू होता है और उन्हीं के इशारे पर ख़त्म। वजूद हमारा भी तो है। हम अपनी वज़न का गला क्यों घोंट देना चाहते हैं। क्यों दूसरों का कहा सच मानते हैं और अपना देखा और महसूसा हुआ झूठ।

यह आपसी दूरिया और मन के बीच अंतरालें शायद इसीलिए हैं। हम बंध से गए हैं दूसरों के खूंटों से। उनके नियम-कानून, विधान और संविधान से। हममें से सब अकेले हो गए हैं। सब अपने-अपने बारे में सोचने लगे हैं। प्यार और भाईचारा का माखौल-सा बना दिया गया है। गांधी की टोपी चुटकुलो की भाषा बोल रहे हैं। हम शरीर, कठ-काठी, देह-भुजा आदि से इंसान जरूर हैं; लेकिन भीतर से हैवान, दुष्ट हो गए हैं।  

यह नदी जिसके किनारे हम बैठे हैं। साफ है। कल भी साफ थी और उसके पिछले दिनों भी। यदि महीने और सालों की अंतराल को एक मान लें, तो वह खारेपन से लैस कभी दिखी ही नहीं। शायद नदी इसलिए ऐसी की ऐसी है क्योंकि उसका अध्यापक प्रकृति है। प्रकृति समस्त जीव-जगत का नेता है। उसके नेतृत्व में संगति, संतुलन, समन्वय, सामंजस्य, समायोजन है; किन्तु ध्रुवीकरण, तुष्टीकरण, राजनीतिक चोंचले, प्रपंच आदि नहीं है।

ओह! हम प्रकृति क्या उसका प्रतिरूप तक नहीं हो सकते हैं। हम हवसी, बर्बर, अमानुष, असहिष्णु हो सकते हैं; लेकिन प्रकृति की तरह नेता नहीं। नेता होना अपने को कुल में से ‘माइनस’ करना है जबकि आज नेता का अर्थ अपने को ‘सरप्लस’ करना है। हम संगमरमर के घरों में रहते हुए आदमियत की परिभाषा बनाना चाहते हैं। मानो आदमीपन ‘फ्राइड राइस’ हो जिसे तेल-नमक-मिर्च के अतिरिक्त अनेकानेक चीजों को मिलाकर करीने से परोसा जाना है।

अरे! तुम तो रोने लगी। टपटप...टपटप आंसू। उसका रंग लाल नहीं है। वह खून नहीं है। सिर्फ पानी की बूंदों वाला आंसू है जो तुम्हारे न चाहते हुए भी लरक रहा है। मैंने देखा, पर कहने से चूक गया। रो तो मैं भी रहा था। यह ख्याल तब आया जब तुम्हारे हाथ मेरे आंखों के नीचे के गीले अंश को सहला रहे थे। दोनों को अपने रोने का अहसास नहीं। बस रोए जा रहे थे। 

क्या हमारा रोना निरर्थक है। जैसे मेरा अब तक का लिखना सार्थक नहीं रहा। किसके लिए हम खुद को उपदेशक की भूमिका में रखते हैं। क्यों हम चाहते हैं कि सब प्रकृति की तरह पाक और पवित्र हों; चारों तरफ अमन, चैन, सुख, शांति और समृद्धि हो। लोकरंग, लोक-परंपरा, लोक-अनुभव आदि से भीने-गुंथीं जीवनचर्या हो। क्यों हम दूसरों को कुछ भी होने का छूट देना नहीं चाहते; क्यों हम दूसरों की गलतियों पर इतना सारा बोझ अपने मन पर लिए फिरते हैं। क्यों हम चाहते हैं कि लोग हमें कुछ न दें; लेकिन अपने साथ अपने समान रहने का मौका दें। हम नामकरण से क्यों डरते हैं। क्या शब्दार्थ ही मूल संकट के जड़ में है। नामकरण न हो, तो क्या भेद-अभेद मिट जाएगा। समानता-असमानता के फर्क मिट जाएगा। 

वर्ण, जाति, धर्म नहीं होगा; लेकिन अपने चमड़े का रंग कैसे बदल पाएंगे। नस्लीय भेदभाव से खुद को कैसे बचा पाएंगे। ओह! प्रकृति ने काश नदी की तरह बनाया होताः रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन। तब हम दोनों को आपस में बोलने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती हम आॅक्सीजन और हाइड्रोजन की तरह आपस में संयुक्त एवं सम्पृक्त होते है।

अहा! ऐसा होता, तो कितना अच्छा होता......




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