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आप और हम

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आप फोन काट सकते हैं
तो हम कर सकते हैं प्रतीक्षा
आप के फोन की।

बाल-दिवस पर देव-दीप के नाम पाती

प्रिय देव-दीप,

आपकी निराली दुनिया के लिए आज का दिन ख़ास है। 14 नवम्बर है। कहें, तो आज बाल दिवस है। थोड़ा आपके बारे में फ़रिया कर कहें, तो बड़े वाले बाबू आप 10 वर्ष के हो गए और नन्हका बाबू 8 साल का। दोनों अपनी बढ़ती उम्र के साथ खुश, प्रसन्न एवं स्वस्थ रहें, यही मेरी मनोकामना है।

देव-दीप, यह दुनिया निराली है; क्योंकि इस दुनिया में तुम्हें जन्म देने वालों के सिवा भी बहुत लोग रहते हैं। खुद तुम्हारे माँ-पिता को जन्म देने वाले दादा-दादी भी ज़िदा है जो तुम दोनों की सदैव बेहद चिंता करते हैं। यह चिंता उनके लगाव एवं स्नेह का परिणाम है। उनसे तुमदोनों का या हमारा दूर होना चिंता का मुख्य कारण है। एक-दूसरे से जुड़ी-गुँथी ऐसी चिंताएँ और भावनाएँ एक समाज का निर्माण करती हैं जिसमें हम सब जी रहे हैं। यह सामाजिक दायरा कई तरह के आयामों से घिरा है। जैसे-राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आदि। हम संगीत सुनते हैं क्योंकि संगीत की समझ और उसका ज्ञान रखने वाले लोग हैं। उन्हें पता है कि इंसानी दिलों के लिए आवाज़, ध्वनि, संगीत, शब्द आदि जादू सरीखा हैं। इसी तरह नाच-गाने, पढ़ना-लिखना, बोलना-सुनना आदि हमारे मनोनुकूल व्यव…

आवाज़ आक्रामक, असंयत और नाटकीय होने से बचाएँ मि. प्राइममीनिस्टर!

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राजीव रंजन प्रसाद
राजनीतिक मनोभाषाविश्लेषक

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'यदि कोई मजबूत जिगर का आदमी तैश में बोले। बेतुके तरीके से अपनी बात रखे। एक ही व्यक्ति के पीछे पिल जाए। समझिए, वह बुरी तरह तनावग्रस्त है और उसका मिशन फेल हो गया है।’ -----------------------------------
'आपने विकास किया होगा, तो आप ही जीतेंगे। भारतीय जनता कृतघ्न नहीं है।' ---------------------
‘झूठ की उम्र लम्बी नहीं होती मि. प्राइममीनिस्टर!’ --------------------------------- 
‘जनता चैलेंज पेश करती है। वह पार्टी कार्यकर्ताओं की चियर्स-ग्रुप नहीं है -----------------------------
‘नीति आयोग अपने को प्रूफ करे। योजना आयोग की तुलना में वह अपने काम को ज़मीन पर पुख़्ता आधार देने में किस तरह और कितना सफल रही है, सार्वजनिक परिचर्चा और जनजागरूकता कार्यक्रम द्वारा साबित करे।’ --------------------------------------
‘यह निर्णय लेने का समय है। युवा देश से पहले अपने भविष्य को टटोलें। सुरक्षित राह लें। उसी सरकार को चुनें जो नौकरी के वादे नहीं नौकरी दे रही है।' ------------…

भारतीय पत्रकारिता की ज़मीन : बाते हैं बातों का क्या?

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राजीव रंजन प्रसाद () ------------------------
भारतीय प्रेस में आजादीपूर्व जो भाव-विचार थे आज उनकी यादें शेष हैं-वह भी धुँधली। स्मृतिलोप की फांस में फँसे अधिसंख्य युवाओं के जे़हन में बीते कल का वाट्स-अप मेसेज, फेसबुक स्टेटस या कहें सरकारी हुक़्मरानों के अखिल भारतीय ट्वीट तक की यादें नहीं बची होती हैं; तो पत्रकारिता के इतिहास, युग, परम्परा, विरासत इत्यादि की उन्हें सुध या बोध होगा-यह कैसे संभव है।
पत्रकारिता को रचने-बुनने में नवजागरणकालीन महापुरूषों ने अपनी निजी और पैतृक संपत्ति तक दाँव पर रख दिए। राष्ट्रीय निष्ठा एवं समर्पण में उन्होंने पाबंदी और प्रतिबंध की घोर यातनाएँ सहीं; पर अपने पत्रकारीय जिजीविषा और उद्देश्य से टस से मस नहीं हुए। 
नवजागरण की चेतना और स्वाधीनता की आकांक्षा को सजीव करने में अनगिनत लोग जुटे थे। सिर्फ भारतीय ही नहीं विदेशी महानुभावों ने भी इसमें अपना अकथनीय योग दिया। भारतीय साहित्यकारों ने भारतीय हितरक्षा में जुटे विदेशी नागरिकों का अभिनंदन करते हुए सही कहा है कि, ‘‘पाश्चात्य विद्वानों ने जिनमें अंग्रेज, फ्रांसीसी तथा जर्मन आदि विद्वान सम्मिलित थे; भार…

आज की मदारी-जमुरे राजनीति और हमारा भविष्य

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विस्तार से पढ़ें राजीव रंजन प्रसाद को.....,
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हर नेता हमारे बारे में बोलता है। उसका जैसे काॅपीराइट हो। उसने हमारे बोलने को हथिया लिया है। वह अपने कहे को हमारा बना पेश कर रहा है। आज की राजनीति में यह जो कुछ हो रहा है उसमें मदारी और जमुरे की राजनीति जबर्दस्त है। बस, नहीं है तो हमारा भविष्य!

हिन्दुस्तान, 2014 : 16/5 से पहले और 26/5 के बाद

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राजीव रंजन प्रसाद -------------








(सभी चित्र गूगल से साभार)

बीएचयू को सवर्ण-मंदिर बनाने का हश्र

------- राजीव रंजन प्रसाद ............
मुझ जैसे लड़के के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय सीखने-जानने-समझने ख़ातिर कर्मस्थली रहा। घोर जातिवादी कुलपतियों द्वारा बार-बार हिन्दी विभाग की नियुक्ति-प्रक्रिया निरस्त करने के बावजूद हम अपने इस संस्थान से बेइंतहा प्यार करते हैं। क्योंकि आज हम जो कुछ हैं, जितनी भी अक़्ल के लायक हैं; काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की देन सर्वाधिक है। आज जो लोग अंध-राष्ट्रवाद या खि़लाफ-राष्ट्रवाद का कपोत उड़ा रहे हैं; टेलीविज़न स्क्रीन या विभिन्न माध्यमों पर बीएचयू का पक्ष रख रहे हैं; आलाप-प्रलाप कर रहे हैं, उन्होंने बीएचयू की गरिमा को कब और कितना बढ़ाया है, मुझे तो अपने 10 वर्षों के रहवास में तनिक याद नहीं।
काशीहिन्दूविश्वविद्यालययानीबीएचयू कामाहौलअराजकऔरहिंसकनहींहै।प्रतिरोधऔरविरोध, सहमतिअथवाअसहमतिकेपर्याप्त ‘स्पेस’  यहविश्वविद्यालयमुहैयाकरातारहाहै।घटनाजोहुई, उसकीनिंदाजितनीकीजाएकमहै।लेकिनसंस्थानकोबदनामकरनेकीसाजिशउचितनहींहै। क्योंकि बिना नाथ-पगहा के हम जैसे जिज्ञासु और सीखने के लिए इच्छुक विद्यार्थियों कोआगेबढ़ानेमेंइसविश्वविद्यालयकीभूमिकाअकथनीयहै।तमामअकादमिकखामियोंएवंप्रशासनिकगड़…