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'अरुण प्रभा' : अरुणाचल प्रदेश से उदीयमान हिंदी अध्येता

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राजीव रंजन प्रसाद ----------  अरुणाचल प्रदेश अवस्थित राजीव गाँधी विश्वविद्याालय का हिंदी विभाग अकादमिक स्तर एवं गुणवत्ता को लेकर वचनबद्ध है। विभागीय शोध-पत्रिका के रूप में ‘अरुण प्रभा’ एक बड़ी उपलब्धि है। यद्यपि स्तरीय हिंदी शोध-पत्रिका निकालने को लेकर दृढ़-संकल्पित होना अपनेआप में बड़ी बात है। वैसे ख़राब समय में जब लोग शोध-पत्र का नाम पढ़कर या कि शोधालेख का मात्र शीर्षक पढ़कर संतोष कर लेते हैं; शोध-अध्येताओं को अपनी लेखनी और माँजनी होगी; अपने शोध-कार्य को और भी बेहतर बनाने का अथक प्रयास करना होगा।  ---------------



सदिच्छा और साग्रह

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Rajeev Ranjan<rajeev5march@gmail.com>May 18 to vc प्रतिष्ठा में,
प्रो. गिरीश चन्द्र त्रिपाठी, कुलपति, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय।

महोदय,

आप तमाम कठिनाइयों के बीच इस बार ‘हिन्दी विभाग’ के लिए विज्ञापित सभी शैक्षणिक पदों पर योग्य प्राध्यापकों की नियुक्ति करा लेंगे, ऐसी शुभेच्छा है। मैंने स्वयं भी 2013 ई. में इसी विभाग के प्रयोजनमूलक हिन्दी पत्रकारिता विषय के लिए ओबीसी कोटे से आवेदन किया था जो विज्ञापन किसी कारणवश आपकों ख़ारिज करनी पड़ी। फिर आपने पुनःविज्ञापित की। फिर से रद्द किया। फिर निकाला और इस बार भी कैंसिल करना पड़ा। यह विज्ञापन ऐसा रहस्यमयी तिलिस्म हो गया है या कि अमृत-मंथन जो पूर्णाहुति तक पहुँच ही नहीं पा रहा है। योग्य आवेदक मारे-मारे फिर रहे हैं। मैं भी ठोंकर खाया और पहली प्राथमिकता और लम्बे इंतजार के बावजूद आप अंतिम रूप से नियुक्ति हेतु आवश्यक औपचारिकता नहीं पूरा करा सके। इस बार कोर्ट के आदेश के बाद पुनःविज्ञापन हुए हैं जिससें हमारे जैसे लोगों को काफी उम्मीदें हैं।
लेकिन मैं इस दौड़ में नहीं शामिल हूँ।  और अब किसी भी स्थिति में या भविष्य में कभी किसी भी रूप में मैं अपना नाम का…

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Research Paper in Hindi -----------  24/08/2017 
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देव, आज दीप का जन्मदिन है!

प्रिय देव,
आज दीप का जन्मदिन है। इस एहसास को तुमने नहीं भूलने दिया। पीएच.डी. के भागदौड़ और लिखापढ़ी में तो मैं भूल ही गया कि 25 जुलाई के मैं करीब आ पहुँचा हूँ। तुमने मनुहार कर उसके लिए शाॅपिंग की। बैलुन खरीदे। चाॅकलेट का पैकेट। गिफ्ट देने के लिए ‘इस्ट्रूमेन बाॅक्स’ लिया। मैंने देखा तुम उससे सिर्फ 2 वर्ष बड़े होने के बावजूद कैसे चिंता करते हो उसकी। यह अच्छी बात है। अपने से छोटे के प्रति आदर स्वयं बड़ा होने की गरिमा को बढ़ा देता है। यह सामाजिकता हमने दूसरों को करते हुए जाना है; और यही वह मूल थाती है जिसे बरकरार रखना है। दीपू के लिए दादा का लाड़-प्यार कभी तुम्हारे जैसा नहीं मिला। अब तुम भी दादा-दादी से इतने दूर हो गए हो कि वे बस बेसब्र होकर तुम्हारी बाट जोहते हैं, कभी शिकवा-शिकायत नहीं करते। शिकायत तो तुम्हारी मम्मी भी नहीं करती जिसे मैंने बहुत कष्ट दिया। तुमलोग कब बड़े हो गए, मुझे पता ही नहीं चला। तुम्हारी माँ सीमा देवता है जिसके आगे मैं कुछ भी नहीं हूँ।
देव, तुम्हारी मम्मी ने मुझे जिस तरीके से पढ़ाया और आगे बढ़ने का हौंसला दिया वह सचमुच अनमोल है। तुम कभी अपनी मम्मी को दुःखी मत होने देना। आज मैं…

वाह! रजीबा वाह!

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रे...रजीबाऽऽ...रे...रजीबाऽऽ.
रे रजीबाऽऽ जिए जा....,
दूध मलाई खाए जा....
मोदी मोदी गाए जा...
रे...रजीबाऽऽ...रे... रजीबाऽऽ.
रे रजीबाऽऽ जिए जा....,

रे...रजीबाऽऽ...रे... रजीबाऽऽ.
रे रजीबाऽऽ जिए जा....,
दूध मलाई खाए जा....
अरविन्द आस लगाए जा...
रे...रजीबाऽऽ...रे... रजीबाऽऽ.
रे रजीबाऽऽ जिए जा....,

रे...रजीबाऽऽ...रे... रजीबाऽऽ.
रे रजीबाऽऽ जिए जा....,
दूध मलाई खाए जा....
अखिलेश ट्यून बजाए जा...
रे...रजीबाऽऽ...रे... रजीबाऽऽ.
रे रजीबाऽऽ जिए जा....,

रे...रजीबाऽऽ...रे... रजीबाऽऽ.
रे रजीबाऽऽ जिए जा....,
दूध मलाई खाए जा....
राहुल बैन्ड बजाए जा...
रे...रजीबाऽऽ...रे... रजीबाऽऽ.
रे रजीबाऽऽ जिए जा....,

कुछ भी कर ससूर!
पर अपना शोध-प्रबन्ध जमा कर
हमें अनुगृहीत कर!!!!

वाह! रजीबा वाह!

.............................


रजीबा ने सोचा-
यदि ‘डाॅक्टोरेट’ की उपाधि न लिया
तो....!
...तो क्या बिगड़ जाएगा?

यही कि तनख़्वाह कम मिलेगी
और क्या?
हा...हा...हा!

.........


साला रजीबा, नौटंकी
चूतिए को और कुछ नहीं सूझता
तो अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी चलाता है
चिल्लर....!

हा...हा....हो.....हो...!!!


चाणक्य हमारी परछाई है!

राजीव रंजन प्रसाद
......

हर सेकेंड बदलता है क्षण
समय का चाणक्य
और क्षण मात्र में
नत्थी जिंदगी धूम जाती है आगे की ओर
पिछले कई सालों से
मैंने घंटे की सुई नहीं देखी
सिर्फ देखा-
समय के चाणक्य को
मिनट-दर-मिनट
जिंदगी बदलता हुआ
घंटे की एवज में
इतने रफ्तार से कि
सोचना संभव नहीं,
विचारमग्न होना तो दूर की कौड़ी है
यह इसलिए भी कि-
चाणक्य अतिसुस्त होने के आरोप से बचना चाहता था
बचाव में हैं पूरे लाव-लश्कर
घड़ीनुमा फौज
हर दिनचर्या शुरू होते ही
हो जाती है ख़त्म
साथ के सभी में से
कोई घंटा होना नहीं चाहता
सभी अतिसुस्त होने के आरोप से बचना चाहते हैं
मैं, आप, यह, वह, सब-
उन्हें देख रहा होता है
समय का चाणक्य
अब घंटे में समा जाती है फटाफट खबरें
पचास, सौ...दो सौ तक
लेकिन मैं घंटा होना चाहता हूँ
अतिसुस्त, महासुस्त, सर्वोपरिसुस्त
क्योंकि मेरा सवाल है-
समय के चाणक्य से
वह जो खुद बेहद आक्रामक है, चक्करदार है
जिसकी भाषा बेरंग और चेहरा पाखण्ड की है
जो अंदर-बाहर लिजलिजा और चिपचिपा है
जो केन्द्र में है
जो सत्ता में है
जो हर सुखों का भोक्ता है
जो नेता, मंत्री, नौकरशाह है
जो करोड़पति है, काननूविद् है, प्रोफेसर है
बहुत म…