Tuesday, October 16, 2018

विज्ञापन : आधुनिक सन्दर्भ एवं विमर्श

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विज्ञापन यानीएडवरटाइजिंगअति-लोकप्रिय शब्द है। यह नाम अक्सर दुहराया जाता है जिसके कई उपनाम और पर्याय हैं। कोई इसे ‘मार्केट प्रोपेगेण्डा’ मानता है जिसमें प्रायः किसी चीज के बारे में बढ़ा-चढ़ा कर इतनी बातें की जाती हैं जिनका वास्तविक जीवन में कोई ठोस अथवा प्रामाणिक आधार नहीं होता है, तो किसी की दृष्टि में विज्ञापन ‘चयन की सुविधा' है। अधिसंख्य विज्ञापन प्रायः भाषा के मुलम्मे में जाहिर और प्रदर्शित किए जाते हैं। सहज निखार लाने के लिए विज्ञापन में नाटकीयता का सन्दर्भ विशेष तौर पर डाला जाता है, जिसमें मानवसुलभ इच्छाओं, आकांक्षाओं, सुरक्षा-बोध, मानवीय मनोवृत्तियों इत्यादि का प्रयोग प्रचुर मात्रा में होता है। भाषा भी स्थानीयता का पुट लिए प्रयोग में लाई जाती है। रंगों, संयोजनों, संगति, तारतम्यता, भाषिक रचनात्मकता के अतिरिक्त  तकनीकी बारीकियों से भी विज्ञापन का नजदीकी रिश्ता है जो उसे लोकप्रिय बनाने के अतिरिक्त लक्षित उपभोक्ता को अपने मोहपाश में बाँधने का काम बखूबी करती है। कई सारे विज्ञापन हमें भ्रमित करते हैं; बेवजह की आवश्यकता को जरूरी बताकर अमुक वस्तु या सेवा को खरीद लेने के लिए उकसाते हैं। विज्ञापन का हमारे दिलोदिमाग पर असर इतना जबर्दस्त होता है कि हम अनिच्छुक होते हुए भी उन चीजों को खरीद लेने को बाध्य होते हैं जिनकी तत्काल हमें कोई जरूरत नहीं हुआ करती है।
विज्ञापन के सफेद-स्याह दोनों पक्ष गौरतलब हैं। “आज जीवन का कोई भी ऐसा कोना नहीं, जो विज्ञापनों के प्रभाव से बचा हो। विज्ञापन हमारी इन्द्रियों से होते हुए और दिल-दिमाग पर राज़ करते हुए हमारे चयन को प्रभावित करते हैं। इस अत्याधुनिक दौर में छोटी-बड़ी सभी वस्तुओं के लिए विज्ञापन हमारी कोमल भावनाओं को लुभाने की हर संभव कोशिश करते हैं। ये विज्ञापन सृजनात्मक कल्पनाशील संदेशवाहक और रचनात्मक सब तरह के होते हैं और विज्ञापनों में जो थोड़े ही में अधिक कह देने की क्षमता होती है।“[1] एफ. एंगेल्स ने ‘दि इमेजेज आॅफ पाॅवर’ में बिल्कुल सही लिखा है कि, ‘‘विज्ञापन की खूबी यह है कि वह भविष्य के सपनों को जगाता है और बार-बार पुनरावृत्ति द्वारा उन्हें सामाजिक विश्वास में बदल देता है।‘’ भारतीय सन्दर्भों में देखें तो “यह तथ्य स्वयंसिद्ध है कि मुक्त बाज़ार व्यवस्था में व्यवसाय और औद्योगिक क्षेत्रों का खूब विकास हुआ। सारी दुनिया के बाज़ारों के लिए भी भारत के दरवाजे खोल दिए गए। विविध प्रकार के उत्पादों और उनके नए-नए ब्रांडों से भारतीय बाज़ार पट गए। ऐसी स्थिति में चयन की समस्या उपभोक्ता के लिए पैदा होती है कि वह कौन-सी वस्तुएँ खरीदें और कौन-सी छोड़ दें, इसी प्रकार उत्पादक के सामने अपनी वस्तुओं को अधिकाधिक मात्रा में बेचकर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की आकांक्षा रहती है। इन दोनों को ही किसी ऐसे माध्यम की जरूरत थी, जो उनके मध्य सेतु का काम करे। ऐसे में विज्ञापन ने बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की।“[2]
विज्ञापन का बढ़ता प्रभाव
विज्ञापन के इस बढ़ते महत्त्व में ‘आइडा’ (AIDA) सिद्धान्त की भूमिका मुख्य है। आइडा थ्योरि में ‘ए’ का सम्बन्ध ‘Attention’ से है जिसका अर्थ है-ध्यानाकर्षण। ‘आई’ का सम्बन्ध ‘Interest’ से हैं जिसका अर्थ है-रुचि जागृत करना। इसी तरह ‘डी’ और ‘ए’ के आशय क्रमशः ‘Desire’ और ‘Action’ से है जिनका अर्थ क्रमशः इच्छा निर्माण के साथ तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित है। सर्वप्रथम यह समझना आवश्यक है कि विज्ञापन बेचने-खरीदने की प्रक्रिया में शामिल एक संयुक्त लाभकारी उपक्रम है। कहा तो यहाँ तक जाता है कि विज्ञापन व्यापार की दृष्टि से बोलने वाला मानव है। यह सूचनाओं को इस तरह प्रदान करता है कि उपभोक्ता खरीदने के सम्बन्ध में सही निर्णय ले सके। आज की तारीख़ में विज्ञापन बहुराष्ट्रीय कंपनियों की बहुउद्देशीय परियोजना का मुख्य हिस्सा है। बाज़ार में दख़ल रखने वाली काॅरपोरेटी कंपनियाँ विज्ञापन को अपनी अकूत कमाई का मुख्य जरिया मानती हैं। उपभोक्ता-व्यवहार से सुपरिचित अधिसंख्य कंपनियाँ अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा विज्ञापन पर खर्च कर रही हैं।
एक आँकड़े के मुताबिक जनता के समक्ष अपने उत्पाद की विशेषता एवं गुणवत्ता की कहानी बखानने के लिए प्रति वर्ष विज्ञापन पर 15-20 ख़रब डाॅलर से भी अधिक की राशि खर्च की जा ही है। ध्यातव्य है कि “सम्प्रेषण के सभी तरीकों में विज्ञापन की पहुँच सबसे ज्यादा है। इसका निर्माण आजकल इतने प्रभावी और मनोवैज्ञानिक तरीके से किया जा रहा है कि ये विज्ञापन फौरन उपभोक्ता/लक्षित ग्राहक को अपनी गिरफ़्त में ले लेते हैं। यह चंगुल मार्केटिंग के सभी दाँव प्रयोग करना चाहता है। इस नाते विज्ञापन का सामाजिक दख़ल तेजी से बढ़ रहा है।“[3]
विज्ञापन व्यवसाय एक सफल उद्योग में तब्दील हो चुका है। विज्ञापन का उपभोक्ताओं के दिलोदिमाग यानी मस्तिष्क पर जबर्दस्त कब्ज़ा है। मस्तिष्क अच्छे-बुरे पर विचार करता भी है, तो जैसे कोई निर्णय नहीं देता है यद्यपि उसके इच्छानुकूल ही सारी क्रियाएँ घटित होती हैं क्योंकि मस्तिष्क का हमारी स्मृति, याद्दाश्त, बोध, संज्ञान, तर्कशीलता, निर्णय तथा बहुविध गतिविधियों इत्यादि से सीधा जुड़ाव होता है। किन्तु, आजकल मस्तिष्क पर हमारे मन का ही अंकुश ज्यादा है। बाज़ार के बीचोंबीच खड़ा हमारा उपभोक्तावादी-मन अपनी पसंद-नापसंद को पहली प्राथमिकता देता है। आज का सजग ग्राहक/उपभोक्ता प्रत्येक वस्तु को फैशन अथवाट्रेंड' के हिसाब से चुनता है। वह चीजों को खरीदने को लेकर इस कदर क्रेजी है कि खरीदना उसकी पहली जरूरत है; तदुपरांत खरीदी हुई वस्तु की उपयोगिता के बारे में विचार करता है। इन्हीं कारणों से आज विज्ञापनों के विभिन्न प्रकार (सजावटी, वगीकृत, लोकसेवा, औद्योगिक, संस्थागत, वैवाहिक, आॅनलाइन इत्यादि) अपनी प्रकृति (चित्ताकर्षक, सरल, वांछनीय, विशिष्ट, विश्वसनीय, सम्मोहक, छद्म, भ्रामक इत्यादि) में बुलंद बाज़ार के मनमोहक दरवाजे बन चुके हैं।  
विज्ञापन की बड़ी विशेषता यह है कि वह अपना प्रभाव और कीमत दोनों जानता है। इसीलिए विज्ञापन जरूरी सूचना अथवा सेवाएँ ‘पब्लिक’ तो करता है, किन्तु शुल्क लेकर। भारी-भरकम बजट वाले विज्ञापन बावजूद इसके लुभाते हैं, तो इस कारण कि विज्ञापन के कहन का तरीका दिलचस्प है। यही नहीं उनकी भाव-भंगिमा और अंदाजे-बयाँ अनूठे होते हैं। वे एक झटके से अपनी और खींचते, और दूसरे ही क्षण विमुग्ध कर डालते हैं। विज्ञापन का आकर्षक और सम्मोहक होना कई बार धोखा देकर ग़लत सौदेबाजी कर लेने का भी अवसर प्रदान करता है। विज्ञापन में यह कशिश अथवा चमत्कार भाषिक मुहावरे, प्रोक्ति और भाषाई वैशिष्ट्य के कारण भी अधिक प्रभावशाली यानी अपीलकारी मालूम पड़ता है। विज्ञापन की दुनिया इन दिनों सचमुच बादशाहत पर है। कहन का ढंग निराला और प्रस्तुति इतनी रचनात्मक है कि विज्ञापन का जलवा और करतब समूची दुनिया के सिर चढ़ बैठा है।
विज्ञापन का मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव
यद्यपि विज्ञापन किसी उत्पाद/सेवा के संभावित खरीददारों या उपयोगकर्ताओं को अपनी शर्तों के अनुसार मनोइच्छित दिशा में संभावित अनुक्रिया करने हेतु प्रेरित करता है; तथापि इसकी कार्य-प्रणाली कायिक और मानसिक दोनों धरातलों पर घटित होती है। हाल के दिनों में विज्ञापन-केन्द्रित बहुत सारे शोध-विश्लेषण हुए हैं जिससे यह जान पाने में सफलता मिली है कि विज्ञापन अनिवार्य रूप से अपने उपभोक्ता को प्रभावित करता है; उनके आचरण और स्वभाव में तब्दीली लाता है। यही नहीं विज्ञापन अपने उपभोक्ताओं को सीमित अथवा विस्तृत दायरे में सोचने-समझने का नज़रिया भी देता है। कई बार वह इरादतन अन्य उत्पादों की उपेक्षा करते हुए केवल उसी उत्पाद को सबसे बेहतर और उपयुक्त साबित करने पर तुल जाता है जिसका वह विज्ञापन है।
विज्ञापन हमारी उम्मीदों और जरूरतों के अनुकूलन में सार्थक भमिका निभाते हैं; लेकिन यह भी सच है कि वह हमारे भीतर अतिरिक्त सुरक्षा-बोध, डर और भय आधारित मानसिक गुणों यानी मनोवैज्ञानिक कारणों को भी उकसाते हैं। दरअसल, प्रायोजक-वर्ग अथवा विज्ञापन-नियोक्ता अपने हित-फायदे के लिए व्यक्ति को भाषा में छलने, उन्हें भाषिक-मुलम्मे में अतिरंजित यथार्थ से परिचति कराने में दक्ष होते हैं; क्योंकि ये उनकी मुनाफ़ा-संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा हैं। यह नकारात्मक प्रवृत्ति इन दिनों विज्ञापनों में सर्वाधिक देखने को मिल रही है।
आश्चर्य कि विज्ञापन ने संतपीठों को भी नहीं छोड़ा है। अध्यात्म अब बाज़ार-पूँजी की बारिश से सराबोर है। कुछ ख़ास उद्योगों एवं उपक्रमों को आगे बढ़ाने की शर्त पर पूरे देश के उपभोक्ताओं को विज्ञापन-बाज़ार का गुलाम बना दिया गया है। हैरानी नहीं कि सार्वजनिक जीवन में सादगी और सेवा के संवाहक बने संत तक इसके क्रीतदास हो गए हैं। कई तो एक ही तीर से कई सटीक निशाने साधने में उस्ताद हैं। मसलन-बाबा रामदेव, श्री श्री रविशंकर आदि।
इस संदर्भ में प्रख्यात अमेरिकी अर्थशास्त्री एडवर्ड चैंबरलिन ने 1933 में ही बाजार के सच को उजागर करती हुई महत्वपूर्ण व्याख्या की थी। उन्होंने अपनी पुस्तक थियरी आॅफ  मोनोपोलिस्टिक कंपीटिशन में लिखा था, ”वह युग खत्म हो गया जब हर उत्पाद के ढेरों निर्माता होते थे और उनके बीच घोर प्रतिद्वंद्विता होती थी। इसकी वजह से प्रत्येक उत्पाद अपनी गुणवत्ता को सुधारने के लिए सक्रिय होता था, ताकि वह ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित कर सके।[4]  जबकि वास्तविकता यही है कि ‘’विज्ञापन के द्वारा उत्पाद के बारे में जानकारी और उसकी गुणवत्ता आदि से उपभोक्ता या ग्राहक को अवगत कराते हुए उसे इसके लिए प्रेरित किया जाता है कि वह उस उत्पाद को खरीदे। उपभोक्ता को बाज़ार तक लाना और फिर अपना उत्पाद उसे बेचना बाज़ार की मुख्य जरूरत मानी जाती है।“[5] 
विज्ञापन के बरास्ते बाज़ार पूँजीकरण
आधुनिक विचारकों ने इसे ‘पूँजी का केन्द्रीकरण’ माना है। अर्थात् तीसरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय प्रवाहों के लिए पूर्णतया खोल दिया जाए; ताकि यहाँ की छोटी किन्तु टिकाऊ अर्थव्यवस्था खुद ही बरबाद हो जाए या कि उनकी हालत इतनी खस्ताहाल हो जाए कि वह स्वयं बाज़ार से बाहर चली जाएँ और उनकी जगह बड़े कारपोरेटियों अथवा बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपना हाथीपाँव जमाने का मौका मिल सके। इस तरह कि अनैतिक सुविधाओं को सरकार अपने फौरी लाभ, वोट-बैंक की दलगत राजनीति विकास का प्रोपेगेण्डा खड़ा करने के लिए लगातार प्रोत्साहित एवं उत्प्रेरित करती है; यह जानते हुए भी कि “इसके चलते तीसरी दुनिया के देशों की आर्थिक वृद्धि मुरझा जाएगी। विकसित पूँजीवादी केन्द्रों (मैट्रोपोलिटन) की पूँजी के हाथों ये देश अपनी आर्थिक सम्प्रभुता खो रहे होंगे तथा अपने घरेलू प्राकृतिक संसाधनों तथा उत्पादक परिसम्पत्तियों (ख़ासतौर पर सार्वजनिक क्षेत्रों) पर अपना नियंत्रण गवाँ रहे होंगे।“[6]
पत्रकार प्रियदर्शन इन चिंताओं से रू-ब-रू हैं; वे कहते हैं, ‘‘यह एक खतरनाक परिदृश्य है। मामला सिर्फ खुदरा बाज़ार में विदेशी पूँजीनिवेश का नहीं है, उस पूरे अर्थतंत्र की नई जकड़बंदी का है जो हमारी राजनीतिक व्यवस्थाओं से बेपरवाह जानती है कि भारत में उसका अश्वमेध पूरा हो चुका है। वह मनचाहे फैसले करवाती है, मनचाहे तर्क गढ़वाती है और मनमाने ढंग से अपने अधिकारों की व्याख्या करती है।…हम सब इस नए दौर में एक बेशर्म किस्म की उपभोक्तावादी संस्कृति के आदी हो चुके हैं। बाज़ार अपनी जरूरत के हिसाब से माल बना रहा है और हमारी जरूरत बता कर हमें बेच दे रहा है। विदेशी कंपनियाँ इसलिए भी भारत आने को तैयार हैं कि उन्हें यह नज़र आ रहा है कि एक हड़बड़ाया हुआ भारतीय मध्यवर्ग अपने डेबिट-क्रेडिट कार्ड लिए, अपनी चेकबुक लिए जैसे सबकुछ खरीदने पर आमादा है।“[7] विशेषतया विज्ञापन के क्षेत्र में, तो गलाकाट प्रतिस्पर्धा इस दौर का एक बिकाऊ ‘ट्रेंड’ बन चुका है। इसकी दुनिया मोहक तथा बेहद आकर्षक है। वर्तमान में जनपक्षीय संचार माध्यमों द्वारा विज्ञापन का व्यावसायिक उपयोग अंधाधुंध जारी है। वृद्ध-पूँजीवाद का वरदहस्त प्राप्त कर चुका विज्ञापन एक स्वतन्त्र ‘पूँजी-उद्योग’ का रूप धारण कर चुका है। सिर्फ और सिर्फ बाज़ार के समर्थन-मूल्य में खड़ी इन प्रवृत्तियों को लक्ष्य करते हुए प्रोफेसर एजाज अहमद का एकदम सही निष्कर्ष है कि, ‘‘अरब-एशिया में जो हो रहा है वह दुनिया की ताकतवर शक्तियों के साम्राज्यवादी विस्तारवाद की ही अभिव्यक्ति है। पूँजी के इस नृशंय रूप् को अअरब और एशिया ही नहीं, लैटिन अमरीकी देशों में भी देखा जा सकता है। इसके हमलों का शिकार यूरोप और अमरीका की जनता भी हुई है और हो रही है जबकि पूँजीवाद ने वहीं अपना ठिकाना बनाया हुआ है।“[8]
यह जानना उपयुक्त होगा कि “आज ज्ञान-विज्ञान की हर शाखा में भूमंडलीकरण की प्रक्रिया का अध्ययन किया जा रहा है। वर्तमान में शायद ही कोई क्षेत्र हो, जो इससे प्रभावित न हुआ हो, अतएव इस प्रक्रिया को समझना भी अत्यंत आवश्यक है। दरअसल भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने 'ट्रिकल डाउन थ्योरी’ की तर्ज़ पर अंतिम व्यक्ति तक को प्रभावित किया है, जिसके अच्छे और बुरे दोनों पक्ष हैं। भारत के सन्दर्भ में १९९१ से उदारीकरण के जरिये इस प्रक्रिया के लक्षण देखे और अनुभव किये जाने लगे। लिहाज़ा पिछले पच्चीस वर्षों में आम जन-जीवन कई अर्थों में बदल चुका है।“[9]
विज्ञापन द्वारा संगत-असंगत छवि-निर्माण
विज्ञापन बाज़ार की माँग और आपूर्ति सेवा-सिद्धान्त के विपरीत जनकल्याणकारी यानी जनहित में जारी होने वाली सूचनाओं, जानकारियों, सुझावों, सेवाओं इत्यादि का भी प्रचुर मात्रा में ज्ञापन करता है। इस कारण विज्ञापन की एकरेखीय आलोचना सुसंगत या उपयुक्त नहीं है। आज के घोर बाज़ारवादी युग में विज्ञापन को लेकर गहन विमर्श और चिंतन-मनन की आवश्यकता है ताकि विज्ञापन अपनी व्युत्पतिजन्य शब्दार्थ का समुचित निवर्हन कर सके जिसका अभिप्राय है-‘विशिष्ट सूचना का माध्यम-विशेष द्वारा संक्षिप्त एवं सारगर्भित प्रकटीकरण’। स्थूल-सूक्ष्म रूप में विज्ञापन की कार्यविधि और उसकी अनुषंगी क्रियाएँ पूर्णतया पूर्व-नियोजित तथा नियोक्ता-निर्देशित होती हैं। दूसरे शब्दों में, “विज्ञापन एक शब्द, चित्र, पत्रिका, रेडियो, टेलीविज़न, अख़बार अथवा मानव-व्यवहार का मनोवैज्ञानिक अनुसन्धान मात्र नहीं है; बल्कि विज्ञापन सम्प्रेषण का एक ऐसा शक्तिशाली माध्यम है, जिसका प्रयोग अन्य व्यक्तियों द्वारा कार्य कराने के उद्देश्य से किया जाता है। यदि आप समाज के बहुत बड़े वर्ग से कुछ करवाना चाहते हैं, तो विज्ञापन व्यक्तियों को निरन्तर अपने उद्देश्यों के अनुरूप मनाने की एक कला है।“
इस उत्तर शती में विज्ञापन एक तरह से बिक्री हेतु माहौल बनाने में मदद करता है; बाज़ार में वस्तु अथवा सेवा की माँग में बढ़ोतरी करने के लिए उपभोक्ताओं को सीधे उत्प्रेरित करता है; विज्ञापित वस्तु या प्रस्तावित सेवा की विशेषताओं को बताता है; उसकी उपलब्धता सम्बन्धी सूचना देता है; उपभोक्ता तथा उत्पाद-निर्माता दोनों के पक्ष में संयुक्त लाभ सृजित करने का दायित्व निभाता है आदि-आदि। तभी तो, आज विज्ञापन आधुनिक दौर का एक मुख्य प्रकार्य बन गया है। इंटरनेट-क्रांति और वेब-दुनिया ने तो पारम्परिक माध्यमों (प्रिंट, इलेक्ट्राॅनिक, श्रव्य, चित्रित इत्यादि) से इतर विज्ञापन को और भी लोकप्रिय एवं महत्त्वपूर्ण बना दिया है। आॅनलाइन शाॅपिंग विज्ञापन का ऐसा ही एक उत्कृष्ट नमूना है जो अपने शो-केश में रखी वस्तुओं को दृश्य-पठ्य-श्रव्य बनाकर प्रकट करता है; ताकि आॅनलाइन उपभोक्ता किसी वस्तु विशेष की सारी खूबियों एवं उनकी बारीकियों से पूर्णतया अवगत हो सके। सामान्यतया विज्ञापन का लक्ष्य उपभोक्ताओं तक उस अर्थपूर्ण एवं सार्थक अभिव्यक्ति को पहुँचाना होता है जिससे किसी उत्पाद अथवा सेवा-विशेष की क्रमशः खरीद-योग्य या जानकारी-योग्य छवि निर्मित होती है। यह और बात है, विज्ञापन द्वारा छुपे तौर पर जोड़-तोड़ तथा शह-मात का खेल खुलकर खेला जाता है। सरकारी-तंत्र द्वारा प्रायोजित होने के कारण अब विज्ञापन की प्रकृति बदल गई है। अब श्वेत-श्याम प्रकाशित समाचार-पत्रों के विचारों तक में विज्ञापन घुस गया है जिनको ‘एडवोटोरियल’ कहा जा रहा है। इसी परम्परा की ईजाद है-‘पेडेड न्यूज़’, जिसमें विचार-मूल्य की बोली लगती है और उसे समाचार की बिकाऊ-शैली में सम्पादकीय सहमति से प्रकाशित अथवा प्रसारित कर दिया जाता है।
नतीजतन, अब सम्पादक की कलम में वह पानी और धार नहीं बची है जिसे कभी अक़बर इलाहाबादी ने आग दी थी-‘खींचो न कमान और न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो’। दरअसल, विज्ञापनी भाषा ने समाचारों एवं सम्पादकीय दृष्टिकोण का सर्वाधिक नुकसान किया है। अब समाचार पढ़ चुकने के बाद आखि़र में हम यह जान पाते हैं कि यह कोई विज्ञापन है। इसी तरह टेलीविज़न या अन्य संचार माध्यमों द्वारा विज्ञापनी तरीके से किसी व्यक्ति-विशेष की महानता का गुणगान किया जाता है या फिर बड़े ही महीन ढंग से किसी व्यक्ति-विशेष की सामाजिक प्रतिष्ठा और उसकी सार्वजनिक छवि को इरादतन धूमिल किया जाता है। यह सब बड़ी ही बारीकी से प्रायः भाषा और तकनीकी-दक्षता की ओट में किया जाता है। इस तरह के छद्म विज्ञापनों को आप ‘सरोगेट’ कह सकते हैं जिनका प्रचलन इन दिनों तेजी से बढ़ा है। इसी तरह विज्ञापनों ने भाषिक विरूपणों को बढ़ावा दिया है, जिसमें अनाप-शनाप कही जा रही बातों का कुल जमा निष्कर्ष है-‘झूठ बाँचो, झूठ फैलाओ’।
विज्ञापनों में स्त्री-छवि का विरूपण
विज्ञापन ने स्त्री-छवि को भी एक ‘जिंस’ अथवा ‘कमोडिटी’ में बदल दिया है। वास्तव में विज्ञापन ने नारी-मन की अचेतन-जिजीविषा यानी प्रदर्शनप्रियता की मनोवृत्ति को उसी के देह के इर्द-गिर्द बने कृत्रिम मोहपाश में जकड़ लिया है। आज विज्ञापनों ने नारी-अस्मिता, योग्यता और क्षमता को पण्यीकरण के ढाँचे में बंदी बना लिया है जबकि “पश्चिम में हुए कई सर्वेक्षणों से यह साबित हो चुका है कि सामान्य दृश्यों वाले विज्ञापन ही उपभोक्ताओं और उत्पाद के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करते हैं। दुनिया के बड़े मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञों में एक ब्रैंड बुशमन ने अपने अध्ययन में पाया है कि टेलीविजन शो के हिंसक और कामुकता भरे विज्ञापन के प्रदर्शन से विज्ञापित उत्पाद का कोई बेहतर प्रचार नहीं हो पाता। अगर विज्ञापन में खूनखराबे वाले दृश्य हों तो दर्शकों को विज्ञापित उत्पाद का नाम तक याद नहीं रहता। यही हाल यौन प्रदर्शन वाले विज्ञापनों का पाया गया है।“[10] युवा पत्रकार हिमांशु शेखर की टिप्पणी एकदम सही है कि “मौजूदा दौर में विज्ञापन में महिलाओं के बढ़ते प्रयोग पर काफी चिंता जताई जा रही है। आज महिलाओं के जरिए विज्ञापन में कामुक पुट डालना आम बात है। शायद ही कोई ऐसा विज्ञापन दिखता है जिसमें प्रदर्शन के रूप में नारी देह का प्रयोग नहीं किया गया हो। विज्ञापन निर्माताओं के लिए यह बात कोई खास मायने नहीं रखती है कि विज्ञापित वस्तु महिलाओं के प्रयोग की है या नहीं। कई विज्ञापन तो ऐसे भी होते हैं जिनमें महिलाओं की कोई आवश्यकता नहीं है। पर यह बाजार आधारित अर्थव्यवस्था का ही असर है कि नारी की काया को बिकने वाले उत्पाद में परिवर्तित कर दिया गया है। इसके सहारे पूँजी उगाहने का भरसक प्रयास किया जाता है।“[11]
विज्ञापनों में राजनीतिक व्यक्ति-विशेष
भारत में चुनावी अवसरों पर विज्ञापनों की बाढ़ आना आमबात है। हर राजनेता अपनी छवि को चमकाने अथवा स्वयं को एक ‘ब्रांड’ के रूप में पेश करने हेतु विज्ञापन को ही अपना सबसे जानदार विकल्प मानता है। नतीजतन, चुनावी सरगर्मी में विज्ञापनों की खेप मीडिया के सभी प्रारूपों में पूरे जोर-शोर से देखने को मिलती है क्योंकि उनकी दृष्टि में एक बात साफ है कि-‘जो दिखेगा, वही बिकेगा’। राजनीति के पुराने मूल्य, साख और परम्परा तेजी से विलुप्त हो रही हैं। नैतिकता और ईमानदारी बेजान पड़ गई हैं। भारत जैसे सांस्कृतिक रूप से ‘डीप रूटेड’ राष्ट्र में भी ‘इमेज बिल्डिंग’ का साधन या विकल्प विज्ञापनी प्रचार-प्रसार, प्रक्षेपण-प्रतिरूपण में ही है। ‘’विज्ञापनों के माध्यम से छवि निर्मिति में सबसे बड़ी सहूलियत है कि इसे जरूरत के अनुरूप बदले जा सकते हैं, इसमें कुछ जोड़े-घटाए जा सकते हैं, नयी छवि पुनःस्थापित की जा सकती है।...मौजूदा चुनाव में राजनीतिक विज्ञापनों की अनिवार्यता के संदर्भ में मैक् कैबी का मानना है कि मुझे तो इस बात पर हैरानी होती है कि जो इंसान अपने पक्ष में जोरदार विज्ञापन नहीं कर सकता,वह किसी देश को कैसे नियंत्रित कर सकता है। मैक् कैबी की इस मान्यता से स्पष्ट है कि चुनाव अब सिर्फ जनसम्पर्क,मुद्दे और राजनीति के आधार पर लड़े औऱ जीते नहीं जा सकते। छवियों की इस लड़ाई में, राजनीतिक विज्ञापनों का प्रयोग अब नैतिकता के सवाल और बहस से बाहर, व्यावहारिक दृष्टिकोण का मामला बनता जा रहा है। सारा जोर इस बात पर है कि कौन कितने बेहतर तरीके से अपनी छवि प्रस्तुत कर सकता है। ‘’[12] यह तो पूँजीगत गुलामी है जिसमें शरीर हम अपना जोत रहे होते हैं, पर हमारे श्रमबल का दोहन कोई और कर रहा होता है। आगामी चुनाव में विज्ञापन की बलि चढ़ने से बेहतर है कि राजनीतिज्ञ अपने पुरुषार्थ के बूते अपनी लड़ाई लड़े, न कि विज्ञापन के भरोसे; पर हालिया परिदृश्य में ऐसा घटित होता नहीं दिखाई देता।
अतः आधुनिक चलन, लोकप्रियता एवं बेजोड़ प्रभावशीलता के बावजूद विज्ञापन का अंध-समर्थन प्रत्येक दृष्टि से ग़लत है। हमें यह समझना ही होगा कि, ‘‘निजी लाभ के लिए समाज की संवेदना और भावनाओं को आहत करना सही नहीं है। इससे समाज में तरह-तरह की कुंठा, अवसाद और तनाव उत्पन्न होते हैं जिससे राष्ट्रीय मानव-संसाधन का उपयोग या कि उनकी क्षमता-शक्ति-ऊर्जा का प्रदर्शन उपयुक्त तरीके से नहीं हो पाता है।…सामाजिक सन्दर्भों में विज्ञापन से मर्यादित आचरण की अपेक्षा की जाती है। यह माना जाता है कि वह समाज में सुविचारों, सुशीलता का नैसर्गिक प्रोत्साहन करेंगे।‘’[13] विशेषतौर से मानवीय शुचिता को कायम रखना अत्यावश्यक है; अन्यथा बाज़ार की चंगुल में फँस अपने लोकतंत्र को विज्ञापनी अखाड़े में तब्दील कर देना अपनी ही हाथों अपनी सम्प्रभुता पर चोट करना है।
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डॉ. अवधेश नारायण मिश्र
प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
वाराणसी-221 005
मो. 9415991344
ई. मेल : anmbhu@gmail.com
एवं
डॉ. राजीव रंजन प्रसाद
सहायक प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
राजीव गाँधी विश्वविद्यालय
रोनो हिल्स, दोईमुख
अरुणाचल प्रदेश-791112
मो. : 9436848281
-मेल : rrprgu@gmail.com


[1] http://www.apnimaati.com/2017/03/blog-post_60.html
[2] आर्य, (डाॅ.) साधना; ‘विज्ञापन और उपभोक्तावाद’; भाषा; मई-जून, 2018; पृ. 101
[3] www.abwaibhindi.wordpress.com
[4] http://www.bhartiyapaksha.com
[5] डाॅ. कौशल्या; ‘हिंदी विज्ञापन: भाषिक और शैलीगत अध्ययन’; अमन प्रकाशन; कानपुर; प्ृ. 09
[6] पटनायक, प्रभात; ‘साम्राज्यवाद: नया और पुराना’; लोक प्रकाशन गृह; दिल्ली; संस्करण: 2006
[7] प्रियदर्शन; ‘माल के आगे बेमानी सवाल’; तहलका; 31 दिसम्बर, 2012; पृ. 16
[8] शुक्रवार; 02 दिसम्बर, 2011; पृ. 54
[9] http://www.apnimaati.com/2017/03/blog-post_19.html
[10] http://www.bhartiyapaksha.com
[11] http://www.bhartiyapaksha.com
[12] http://jnanpith.net/

विज्ञापन : आधुनिक सन्दर्भ एवं विमर्श

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