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Showing posts from October, 2010

राजनीति में युवा

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20वीं शताब्दी युवा राजनीतिज्ञों की सक्रियता और सार्थक हस्तक्षेप का साक्षी रहा है। अतीत के स्वर्णीम पन्नों में दर्ज अनगिन युवा रणबांकुरों की बात न भी करें तो स्वतंत्रता बाद जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में उभरा ‘युवा तुर्क’ भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक नवजागरण का ‘कोपरनिकस प्वाइंट’(बदलावकारी बिन्दु) साबित हुआ जिसके मूल-स्तंभ रामधन, ओम मेहता, कृष्णकांत, चन्द्रशेखर और मोहन धारिया थे। कर्मठ, जुझारू और राजनीतिक संचेतना से संपन्न इन युवा तुर्कों ने अपने बाद की युवा पीढ़ी को काफी मजे से मांजा। उनमें लोकचेतना का राजनीतिक टान पैदा किया। इस पाठशाला में तपकर कुंदन बनने वालों में जार्ज फ्रर्ण्डांडिस, लालू यादव, मूलायम सिंह यादव, नीतिश कुमार, शरद यादव जैसे सैकड़ों छात्र-नेता शामिल थें जिन्होंने मुख्यधारा की राजनीति में सफलतापूर्वक अपनी प्रभुसत्ता स्थापित की।
90 के दशक में युवा-राजनीति की सक्रियता को छात्र-संघ ने रसद-पानी उपलब्ध कराया। लोकतंत्र की बुनियाद पक्की हो इस परिकल्पना के साथ राष्ट्रीय स्तर पर युवा-संसद की पृथक योजना बनी। 1988 ई0 में देश के सभी केन्द्रीय विद्यालयों से शुरू हुई यह योजना 1997-98…

युवा किस ओर...?

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भारतीय युवा जनतांत्रिक समाज का नवीन प्रवर्तक तो सांविधानिक इकाई का महत्वपूर्ण घटक है। युवा अर्थात एक ऐसा वर्ग, जो मेहनती, ऊर्जावान, दिलेर, जांबाज, स्वाभिमानी, राष्ट्रभक्त और देशप्रेमी हो जिसकी चेतना जीवित हो। रक्त में स्फुर्ति और ताजगी हो। उपस्थिति अलहदा, तो विचार जुदा हो। जो अंतर्मन की आंख से भविष्य में ताक-झांक करने में निपुण हो। यानी युवा एक ऐसा शब्द है, जो सर्वगुणसंपन्न भले ना हो किंतु नूतन-नवीन गढ़ सकने में प्रवीण अवश्य हो। यथार्थ जो भी हो। युवा होने का अर्थ कमोबेश यही समझा जाता है। फिलहाल राष्ट्रीय मानव-संपदा के रूप में ये युवा देश की अंदरूनी ताकत और श्रेष्ठता का पर्याय हैं जिन पर 1 अरब आबादी वाला देश हिन्दुस्तान मजे में गुमान कर सकता है।
कई देश जो इस बात को लेकर चिंतित हैं कि उनके यहां युवा उम्र के लोगों की तादाद तेजी से घट रही है जबकि बुढ़ाते जा रहे लोगों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी जारी है। भारत में युवाओं की संख्या 55 फीसदी से अधिक होना वाकई गर्व करने की हिम्मत और अवसर देता है। आधुनिक साम्राज्यवादी देशों में अगुवा राष्ट्रों का भारतीय युवाओं के प्रतिभा, गुण एवं दक्षता पर री…

संचार: भारतीय और पाश्चात्य दर्शन

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संचार संबंधी भारतीय अवधारणा के बारे में जानना काफी रोचक और दिलचस्प होगा। आधुनिक संकल्पना में अन्तर्राष्ट्रीय संचार एवं संवाद की बात जोर-शोर से की जाती है, जो भारतीय चेतना और स्मृति में गहरे व्याप्त है। भारत में केवल अंतःवैयक्तिक संचार के कई ऐसे अनछुए पहलू हैं, जो मनुष्य की आंतरिक सक्रियता को सूक्ष्म और सूक्ष्मेतर ढंग से व्याख्यायित करती हैं। साहित्यकार निर्मल वर्मा के शब्दों में-‘‘गंगा महज एक नदी नहीं, हिमालय सिर्फ पहाड़ नहीं, वाराणसी और वृंदावन महज शहर नहीं हैं। मनुष्य का अतीत संग्रहालयों में बंद नहीं है, न ही उसके देवता यूनानी देवताओं की तरह पौराणिक काल के स्मृति-चिन्ह्र हैं। मिथक और यथार्थ, पौराणिक स्मृति और वर्तमान जीवन, देवता और मनुष्य आज भी एक साथ रहते हैं। सैकड़ों विश्वासों, आस्थाओं, समृतियों और संस्कारों का यह संगम और पारस्परिक संपर्क-संवाद केवल भारतीय संस्कृति में ही संभव हो सकता था-जिसमें संपूर्ण मनुष्य की परिकल्पना निहित रहती है।’’
यह बात विशेष उल्लेखनीय है कि भारतीय मानस संचार की अंतः-प्रेरणा को सिर्फ अपने भीतर समेटे रखने का आदी नहीं है। यहां विचारों, अनुभवों और जानकारियों क…

संचार: सवाल और संकट

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संचार की व्यापकता तथा संचार संबंधी भारतीय अवधारणा को समझने के लिए वैचारिक मूल्यांकन का क्रमबद्ध विश्लेषण जरूरी है। साथ ही यह पड़ताल भी आवश्यक है कि सूचनाओं के शक्ति को लक्ष्य कर हम जन-समाज या जन-संस्कृति( की जिस आधुनिक शब्दावली का प्रयोग कर रहे हैं, उसका सार्वभौमिक महत्व कितना है। कहना न होगा कि भारत जैसे विकासशील देश में संचार-क्रांति के मायने बहुत हैं किंतु उपयोगिता सीमित है। वजह यह है कि गरीब तबके के लिए आधुनिक संचार प्रौद्योगिकी की क्षमताओं के उपयोग द्वारा अधिकाधिक लाभ पहुंचाने की राह में प्रभावी प्रयास किया जाना शेष है। साथ ही भारत के खेतिहर समाज, जिस पर देश के तीन-चौथाई हिस्से के भरण-पोषण का जिम्मा है, की आवश्यकताओं तथा उनकी जरूरत संबंधी मूलभूत प्रश्नों मसलन, निर्धनता, निरक्षरता, स्वास्थ्य और आर्थिक-सामाजिक विषमता का समाधान खोजा जाना अभी बाकी है। अन्यथा संचार-क्रांति का यह तामझाम महज साधन-युक्त सुविधा-संपन्न वर्ग के लिए ही हितकर साबित हो सकती है। जन-भागीदारी और जन-उपयोगिता के अभाव में उसका सार्वभौमिक मूल्य नील-बट्टा-सन्नाटा ही साबित होगा।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहर…

संचार: शक्ति और अभिसरण

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यह निर्विवाद सत्य है कि आधुनिक परिप्रेक्ष्य में तकनीक और प्रौद्योगिकी आधारित संचार की जरूरत प्राथमिक है। विश्व की हर स्थापित सत्ता संचार-शक्ति से परिचित है। मार्शल मैकुलुहान ने अपनी पुस्तक ‘अंडरस्टेण्डिंग मीडियाः दि एक्सटेंशन ऑफ मैन’ में माध्यम की महत्ता का जिक्र ‘माध्यम ही संदेश है’ के रूप में किया है, तो फ्रेन्क डांस ने अपने वर्तुल प्रारूप में संचार माध्यम को व्यक्तित्व संचार और ज्ञान-सृजन का पर्याय माना है। संचार का केन्द्रीय तत्व सूचना है, जो शक्ति का अक्षय स्रोत है। मीडिया विशेषज्ञ जे. एस. यादव के शब्दों में-‘‘सूचना ही शक्ति है। किसी समाज में सूचना का प्रयोग अपने हित के लिए करने की कला और विज्ञान ही प्रभाव और शक्ति का मुख्य स्रोत है। मानव इतिहास तो नए और अधिक से अधिक सह-ज्ञात प्रतीकों के सृजन की क्षमता का उत्तरोत्तर विकास का इतिहास है।’’
सूचनाओं का अकूत भंडार, संचार-शास्त्री एल्विन टॉफ्लर के शब्दों में ‘थर्ड वेब’ अर्थात ‘तीसरी लहर’ का जामा पहन चुका है। सूचना-संसाधन में मानवीय क्रियाशीलता के बढ़ते रूझान तथा सक्रिय भागीदारी की वजह से पूरा विश्व ‘सूचना राजमार्ग’ में तब्दील हो गया है।…

टूटती चारदीवारी और ख़तरे में पहरेदार बहुरुपिए

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अपनी बात का सिरा मशहूर स्त्री-चिंतक सिमोन द बोउवार के बहाने से शुरू करें, तो ‘औरत जन्म से औरत नहीं होती बल्कि बनाई जाती है।’ यह आज के समय का नंगा सच है, जिसे आज की महिलाएँ शिद्दत से महसूस करने लगी हैं। विज्ञान और विवेक आधारित आधुनिकता की ढेर सारी बाधायें हैं, जो इसे निरंकुश, अराजक और अव्यावहारिक साबित करती हैं। स्त्री के बारे में हम संकीर्णवादी सामंती प्रवृति के शिकार हैं। वर्तमान संचार माध्यमों में स्त्री की छवियों को एक विशेष प्रकार के साँचे में उभारा जा रहा है। उसके देह का प्रदर्शन ‘चीजों’ या ‘वस्तुओं’ के साथ किया जा रहा है।
हाल ही में एक दैनिक अख़बार में छपे उस विज्ञापन को हम मिसाल के तौर पर चुन सकते हैं, जिसमें एक बाइक के प्रचार हेतु स्त्री छवि को इस संदेश के साथ उभारा गया था, ‘ड्राइव मी क्रेजी’। हम आसानी से देख सकते हैं कि आज हर बात नाटकीयता के लहजे में कैसे परोसी जा रही है। किसी उत्पाद के विज्ञापन में स्त्री को दिखाने की मंशा उन्हें सकरात्मक तरीके से ‘प्रमोट’ करना न हो कर स्त्री-सौंदर्य को सेक्स और ग्लैमर्स के हिसाब से दिखाना है। आधुनिक स्त्री को बाज़ार जबरिया इस्तेमाल करने पर तु…

हिंसा की डफली, हिंसक राग -२-

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नाउम्मीदगी के इस दौर में यूपी की जनता तिल-तिल मरने को अभिशप्त दिख रही है। अपराध के बढ़ते सेंसेक्स ने हिन्दी पट्टी के अगुवा कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश का जीना मुहाल कर दिया है। प्रांतीय अमन, चैन और शांति को लकवा मार चुका है। शासकीय विधि-व्यवस्था में इतनी छेद है कि लोग कल की तारीख़ में कोई अप्रत्याशित घटना न घटे, इसे लेकर आश्वस्त नहीं दिख रहे। राजनीति संरक्षित हिंसा और अपराध से यूपी की जनता में काफी घड़बड़ाहट और बेचैनी है। क्योंकि राजनीतिक सरगर्मी की तपाहट-तराहट जिस बात पर निर्भर करती है, वहां सिर्फ और सिर्फ हिंसा की डफली और हिंसक राग बज रहा है। असलहे चमकाये जा रहे हैं। धमकी और धौंस के बूते मनमाने ढंग से रंगदारी वसूली जा रही है। लोग सदमे में हैं। उन्हें तनिक समझ में नहीं आ रहा कि आपसी वर्चस्व और राजनीतिक बल-प्रदर्शन के लिए आम-आदमी की जिंदगी पर हमला बोले जाने का क्या मायने-मतलब? वो भी वैसे समय में जब प्राकृतिक आपदा पारंपरिक खेती-किसानी को लील लेने को तैयार है। भूख, गरीबी, बीमारी, महंगाई और बेरोजगारी जिन्हें हर रोज मौत का दावत सौप रही है।
इस भयावह सच की अगर थोड़ी गहराई से पड़ताल करें, तो पाते …

हिंसा की डफली, हिंसक राग -१-

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यह राजनीतिक हिंसा का भुतहा दौर है। डर, भय, खौफ, चीख और चीत्कार से सना एक ऐसा कालचक्र, जिसके कपाल पर यूपी का नाम ‘लार्ज टाइपफेस’ में गुदा है। दिनेदहाड़े प्रदेश के पूर्व विधायक कपिलदेव यादव की हत्या होती है। लोग उस तारीख को काले घेरे में चिह्नित करते हैं-4 जुलाई। चंद दिन भी नहीं बीतता कि उत्तर प्रदेश के काबीना मंत्री नदं गोपाल गुप्ता ‘नंदी’ पर इलाहाबाद में उस समय जानलेवा हमला बोल दिया जाता है, जब वह मंदिर पूजा-अर्चना खातिर निकल रहे होते हैं। 12 जुलाई को हुए इस बम विस्फोट में बाल-बाल बचे मंत्री जी का निजी सुरक्षाकर्मी राकेश मालवीय मारा जाता है और कई सार्गिद घायल हो जाते हैं।
यूपी की पुलिस महकमा जैसे सोए से जगा हो। वह इस घटना का तार काबीना मंत्री से खार खाये चाका ब्लॉक प्रमुख दिलीप मिश्रा से जोड़ती है। साथ ही शक की सुई सपा विधायक विजय मिश्रा पर भी घूमती है, जो दिलीप मिश्रा का करीबी रिश्तेदार है। इस मामले में गिरफ्तार राजेश यादव और कृपाशंकर ने जो बात कबूली, उससे यह साफ हो गया कि इस घटना का मास्टरमाइंड दिलीप मिश्रा ही है, जिसका सपा और भाजपा दोनों से निकट संबंध है। राजनीतिक रंजिश का यह खूनी खे…

दिमाग से पैदल नहीं युवा

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पिछले दिनों शोध-छात्रो को बीएचयू प्रशासन ने जो नये नियम-कानून बताये। उसकी अनुशंसा पर कुछ छात्रो को दूसरे छात्रावास में ‘शिफ्ट’ होना पड़ा। उसमें एक मैं भी शामिल था। पता नहीं क्यों? मुझे बिरला छात्रावास परिसर से जाते हुए घर-निकाला का आभास हुआ। मन में अजीब किस्म की टीस और तकलीफ महसूस हुई। यह जड़ से कटने की तरह का दर्द भले न हो, लेकिन झंुड से बिछुड़ने का ग़म जरूर था। जबकि बिरला से मैं एम.ए. में जा कर जुड़ा, बी.ए. में तो था ही नहीं। एम.ए. में मोह का व्योम इस कदर विस्तार न पाया था। पीएचडी में आकार लेना शुरू ही किया कि ‘ठौर बनाओ कहीं और’ का फरमान आ गया। कहने को साथी कहेंगे कि आप स्वेच्छा से गए। भाई! स्वेच्छा से हवन-कुंड में घी डाला जा सकता है, हाथ तो नहीं जलाया जा सकता है न!
खैर, दमदार विरासत का हकदार बिरला छात्रावास न तो मेरे कद-कादी से बढ़ सका था और न ही जाने से घटेगा। किंतु मुझे सालेगा कई दिनों तक इसका मेरे साथ रहना, उठना, बैठना, खाना-पीना और सोना। मेरे वो तमाम साथी, जिनके युवा दिखने पर मैं गर्व करता आया हंू। जिनकी वैचारिक समझ पर मार्क्स की भाषा में ‘डाउट ऑन एवरीथिंग’ सिद्धांत का अनुसरण करता रह…