टूटती चारदीवारी और ख़तरे में पहरेदार बहुरुपिए


अपनी बात का सिरा मशहूर स्त्री-चिंतक सिमोन द बोउवार के बहाने से शुरू करें, तो ‘औरत जन्म से औरत नहीं होती बल्कि बनाई जाती है।’ यह आज के समय का नंगा सच है, जिसे आज की महिलाएँ शिद्दत से महसूस करने लगी हैं। विज्ञान और विवेक आधारित आधुनिकता की ढेर सारी बाधायें हैं, जो इसे निरंकुश, अराजक और अव्यावहारिक साबित करती हैं। स्त्री के बारे में हम संकीर्णवादी सामंती प्रवृति के शिकार हैं। वर्तमान संचार माध्यमों में स्त्री की छवियों को एक विशेष प्रकार के साँचे में उभारा जा रहा है। उसके देह का प्रदर्शन ‘चीजों’ या ‘वस्तुओं’ के साथ किया जा रहा है।
हाल ही में एक दैनिक अख़बार में छपे उस विज्ञापन को हम मिसाल के तौर पर चुन सकते हैं, जिसमें एक बाइक के प्रचार हेतु स्त्री छवि को इस संदेश के साथ उभारा गया था, ‘ड्राइव मी क्रेजी’। हम आसानी से देख सकते हैं कि आज हर बात नाटकीयता के लहजे में कैसे परोसी जा रही है। किसी उत्पाद के विज्ञापन में स्त्री को दिखाने की मंशा उन्हें सकरात्मक तरीके से ‘प्रमोट’ करना न हो कर स्त्री-सौंदर्य को सेक्स और ग्लैमर्स के हिसाब से दिखाना है। आधुनिक स्त्री को बाज़ार जबरिया इस्तेमाल करने पर तुला है। इसके पीछे बहुत बड़ी राजनीति है, जिसे महज स्त्री-विमर्श के नाम पर प्रोपगेंडा फैलाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी और आलोचक जिसमें बहुतेरे खुद भी पाक-साफ नहीं, की नियत पर संदेह व्यक्त करना लाज़मी है।
आज की बाज़ारवादी प्रवृतियों में स्त्री-चरित्र निरुपण के मसले पर लेखिका मन्नु भंडारी कहती हैं, ‘मीडिया ने स्त्री को बिकाऊ बना दिया है। विज्ञापनों में मोबाइल फोन की बगल में खड़ी अर्धनग्न लड़की की उपस्थिति के क्या मायने है? मेरा स्त्री पहनावे के प्रति रोष नहीं है, रोष इस बात पर है कि मीडिया ने वस्तु को बेचने के लिए स्त्री का सहारा लिया है। मीडिया ने स्त्री में यह मानसिकता पैदा की है कि स्त्री का शरीर ही उसकी शक्ति है और इस स्त्री ने अपनी शक्ति पहचान ली है। जबकि स्त्री को बाजार के विरूद्ध खड़ा होने की आवश्यकता है। उसे अपना मनचाहा उपयोग नहीं करने देना चाहिए।’
प्रख्यात पत्रकार सच्चिदानंद जोशी इस बारे में बेबाक शब्दों में कहते हैं, ‘आधुनिकता को परंपरा के साथ मिलाकर प्रस्तुत करने की जो भोंडी कोशिश हमारे माध्यमों के जरिए हो रही है, उस पर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है। हम शालीनता और संस्कारों की सीमाएँ लाँघते जा रहे हैं। हमारी मान्यताओं, परंपराओं और संस्कृति पर निरंतर आधुनिकता, बाजार और उपभोक्तावाद के नाम पर आक्रमण होते जा रहे हैं।’
लब्बोलुआब यह है कि आज हम आधुनिकता का सीधा मतलब पोशाक और परिधान की रंगिनियों से लगाते हैं। उन युवाओं के प्रेम-प्रसंग से लगाते हैं, जो उच्च शिक्षण संस्थानों तथा विश्वविद्यालय परिसरों में तेजी से पनप रहा है। यह चीज भी आधुनिकता की ही देन मालूम पड़ती है, जहाँ झूठ, मक्कारी, ईष्र्या, घृणा, स्वार्थ तथा ‘यूज एंड थ्रो’ थ्योरी का वर्चस्व है। जरा याद कीजिए हाल ही में रिलीज फिल्म ‘देव डी’ का वह संवाद, ‘दिल्ली में बिल्ली मारकर खा लो, उसे पोसो मत।’ यहाँ बिल्ली का सीधा अर्थ लड़कियों से ही है, वैसे समझने वाले की समझदारी हजार।
यह पूरा सच नहीं है, लेकिन काफी हद तक पुरुष बिरादरी के लिए सोचनीय अवश्य है। आज अगर ‘वेलेंटाइन डे’ पर युवा-प्रेमियों पर लाठी बरसायी जा रही है या मंगलौर के एक पब में ‘श्रीराम सेना’ के अराजक तत्त्व हमला बोल रहे हैं, तो इसके पीछे का तर्क यही है कि आज के समय में भी समाज का एक तबका ऐसा भी है, जिसे अपने बेडरूम में गैर स्त्रियों का कपड़ा उतारना जँचता है, लेकिन ‘पब्लिकली’ यही खुलापन रास नहीं आता। ‘सेक्स स्कैण्डल’ या ‘कास्टिंग काउच’ की घटनाएँ इस बात की पुख्ता प्रमाण हैं।
स्त्री के साथ छेड़छाड़ और दुष्कर्म की घटनाएँ बदस्तूर जारी है। अख़बारी भाषा में इसका कारण बदनियति माना जाता है, जबकि यह बदनियती औरतों की प्रगतिशीलता को बाधित करने का सबसे बड़ा हथियार है। इसमें कोई दो राय नहीं कि किसी भी तरह के सांप्रदायिक उन्माद, सामाजिक प्रतिशोध या फिर वर्ग-संघर्ष में सबसे ज्यादा जिल्लत-जलालत स्त्रियाँ ही झेलती हैं। सन सैंतालिस के बँटवारे हो या गुजरात दंगे, स्त्रियों के साथ हुई ज्यादतियाँ आधुनिक समाज का काला चिट्ठा खोलकर रख देती हैं। असल में, छिटपुट घटनाएँ जो हमारे समाज की स्वाभाव बन चुकी है। मनुष्य के अंतस में बसी उस पशुता या हैवानियत का द्योतक है, जो वह बनावटी मुखौटे में छुपा ले जाने की हरसंभव कोशिश करता है।
यदि हम आधुनिकता की बात स्त्री से जोड़ कर करें, तो चारदीवारी में कैद रहने वाली स्त्रियाँ निःसंदेह अब पहले से ज्यादा मुखर और अपने अधिकारों के प्रति सजग हुई हैं। आज की स्त्री स्वयं अपनी भाग्य-निर्माता है। उसे क्या करना है, यह उसे पता है। वह अपना मुकाम स्वयं तय कर रही हैं। चुनौतियों से जूझ रही है। देखा जा सकता है कि कल की तारीख तक हाशिए पर धकेली जा चुकी औरतें, आज केन्द्रीय विमर्श की विषय हैं। वे अपने हक के लिए खुलकर बोलने लगी हैं। चुप्पी तोड़ते हुए वे उस मुकाम को हासिल करने के लिए तत्पर हैं, जहाँ कल तक पुरुष वर्चस्व का डंका बज रहा था। देश की पहली महिला आॅटो चालक सुनीता चैधरी हों या एयर मार्शल पद्मावती वंद्योपाध्याय, सभी तमाम चुनौतियों को दरकिनार कर अपने अस्तित्व की लड़ाई मुस्तैदी से लड़ रही हैं।
बहरहाल, आधुनिक दौर की स्त्रियों ने पुरातन आदर्शों को वर्तमान व्यावहारिकताओं से बदल लिया है। वे धार्मिक व्रत-उपवास की जगह स्वास्थ्य को चुन रही हैं। सिमटी सिकुड़ी दूर-दराज की लड़कियाँ भी अब खुलकर हँसना-बोलना सीख गई हैं। अपने पक्ष के लिए लड़ पड़ना और अंत तक हार न मानना आज की स्त्री का तेवर बन गया है। अगर उनके लिए ‘लिव इन रिलेशनशीप’ या ‘विवाहेतर संबंध’ मुफीद है, तो है। कुछ लौह-मंशा वाली स्त्रियाँ निर्भिक ढंग से ‘समलैंगिकता’ जैसे विवादास्पद कहे जाने वाले विषय पर ‘फायर’ जैसी फिल्में बनाने की ‘दुस्साहस’ दिखा रही हैं, तो ऐसी स्त्रियों को निश्चय ही ‘सैल्यूट’ दागना चाहिए।
निस्संदेह, आधुनिक स्त्री का यह बदलता चेहरा पुरुषवादी सोच के लिए एक चुनौती बन खड़ा हुआ है। पुरुष समाज अप्रत्यक्ष रूप से नई कुंठाओं का शिकार है। उसकी निगाह में औरतों का अपनी सहूलियत और इच्छानुसार जीना, व्यवहार करना या पुरुषों से अप्रभावित रह कर अपनी यौनिकता का आनंद लेना अक्सर पुरुषों में एक विकृत और घातक मानसिकता को जन्म दे रहा है। सरेराह तेजाब फेंकना, छेड़छाड़ करना, बदसलूकी, अश्लील हरकतें, भद्दे कमेंट्स, कामकाजी औरतों पर लांछन, प्रेम-संबंधों में विफलता पर औरतों पर हमले पुरुष की औरतों संग की जाने वाली स्पर्धा का परिणाम कम लैंगिक वर्चस्व दिखाने की मानसिकता अधिक है। लेखिका पूनम सहरावत की बेचैनी उनके इन शब्दों में देखा जा सकता है, ‘इसमें कोई दो राय नहीं है। समय जरूर बदला है। समाज भी बदल रहा है। औरत की परंपरागत, सामाजिक, सांस्कृतिक छवि भी बदल रही है। लेकिन इसके साथ-साथ औरत को दुष्प्रचारित और दंडित करने के तरीके भी बदल चुके हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है आज के औरत की इस समकालीन पोजीशन और छवि से तालमेल बिठा पाने में अधिकांश मर्दों की असमर्थता।’
ख़ैर, आधुनिक विमर्शों के इस दौर में जहाँ स्त्रियों के अस्तित्व को ‘चिõित’ करने के नाम पर दैहिक शोषण का करतब हो रहा है। सार्वभौमिक उपयोगिता सिद्ध करने की खातिर एक ‘सिंथेटिक कल्चर’ पनप रहा है, जहाँ आधुनिकता का चोला ओढ़ी स्त्रियाँ कम कपड़ों में ज्यादा आज़ाद दिखने का दम भर रही हैं। यह दिखावा या छलावा, जिसमें कुल्हे मटकाती स्त्रियाँ मौजूद हैं, असल में आधी आबादी की प्रतिनिधि ईकाई नहीं हैं। इस बारे में स्त्री-मुद्दों की जानकार डाॅ0 रजनी गुप्त कहती हैं-‘पितृसत्तात्मक संरचनाओं के चलते आज की तथाकथित आजाद स्त्री की संपूर्ण आजादी जिसमें उसकी सामाजिक भागीदारी पुरुषों के समकक्ष हो, यह फिलहाल स्वप्न ही है। इस विज्ञान आधारित आधुनिक युग में आधुनिक सोच के तमाम दावों के बावजूद स्त्री की सामाजिक हैसियत में कोई बहुत बड़ी तब्दीली नजर नहीं आती। आज की कमाऊ स्त्रियाँ भी कहे-अनकहे समझौतों और दोहरे कार्यभार से ग्रस्त हैं। आर्थिक आजादी से रिश्तों की जकड़ने जटिल से जटिलतर होती जा रही हैं। प्रताड़ना के नित नए औजारों पर धार दी जा रही है। दरअसल, पुरुषसत्ता की जड़े इतनी गहरी धंसी हैं, जिन्हें तोड़ना या बदलना सचमुच एक लंबी लड़ाई होगी।’
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