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Showing posts from July, 2014

उपभोक्ता-मन और विज्ञापन बाज़ार की उत्तेजक दुनिया

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विज्ञापन को बाज़ार में उत्पाद-प्रक्षेपण का सशक्त साधन माना जा चुका है। इसका मुख्य लक्ष्य उपभोक्ता की प्रतिष्ठा और जीवन-स्तर में अभिवृद्धि करना है। भारतीय संदर्भों में विज्ञापन सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्व का महत्त्वपूर्ण कारक है। वर्तमान में विज्ञापन और पूँजी दोनों एक दूसरे के पूरक अथवा पर्याय हो चुके हैं। बगैर विज्ञापन के आधुनिक पूँजीवाद का विस्तार या उसके आधिपत्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। आज विज्ञापन ही तय करने लगे हैं कि कोई विचार, सेवा या उत्पाद बाज़ार के हिसाब से बिक्री योग्य है भी या नहीं। पूँजीवाद पोषित इस नवसाम्राज्यवादी विश्व में विज्ञापन का उत्तरोत्तर बढ़ता कारोबार सन् 2020 तक 2 ट्रिलियन डाॅलर हो जाने की उम्मीद है।1 सिर्फ भारत में विज्ञापन का कुल अनुमानित बाज़ार 8000 करोड़ रुपए से ज्यादा है। दो मत नहीं है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को शीर्षाेन्मुखी करने में ‘विज्ञापन युक्ति’ अनंत संभावनाओं से भरा-पूरा क्षेत्र है। ‘एड गुरु’ के नाम से मशहूर प्रहलाद कक्कड़ की मानें तो “जनसंचार माध्यमों का इस्तेमाल करके अपने उत्पाद की पहु…

वनस्थली विद्यापीठ और मेरा प्रस्तुतिकरण

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मेरी दो और पुस्तकें:

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मेरी दो पुस्तकें : ‘संचार-भाषा: मन से विज्ञान तक’ और ‘Future Crying’(हिन्दी में)

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ओह! वनस्थली तुम भी....?

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‘जनसंचार एवं पत्रकारिता(प्रिन्ट जर्नलिज़म)' विषय के अन्तर्गत सहायक प्राध्यापक पद हेतु साक्षात्कार के लिए आए एक आवेदक का विनम्र अनुरोध सहित शिकायत-पत्र
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प्रति,

कुलपति
वनस्थली विद्यापीठ।

महोदय,

यह ई-मेल आपको इस सम्बन्ध में प्रेषित किया जा रहा है कि आज ही दिनांक
20/07/2014 को ‘आपाजी मन्दिर’ में ‘जनसंचार एवं पत्रकारिता’(प्रिन्ट
जनर्लिज़म) विषय के अन्तर्गत सहायक प्राध्यापक पद हेतु साक्षात्कार हुए
जिसमें मेरा अंतिम रूप से चयन नहीं किया जा सका। इस बात का मुझे तनिक
दुःख नहीं है। लेकिन, मुझे साक्षात्कार के दौरान साक्षात्कारकत्र्ताओं के
रवैए असहज कर देने योग्य लगे। यदि आपके द्वारा सही और उपयुक्त आवेदक
चुनने का यही सर्वश्रेष्ठ आधार/मानदण्ड है, तो इसमें बदलाव अपेक्षित है।
फि़लहाल, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के गुरुकुल से अध्ययनजीविता का
संस्कार पाये हम जैसे विद्यार्थी आप तक अपनी यह शिकायत दर्ज करा सकते हैं
कि-‘वनस्थली मंदिर है, सौध, नीड़ है, गेह है, कुंज है, आलय है.....लेकिन
साथ ही साथ यहाँ हिन्दी भाषा के प्रति दुराग्रह/पूर्वग्रह भी हैं; यह
अविश्वसनीय तथ्य मुझ जैसे …

आज यों ही कुछ अपने मन की

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प्रिय देव-दीप,
शिक्षा-प्राप्ति का कार्य सबसे कठिन योग है। यह भीतरी प्राणायाम है। बाहरी को हम तीन रूपों में जानते हैं: रेचक(साँस को छोड़ना), पूरक(साँस को भरना) और कुंभक(साँस को रोकना)। जबकि भीतरी प्राणायाम है: संज्ञान, चिन्तन और स्फोट। भारत की प्राचीनता गुरुओं की बलिहारी इसीलिए है क्योंकि ''गुरु ही समस्त श्रेयों का मूल है। वह जिसके वाक्य-वाक्य में वेद निवास करते हैं, पद-पद में तीर्थ बसते हैं, प्रत्येक दृष्टि में कैवल्य या मोक्ष विराजमान होता है, जिसके एक हाथ में त्याग है और दूसरे हाथ में भोग और फिर भी जो त्याग और भोग दोनों में अलिप्त रहते हैं।'' यह विषय वर्तमान पीढ़ी को भली-भाँति समझनी होगी। शिक्षा ही हमारे जीवन का मूलाधार है। यह एक ऐसा बीजतत्त्व है जिसमें शारीरिक-बौद्धिक क्षमता, प्राकृतिक गुण-सौन्दर्य, सामाजिक मूल्य-बोध, जीवन-बोध, नैतिकता, संकल्प, स्वप्न, कल्पना, चिंतन, विचार, व्यावहारिक दृष्टिकोण आदि बँधे होते हैं। इसी से मनुष्य बड़ा बनता है, विशाल कर्मों का कत्र्ता बनता है और मानवीय संचेतना से लैस सम्पूर्…

जानिए तो सही: मैं ब्लाॅगिंग क्यों करता/करती हूं...?

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हिन्दी ब्लॉगर के मनोविज्ञान पर एक सर्वे : आइये दो मिनट समय दे कर इसे भरें आदर्शों और वास्तविकताओं के मध्य एक प्राथमिक शिक्षक का श्यामपट in , , , - on 9:56 am - No comments एक निवेदन ब्लॉगर और सोशल मीडिया पर सक्रिय मित्रों से!

प्रो0 अनीता कुमार जी, मुम्बई के एक महाविद्यालय में वरिष्ठ प्रोफ़ेसर हैं। हाल फिलहाल उन्होने बातचीत और संदेश के माध्यम से बतलाया कि वह वे हिंदी ब्लॉगरों के संबंध में मनोविज्ञान के क्षेत्र में पीएचडी कर रही हैं जिसके लिए उन्हें आप सभी चिट्ठाकार मित्रों का अभिमत चाहिएऔर उनका विषय है - "हिन्दी ब्लॉगर"। अनीता कुमार जी हिन्दी ब्लॉगर्स के व्यक्तित्व और ब्लॉग चलाने के कारण जानने की कौशिश कर रही हैं। जिसमे तीन भाग हैं- (1) व्यक्तिगत सूचना (2) व्यक्तित्व प्रश्नावली (3) प्रेरणा प्रश्नावली. इस शोध के लिए उन्होंने एक ऑनलाइन सर्वे / प्रश्नावली तैयार की है, जिसे सिर्फ आपको टिक करते हुए भरना है। आप सभी से निवेदन है कि  है कि आप अपना मत/ राय अवश्य प्रदान करें।  इसके लिए अनीता जी ने तीन अलग अलग पृष्ठों का एक …

‘प्राइम-पाॅलिटिक्स’ कार्यक्रम के लिए फाइनेंसर खोजने में जुटे आर.आर.पी

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भारतीय राजनीति में स्त्रियों को ‘इंट्री’, तवज्ज़ो नहीं

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Report : Rajeev Ranjan Prasad
कम असरदार लोग राजनीतिक-दौड़ में बुरी तरह पिछड़ जाते हैं। वे आँकड़ों की निगाहबानी में नहीं आ पाते हैं क्योंकि उन्हें कुतों/बिल्लों को ढंग(?) से पालना-पुचाकारना और  उन्हें अपने आगोश में भरना नहीं आता है। भारत जहाँ पैदाइश से ही मर्दवादी सोच हावी है; की राजनीति में स्त्रियों की सहभागिता, नेतृत्व और हासिल मुकाम देखें, तो वह पुरुषों के बनिस्पत सर्वथा नीचे की कोटि में दर्ज है। ‘हाथ कंगन को आरसी क्या’ वाली तर्ज पर कहें, तो इंडिया टुडे ने अप्रैल 2011 में भारतीय जनगणना के समानान्तर आला भारतीयों हस्तियों की सूची प्रकाशित की थी जिसमें वैभवशाली/गुणशाली औरतों का नाम टाॅप-40 में अनुपस्थित था। अगले 10 हस्तियों में जो चार नाम शामिल थंे: चंदा डी. कोचर, परमेश्वर गोदरेज, सायना नेहवाल, कैटरीना कैफ।.....

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प्रिन्ट जर्नलिज़म: मशीनी ज़माने में अक्षरों की इबारतें

बहुरंगीय और बहुसंस्करणीय पत्र/पत्रिकाएँ -------  पृष्ठीय आसमान में साज-सज्जा का इन्द्रधनुष (एक टटोल, एक मूल्यांकन) Rajeev Ranjan Prasad ---------------------------------- Please visit on : www.missionmasscomm.blogspot.in
सहस्त्राब्दी का पहला दशक बीत चुका है। दूसरा दशक बीता जा रहा है। भारतीय समाचारपत्रों में जो अप्रत्याशित बदलाव होते दिख रहे हंै; राॅबिन जेफ्री उसे ‘भारत में समाचारपत्र क्रांति’ की संज्ञा देते हैं। वाकई भारतीय प्रायद्वीप में विज्ञान और प्रौद्योगिकी आधारित तकनीकी-क्रांति की लहर धुंआधार है। एक ही अख़बार के कई-कई संस्करण और हर संस्करण का अपना एक स्थानिक पहचान और पाठकीयता-बोध है। पठनीयता के स्तर पर सामान्य साक्षर से लेकर उच्चशिक्षा प्राप्त पाठक तक शामिल हैं। ये हर रोज समाचारपत्रों को पढ़ और सराह रहे हैं। यह उभार इसलिए भी दृष्टिगोचर है कि यह माध्यम कई अछूते क्षेत्रों अथवा सुदूरवर्ती इलाकों में अभी-अभी ‘लांच’ हुआ है। यह गति आमजन के बीच ‘सूचना एवं विचार’ की अनुपस्थिति का द्योतक है। शासन-व्यवस्था ने एक बड़े भू-भाग में बसी आबादी को सायासतः मुख्यधारा के जनमाध्यमों से काट कर रखने का उप…