वाह! रजीबा वाह!

1.

बहुत दिन हो गए थे-‘हँसे’,
जब बुरे फँसे, तो खूब हँसे।

2.

सुना था-‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोंचे’,
आज अपनी ही बालों का कचूमर निकाला।

3.

नौकरी लगी, तो क्या करूँगा,
पैर पसार हीक भर सोऊँगा।

4.

जिनके पास दौलत है बेशुमार
वे भी रहते हैं बुरी तरह बीमार।

5.

मोदी जी प्रधानमंत्री बनने के लिए खूब पापड़ बेले
आइए, हम सब बेले हुए पापड़ों को मिलकर खाएँ।

6.

जो कहा जाये-‘मत करो’, ‘नत करो’
दिल कहे, तो उसके लिए सब करो।
Post a Comment

Popular posts from this blog

‘तोड़ती पत्थर’: संवेदन, संघात एवं सम्प्रेषण

उपभोक्ता-मन और विज्ञापन बाज़ार की उत्तेजक दुनिया

भारतीय युवा और समाज: