मैं मर जाऊँ कबूल....पर आमजन के ‘अच्छे दिन’ जरूर आयें

प्रिय देव-दीप,


खुली हवा में साँस लेने के लिए भारत का राष्ट्रपति होना जरूरी नहीं है, न ही रायसीना हिल्स में रहना जरूरी है। हवा किसी के रहमोकरम पर नहीं बहती है। साँस लेने और छोड़ने की प्रक्रिया किसी पूँजीपति या तानाशाह के इशारे पर नहीं पूरी होती है। यानी हम स्त्री हो या पुरुष। राष्ट्रपति हों या साधारण विद्यार्थी। उम्रदराज पुरनिया हों या अभी-अभी जन्मा नवजात। 40 तल्ले की बिल्डिंग में रहते हों या बिना किसी छत या आसरे के खुली ज़मीन पर बना हुआ हमारा बसेरा हो। हवा, पानी, रोशनी आदि हमें  प्रकृति-प्रदत हंै। यानी इन्हें हासिल करने के लिए युद्ध लड़ने की नौबत नहीं आती है और न ही ऐसे किसी सिरफिरे प्रयास की जरूरत पड़ती है। अपनी कारगुजारियों से दुनिया के जन-जीवन को संकट में डालने वाले योद्धा अथवा वीर-बहादुर कतई नहीं कहला सकते हैं। इतिहास में जितनों का नाम दर्ज हैं; वे सब मात्र लाशों की नामशिलाएँ हैं, मुर्दा यानी दफनाए गये लोगों की ऐसी दस्तावेजी-पंजिका जिन्हें न तो पढ़ने की इच्छा होती है और न ही उन पर गुमान करने की कोई विशेष वजह समझ में आती है।

देव-दीप, आदमी कर्म से बड़ा होता है। सही कर्म करने का संस्कार धर्म से मिलता है। धर्म आज जो कहा जाता है वह कतई नहीं है। धर्म तो वह है जिसे हम चैबीसों घंटे धारण किए रखे; लेकिन हमें तनिक उकताहट न हो; ऊब या चिढ़ न हो। इस तरह की सोच-समझ वाला धर्म हमारे भावों को पवित्र रखता है। वह हमको दुनिया में फूल सरीखा खिलने की सीख देता है और चाहता है कि जब हम मुरझायें, तो हमारे आगोश में वह जीवनदायिनी बीज हो जिसमें अपनी ही भाँति उगने-उमगने, खिलने और खिलकर प्राकृतिक आभा-सौन्दर्य में इज़ाफा करने का बीजगुण विद्यमान हो।


देव-दीप, इस दुनिया में मानवता से बढ़कर कोई इबादत नहीं है। औरों के काम आना ही इंसान को इंसान बनाए रखने की सबसे पवित्र तालीम है। अपना-पराया संसार में कुछ भी नहीं है। न्यूटन का गति नियम सब पर बराबर लागू होता है। सभी वस्तुएँ गुरुत्वाकर्षण के सामान्य नियम से बँधे हुए हैं। तूफान, सुनामी, बाढ़, भूकंप आदि आने पर सबको समान क्षति और नुकसान पहुँच सकती है। हाँ, बचाव और राहत की सुविधा किसको कैसे और कितने समय से मिल पाती है या वह भी नहीं...यह जरूर व्यवस्था, कानून और सामाजिक वातावरण के अनुसार तय होता है।

देव-दीप, मान लो कि मैं असमय मर जाऊँ, तो क्या होगा? दुनिया जस की तस अपने भूगोल-अक्ष में घूमती रहेगी। अंतरिक्ष वैसे ही तारों-सितारों से आच्छादित होगा। सूरज और चन्द्रमा रोज की भाँति बेखटक उदय और अस्त होंगे। रात और दिन के क्रम सामान्य ढंग से बदलती रहेंगी। जो बचे रहेंगे वो आने वाले समय की राजनीति देखेंगे। गाँधी और नेहरू युग की आज जैसी यादें बची हैं उनसे हमारा वर्तमान सुधर या बन नहीं सकता है; वैसे ही मनमोहन या मोदी युग भी इतिहास हो जाएगा। तारीख रोज बदल रही है। एक-एक कर साठ महीने पूरे होने की अंतिम तारीख भी सामने आ जाएगी। प्रधानमंत्री मोदी जो कल के बेहतर होने का दिलासा देते हुए आज अपनी भाषा में महमह कर रहे हैं; हो सकता है कि उनकी विदाई मनमोहन से भी बुरे ढंग से हो या कि मोदी जी के ‘अच्छे दिन’ कहने का लक्ष्यार्थ ही हो पूँजीपतियों के अच्छे दिन, व्यापारियों के अच्छे दिन, नौकरीपेशावालों के अच्छे दिन....और ये ही लोग उन्हें भारत का अब तक का सबसे गुणी और श्रेष्ठ प्रधानमंत्री घोषित कर दें। यानी उनके प्रधानमंत्रीत्व काल में जनता-जनार्दन उसी तरह बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, भूमि, रोजगार, प्रगति, समृद्धि, स्वस्थ मनोरंजन, निष्पक्ष जनसंचार, नैतिक समाज, मूल्य आधारित संस्कृति, भ्रष्टाचारमुक्त राष्ट्र के लिए चिंचियाती रहे, चीखती-चिल्लाती रहे और वह पुरानी सरकारों की तरह इन मुद्दों/समस्याओं पर जरा-भी कान न दें।

....तो फिर भरोसे से भरोसा उठ जाना स्वाभाविक है। ऐसा नहीं होगा, इसके लिए लोग आश्वस्त कर रहे हैं...निश्चिंत कर रहे हैं। मैं भी चाहता हूँ कि मैं ज़िन्दा रहूँ या न रहूँ; लेकिन मोदी सरकार के वादों/आश्वासनों की लाज बची रहे क्योंकि आज आमजन इन वादों और आश्वासनों के भरोसे अनगिन सपने बुनने में जुटा है। यदि धोखा हुआ तो समझो कि यह आमजन के सपनों की मृत्यु है। और जैसा कि कवि पाश कहते हैं...सबसे खतरनाक होता है ज़िन्दा आँखों में सपनों का मर जाना। चलो, देव-दीप! शेष फिर कभी।


तुम्हारा पिता
राजीव
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