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Showing posts from April, 2011

अपना-अपना आकाश

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चन्द्रसेनजीत मिश्र


सभी को नहीं मिल पाता
अवसर
खुले आकाश के तले
अधलेटे निहारने का मौका
टिमटिमाते तारों को।

जिन्हंे है पूरा अवकाश
तारों और चाँद को निहारने की
उन्हें नहीं मिल पाता
भरपेट भोजन।

और जिनके पास
होता है
रोटियों का ढेर
उन्हें खुले आसमान के
तारें नसीब नहीं होते।

(युवाकवि चन्द्रसेनजीत काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रयोजनमूलक हिन्दी(पत्रकारिता) के स्नातकोत्तर के विद्यार्थी हैं। अंतस की हलचल को अपनी दृष्टि, अनुभव और संवेदना की धरातल पर परखते हुए उसे शब्दों में ढालने का उनका प्रयास अनोखा है, चाहे यदा-कदा ही सही। ब्लाॅग ‘इस बार’ में पढि़ए उनकी कविता ‘अपना-अपना आकाश’)

नवाचार अधारित टिकाऊ ग्रामीण विकास एवं राजनीतिक इच्छाशक्ति: संचार जागरूकता की असीम संभावनाएँ

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आज भारतीय गाँव ‘ग्लोबल गाँव’ की भूमिका में है। कहना न होगा कि ग्रामीण समाज की उपस्थिति ‘सूचना राजमार्ग’ को निरंतर विस्तार दे रहा है। एक ओर दूरसंचार साधनों की धमक बढ़ी है तो दूसरी ओर आँकड़ों में नियमित वृद्धि जारी है। जून 2010 तक की स्थिति के मुताबिक ग्रामीण फोन घनत्व 26.4 है जो ग्रामीण सशक्तिकरण को दर्शाता है। मौजूदा समय देश में 98 लाख ब्राॅडबैंड कनेक्शन उपलब्ध हैं जिनमें से 6 लाख गाँवों में लगे हैं। यह संचार साधनों द्वारा फैलाये गए जन-जागरूकता सम्बन्धी अभियान का हिस्सा है जिसने ग्रामीण परिवेश को विज्ञान, प्रौद्योगिकी और तकनीक के व्यावहारिक ज्ञान से परिचित कराया है। संचारगत इसी विकास को संचारशास्त्री एल्विन टाॅफ्लर ‘तीसरी लहर’ की संज्ञा देते हैं। और यही नवाचार है। नवाचार मानव-संसाधन को कुशल एवं दक्ष होने का अवसर देता है। आम-आदमी की सक्रिय सहभागिता ने ‘सकल नवाचार सूचकांक’ को पूर्णांक बनाना संभव कर दिया है। असल में नवाचार एक सार्वभौमिक प्रक्रिया है। इसका मुख्य उद्देश्य मानव-संसाधन के लिए अधिकाधिक साधन और अवसर का सृजन करना है। इस संदर्भ में विकासमूलक तकनीकी विकास पद्धति के अतिरिक्त राजनी…

जहाँ अनशन रोज हो रहे हैं

भारत की सामाजिक-पारिस्थितिक तंत्र और राजनीतिक भूगोल अरब जगत से भिन्न होने के बावजूद एक जैसी ही संक्रामक बीमारी से ग्रस्त है। यमन, ट्यूनीशिया, मिस्र और लीबिया जैसे हालात भले यहाँ देखने को न मिले, किंतु शोषित-दमित बहुसंख्यक जनता की आँखों में क्षोभ, असंतोष, पीड़ा और आक्रोश समान रूप से देखे जा सकते हैं। विश्व-पटल पर आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरते भारत के बारे में यह कहना कि भारत भविष्य का छत्रपति राष्ट्र है, सही है। लेकिन, देश की शासकीय व्यवस्था में व्याप्त अराजकता और भ्रष्टाचार की ‘अकथ कहानी’ इस देश की कमजोरी को ही प्रदर्शित करता है। जनता भ्रष्टाचार के इस गणितीय 'हाईएस्ट काॅमन फैक्टर' से बिल्कुल आजि़ज़ आ चुकी है।
विषबेल की भाँति पैर जमाए भ्रष्टाचार से भारत का प्रत्येक नागरिक दुःखी, त्रस्त एवं पीडि़त है। इस प्रवृत्ति से निजात पाने की छटपटाहट और बेचैनी सभी वर्गों में एकसमान देखी जा रही है। वे कारोबारी घराने जिनकी नेता, मंत्री, अफसर व हुक्मरानों से खूब छनती है; आज वे भी पूरी ठाठ से अण्णा हजारे के साथ खड़े हैं। उन्हें अपने पेशे की मर्यादा का भान है जिस पर भ्रष्टाचार न केवल भारी पड़…

सौ टके की एक-एक बात

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1. आम-आदमी रोजमर्रा की ढेरों छोटी-बड़ी मुश्किलों से घिरा है। इन समस्याओं को सरकारी मुलाजिमों ने और भी सुरसाकार बना डाला है। कागजी धरातल पर इन सेवकगणों की ताकत भले गौण दिखती हो किंतु जनता की जेब पर सर्वप्रथम गैरकानुनी हाथ यही फेरते हैं। कहाँ एक ओर जनता जिंदगी की मूलभूत जरूरतों से महरुम है। असमय अपने आत्मीयों को खो रही है; वहीं दूसरी ओर नया बना धनाढ्य वर्ग व्यक्तिकेन्द्रित ‘पूँजी की पराकाष्ठा’ पर बिछे जा रहा है।

2. भूख-प्यास से विकल इन समुदायों की समस्या अत्यंत विकराल है। राहत के जो संसाधन मौजूद हैं वे भी या तो सीमित हैं या फिर अपर्याप्त। तीस पर सरकार के नीति-नियंता नोच-खसोट के नए-नए तरीके ईजाद कर रहे हैं। भ्रष्टाचार के आवरण में लिप्त नेता-हुक्मरानों की धनलिप्सा जगजाहिर हैं जिससे उनके पार्टी-एजेण्डे पर छिड़के खुशबूदार इत्र कोई प्रभाव न छोड़ पा रहे हैं। सामाजिक-राजनीतिक विभिन्न पहलूओं की सूक्ष्म पड़ताल के साथ बारीक विश्लेषण करें तो चैंकाने योग्य निष्कर्ष सामने आते हैं। उनमें से एक तो यही कि शासकीय कर्मचारियों की लूट-शाखा सर्वाधिक समृद्ध है। ये सरकारी बाबू सदैव उन रास्तों को चैाड़ा करने के…

परीक्षा में फेल, न नेट हुए न जे0 आर0 एफ0

उम्मीद हरी-भरी थी कि इस बार खालिस पास न होंगे बल्कि जे0 आर0 एफ0 अवार्ड होगा. परिणाम आया तो पेटकुनिया सो कर घंटों से रो रहे हैं. मेहनत का सिला यह कि पाँचवी बार यूजीसी-नेट में ‘मन भर गदहे’ का सर्टिफिकेट मिल गया. घरवालों ने कहा कि क्या पढ़ते हो कि कुल जमा 200 में से 80-90 अंक भी नहीं आ रहे हैं। घास-फूस लिखोगे तो परीक्षक क्या खाक नंबर देगा. खर-पतवार लिखो और उम्मीद करो रुपली अंकों की. प्रतिभाशाली पास कर गए, बचे गंवार तुम जैसे श्रेणी के लोग. काम के न काज के, सेर भर अनाज के. केतली में चाय बेचो या फेरी करते हुए चायछनी. पढ़ाई-लिखाई तुम्हारे वश की बात नहीं. शादी कर ही दिया है. बच्चे भी पैदा कर ही लिए हो. अब गृहस्थी में मन रमाओ. देश-चिंता छोड़ कर घर-बार में हिया लगाओ. दो-अन्नी से चवन्नी या अठन्नी जो बना सको, तत्काल बनाना शुरू कर दो.

अब कौन इन्हें समझाए कि पिछली दफा मैं थोड़ा-सा के लिए चूक गया था. ‘जनसंचार एवं पत्रकारिता’ विषय में नेट/जे0आर0एफ0 होना आसान बात नहीं है. अंग्रेजी माध्यम से लिखने वाले तो बाजी मार भी ले जाते हैं. हिन्दी माध्यम से लिखकर पास होने वालों की अक्सर नानी याद आ जाती है. मुझ से…

वेबजगत की काम-वीरांगनाएँ

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तन से सुघड़।
मन से खुली।
अल्हड़। बिंदास।
सुपर्ब। फण्टास्टिक।
चोखा। माल।
किस्म-किस्म के जिस्म। रुपली पर नहीं, रुपहले पर्दे पर। कम एण्ड ओपन दि डोर। लोकलाज नहीं। शर्म या लिहाज नहीं। फटाफट टाइप। और चेहरे देखने शुरू। फोटो का धंधा। दृश्य का धंधा। नंगई और खुलेपन का बाज़ार। उपभोक्ता जो की-बोर्ड पर क्लिक के समय अपनी उम्र 18 से पार आंकता है। घंटों इंटरनेट पर। पोर्न साइटों पर। कामोत्तेजक चित्र एवं दृश्यों के साथ। काम-भावना से उन्मत इन क्लिपों में आपकी मर्जी पर तकनीकी दुनिया में समाया ‘आभासी लोक’ मनमर्जी करने लगता है। हम रिश्तों को भूल जाते हैं। सम्बोधन का अर्थ से सम्बन्ध-विच्छेदन हो जाता है। हर स्त्री जिसका फोटो पोर्नोग्राफी में चस्पा है, उनका मांसल शरीर और देह का उभार हमारे लहू के तापमान को बढ़ा देता है। आपके एक क्लिक पर सैकड़ों फोटो उभरते हैं स्क्रीन पर। वहीं हजारों उससे ‘डिफरेंट’ तस्वीरें हमारे मन में बनने लगती हैं। यह भी एक किस्म की अकथ कहानी है। आइए इसका एक सिरा पकड़ पड़ताल करें और देखें कि वेबजगत की इन काम-वीरांगनाओं की असली असलियत क्या है....?


(आप पढ़ सकेंगे ‘इस बार’ में जल्द ही - राजीव रंजन…

युवा राजनीतिज्ञों का मनोभाषिक संचार : शोध-पड़ताल

राजीव रंजन प्रसाद

समकालीन भारतीय राजनीति में ‘युवा राजनीतिज्ञ’ शब्द राजनीतिक प्रतिनिधित्व का एक महत्वपूर्ण घटक है, जिसमें संचार-सम्बन्धी सक्रियता सबसे प्रबल मानी गई है। सम्प्रेषणीयता की दृष्टि से ‘युवा राजनीतिज्ञ’ का सफल या असफल होना कुछ निश्चित कारकों पर निर्भर करता है। उदाहरणार्थ-व्यक्ति विशेष के आचरण और व्यवहार मंे प्रदर्शित मूल-प्रवृत्तियाँ, व्यक्तित्व, भाषिक व्यवहार, संज्ञानात्मक प्रत्यक्षीकरण एवं बोध, शैक्षिक-पृष्ठभूमि, सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिकोण, देश-काल-परिवेश से जुड़ाव, राजनीतिक परम्परा, विरासत से अंतःसम्बन्ध आदि-आदि। इस नाते किसी युवा राजनीतिज्ञ के व्यक्तित्व या आचरण-व्यवहार में प्रदर्शित अभिरुचि, अभिव्यक्ति के स्तर, ग्रहणशीलता के गुण और अनुभूति-संवेग संबंधी सभी प्रत्ययमूलक क्रियाएं उसके मन-मस्तिष्क की आवश्यक परिघटना मानी जाती हैं, जो संचार-संपादन के लिए अनिवार्य हैं।
संचार मनुष्य की प्राथमिक एवं अनिवार्य आवश्यकता है। संचार के माध्यम से मनुष्य अपने सामाजिक सम्बन्धों का न केवल निर्माण करता है, अपितु अपने व्यक्तित्व और सहसम्बन्धों का भी विस्तार करता है। विशेषकर राजनीति में सं…

ओरहन

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सुबह से उल्टा-पुल्टा हो रहा था. मैं मौन था, लेकिन मन चालू.
फोन आया तो खीझ हुई. एक और काम बढ़ गई थी. काॅल सीमा का था. अटेंड करना जरूरी. नही ंतो बाद में ओरहन ही ओरहन. शादी नई हुई होती तो मनाने के हजार नुस्खे इश्तहार की तरह एक के बाद एक परोस देता. हाथ कंगन को आरसी क्या? आजकल दुल्हे को थोकभाव एसएमएस आते हैं कि दुल्हन को कैसे रिझा कर रखें, अपने पर लट्टू कर दें. वहीं लड़कियों को डायरेक्ट काॅल. पतिदेव शनि-महराज न बने यानी कुपित न हों, इसके लिए ये-ये नियामत.
अभी-अभी जो वाक्या घटित हुई थी. उससे सीधी मुठभेड़ कर अपनी बीवी से फोनियाना संभव न था. पत्रकारिता माने जान की आफत. कब चाँद, कब तरेगन दिख जाएंगे, कोई अता-पता नहीं. फिलहाल रिंग दुबारा होते देख मैंने लपककर मोबाइल उठा लिया.
‘हैलो...,’
‘... ... ...’
(माफ करें, मेरा फोन स्विच आफ हो गया है. यह कहानी मोबाइल रिचार्ज होने के बाद सुनाई जाएगी, बशर्ते आप हुंकारी भरने की कृपा करें.)

अनशन का हासिल

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बहुप्रतीक्षित तारीख 5 अप्रैल।
आज से शुरू है अन्ना हजारे का आमरण अनशन। इस मुहिम में हर देशवासी शामिल है-अपरोक्ष या परोक्ष ढंग से। लोकतांत्रिक व्यवस्था की सड़ांध और सत्ता के नकारापन को दूर करने के लिए गाँधीवादी चिंतक तथा सामाजिक एक्टिविस्ट 74 वर्षीय अन्ना हजारे ने लोकपाल विधेयक को बिना शर्त लागू किए जाने की खातिर यह मार्ग चुना है।

गाँधी के सिद्धांतों को अडिग आस्था और विश्वास के साथ मानने वाले अन्ना हजारे के साथ इस वक्त तकरीबन 80 हजार लोग शामिल हैं। न्यू मीडिया के फेसबुक संस्करण पर करीब 23 हजार लोग हमराही या हमकदम बन चुके हैं। एक अनुमान के मुताबिक लगभग 25 लाख लोगों के इस आंदोलन में शामिल होने की आस है। युवा सहित कई सज्जन-लोग पूछ रहे हैं यह अनशन क्यों...? किसलिए...? ...और किसके लिए? बताने वाले बता रहे हैं सबकुछ।

इसी क्रम में नंबर 022615000792 पर एक मिसकाॅल करने का आग्रह भी कर रहे हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर देश भर से जुटे 200 लोग उपवास के साथ अनशन प्रारंभ करने हेतु कटिबद्ध हैं। इस बात की सूचना मय देशवासियों को विविध माध्यम से दी जा चुकी है और अभी भी दिए जाने की प्रक्रिया जारी है।

अधिकांश …