Friday, April 22, 2011

ओरहन




सुबह से उल्टा-पुल्टा हो रहा था. मैं मौन था, लेकिन मन चालू.
फोन आया तो खीझ हुई. एक और काम बढ़ गई थी. काॅल सीमा का था. अटेंड करना जरूरी. नही ंतो बाद में ओरहन ही ओरहन. शादी नई हुई होती तो मनाने के हजार नुस्खे इश्तहार की तरह एक के बाद एक परोस देता. हाथ कंगन को आरसी क्या? आजकल दुल्हे को थोकभाव एसएमएस आते हैं कि दुल्हन को कैसे रिझा कर रखें, अपने पर लट्टू कर दें. वहीं लड़कियों को डायरेक्ट काॅल. पतिदेव शनि-महराज न बने यानी कुपित न हों, इसके लिए ये-ये नियामत.
अभी-अभी जो वाक्या घटित हुई थी. उससे सीधी मुठभेड़ कर अपनी बीवी से फोनियाना संभव न था. पत्रकारिता माने जान की आफत. कब चाँद, कब तरेगन दिख जाएंगे, कोई अता-पता नहीं. फिलहाल रिंग दुबारा होते देख मैंने लपककर मोबाइल उठा लिया.
‘हैलो...,’
‘... ... ...’
(माफ करें, मेरा फोन स्विच आफ हो गया है. यह कहानी मोबाइल रिचार्ज होने के बाद सुनाई जाएगी, बशर्ते आप हुंकारी भरने की कृपा करें.)

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हँसों, हँसो, जल्दी हँसो!

--- (मैं एक लिक्खाड़ आदमी हूँ, मेरी बात में आने से पहले अपनी विवेक-बुद्धि का प्रयोग अवश्य कर लें!-राजीव) एक अध्यापक हूँ। श्रम शब्द पर वि...