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Showing posts from November, 2010

मानव-संचार : मानव-मन की पटकथा

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आधुनिक संचार-पद्धति द्वारा अर्जित सर्वोत्तम उपलब्धियाँ; एक ओर, मौलिक प्राकृतिक खोजों एवं मानवीय प्रयासों पर आधारित है जिस कारण यह अधिकाधिक विकसित स्वरूप ग्रहण करते हुए समाज पर सशक्त प्रभाव डाल रहा है। दूसरी ओर, संचारगत उपलब्धियाँ मनुष्य मात्र से जुड़ी हुई हैं। आज इसका प्रभाव सार्वजनिक जीवन के प्रायः सभी क्षेत्रों में दृष्टिगत है। संचार सम्बन्धी वैज्ञानिक चिंतन से प्राप्त ये तकनीकी उपलब्धियाँ मानवजाति के इतिहास की विभिन्न मंजिलों अथवा पड़ावों के यथार्थ चित्र प्रस्तुत करती हैं। मिस्र के पिरामिडों के निर्माताओं की तकनीकी क्षमता को, माया जाति की संस्कृति को हम सराहे बिना नहीं रह सकते हैं और इसी तरह हम पुरातात्त्विक खोजों से मिले सैंधव एवं हड़प्पा सभ्यता के साक्ष्यों या फिर प्राचीन यूनानी-रोमन इमारतों के मलबे को श्रद्धापूर्वक देख सकते हैं। यही नहीं पुराने ज़माने में प्रचलित धूप-घड़ी, दिशासूचक यंत्र, गुफाचित्र, भित्तिचित्र, शिलालेख, दूत, हकहारा आदि ऐसे सूचना-स्रोत हैं जो मानव सभ्यता के विभिन्न अंग-उपांगों का इतिहास-बोध कराते हैं।
निर्विवाद सत्य है कि समय की वेगवान उड़ान आधुनिक संचार-प्रक्रिया की …

शायद मैं बड़ा हो गया हूँ

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-श्रीकांत मनु

रात को सोने के बाद
और सुबह जगने से पहले
चलती थी तब
ट्रेन
छुक-छुक कर
सीटी देकर
घर के सामने वाली सड़क पर
जिस पर चला करते थे
जीप, बस-ट्रक दिनभर।

लेदरे के नीचे
टेढ़ी टांग वाली एक झलंगी खटिया पर
हल्की नींद में
सुनाई पड़ती थी
तेज होती,
धीमी होती
सीटी की आवाज़
कभी पूरब से, कभी पश्चिम से,
मुझे पता था कि ये ट्रेन
मेरे सोने का इंतजार करती है
और जागने से पहले
चक्कर काटती रहती है
मेरे घर के चारों ओर।

सामने कुछ दूर
एक काले रंग का हाथी
बैठता था
सूँढ़ लिटाकर
बिना हिल-डुले, पत्थर-सा
सिर दिखता था बड़ा सुंदर,
सोचता था
उठता होगा
रात को सोने के बाद
और सुबह जागने से पहले।

मील भर दूर नदी की
कल-कल, छल-छल सुनाई पड़ती थी तब
आधी नींद में भी
पुआल पर बिछी एक ठंडी साड़ी पर,

सोचता था
छूती होगी उसकी लहरें
मेरे घर को रात को सोने के बाद
और सुबह जागने से पहले,
कभी-कभी तो लगता था
तैरेगा मेरा घर
पानी की लहरों पर
सुबह जगने के भी बाद।
पूरब के ओटे पर बैठकर
कलेवा करता था तब
टीन के कटोरे में,
और दिखती थी आसमान में
एक थाली से निकलती
कई रंग-बिरंगी थालियाँ
नाचती हुई
सुबह जगने के बाद।

अब रात आती नहीं कभी
सब सच साफ दिखता है
दिन के उजाले में,
वह सच
जो कभी रहा ही नहीं,
आज पता है
म…

ओ माय गॉड! यह बत्ती तो गुल हो गई

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‘‘...15वें लोकसभा चुनाव के शपथग्रहण समारोह में हिन्दी में शपथ लेकर पूरे देश का मन मोह लेने वाली पूर्वोतर की युवा सांसद अगाथा संगमा आज अखबारी और टेलीविजन परिदृश्य से गायब दिखती हैं। अन्य युवा नेताओं मसलन प्रदीप कुमार मांझी, अशोक तंवर, मीनाक्षी नटराजन, मौसम नूर, जितिन प्रसाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट मानों ‘बक्कफुट’ पर ‘शिफ्ट’ कर दिए गये हैं जबकि कांग्रेस महासचिव राहुल गाँधी की हर तरफ ‘जय हो’ रही है। उन्हें पुनरोदय और पुनर्जागरण का सूत्रधार भी कहा जाने लगा है। खासकर बिहार और उत्तर प्रदेष््रा में वह बदलाव के संवाहक के रूप में प्रचारित हैं। इन दोनों प्रान्तों में आगामी विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस क्या गुल खिलाती है, यह देखा जाना अभी बाकी है।’’
(मासिक पत्रिका ‘सबलोग’ के अप्रैल, 2010 अंक में प्रकाशित स्वयं के आलेख से लिया गया अंश)

राहुल जी, हर जिले-कस्बे में ‘एयरपोर्ट’ क्यों नहीं है...?

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बिहार चुनाव में नेतागण आए तो फिर उसी तरह आए, जैसे पिछली दफा आये थे। राहुल गाँधी से लोगों की उम्मीदें कुछ ज्यादा ही थीं। लोगों को उड़नखटौला से अलग कुछ खास देखने की चाह थी लेकिन वो इस बार भी उसी तरह आये, जैसे पिछली दफा आये थे। अब लोगों के ज़ेहन में एक सवाल उठ खड़ा हुआ है कि राहुल जी, हर जिले-कस्बे में ‘एयरपोर्ट’ क्यों नहीं है...? दृश्य बदले जा सकते हैं लेकिन आँख तो नहीं बदले जा सकते न! और बदलेंगे भी तो कितनी आँखें बदलेंगे, भाई! करीब-करीब हर आँख में पीड़ा, चूभन और किरकिरी है। जनता के पास कहने के मौके कम हैं, सो उसकी आँखों ने जो देखा बस उसी को बेलागलपेट कह दिया है। आजकल तो अपनी पीड़ा सबके सामने कहना भी बाजारू विज्ञापन माना जाने लगा है। इसीलिए जनता की जुबान ज्यादातर बंद ही रहती है। कुछ खास तरह के अक्लमंद लोग ऐसे चुपाधारी जनता से कुछ बुलवा लेते हैं। फिर उसी को राजनीतिक चुनाव-प्रबंधन के तहत मंचासीन नेता के सामने पेश कर देते हैं। पुर्जा मिलते ही अमुक नेता के भाषण और बयानबाजी में गर्जन-तर्जन के भाव-बिंब बढ़ जाते हैं। तेवर आक्रामक हो उठते हैं और आवाज़ तल्ख़। अग्रिम पंक्ति में तालियाँ बजती हैं। शोर की भ…

जनता का आदेश बना बिहार जनादेश

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बिहार की जनता तथाकथित ‘बीमारू प्रदेश’ में रह भले रही हो लेकिन वह बीमार नहीं है। वह अपना आग-पाछ सब जानती है। बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम से अभिभूत नीतीश सरकार को इस जीत की व्याख्या इसी रूप में करनी चाहिए। अपने राजनीतिक साहस और वैकल्पिक सोच की बदौलत मजबूत जनादेश पाये नीतीश कुमार के लिए आगे की राह कंटिकापूर्ण है। यह एक चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी है जिसकी उलटी गिनती बैण्ड-बाजे, पटाखे और आतिशबाजी का दौर थमते ही शुरू हो जाएगी। आँकड़े बताते हैं कि जद(यू)-भाजपा गठबंधन को कुल 243 सीटों में से 206 सीट हासिल हुए हैं; वहीं कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी को केवल 4 सीट नसीब हुए हैं। यह परिणाम इस मायने में भी महत्त्वपूर्ण है कि पिछली दफा नवंबर 2005 में मुख्यमंत्री पद पर आसीन नीतीश कुमार को सिर्फ 143 सीटें ही मिली थीं जिसमें इस बार बढ़ोतरी हुई है। गठबंधन में शामिल भाजपा को पिछले चुनाव की तुलना में जहाँ 36 सीटें अधिक मिली हैं वहीं जद(यू) ने 27 सीटे और हथिया ली है। इस तरह भाजपा 91 विधानसभा सीटों के साथ फायदे में है तो जद(यू) का पलड़ा 115 सीट प्राप्त कर फिलहाल बेहद मजबूत स्थिति में है।
विधानसभा सीटों के ये बदल…

स्त्री.वेदना का कारुणिक चित्रण

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काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग द्वारा प्रस्तुत ‘माध्वी’ नाटक का मंचन स्वतंत्रता भवन में किया गया। अंग्रेजी विभाग के शोध-छात्र पिनाक शंकर भट्टाचार्य के निर्देशन में मंचित इस नाटक की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगायी जा सकती है कि मंत्रमुग्ध दर्शकों ने नाटक के दौरान खूब तालियां बजायी। माध्वी की मुख्य भूमिका निभा रही स्वाति अपने उत्कृष्ट अभिनय से दर्शकों का मन मोह लेने में सफल रही, वहीं मुनिकुमार गालव का अभिनय कर रहे सायन ने अपने चरित्र को जीवंत बना नाटक में प्राण फूँक दिया। राजा ययाति की भूमिका में मनीष एवं ऋषि विश्वामित्र की भूमिका में उमेश को दर्शकों ने तालियों से खूब सराहा। सूत्रधार के रूप में अभिनय कर रहे तुषनिम और अनिंदिता ने नाटक के सभी चरित्रों एवं पात्रों से दर्शकों को शुरू से अंत तक जोड़े रखा। अन्य सहयोगी कलाकारों में अमर, ऋतपथिक, आनंद, मिथुन, दिव्येन्दु, अभय और सुमित्र की भूमिका जबर्दस्त रही जिनकी छोटी से छोटी भूमिका को देख दर्शक रोमांचित और भावविभोर थे। संगीत के सुंदर संगत से वातावरण को मोहक बनाने का काम विदिशा और अर्पिता ने किया। नाट्य-मंचन के दौरान अभिनय-परिवेश क…

ख़बर है पूर्वी एशिया में आग लगी है

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दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया के आपस में सुधरते सम्बन्धों को तेज झटका लगा है। नवंबर माह के अंतिम सप्ताह के बीच हुए भीषण गोलेबारी की वजह से दोनों देशों में भारी तबाही मची है। योंग्पेयोंग टापू में आग की लपटें हैं। आसमान में धुएँ की धौंकनी जल रही है। आरोप-प्रत्यारोप के मध्य दोनों देश एकदूसरे पर लगातार तोप से गोले दाग रहे हैं। दक्षिण कोरिया को अमेरिका का समर्थन हासिल है। वह उत्तर कोरिया पर 200 गोले दागने के आरोप मढ़ रहा है। इस कथित हमले में अपने दो सैनिकों के मारे जाने को लेकर दक्षिण कोरिया तैश में है। उसके पास अपने देश से दागे गोले का हिसाब नहीं है जो योंग्पेयोंग टापू में धधकता दिख रहा है। बीबीसी ने अपने वेबसाइट पर इससे सम्बन्धित कुछ फुटेज अपलोड किए हैं जिसे दक्षिण कोरिया के सभ्य नागरिकों द्वारा कैमरे में कैद करते हुए देखा जा सकता है। बीबीसी ने उन तस्वीरों को भी जारी किया है जिसमें उत्तर कोरिया के सैनिक शांत, स्थिर और खुशमिजाज नजर आ रहे हैं। उनके चेहरे पर हिंसा, आक्रामकता और क्रूरता के कोई लक्षण नहीं मौजूद है। खबर में यह चेतावनी अवश्य है कि-‘‘अगर उसे उकसाया गया तो वह ‘पवित्र युद्ध’ छेड़ सक…

भुलावे का इतिहास-भूगोल

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जब मैं छोटी उम्र का था तो देश के भूगोल से परिचित था। चौहद्दियाँ ज़बानी याद थी। किस कोने में कौन-सा देश, खाड़ी और समंदर है, सब पता था। कोई पूछता तो आवाज़ के सुर-ताल बदल जाया करते। कहन-शैली में शोखी और गर्वीलापन इस कदर हावी हो जाता कि लगता जैसे मैं चाँद पर उतरा पहला अंतरीक्ष यात्री नील आर्म स्ट्रांग हँू। और सामने वाले को यह बताना चाहता हँू कि देखो मैंने अपनी हथेली चाँद के सर पर रख दी है। उस समय दिमाग की पोटली छोटी थी। पर उसमें इतिहास-भूगोल की बातें ढेरों अटती थीं। हिसाब की भी किताब थी जिसमें समकोण न्यूनकोण से बड़ा तो अवश्य था किंतु वह खुद अधिककोण से छोटा होता था। यह अंतर इतनी साफ थी कि काग़ज पर चाँद-मीटर रख कर मनमाफिक कोण बनाने में मुझे बेहद मजा आता। जब मेरी बढ़ती उम्र चार्ल्स डार्विन के ‘विकासवाद के सिद्धांत’ को पढ़ने की हुई तो लगा जैसे अब मैं सयाने होने के लिए अनुकूलित हो रहा हूँ। मेरे बोल के गंध और सोच की त्वरा में फर्क आ रहा है।
मुझे याद है, उस समय भी मेरा साबका राजनीति से नहीं पड़ा था। राजनीति की बात मैं नागरिकशास्त्र से समझा करता था। वैसे यह मेरे महत्त्व का विषय कभी नहीं रहा। इतिहास-भूग…

अब 11 बजे के बाद दिखेगा इंसाफ

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एक किशोर अपने उम्र का अतिक्रमण करते हुए दोस्तों से कह रहा था, ‘‘यार जब ‘यस’ और ‘नो’ में हाँ वाला विकल्प चुनते ही मैं मजे से पोर्नोग्राफी देख लेता हँू तो फिर यह पूछने का क्या मतलब कि क्या आपकी उम्र 18 वर्ष से कम है।’ यह पूछना क्योंकर जरूरी है इसके जवाब से हम सभी वाकिफ हैं। देखिए, सेक्स करने की इच्छा और साजो-सामान लगभग सभी जीवित प्राणियों को कुदरती तौर पर मिले हैं। लेकिन सामाजिक-सांस्कृतिक बाध्यताएँ/मान्यताएँ रद्दोबदल की तमाम गुंजाइशों को देखते हुए भी खुल्लमखुल्ला देह-सम्बन्ध बनाने की इजाजत नहीं देती। संचार मंत्रालय तो उसी समाज का कृत-दास है। इसीलिए उसने हाल में अश्लिलता के आरोप में चर्चित दो कार्यक्रमों ‘राखी का इंसाफ’ और ‘बीग बॉस’ को रात्रि 11 बजे के बाद ही दिखाए जाने की ताकीद की है। इस फैसले से ऐसे कार्यक्रमों को बेधड़क दिखलाने की जो पूँजीवादी प्रवृति आजकल विकसित हुई है, को अंकुश लगेगा। सो इस फैसले पर ज्यादा चिल्लपों या हो-हल्ला मचाना समीचीन नहीं कहा जा सकता है।
देखिए, हम सोच में कितने भी उत्तर आधुनिक क्यों न हों? अपने बेटे या बेटी के सामने क्या किसी अजनबी व्यक्ति के सामने भी खुद की ह…

देशी-भाषा में बोली-बात

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हिन्दी दिवस बीत गया। पर मेरे जेहन में एक बात अटकी रह गई है। कोई बात किसी दिवस के भरोसे क्यों छोड़ी जाए? हिन्दी दिवस पर ही हिन्दी की बात क्यों हो? हिन्दी सप्ताह या पखवाड़ा तभी क्यों मनाएँ, जब घोषित तारीख-दिवस आस-पास या करीब हो। हमें बोलने की आजादी है अर्थात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। दूसरे शब्दों में कहें तो सांविधानिक रूप से मिले मौलिक अधिकार का अनुच्छेद 19(अ) वाला पैरा। हाँ तो खैर, आजकल खूब हो-हल्ला होता दिख रहा है कि अपनी भाषा का सिर-पैर बचाईए। क्या तो अंग्रेजी से खतरा है। पैंताने से सिराहने आ बैठी है यह गोरी-नस्ल की तथाकथित अक्लमंद जुबान। लोगबाग यह भी कहने लगे हैं कि घोर निर्लज्जता के ऐसे दिन आ गए हैं कि टेलीविज़न चैनलों पर हिन्दी की तो बोली-बात ही बंद हो चुकी है। मेहमान-मेज़बान वाले दिलचस्प कार्यक्रमों को अंग्रजीदां होस्टों-गेस्टों ने हथिया लिया है। सरकारी समाचार बोलते जीव भी हिन्दी में खुद को ‘अनईजी’ फिल कर रहे हैं वहीं अंग्रेजी भाषा में उनकी जुबान फर्राटा दौड़ती है। रेडियो के कामगारों की भी यही गत है। हिन्दी बोलते हुए जरा-सा असहज हुए नहीं कि खट से अंग्रेजी में टिपियाना शुरू कर दिए।
अब…

इक सपने में देशकाल

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सपना हर कोई देखता है। आज मैंने भी देखा। बस देखने में अंतर था। वह यह कि एक मोटा-मलंद आदमी बार-बार सपने देखने को कह रहा था। मानो सपना न हुआ मिस्र का पिरामिड या फिर फ्रांस का एफिल टॉवर या अमेरिका का स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी। खैर, अभी मैं आपका सामान्य ज्ञान बढ़ोतरी का जिम्मा नहीं ले सकता। सो सीधे सपने वाली बात पर आता हँू। जी हाँ, तो मैं कह रहा था यह कि सपना मुझे ऐसे दिखा रहा था वह मोटा-मलंद जैसे मदारी वाले दिखाते हैं बंदर-नाच के साथ। सपेरे दिखाते हैं जिंदा साँप का जादू-खेल। लो आपका मन है तो उस्ताद और जमूरे को भी उदाहरण में शामिल कर लो। अपन के देशी-जेबी में उदाहरणों की कमी थोड़े है। एक घोटाले का नाम लिया नहीं कि दूसरा नाम जबरिया जबान पर चढ़ बैठता है। मधु कोड़ा का घोटाला वाला कागजी घोड़ा अभी रेस में आगे चल ही रहा था कि स्पेक्ट्रम घोटाले ने उसे धर दबोचा। रेस का दस्तूर ही ऐसा है कि आगे निकलने वाला विजेता ही होता है। अभी ए. राजा विजयी मुसकान के मालिक हैं। देश के लिए उन्होंने काफी कुछ किया-धरा है। जनता उन्हें निष्पाप और निष्कलंक अवश्य साबित करेगी।
दरअसल, हर विजेता को कुछ अलग हटकर पाने के लिए बहुत कुछ गवा…

कठघरे में इंसाफनेत्री

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‘इमेजिन टीवी’ पर एक ‘रियलिटी शो’ शुरू हुआ है है-‘राखी का इंसाफ’। हर तरह के लड़ाई-झगड़े और अडं़गे-पचड़े जो अक्सर मियां-बीवी के आपसी तनातनी और तू-तू-मैं-मैं की उपज होती हैं, को अब इंसाफनेत्री राखी सावंत सलटाएँगी। हाल ही में राखी के फैसले से आहत हुए एक व्यक्ति की मौत ने इस कार्यक्रम की लोकप्रियता को बढ़ाने में काफी मदद की। इस घटनाक्रम के बाद मीडिया बाज़ार में इस कार्यक्रम की चवन्नी हैसियत को बढ़िया ‘ब्रेक’ मिला, लिहाजा यह कार्यक्रम जल्दी ही अधिकांश लोगों की निगाह में आ गया है। इससे पहले भी राखी कई मजेदार ‘स्टंट’ कर चुकी हैं जिसकी चर्चा ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ की तरह है। लोकतांत्रिक भारत का न्याय-नियंता और अपने सर्वाधिकारों में संप्रभु सुप्रिम कोर्ट को अचरज होना चाहिए कि जो न्याय-तंत्र बीसियों बर्षों से इंसाफ की आस में झोल खाते मामलों को ‘फास्ट ट्रैक कोर्ट’ के प्रावधान के बाद भी नहीं निपटा सका है, उसे एक रियलिटी शो अपने स्व-प्रयास से रफा-दफा करने के लिए कमरकस खड़ा है। ऐसे में भला किसी को क्या गुरेज? लेकिन अफसोस! ऐसे कार्यक्रम अपने नाम में चाहे कितने भी धाँसू क्यों न होते हों, उनके साथ का पूँजी-…

सांस्कृतिक प्रतीक और अनुवाद

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आधुनिक परिप्रेक्ष्य में उत्तर आधुनिकता ‘ब्रिकोलेज सिस्टम’ को आत्मसात कर रहा है जिसमें भिन्न-भिन्न संस्कृतियों को आपस में जोड़ा गया है। ‘पेस्टीच कल्चर’ का भारतीयकरण जनसमाज में ‘संस्कृति के अनुवाद’ अर्थात ‘ट्रांसलेसन टू कल्चर’ के माध्यम से हो रहा है। वर्तमान संदर्भों में अनुवाद की दृष्टि से सांस्कृतिक प्रतीकों का महत्त्व बढ़ा है। भारतीय टेलीविज़न-लोक में प्रयुक्त कार्टून चरित्रों के लिए पौराणिक सांस्कृतिक प्रतीकों को चुनना संस्कृति के अनुवाद का एक विशिष्ट उदाहरण है। विदेशों में ‘टॉम एण्ड जैरी’, ‘मिकी माउस’, ‘टेल्स पिन’, ‘डोनाल्ड डक’ आदि कार्टून चरित्रों को गढ़ा गया। बच्चों को विशेष प्रिय जंतु-चरित्रों में मानवीय-गुण और स्वाभाव डालकर और अधिक प्रभावी बनाने की चेष्टा हुई। इस नए ढांचे को ‘ही-मैन’, ‘बैट-मैन’ जैसे ‘सुपर हीरो’ की भांति पहचान मिली। पूंजी-तंत्र को सबल बनाने में इन चरित्र नायकों की भूमिका उल्लेखनीय रही जिसे बाद में भारतीय जनमाध्यम ने संस्कृति के अनुवाद द्वारा अपने कार्टून-चरित्रों में अपना लिया।

विदेशी कार्टून चरित्रों की तर्ज पर भारतीय संस्कृति में लोकआस्था से जुड़े वैसे सांस्कृतिक प…

वैश्विक मीडिया के घेरे में भारतीय संस्कृति

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विश्व की तमाम संस्कृतियाँ परंपरा का अंग हैं जिसमंे साहित्य, संगीत, कला, विज्ञान, धर्म, दर्शन और राजनीति सभी समाहित हैै। संस्कृति सदैव अपनी एक विशिष्ट भावभूमि के साथ भाषा में अभिव्यक्त होती है। बोले गए शब्दों में अपने क्षेत्र, जमीन, मौसम, संवेदना और भावना का असर होता है। सांस्कृतिक गौरव और विरासत भाषा को समृद्ध तथा विचार को परिपक्व बनाते हैं। संस्कृति सम्प्रेषण हेतु भाषा को उपकरण की भाँति साधती है जिसमें सामाजिक, सांस्कृतिक संचेतना का प्रचार-प्रसार संभव हो पाता है। आज भारत में देशज-संस्कृति और पश्चिमीकृत संस्कृति के बीच का फाँक निरंतर गहरा हो रहा है। एक तरफ तकनीक और प्रौद्यौगिकी आधारित विकास करवट ले रहा है तो दूसरी ओर भारतीय मूल्यबोध, नैतिकता, सदाचार, सयंम, अनुशासन, सद्भाव और संतोष जैसे पुरातन मूल्य कमजोर एवं विघटित हो रहे हैं। आज ज्ञान, तथ्य और जानकारियों की कसौटी स्वयं भी पूर्वग्रह से प्रेरित है जो हमें भाषांतरण, लिप्यंतरण या कहें कि अनुवाद द्धारा प्राप्य है।
मनुष्य की ‘ग्लोबल’ अवधारणा संचारगत विभेद, नस्लीय दृष्टिकोण और सांस्कृतिक विषमता की वजह से खटाई में है। सूचना-राजमार्ग पर नव-सा…