Tuesday, May 31, 2011

गहरे एकांत में आत्मीय मूरत गढ़ता काव्य-संग्रह ‘सीढ़ियों का दुख’



काव्य-संग्रह ः सीढ़ियों का दुख
कवयित्री ः रश्मिरेखा
प्रकाशक ः प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली-110002
मूल्य ः 150 रुपए

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चुनिन्दा कविताओं के उद्धरित अंश :


कटोरियों की हिकमत में
शामिल है जीने की जिद
त्माम जिल्लतों के बीच भी
वे बना लेती हैं अपनी जगह। (कटोरी/पृ0 14)


शब्दों की दुनिया से मुलाकात
कितना मुश्किल है किसी खास चश्मंे से
चीजों को पहचानने की आदत डालना
भले ही यह चश्मा अपना हो
या कभी मुमकिन है
अपनी नज़र को अपने ही चश्में से देखना। (चश्मा/पृ0 16)


अपनों के लिए कुछ बचाने की खातिर ही
बनी होगी तह-दर-तह
चेहरों पर झुर्रियों की झोली
जिसे बाँट देना चाहता होगा हर शख़्स
जाने से पहले
कि बची रह सके उसकी छाप और परछाई। (झोला/पृ0 17)


अपने अनंत सपनों से दूर भागती
अवहेलना के संगीत सुनती
उपहास के कई दृश्यों में शामिल
कोकिल आत्मा अनुभव करती है
उसका तो कोई समाज नहीं है। (काली लड़की/पृ0 21)


इन दिनों रोशनी के आतंक में
अक्सर तिरोहित हो जाती है
शब्दों की रोशनी
जिसे हम साफ़-साफ़ देखते हैं। (लालटेन/पृ0 22)


मेरी किताब पर
तुम्हारी लिखावट में लिखा मेरा नाम
अभी भी मेरे पास जगमगा रहा है
स्वर्णाक्षरों में लिखा नाम
क्या ऐसा ही होता है? (स्वर्णाक्षर/पृ0 24)


कई-कई मजबूत गाँठों और कड़े छिलकों से बनी
अपनी ज़मीन पर सीधा तना ईख
कैसे खींचता होगा धरती से
इतनी सख़्ती इतनी मिठास एक साथ। (ईख/पृ0 30)


चमकती दाँतों की प्रदर्शनी के इस दौर में
मेरी मुसकान पूस महीने की ओस की तरह
मेरी आँखों में रहती है मोनालिज़ा की तस्वीर। (तुम/पृ0 31)


अक्सर समय के इतिहास में
बच जाते हैं वे ही नाम
जिनके पास नहीं होती है
अपनी तख़्ती। (नाम की तख़्ती...पृ0 36)


आज जब सूचनाओं को बदला जा रहा है
हमारी स्मृतियों में
शब्दों के घोंसले में दुबक रहे हैं सपने....
वे हैरान-परेशान हैं इस ख़बर से
कि सपने और स्मृतियाँ भी
ख़रीद-फरोख़्त की वस्तुएँ हैं
और जज़्बात बाज़ार की एक पसंदीदा चीज़। (समय/पृ0 38)


आज कितना मुश्किल होता जा रहा है
इतने बड़े भूमंडल पर
बचाए रखना एक कोना
जहाँ सिर पर अपनी छत हो और
उस छत से उड़ान के लिए एक आसमान। (छत/पृ0 43)


मौत भी अब कहाँ रही पहले वाली मौत
सुबह भी अब नहीं रही पहले वाली सुबह। (हालात/पृ0 52)


रात के आईने पर कितना भी गहरा पुता हो स्याह रंग
गौर से देखो तो उसमें
दिखाई पड़ेगा सुबह का चेहरा। (आईना/पृ0 54)


बाँधते हुए हवाई पुल
पहरुए फ़तह करते रहे हैं हवाई किले। (पहरुए/पृ0...58)


पृथ्वी की कोख़ में पल रही
पूर्वजों की सृजन-स्मृतियाँ
कालातीत कलाकृतियों के नमूने
आसमा में गहरे उतर आया
उनका आदिम स्पर्श। (पत्थरों पर अंकित था इतिहास/पृ0 71)


इस तिरंगे आकाश के नीचे
दूरंगी होती देश की अधिकांश राजनीति के बीच
मुझे कब तक झेलनी है
उनके अपराधों की बनती
लंबी फेहरिस्त। (कब तक/पृ0 72)


बीते वक्त की कतरनें
बन रही थीं गीली आकृतियाँ
पानी के कैनवास पर
नींद आराम से सो रही थी शोर के बीच
और मैं जाग रही थी सन्नाटे में भी चुपचाप। (पानी का कैनवास/पृ0 80)


पेड़ों की हरियाली-सी होती हैं लड़कियाँ
दुनिया के सारे नीड़
बनती हैं उन्हीं की टहनियों पर। (पेड़ों की हरियाली/पृ0 84)


वर्त्तमान की सारी आस्थाएँ
शीशे की तरह चिटकती हैं ख़ामोश
सुरक्षा के नाम पर
साज़िशे अंतहीन। (आखि़री नक्शा/पृ0 88)


मेरी बेटी!
नहीं आना इस धरती पर
कि यहाँ नहीं बनी अभी
कोई जगह तुम्हारे लिए। (नहीं आना इस धरती पर/पृ0 90)


लगातार दिखाए जाते हुए
सुखद आश्वासनों के दृश्य
शब्दों की मूसलाधार वर्षा
और एलोरा की गुफाओं-सी लम्बी हमारी चुप्पी
तुम्हें कहीं से आश्वस्त करती हैं
कि हमारी परिभाषा बदल रही हैं। (उस सुबह के लिए/पृ0 93)


पर पापा तुमने नहीं सिखाए थे
पीछे से होते हमलों के जवाब
आत्मा को गिरवी रखना
दूसरों को सीढ़ियों की तरह इस्तेमाल
फिर ज़िन्दगी के मोर्चे पर हारते
कैसे हो पाते विजयी हम। (पिता/पृ0 96)


आधी-अधूरी बनी रहकर भी माँ
इंगित करती रही दिशाओं की ओर
सिखाती रही जूझना। (माँ/पृ0 98)


इधर मैं सोच रही हँू
मेरे डैनों के बाहर ये जब जायेंगे
इनके लिए दुनिया क्या ऐसी ही रहेगी। (बच्चों की दुनिया/पृ0 100)


तुम्हारे स्नेह की रोशनाई ने
भर दिए मेरी कलम में अशेष शब्द
जिसे तुम्हीं ने दिया था कभी
बनाए रखने को वजूद। (राग-बीज/पृ0 102)


जानती हँू रूकेगा नहीं जान लेने का सफर
एक को याद करने की कोशिश में कई को भूल जाने का
अवसाद। (जान लेने का सफर/पृ0 104)


शोषितों को सीढ़ियाँ बना
शीर्ष चढ़े लोगों ने
आसमानी सितारों में बना ली
अपनी दुनिया
लेकिन अँजुरी भर जल ही तो
पूरा समंदर नहीं होता। (इतनी उदास क्यों हो?/पृ0 106)


तमाम सुरक्षा कवचों के बीच
सिंहासन से शहीदी मुद्रा से
लगातार प्रवाहित हो रहा है प्रवचन। (युद्ध के समय/पृ0 110)



क्या सही है, क्या ग़लत
सबकुछ तय नहीं किया जा सकता
युद्ध के समय
जरूरी नहीं चीजें वहीं हो
जहाँ चाहते हैं हम इन्हें रखना। (युद्ध के समय/पृ0 110)


नदियों, पक्षियों और हवाओं का शोर
क्यों सुनाई नहीं पड़ता
क्यों हर तरफ दहशतअंगेज ख़बरों का शोर है। (यूज एण्ड थ्रो/पृ0 112)

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संपर्कः निराला निकेतन के पीछे, झुनी साह लेन,
रामबाग रोड, मुजफ्फरपुर-842001. बिहार
मोबाइल- 09430051824

(कविता-संकलन ‘सीढ़ियों का दुख’ की समीक्षा जल्द ही ब्लॉग ‘इस बार’ में प्रकाश्य-राजीव रंजन प्रसाद)

Monday, May 30, 2011

जनोक्ति

जनता के लिए नाक का प्रश्न नहीं है ‘NAC’ बिल


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यह विधेयक सीधे-सीधे तुष्टिकरण की नीति है. वोट-बैंक की राजनीति भी.
साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा की जो परिभाषा विधेयक में वर्णित हैं
जिनका जिक्र सुरेश चिपूलकर जी ने अपने पोस्ट(www.janokti.com)में क्रमवार
ढंग से किया है; वे तर्क-आधारित कम निराधार अधिक हैं. यह समझ से परे है कि
आखिर इस विधेयक को किन तथ्यों, आँकड़ों एवं वस्तुनिष्ठ शोधों के आलोक में तैयार
किया गया है. विधेयक में प्रयुक्त यह कथन कि साम्प्रदायिक हिंसा सदैव बहुसंख्यक
वर्ग के द्वारा चालित होते हैं, नेशनल एडवाइजरी कॉन्सिल की बुद्धिमता पर
सवाल खड़े करते हैं. पक्षपातपूर्ण रवैए या पूर्वग्रह की नीति से देश का
फायदा कम नुकसान ही अधिक है. अतः सम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा विधेयक पर
जोरदार बहस-मुबाहिसे की जरूरत है. विचार कभी व्यक्तिपरक नहीं होने चाहिए.
ध्यान दें कि यह व्यक्ति कोई समुदाय विशेष या सांगठनिक इकाई भी हो सकता
है जिसे हम अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक खाँचों में बाँट सकते हैं.

पीछे मुड़कर देखें तो सन् 2002 में गुजरात में हुए साम्प्रदायिक दंगे ने
अमानवीयता की सारे हदें तोड़ दी. सर्वधर्मप्रिय गुजराती समुदाय जिन
सत्ता-प्रतिष्ठानों के परोक्ष षड़यंत्रों का शिकार हुई उससे आज की तारीख
में वहाँ की जनता काफी हद तक उबर चुकी है. लेकिन उन काली तारीखों में
आमआदमी ने जलालत और वहशी कुकृत्य के जो अंजाम भुगते; उनका
आकलन-समाकलन लिंग, वर्ग, वय, जाति, धर्म या सम्प्रदाय विशेष के रूप में कर
पाना असंभव है. बहुसंख्यक समाज के ऊपर तोहमत मढ़कर अल्पसंख्यक जमात को
बहला-फुसला लेने की यह कुत्सित चाल ‘पब्लिक’ जान चुकी है. जनता यह भी जान
चुकी है कि सामंती ध्येय वाली केन्द्र सरकार की इस विधेयक को लाने के पीछे असली मंशा
क्या है? मित्रों, प्रायश्चित के प्याले में गंगाजल पी लेने से अगर
मोदी-सरकार के पाप नहीं धुल सकते हैं, तो गारंटी कि प्रायोजित ढंग से
दलित-बस्ती में जाकर एकदिनी प्रवास करने से दलित-उत्थान भी नहीं संभव है.
और नहीं नेशनल एडवाइजरी कॉन्सिल की ओर से प्रस्तावित साम्प्रदायिक एवं
लक्षित हिंसा विधेयक से दूरगामी परिणाम ही देखने को मिलेंगे. वैसे भी यह
विधेयक नैक(NAC) के लिए नाक का प्रश्न भले हो, आमआदमी के लिए तो यह महज
वोट-बैंक हथियाने का जरिया भर है.
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Saturday, May 21, 2011

कल्पना

ओम और कमला

ब्लॉग ‘इस बार’ को यह कविता सप्रेम भेंट



का गुरु, मोटइबऽ कि अइसन के अइसन रहबऽ?

ल सुन एगो कविता जरका
लिखनी हईं टटका-टटका।

जिन्स कमर में आटे ना तोहरा
टी-शर्ट मारे झख।

कोट-पैन्ट के तऽ हाल न पूछऽ,
पहन लऽ त लाग बतख।

48 किलो वजन बाटे अउर
100 ग्राम बाऽ घलुआ।

पढ़े-लिखे में कलम-घसेटू
हँसेला जे पर कलुआ।

प्रथम श्रेणी में पास करिके
आज तक बाड़ऽ फिसड्डी।

नून-तेल के भाव का जानऽ तू,
घर बैइठल मिले गंजी-चड्डी।

छोड़ऽ बबुआ कलम-मास्टरी
अब करऽ जरका काम।

देह-दुबराई से ना देश सुधरी
चाहे बीती जीवन तमाम।

हा....हा....हा....ही....ही....ही....हू....हू....हू
हे......हे......हे......हो.........हौ.....हौ....हौ....!

Saturday, May 14, 2011

पत्रकारिता के 'रुग्ण' तथा 'रुदन' काल से उबरिए

नोट : इस आलेख को आप पढ़ सकेंगे 'इस बार'
में दो माह बाद.तब तक मनाइये छुट्टी गर्मी की.

Friday, May 13, 2011

चुनावी असर : पश्चिम बंगाल में हरा हुआ लाल झन्डा

हाँ जी, दोस्तों! ममता दीदी ने लाल सिग्नल को किया हरा. ट्रेन खुली तो है,
पर स्पीड कैसी रहती है या फिर किस दिशा में यह आगे बढती है, बस देखते रहिये.




नोट : माफ़ करेंगे, शीर्षक के अलावा कुछ नहीं 'इस बार' में. छुट्टी का आनंद ले.

प्रार्थना : आतंकी साये के बीच नये सुबह की तलाश

सुबह की रोशनी अभी मजे से क्षितिज पर फैली भी नहीं थी कि पाकिस्तान लहूलुहान हो गया. शुरूआती सूचना के मुताबिक फि़दायीन हमले में 70 लोगों की मौत हो गई है, जबकि 40 लोग जख़्मी हैं. मरने वालों में ज्यादातर अर्द्धसैनिक बल हैं. पेशावर से 35 किलोमीटर दूर स्थित चरसद्दा शहर में मामूली अंतराल पर हुए दो आत्मघाती विस्फोटों ने शहर के तापमान को इस लू-तपिश के मौसम में सुबह-सुबह ही अंगार बना दिया. यह आत्मघाती विस्फोट चरसद्दा शहर में अवस्थित एफसी किला जो कि अर्द्धसैनिक बलों का ट्रेनिंग सेन्टर है; के पास उस समय घटित हुई जब अर्द्धसैनिक बल के जवान बस में सवार हो रहे थे. उनकी छुट्टियाँ हो चुकी थीं और वे अपने-अपने घर जाने की मौज में मगन थे.


पाकिस्तान में जो आज अभी-अभी घटा है. यह आखीरी या अंतिम आतंकी कार्रवाई नहीं है. ओसामा को मारकर �न्याय हो चुकने� का ढिंढोरा पिट रहे अमरीका को इस पर गौर फरमाने की जरूरत है. वैश्विक राजनीति की कुत्सित चालें जिसका शिकार आम-आदमी है; उसके जन्मदाता खुद अमरीका और पाकिस्तान ही हैं. जहाँ तक मैं सोच पा रहा हँू, इस घटना से आहत सभी हैं, भारी कोफ्त और आवाज़ में ग्लानि सभी की है. कल की तारीख़ में कुछ और बुरा या भयानक घटित न हो, इसके लिए प्रार्थना और दुआ भी सभी के मन में चल रहा है. क्योंकि इस आतंकी कहर ने हर इक शहर को अपनी चपेट में ले लिया है. सुदूर स्थित गाँव-दालान और चबूतरा-चैपाल सभी इस घटना की खुलकर मज़मत करते हैं.


दरअसल, आशंका तो उसी समय दृढ़ हो गई थी जिस समय अमरीका ने ओसामा के मौत की आधिकारिक घोषणा की थी. संभावना व्यक्त की जा रही थी कि ये आतंकी बदले की नीयत से किसी भी बड़ी आतंकी घटना को अंजाम दे सकते हैं. आज पूर्व सोचा सच सामने है. पाकिस्तान ही नहीं भारत भी इस तरह के खूरेंजी हमलों का कई दफा शिकार हो चुका है जिसमें न जाने कितनी जानें गई हैं, कितने जख़्मी हुए हैं, और कितने लूल-अपंग आज भी अन्धेरे की काल-कोठरी में कैद हैं? हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह हमला आतंकियों को पनाह और प्रश्रय देने का परिणाम है जिसमें पाकिस्तान की संलिप्तता जगजाहिर है. भारत के खिलााफ पाकिस्तान ने शत्रुतापूर्ण साजिश रचने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ा है. मुंबई ब्लास्ट से लेकर मुंबई ताज प्रकरण के बीच उसने भारत को कई ऐसे आतंकी चोट दिए हैं जिसे कुरेदने पर पुराना जख़्म आज भी और गहरा हो जाता है. कह सकते हैं कि जिस जाल को पाकिस्तान ने भारत को फांसने के लिए बुना, आज बदली हुई परिस्थिति में वह खुद उसी में उलझ गया है. अमरीका भी इसी नक्शेकदम का राही है. कहा तो यह भी जाता है कि विश्वपटल पर अमरीका ने ही ओसामा जैसे आतंकी को गढ़ा, उभारा और अंत में अपने ही हाथों उसका शिकार भी कर डाला.


खैर, मानवीयता को भेदती और शत्रुता के वेष में आमोख़ास के चेहरे पर शिकन पैदा करती यह घटना पूरी दुनिया के सामने जो भयावह तस्वीर पेश कर रही है. उस पर गहन मंथन की जरूरत है. यह दुर्निवार घड़ी है जिसके बारे में थमकर सोचने की जरूरत है. दुनिया का भूगोल आज जिस तरह चरमपंथियों के निशाने पर हैं. लोग हताहत हो रहे हैं. बनी-बनायी दुनिया उजड़ रही हैं. छोटे-छोटे बच्चें भय और ख़ौफ के साये में सिकुड़ रहे हैं. क्या यह क्षम्य है? निरपराध लोग चाहे लैटिन अमरीका में बेमौत मारे जाएं या कि एशिया-यूरोप में; लहू का कतरा गोरा या काला नहीं होता है. हमें उन सभी की पुरजोर मुख़ालफत करनी चाहिए जो हमारी दुनिया-जहान को दोजख़ में तब्दील करने पर आमदा है. हम मनुष्य हैं, खुदा की बंदगी करने वाले, रसूल से फरियाद करने वाले, ईसा-मूसा की नेकनियती पर बिछने वाले या फिर राम-रहीम और बुद्ध-महावीर की चरण-वंदना करने वाले. हमारी तहज़ीब, संस्कृति, रीति और रवायत कितनी भी अलग क्यों न हो? हम इंसानियत को चाहने वाले अमनपसंद लोग हैं. हमें अपने नौनिहालों के लिए ऐसी आबाद दुनिया की ख़्वाहियश हैं जहाँ मुल्क की सरहद और चैहद्दियाँ तो मौजूद हों लेकिन नफरत, ईष्र्या, कट्टरता, साम्प्रदायिकता और खूनी रंजिश का बसेरा न हो?


अतः आइए, इस आतंकी ख़ौफ के सिलसिले को यहीं ख़त्म करे. बेहतर कल के लिए आशाओं की दीप प्रज्ज्वलित करें. आतंकी साये के बीच यह एक किस्म की नये सुबह की तलाश है. उम्मीद ही नहीं पूरा विश्वास है कि अच्छा चाहने वाले के साथ बुरा एक बार, दो बार या कुछेक अधिक बार हो सकता है; लेकिन बार-बार या हमेशा बुरा ही हो...यह हरगिज़ संभव नहीं है.

Tuesday, May 10, 2011

रंग जिंदगी के

बढि़या लिखले बाड़ऽ तू आपन संस्मरण. गंवउन के लोग के गंवार कहे के चलन भले होखे. जितना प्यार रिश्तन में गांव-ज्वार में बा ओकर रति भर अंश ना मिलिहे शहरवन में. अपनापा जेतना गांव में आजो बाटे. परिवार में रचल-बसल बा मेल-बहोर आजो खूब झोंटा-झोंटी, लड़ाई-तकरार, गाली-गलौज होखै के बादो में. उ देख के गर्व होला कि हम गांव के बिटवा हनी.

न दैन्यम् न पलायनम्

विचार त खूब निक बाटे. बाकिर इ हमनि के मति-बुद्धि में अटे तब न! विवेक के त कोठा-अटारी पर ढांक-तोप के रख देले बानिजा. खैर, जानकारी रउआ बहुत बढि़या दिहली, और जरूरी बात बतइले हनि अपना ब्लाॅग ‘न दैन्यम् न पलायनम्’ के माध्यम से.

असीमा

अइसन पोस्ट लिख दिहलू तू कि मन कुछ सोचे पर विवश हो गइल. हमनि के केतना आपन-आपन रटिलाऽजा. लेकिन दीदी हो तोहार बाबूजी त आपन स्वार्थ के उतारि के आपन जिन्दगी देस खातिर लगा दिहले, तोहनियो जानि आपन पापा के प्यार पाव खातिर तरस गइलूजा. खैर, हमहू खालि दिलासा देवे के और का कहि सकिला.

तितली: आज़ाद बुलबुल

तितली: आज़ाद बुलबुल: "आओ नन्हीं बुलबुल आओ मीठा मीठा गीत सुनाओ पिंजरा सोने का बना दूँ हीरे उसमें लाख जड़ा दूँ फल मीठे दूंगी खाने को ठंडा ठंडा जल पीने ..."


जानताड़ू दीदी, इ कविता जब हम आपन बबुआ देवरंजन के सुनाइब, त उ खूब खुश होई. अइसन कविता एहू से निक लागेला काहे कि एकर तार मन के डोर से जुड़ जाला. चलऽ 2 महीना तक हम देखब का लिखताड़ू तू हमरा देवरंजन के उमिर के लइकन खातिर.

बाल सजग

ए लइकन लोग बढि़या प्रयास करऽताड़जा हो. तोहन जानि के मनवा में आपन देसवा के लेके अभिए से एतना फिकिर बा, इ देखि के मन जुड़ाइ गइल. करीब दू महीना के हमहू छुट्टी पर बानि. ए से तोहन जाना के लिखल हम देखत रहब खलिहल में. हमरा तरफ से मन से निक और अंदर से ठीक बनऽजा. आज देसवा के हमनि के इहे के जरूरत बा हो.

का लिखताड़ जा आपन ब्लाॅग पर, आवतानि देखे...!




काहे त मन जहुआइल बा. लगऽता बड़ी दिन्हा से घूम-फिर नइखे भइल न! ऐही से मनवा में हमार सब तमाशा हो रहल बा. अपना यूनिवर्सिटी में त पेड़ पर आम के टिकोरा लागल देख मन ईंटा-पत्थर चलावे के करता. कबो अधिया रतिया में पुरवा में लस्सी पीएला मन करे लागता. आईआईटी और मेडिकल के का कहल जाव आर्ट्स और सोशलो साइंस के लइकन सब खूब अंग्रेजी नाम वाला ठंडा पिअताड़न जा. देर राति के सड़क किनारे खड़ा होइके आपन छाति जलाव ताड़न जा सिगरेट पी-पी के.


देखा-देखी ही सही आजतक खूब गिटिर-पिटिर कइनी हमहू बैठी के कंप्यूटर पर. ई-मुआ कंप्यूटर हऽ. आफत के पुडि़या भी हऽ. ना खाली सामने रखल चाय के रंग बदल देवेला, बल्कि हमरा से कोसो दूर रह वाली हमार औरतियो के नराज कर देवेला. उनकर हमार खटर-पटर से नफरत हऽ. अब उनका के हम का बताइ की ज्यादा पढ़निहार भइला के फायदा बा, तो ओकरा से ज्यादा नुकसानो बउये ढेरो.


सो चल भईल छुट्टी. राजू बबुआ के यात्रा शुरू, अब हम न! बताइब कि कहाँ का पक रहल बा? कवन ब्लाॅगवा पर कव चीज रचल जा रहल बा? दिदिया-भैया लोगन के संसार में के-के का महत्त्व और जगह बनवले बा? कइसन-कइसन कमेन्टवा देइके मन जुड़वले बा? अब इ यात्रा में निकल ही गइनी त फिर फलतुआ में ‘इस बार’ के बारे में बार-बार का सोचेला बा? सारा बतिया बखानब हम एही जगिहा से न!


त भईया लोगन और बहिनी लोगन, बाबू-चाचा, माई और चाची लोगन भी अगर कंप्यूटर से दोस्ती-यारी कर लेले होइ त, उहो लोगन आईं जा, मिल-बहुरि के चलि जा ब्लाॅग ‘इस बार’ के ब्लाॅग यात्रा-पर. इ यात्रा जब ले थमी, तब ले जुलाई शुरू हो जाई...पानी टिपिके लागि...और हमनि के तब तलक ले हरिया गइल रहब जा.

आज ले खड़ी हिन्दी भइल बंद. पीएच0डी0 करतानि त एकर का मतलब, सगरो घड़ी हिन्दीए बोलब. कोई हमार ठिका लेले बा थोडे....,

राहुल गाँधी का भट्टा पारसौल आना तय......(x)

ख़बर के नक्शे पर भट्टा पारसौल

ब्लाॅग ‘इस बार’ ने कलम चलानी चाही, तो
एक शुभचिन्तक मित्र ने कहा कि यह ख़बर लिखने के लिए
लिखना है या फिर सोचने के लिए. मैं सोचने लगा.
चिन्तन अभी तक जारी है...!

Sunday, May 8, 2011

ये रिश्ता क्या कहलाता है...?

हम दो थीं
एक-दूजें पर मरने-कूटने वाली
लड़ने-झगड़ने वाली
आपस में अक्सर।

हम दो थीं
चाँद-सितारों की तरह
आसमान में उगने वाली
अल्हड़ और आप ही में मगन।


हम दो थीं
जिनके साथ घूमने-फिरने पर
नहीं थी कोई रोक-टोक
न ही कोई प्रतिबंध।

आज हम दोनों हैं
पर हम पर बंदिशे हजार
शहर से आए शब्दकोश में
क्या तो लिखा है
हम दोनों ‘लेस्बियन’ हैं!

अमरीकी इरादों का डीएनए टेस्ट जरूरी

''पाक में मारा गया ओसामा!’’
‘‘अलकायदा हुआ बिन लादेन!’’
‘‘दुनिया पहले से ज्यादा सुरक्षित!’’
‘‘जस्टिस हैज बीन डन!’’

समाचारपत्र की उक्त पंक्तियाँ ओसामा बिन लादेन के मारे जाने से सम्बन्धित हैं. 1 मई की देर रात पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से सटे ऐबटाबाद में अमरीका ने सीधी कार्रवाई को अंजाम देते हुए ओसामा के अंत की घोषणा की, तो पूरे विश्व में एकबारगी सनसनी फैल गई. आतंकी संगठन अलकायदा का मुखिया 54 वर्षीय लादेन दुनिया का सर्वाधिक वांछित आतंकवादी था जिस पर अमरीका ने 1 अरब रुपए से अधिक का इनाम घोषित कर रखा था. 9/11 की चर्चित घटना के बाद ओसामा के नाम से पूरी ख़ासोआम दुनिया वाकिफ़ हो गई थी और वह विश्व की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘टाइम’ द्वारा इतिहास के 10 सबसे कुख्यात भगोड़े आतंकी की सूची में पहले स्थान पर शामिल किया जा चुका था. उसकी मौत की सूचना क्या मिली, अमरीकी जनता उसी रात सड़कों पर उतर आई. जश्न में डूबे अमरीकी नागरिक व्हाइट हाउस के सामने ‘यूएसए...यूएसए’ चिल्ला रहे थे. इस ख़बर से वे कितने आह्लादित थे, इसका अंदाजा वहाँ खड़े हुजूम को देखकर लगाया जा सकता था.

वास्तव में यह अमरीकी प्रशासन और सीआईए की जीत थी जिसने पाक को बगैर कोई अग्रिम सूचना दिए वो करतब कर दिखाया था जिसकी कल्पना इस्राइल के अलावा शायद ही कोई दूसरा मुल्क कर पाता. अमरीका की यह कार्रवाई पूरी तरह एकपक्षीय थी. अमरीकी ख़ुफिया एजेंसी सीआईए ने पाकिस्तानी-तंत्र के किसी सिपाहसलार को इसकी भनक तक नहीं लगने दी. और जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को ओसामा के मारे जाने की ख़बर मिली; तो उस वक्त पूरा अमरीका जश्न में डूब चुका था. इसके पीछे का असली रहस्य या भीतरी सचाई क्या है, यह जानने के लिए सिवाय इंतजार के और कोई चारा नहीं है.

अपनी सरज़मीं पर आतंकवादियों को पनाह देने को लेकर पाकिस्तान की पहले भी काफी छीछालेदर हो चुकी है. पाकिस्तान ने आतंकी गतिविधियों में किसी किस्म का सहयोग देने या फिर अपने देश में इनके प्रशिक्षण शिविर होने सम्बन्धी आरोप को हमेशा ख़ारिज किया है. भारत ने इस बाबत कई बार अन्तरराष्ट्रीय मंच से आतंकी गतिविधियों को पाकिस्तानी संरक्षण हासिल होने सम्बन्धी मसले को जोरदार ढंग से उठाया, लेकिन विश्व के किसी भी देश ने इस ओर अपेक्षित सहयोग नहीं किया. लेकिन इस घड़ी पाकिस्तान की स्थिति साँप-छछूंदर वाली है जिसे निगलना और उगलना दोनों मुश्किल हो चुका है. पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की जवाबदारी बनती है कि वह इस मामले में पूरी ईमानदारी बरतते हुए अपनी स्थिति स्पष्ट करें. यह इसलिए भी जरूरी है कि लादेन को जिस जगह मारा गया है, वह कोई खोह या दुर्गम इलाका न हो कर अतिसंवेदनशील सुरक्षित स्थान है. ऐबटाबाद में घटनास्थल से कुछ ही दूरी पर पाकिस्तानी सैन्य अकादमी का अवस्थित होना न केवल चैंकाता है; बल्कि संदेह का भरपूर अवसर देता है. अमरीका के आतंकवाद निरोध और गृह सुरक्षा मामलों के राष्ट्रीय उप सुरक्षा सलाहकार जाॅन ब्रेनन का कहना तर्कसंगत है-‘यह नहीं माना जा सकता है कि लादेन का पाकिस्तान में कोई सहयोगी तंत्र नहीं था.’

मशहूर अमरीकी पत्रकार जाॅन रीड की एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है-‘‘दस दिन जब दुनिया हिल उठी.’ लेकिन जब जनमाध्यमों ने ओसामा के मारे जाने से सम्बन्धित ख़बरें देनी शुरू की, तो दुनिया तनिक भी हिली-डुली नहीं. अमरीका को छोड़ दुनिया भर में जश्न का माहौल भी कम ही देखने को मिला. भारत की ओर से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बेहद सयंत लहजे और संतुलित भाषा में प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ‘‘ओसामा का मारा जाना अलकायदा और सैन्य आतंकी संगठनों से निपटने की दिशा में महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है.’’ यह जरूर है कि अमरीका से आयातित इन ख़बरों को दुनिया ने बड़े ही चाव से देखा, पढ़ा-सुना और गुना. इस अभियान को सीआईए ने आॅपरेशन जेरोनिमो नाम दिया था जिसकी सफलता ‘जेरोनिमो-ईकेआईए’ के रूप में कूटीकृत थी जिसका अर्थ था-‘ओसामा-दुश्मन को मार गिराया गया.’ अमरीकी उच्चाधिकारियों के बीच लाइव आॅपरेशन देख रहे बराक ओबामा की देहभाषा ‘आउट आॅफ फार्म’ और उनका ‘एड्रिनलिन लेबल’ निम्न दिखा. लेकिन अभियान के सफल होने के तुरंत बाद उन्होंने दुनिया के सामने जो कहा-‘हम जो चाहते हैं वो कर दिखाते हैं.’ उस घड़ी बराक ओबामा में अमरीकी हेकड़ी साफ दिख रही थी. उन्होंने बेहद संक्षिप्त एवं नपे-तुले शब्दों में जितना असरदार कहा, वह दरअसल अमरीका की कूटनीतिक विजय थी.

अमरीकी विशेष बल ‘नेवी सील्स’ ने पूरे अभियान को चार हेलिकाॅप्टरों के माध्यम से अंजाम दिया. ओसामा को ख़त्म करने में अमरीकी रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ 40 मिनट लगे. इस दौरान उनका एक हेलीकाॅप्टर भी नष्ट हो गया. ओसामा के परिजनों में से कुछ को अमरीकी सेना अपने साथ लेती गई ताकि उनसे गहन पूछताछ की जा सके. अमरीकी सेना कंप्यूटर हार्ड डिस्क भी अपने साथ ले गई है जिसमें आतंकी गतिविधियों से सम्बन्धित अहम सुराग होने का दावा किया जा रहा है. वैसे तो अमरीकी ख़ुफिया विभाग उन समस्त सूत्रों एवं सुरागों पर कड़ी निगरानी रखने का काम पहले घंटे से ही शुरू कर चुकी होगी जो हार्ड डिस्क के माध्यम से उसके हाथ लगी है. लेकिन हार्ड डिस्क ड्राइव मिलने की पुष्टि और खुलासा अमरीका ने सार्वजनिक तौर पर तकरीबन 6 घंटे बाद किया.

सन् 2001 में अलकायदा ने जब ‘वल्र्ड ट्रेड सेन्टर’ पर हमला बोला तो उसमें तकरीबन 3000 लोग मारे गए. 9/11 की इस ख़ौफनाक घटना के बाद ओसामा बिन लादेन को लेकर अमरीकी महकमें में धर-पकड़ सम्बन्धी गतिविधियाँ तेज हो गई. वैसे सीआईए उसे दबोचने के फि़राक में 1990 से ही जुटी थी; लेकिन वह अमरीका और गठबंधन सेना को चकमा देने में हमेशा सफल रहा. यह वही सीआईए है जिस पर आरोप है कि उसने 1979 में सोवियत रूस के खिलाफ ओसामा को ट्रेनिंग दी थी. लेकिन खाड़ी युद्ध के दौरान उपजी तनातनी में ओसामा अमरीकी नीतियों के खिलाफ हो गया. फिर उसके बाद अमरीका से जो सम्बन्ध बिगड़े, तो अंत तक सुधरने का नाम नहीं ले सके. ताज्जुब भले हो, किन्तु सचाई है कि अमरीका अपनी हित-साधना में बेहद प्रवीण है. वह कब किसका हितैषी बन जाए; और कब किसका दुश्मन, इसका पता लगाना टेढ़ी खीर है. यों तो नीतिशास्त्र की एक बहुश्रुत कथन है-‘‘राजनीति में न तो कोई स्थायी मित्र होता है और न ही दुश्मन.’’

फिर भी, ओसामा की अमरीकी-विरोध सम्बन्धी नीति स्पष्ट थी. उसका सार्वभौमिक लक्ष्य इस्लामी कट्टरवाद का समर्थन तथा आतंकी संगठनों के बीच जेहाद था. अलकायदा के कई लड़ाकों का मानना था कि ओसामा जंग के दौरान आगे की पंक्ति में खड़ा हो कर दुश्मनों पर वार करता है. मृत्यु के अंतिम क्षण में भी ओसामा अपने बचाव के लिए एक औरत को ढाल की तरह इस्तेमाल कर सकता है, ऐसा मानने वाले उसके गिरोह में शायद ही कोई हो. उनका मानना है कि ओसामा अलकायदा के मुखिया की तरह कम दोस्त की भाँति ज्यादा व्यवहार करता था. क्या इन्हीं सब वजहों से तालिबानी लड़ाकों में उसकी लोकप्रियता शिखर पर थी. उसका मजबूत संगठन आन्तरिक टूट-फूट से बचा रहा. और उसके समर्थित लोग उसे मसीहा की तरह पूजते रहे. ये सवाल ऐसे हैं जो ओसामा के शव को समुद्र में बहा दिए जाने के बाद भी सभी को झिंझोड़ती रहेगी.

अमरीका ने ओसामा की छवि को न सिर्फ महिमामंडित किया, सर्वाधिक भुनाया भी. अब उस प्रेतछाया से मुक्ति काफी हद तक संभव है. उम्मीद की जानी चाहिए कि अफागानिस्तान से अमरीकी सैनिक-बल हटेंगे और वहाँ आन्तरिक लोकतंत्र बहाल होगा. अमरीका की वापसी पूरी दुनिया के लिए एक नज़ीर बन सकती है. अमरीका के बारे में एक आमफ़हम धारणा है कि उसके पैर जिस सरजमीं पर पड़ जाते हैं; वह वहाँ की चैहद्दी, सरहद और हद सबकुछ भूल जाता है. फिलहाल, ओसामा के मारे जाने से उसके मौत से सम्बन्धित अटकलों से छुटकारा मिलेगी. कई प्रतिष्ठित समाचारपत्र उसके ख़ात्में से जुड़ी ख़बरें छाप चुके हैं. कईयों ने तो पर्याप्त सबूत पेश कर अपने दावे की पुष्टि भी की है. स्वर्गीय बेनजीर भुट्टो सहित मौजूदा राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी तक यह कह चुके हैं कि ‘ओसामा दुनिया को अलविदा कह चुका है.’ खुद अमरीका अफगानिस्तान स्थित तोराबोरा की पहाडि़यों पर भीषण गोलीबारी कर चुका है जहाँ उसे ओसामा के छुपे होने का अंदेशा था. आज वे सारे कयास बेमतलब साबित हुए जब अमरीका ने दुनिया को बताया कि ओसामा अभी तक जिन्दा था जिसे उनके जांबाज लड़ाकों ने बीती रात मार गिराया.

सचाई जो हो, लेकिन जाहिरा तौर पर ओसामा बिन लादेन को अमरीका ने ऐसे समय में मारा है जब अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की छवि धूमिल हो रही है और उनकी लोकप्रियता का कद नित घट रहा है. हालिया कार्रवाई को बराक ओबामा ने आगामी चुनावों के मद्देनज़र हरी झण्डी दी है, यह काफी हद तक सच प्रतीत होता है. आर्थिक मंदी से उपजे हालात में अमरीका की अर्थव्यवस्था जिस ओर करवट ले रही है, उसमें बराक ओबामा की पुरातन छवि एकदम मिसफिट बैठती है. लिहाजा, यह माना जाने लगा है कि ओबामा भी अब पिछले राष्ट्रपति जार्ज डब्लयू बुश के नक्शेकदम पर चलना चाहते हैं; ताकि अमरीकियों की आक्रामकता और सर्वश्रेष्ठ-ग्रंथि को भुनाया जा सके.

यह इसलिए भी जरूरी हो चला है कि इस समय अमरीका अरब देश लीबिया में बुरी तरह फँसा है. वह वहाँ अपने युद्धक पंजे से लोकतंत्र-विरोधी कार्रवाइयों को अंजाम दे रहा है जिसकी विश्वभर में तीखी आलोचना की जा रही है; उसके मद्देनज़र ‘ओसामा के अंत’ सम्बन्धी ख़बर ‘प्लाॅट’ किया जाना साफ समझ में आती है. कर्नल मुअम्मर गद्दाफी जिन्हें अपने ही देश लीबिया में जनता के भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है; पर निशाना साधते हुए अमरीकी सेना जिस प्रकार ताबड़तोड़ हमला बोल रही है वह हरगिज़ तर्कसंगत या उपयुक्त कार्रवाई नहीं है. पिछले दिनों कर्नल गद्दाफी के बेटे सहित उनके छोटे-छोटे नाती-पोतों को मौत के घाट उतार दिया जाना, अमरीका और नाटो देशों को कठघरे में खड़ा करता है. बर्बर हमलों के द्वारा अमरीका आखि़र अपनी किस लोकतांत्रिक पक्षधरता और वैश्विक जवाबदेही को प्रदर्शित करना चाहता है, यह सोचने का विषय है? ऐसे निर्णायक समय में अमरीका ने एक गंभीर चाल चलने की कोशिश की है. लीबिया से सारी दुनिया का ध्यान बँट सके, इसके लिए उसने ओसामा के गुप्त ठिकाने पर अचानक धावा बोला जिसका सुराग पिछले साल के अगस्त महीने में ही मिल चुके थे. लेकिन अमरीका सीधी कार्रवाई से कतराता रहा. सटीक निशानदेही के बावजूद अमरीकी खुफिया विभाग सीआईए द्वारा नौ महीने तक कुछ नहीं किए जाने के पीछे अमरीका की असली मंशा क्या हो सकती है? यह सभी राजनीतिक विश्लेषकों एवं अन्तरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों के लिए चुनौतीपूर्ण मसला है.

अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा का यह कहना कि ‘न्याय हो चुका है(जस्टिस हैज बीन डन), चकित करता है. स्वयं को वैश्विक न्यायमूर्ति की भूमिका में रखकर देखने वाला अमरीका अक्सर यह भूल जाता है कि उसके इस कथित न्याय से दुनिया में आतंक, खौफ और भय का वातावरण ज्यादा गाढ़ा हुआ है. सद्दाम हुसैन को रसायनिक जैव-हथियार रखने के निराधार आरोप में नेस्तानाबूद कर चुका अमरीका आज वहाँ की जनता से कैसा न्याय और सलूक कर रहा है, यह सचाई छुपी नहीं है. उसने अभी तक जितनी भी लड़ाइयाँ लड़ी हैं; उसके पाँव हर जगह ‘हाथी पाँव’ की तरह रोगग्रस्त दिखें हैं. अंतोनियों ग्राम्सी का एक मशहूर कथन है-‘‘लड़ाइयाँ व्यापार के लिए लड़ी जाती हैं, न कि सम्यता के लिए.’’ यहाँ भी अमरीकी युद्ध का मुख्य लक्ष्य अरब देशों के कच्चे तेल-संसाधनों पर कब्जा जमाना है. पूँजीवादी शोषण-व्यवस्था के विकेन्द्रीकरण में जुटा अमरीका आज जिन वजहों से आर्थिक मंदी का सामना कर रहा है, उसमें उपभोग-संस्कृति का बहुत बड़ा हाथ है. अरब देश इस उपभोग-संस्कृति के धुर विरोधी हैं. वे अमरीकी जीवनशैलियों एवं आधुनिकता के साए में थोपी जा रही अनैतिक हरकतों को धर्म विरुद्ध आचरण मानते हैं. ओसामा बिल लादेन जैसे आतंकवादियों को सहानुभूति या जनसमर्थन हासिल होने के पीछे अमरीका का असली साम्राज्यवादी चेहरा है जो अलकायदा जैसे आतंकी गिरोह से ज्यादा ख़ौफनाक और भयावह है.

भारत के सन्दर्भ में इस घटना का अपना एक अलग ही अर्थ है. विदेश मंत्री एस0एम0 कृष्णा ने जहाँ इसे ‘ऐतिहासिक’ बताया है, वहीं गृहमंत्री पी0 चिंदबरम ने मुंबई हमलों की साजिश रचने वालों को पाकिस्तान में पनाह मिलने सम्बन्धी दावे को एक बार फिर से दुहराया है. इस मौके का फायदा उठाते हुए भारत ने मुंबई में हुए 26/11 हमले के षड़यंत्रकर्ता दाउद इब्राहिम और उसकी ‘डी’ कंपनी से जुडे ठोस साक्ष्यों के अपने पास होने की पुष्टि की है; लेकिन वह अमरीकी तर्ज़ पर उन्हें धर दबोच पाएगा, यह कहना बहुत मुश्किल है. भारत ने सकारात्मक रुख दिखाते हुए अमरीका-पाकिस्तान के साथ अपने सम्बन्धों की पुनर्समीक्षा शुरू कर दी है.

फिलहाल मध्य-पूर्व एशिया में फैले आतंकी संगठन अलकायदा को कमतार आँकने की भूल नहीं की जानी चाहिए. ओसामा के बाद अलकायदा का कमान संभाल रहे अयमान अल जवाहिरी ने अमरीका-पाकिस्तान को सबक सिखाने सम्बन्धी जो एलान किया है; उसकी आँच और तपिश से भारत भी झुलसेगा. इन संभावित खतरों से निपटने के लिए भारतीय सुरक्षा-तंत्र ज्यादा मजबूत और चैकस हो, इस दिशा में ठोस प्रयास किए जाने की जरूरत है. 9/11 के बाद भले अमरीका में किसी किस्म की आतंकी घटना न घटी हो, लेकिन आने वाले समय में अलकायदा के ज़ख्मी लड़ाकू उससे भी भीषण हमले की साजिश रच सकते हैं. फिलहाल पाकिस्तान उनका पहला ‘टार्गेट’ हो सकता है. ओसामा की मौत के साथ आंतक की आतंकी-कथा ख़त्म हो चुके हैं, यह सोचना फिलहाल जल्दबाजी होगी. पूर्व आईएसआई प्रमुख हामिद गुल की टिप्पणी महत्त्वपूर्ण है-‘‘पाकिस्तान के भीतर अलकायदा को समर्थन करने वाला एक बड़ा तबका मौजूद है और महज ओसामा बिन लादेन की मौत से यह नहीं कहा जा सकता कि दुनिया से आतंकवाद का ख़ात्मा हो गया.’’

यहाँ मुख्य सवाल आतंकी सरगना अलकायदा के मुखिया ओसामा बिन लादेन के मारे जाने से ज्यादा इस बात को ले कर है कि इन समस्त कार्रवाइयों में पाकिस्तानी सेना की भूमिका क्या है? वह गैर-मुल्क से अपनी भूमि पर संचालित एक गुप्त अभियान को ‘ट्रेस’ करने में ऐसे कैसे विफल रही, जबकि वहाँ सैन्य अकादमी का चाक-चैबंद अड्डा मौजूद है? इस पूरे घटनाक्रम पर पाकिस्तान ने कोई सीधी आपत्ति नहीं दर्ज की, जबकि यह मामला सीधे-सीधे आन्तरिक सम्प्रभुता के उल्लंघन का बनता है. एक परमाणु संपन्न राष्ट्र की सम्प्रभुता को इस तरह खुलेआम चुनौती दी जाती है. फिर भी वह अपने तेवर में तल्ख़ कम गुपचुप रवैया ज्यादा अपनाता है. पाकिस्तान के विदेश सचिव सलमान बशीर ने भविष्य में ऐसी किसी किस्म की कार्रवाई के बदले गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है, किंतु यह चेतावनी कम मामले को रफा-दफा करने का प्रयास अधिक है. भारत-भय(इंडो-फोबिया) से ग्रस्त पाकिस्तान अमरीका से ज्यादा भारत के सामने अपनी सैन्य-शक्ति और युद्ध-क्षमता का ढिंढोरा पिट रहा है. जबकि पाकिस्तान के प्रतिरक्षातंत्र को ध्वस्त होते हुए सारी दुनिया ने खुद अपनी आँखों से देखा. इसमें कोई दो मत नहीं है कि पाकिस्तान को आतंकी संगठनों के सफाए के नाम पर अमरीका ने आफ़रात आर्थिक सैन्य मदद पहुँचायी है. अतः संभावना यह भी जताई जा रही है कि अमरीकी खुफिया विभाग सीआईए को समस्त सुचानाएँ पाकिस्तान ने ही मुहैया कराए हैं जिसके बदले में उसने अमरीका के साथ गोपनीय राजनयिक ‘डील’ कर रखा है.

बहरहाल, ओसामा बिन लादेन जैसे एक आतंकी शख़्स का मारा जाना; दुनिया के लिए जितनी सुकूनदेह ख़बर है, उतनी ही खतरनाक भी. अतः इस ख़बर को अमरीकी शर्तों पर स्वीकार कर लिया जाए, यह तर्कसंगत नहीं है. अमरीकी फैसला ही विश्व-समाज का फैसला हो; इसकी पुष्टि के लिए अमरीकी इरादों का डीएनए टेस्ट जरूरी है. इस घड़ी अमरीकी बहाव में बहने की जगह अभिसारित ख़बरों की गहन जाँच-पड़ताल की जानी चाहिए. क्योंकि यह एक किस्म की ‘इम्बेडेड जर्नलिज्म’ अर्थात ‘नत्थी पत्रकारिता’ है जिसमें सेना द्वारा मुहैया कराई गई सूचना ही अंतिम तथ्य मान ली जाती है.

सच जानने की यह प्रक्रिया बेहद जटिल या फिर पेचीदगी भरी हो सकती है, किन्तु इससे जो तथ्य उजागर होंगे; उसे निरर्थक या निराधार साबित करना मुश्किल होगा. वर्तमान समय में किसी सूचना को काफी देर तक पचाए रखना अथवा सेंसर करना मुश्किल है. अतः देर-सबेर जब भी इस घटना की असली परत खुलेगी, न केवल अमरीकी प्रशासनिक नीति की असलियत उजागर होगी; बल्कि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान भी ओसामा बिन लादेन को अपनी सरज़मी पर पनाह देने सम्बन्धी रहस्यों से पर्दा हटाने के लिए बाध्य होगा.

मम्मी हो आज ‘मदर्स डे’ हऽ

जानतानी खूब हसबँू तू. हँस लऽ, लेकिन सच कहतानि की आज के तारीख बउये तोहरे नाम. आज मदर्स डे हऽ. दुनिया भर के मम्मी लोगन के आज बच्चवन-बेटवन सब गिफ्ट दिहन जा. हऽ ठीक कहताडू तोहार कन्यो के मिली गिफ्ट. लेकिन ओनि के तऽ अभी नबोज बाड़सन. अधिक से अधिक बिस्कुट आ चाकलेट खिया दिहसन उनका के. और हम...? हाँ, हम तोहरा खातिर कवन गिफ्ट ले सकिला ई तऽ सोचे के पडि़ न हो.
तू ठीक कहताड़ू कि इ सब तारीख विदेशिया प्यार जताव के हऽ. लेकिन हमार-तोहार कोई बात सुनी थोड़े. सब कोई शहरिया वेष धरि लेले बा. उहो आपन अर्जल थोड़े बा. दूसर दुनिया के चाल अउरि रंग-ढंग के नकल करि के हमनि के कबो मदर्स डे मनावतानि जा तऽ कबो फादर्स डे. सचो के मनवा-दिलवा में आदर लोगन के केतना बउये, तू हूं तऽ देख ताड़ू ना. जाये द छोड़. आज तू और कन्या मिली-बहुरि के खुशी-खुशी दिन बितइह जा. कवन बात के ले क तू-तू मैं-मैं ना. आज मदर्स-डे हऽ न! ऐ से हमहूं यहीजे से पैर छू के प्रणाम करऽ तानि.

Saturday, May 7, 2011

वृक्ष बनता है बीज एक दिन

चन्द्रसेनजीत मिश्र


एक बीज को चाहिए
अंकुरित होने के लिए
मिट्टी और पानी।

वह पेड़ों पर लगे रहकर
नहीं बन सकता एक पौधा।

रोका गया उसे यदि
पेड़ से गिरने से
मिट्टी से मिलने से
तो सड़ जाएगा वह।

रोको नहीं उसे
मिट्टी में मिल जाने दो।

पड़ने दो कुछ पानी के छिंटे
टूटने दो जरा उसे
पौधा तो बन जाने दो।

करने दो संघर्ष जरा
मिट्टी-पानी से सनने दो।

जब वह लड़-भिड़ कर बाहर निकलेगा
तो वही बीज एक दिन
विशाल वृक्ष बन कर उभरेगा।

(युवाकवि चन्द्रसेनजीत काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रयोजनमूलक हिन्दी(पत्रकारिता) के स्नातकोत्तर के विद्यार्थी हैं। अंतस की हलचल को अपनी दृष्टि, अनुभव और संवेदना की धरातल पर परखते हुए उसे शब्दों में ढालने का उनका प्रयास अनोखा है, चाहे यदा-कदा ही सही। ब्लाॅग ‘इस बार’ में पढि़ए उनकी कविता ‘वृक्ष बनता है बीज एक दिन’)

पेशा नहीं ‘पैशन’ है पत्रकारिता

समयबद्ध तत्परता एवं सक्रियता पत्रकारिता के बीजगुण हैं. एक पत्रकार की स्थिति उस दोलक की तरह होती है जो तयशुदा अंतराल के बीच हर समय गतिशील रहता है. पत्रकार होने की पहली शर्त है कि आलसपन या सुस्ती से वह कोसो दूर रहे. उसकी निगाह ‘शार्पसूटर’ की भाँति मंजी हुई या पैनी होनी चाहिए. किसी घटना या घटनाक्रम को एक अच्छी ख़बर के रूप मंे ढाल लेने की काबीलियत होना एक दक्ष पत्रकार की प्राथमिक योग्यता है. पत्रकारीय पेशे में ‘न्यूज़ सेंस’ को छठी इन्द्रिय का जाग्रत होना कहा गया है. समाचार-कक्ष में ख़बरों की आवाजाही हमेशा लगी रहती है. किसी ने ठीक ही कहा है कि जब सारी दुनिया सो रही होती है, तो समाचार-कक्ष में दुनिया भर के मसले जाग रहे होते हैं. यहाँ प्रत्येक ख़बर समय की खूंटी से बंधी हुई होती हैं. क्योंकि एक निर्धारित सीमा-रेखा(डेडलाइन) के बाद प्राप्त ख़बरें कटी-पतंग की तरह हवा में हिचकोलें खाती रह जाती हैं. चाहे वे कितनी भी महत्त्वपूर्ण, अप्रत्याशित, नवीन या बहुसंख्यक पाठकों की लोक-अभिरुचि की क्यों न हांे? उन्हें अंततः ‘छपते-छपते’ काॅलम के अन्तर्गत ही संतोष करना पड़ता है या फिर अगले दिन की ‘प्रतीक्षा-सूची’ में जगह पाने के लिए होड़ करना होता है.

पत्रकारिता में समय का मोल अनमोल होता है. लेकिन जल्दबाजी या लापरवाहीवश समाचारपत्र कंकड़-पत्थर कुछ भी निगल ले, ऐसा मुमकिन नहीं. एक जिम्मेदार पत्रकार की जवाबदेही बनती है कि वह सजग प्रहरी की तरह ख़बर के हर एक तह की पड़ताल करे. कथ्य और कथनशैली को बारीकी से जाँचे; तत्पश्चात अपने समाचारपत्र में यथास्थान रखने की चेष्टा करे. पत्रकार की सुचिंतित चेष्टाएँ ही पत्र की विश्वसनीयता का असली मानक होती हैं. सामान्य पाठक किसी ख़बर को पढ़ते हुए इस बात के लिए आश्वस्त रहता है कि वह जो ख़बर पढ़ रहा है; वह समुचित छानबीन और वस्तुनिष्ठ विश्लेषण के पश्चात ही उस तक पहुँचाई गई है. समाचार की अन्तर्वस्तु तथ्यपरक और भाषिक-प्रस्तुति का सुगठित होना पाठकीय ग्रहणशीलता और पाठकीय-प्रत्यक्षीकरण का वास्तविक मानदण्ड है.

आजकल पत्रकारिता में अवतरित नए महर्षि-संपादक ‘क्लोन थाॅट’ के मार्फत समाचारपत्र के उच्चस्थ पदों पर आसीन हैं. उनके लिए पत्रकार ‘कन्टेन्ट राइटर’ की भूमिका में है, तो समाचरपत्र जनपक्षरधर विचारों का निर्माता न होकर पूँजीधारक विज्ञापनदाताओं का ‘बीमाकार्ड’ बन चुका है. प्रबन्ध-संपादक की हैसियत से पत्रकारिता में इनकी धौंस भले ज्यादा हो, किंतु बहुसंख्यक लोगों में प्रभाव नगण्य है. निर्विवाद रूप से ऐसे पत्रनायकों के नाम समाचारपत्र में छपते रोज हैं. लेकिन सुबुद्ध जनता आज भी जिन चंद पत्रकारों के नाम जानती है, उसमें इनका नाम उँगली के कीसी भी छोर पर आसीन नहीं है. आज भी भारतीयों के जेहन में भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग, गाँधी युग के पत्रकार ही रचते-बसते हैं. स्वातंत्र्योत्तर भारत में जिन पत्रकारों को समाज ने सर्वाधिक महत्व दिया, उनमें कुछेक लोगों के नाम ही जिह्वाबद्ध है.

क्या कभी आपने जानने की कोशिश की है कि लोग कुछेक पत्रकारों को ही असली पत्रकार क्यों मानते हैं? क्यों उन्हें आदर्श पत्रकारिता का अगुवा समझते हैं? भारतीय समाज उन पत्रकारों के समक्ष आज भी क्यों ऋणी और नतमस्तक है जिन्होंने अपना सबकुछ होम कर दिया. अपना सर्वस्व दाँव पर लगा दिया. जिन्दगी के कठिनतम दौर में भी जनपक्षधर एवं मूल्यगत पत्रकारिता की रवायत और रस्म पूरी की; लेकिन भटकाव के किसी गुणसूत्र को अपने भीतर नहीं पनपने दिया. इन जीवट पत्रकारों का नाम लेते हुए आज भी हमारा समाज खुद को कितना गौरवान्वित महसूस करता है? यह जानने के लिए हमें पुरानी पीढ़ी से अवश्य बातचीत करनी चाहिए.

मैं जहाँ तक समझ पाता हँू, उनके लिए पत्रकारिता भूख थी, पीड़ा थी, दुःख और संत्रास थी. वे इससे निपटने के लिए कलम को फावड़ा की तरह इस्तेमाल कर रहे थे. हसुआ और खुरपी की तरह सामाजिक विडम्बनाओं पर प्रहार कर रहे थे. सामाजिक कुरीतियों और सत्ता-प्रतिष्ठानों की राजनीतिक चालों पर धावा बोल रहे थे. हर किस्म के षड़यंत्र में सेंध लगाना उनका एकमात्र मकसद था. सबसे बड़ी बात यह थे कि वे उन्मुक्त थे, इसलिए अपने कर्म और कर्तव्य के प्रति जवाबदेह अधिक थे. उन्हें पता था कि जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालना ही श्रेयस्कर है. व्यापक जनसमूह को अपनी आवाज़ में वैचारिक चेतना भरकर ही जगाया जा सकता है.

ये पत्रकार दिवंगत पोप जॉन पॉल द्वितीय की तरह ‘धन्य’ भले न घोषित किए गए हों, किंतु वे सिर्फ हाड़-मांस का इंसान भर नहीं थे. वे देवता भले न हों, किंतु राक्षसी गुण भी उनमें नहीं विद्यमान था. उनकी असली ताकत कलम की प्राणवत्ता थी जिसका जगना मुल्क के जगने से एकदम भिन्न था. इसीलिए मैं मानता हँू कि पत्रकारिता पेशा न हो कर ‘पैशन’ थी उनके लिए. वे कलम-योद्धा थे, संस्थागत चाटुकार नहीं. पत्रकारिता के दीप से भविष्य की डगर पर रोशनी करने वाले इन पत्रकारों से हम सीख लें या न लें. आने वाली पीढ़ी जब सत्य की खोज में भारत-यात्रा पर निकलेगी, तो इन्हीं पत्रकारों की डगर से अतीत की सभ्यता-संस्कृति में प्रवेश संभव हो सकेगा.

Friday, May 6, 2011

असमय सयाने होते किशोरों से चकित अभिभावक





किशोर समझकर उम्र मत पूछिए. कंधे पर स्कूल बैग देख उनकी नादानियत पर हँसना भी मना है. अभिभावक चकित हो सकते हैं, लेकिन ज्यादा देर तक सचाई को अन्धेरे में छुपा रखना भी सही नहीं है. आप विश्वास मानिए कि आपका 12-13 साल का किशोर कण्डोम-प्रयोग से सम्बन्धित सारे विधान जान चुका होगा. विश्वास मानिए, आज के किशोर इतने जानकार हैं कि वात्सायन के ‘कामसूत्र’ पर डाॅक्यूमेन्ट्री फिल्म बना डालें. सहपाठियों का एमएमएस बनाना तो उनके बायें हाथ का खेल है. बालसुलभ मुसकान में कामुकता देख आपको हैरानी हो सकती है और उनकी हरकत के किस्से जान आपके पेशानी पे बल पड़ सकते हैं. पर इन किशोरवय बच्चों के लिए ‘फिकर नाॅट’ शब्द चर्चित अथवा पसंदीदा तकिया कलाम है. माँ भी चोखा ‘आइटम’ है, माल है. वहीं हर जवान लड़की उनकी नज़र में शीला या फिर मुन्नी की किरदार.

किशोर लड़कियाँ भी उतनी ही खुली हुई बिंदास हैं. एक दूसरे के तन-बदन अर्थात फिगर से सम्बन्धित चटपटे जोक्स साथी लड़कों को भेज खुश होती इन लडकियों के लिए आज का ज़माना ‘फुल इन्ज्वाॅयमेन्ट’ का है. इसलिए खुद भी फ्लर्ट करती हैं और दूसरों को फ्लर्ट करने का न्यौता भी देती हैं. इनकी पीड़ा यह है कि कोई इनकी स्कर्ट नहीं खींचता या फिर ‘लालो’, ‘पारो’, ‘छम्मकछल्लो’ कह सड़क चलते नहीं छेड़ता. ये इतनी अल्हड़ हैं कि सबके सामने आँख मार सकती हैं. आइसक्रीम के साथ कौतुक करती हुई उसे साथी लड़कों के अन्तर्वस्त्र में डाल सकती हैं. इन खुशमिज़ाज़ लड़कियों से ईष्या या जलन होना स्वाभाविक है, क्योंकि ये तड़ाका जवाब ही नहीं दे सकती हैं, बल्कि झन्नाटेदार थप्पड़ भी लगा सकती हैं, बेलाग-बेलौस.

कलतक स्कूल की शिक्षिकाएँ जो अक्सर पढ़ाने की रौ में अपना पल्लू या दुपट्टा संभालना भूल जाती थी. आजकल घड़ी-घड़ी उस पर हाथ फेर रही हैं. अचानक नहीं हुआ है यह सबकुछ. बिलावज़ह ही 7वीं-8वीं कक्षा के किशोरों से नहीं शर्माने लगी हैं वे. बल्कि उन्हें सचाई का भान ही नहीं प्रत्यक्ष ज्ञान है कि कक्षा में बैठ मोबाइल पर हाथ फिराता कोई किशोर या किशोरी कब उनके अस्त-व्यस्त या उघड़े बदन का चित्र खिंच डाले और तत्काल इंटरनेट-देवता के महा-समन्दर में सुपुर्द कर दे, कोई ठिकाना नहीं है. गुगल गंगोत्री है जहाँ रोज मंथन होते हैं, कथित 84 करोड़ देवी-देवताओं की योनियों के यात्रा और दर्शन होते हैं. वहाँ जीवन का हर अपूर्ण कोना पूर्ण है. जिन्दगी निसार नहीं सम्पूर्ण है. किशोर इस नए अवतरित आभासी दुनिया में मंजे गोताखोर की तरह गोता लगा रहा है. अभिभावक अपने किशोरवय बच्चों को इस नये तकनीक के आवेग में बहते देख भौचक्क हैं, चकित भी. शायद! यह उनके असमय सयाने होने का लक्षण है जिसे माता-पिता और अभिभावकों द्वारा लक्षित किया जाना भी बेहद जरूरी है.

बाकी सारा....थोड़ा लिखना ज्यादा समझना.

Monday, May 2, 2011

लाइव हिन्दुस्तान ने लिखा: मारा गया ओबामा

ख़बरों की होड़ में आगे रहने की स्पर्धा में देखिए बलण्डर मिस्टेक-

लाइव हिन्दुस्तान ने लिखा: ''मारा गया ओबामा’’(?)


मारा गया ओसामा बिन लादेन
दुनिया का वांटेड नंबर-1 आतंकवादी एवं अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन मारा गया है और अमेरिकी अधिकारियों ने उसके शव को भी कब्जे में ले लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने इसकी पुष्टि कर दी है। 08:03 PM
मारा गया ओबामा
ओसामा की मौत की खबर कोई चाल तो नहीं!
कौन था ओसामा
लड़ाई इस्लाम के खिलाफ नहीं: ओबामा
http://www.livehindustan.com/home/homepage.php

ओसामा की मौत: रहस्य की पटकथा

‘‘ओबामा-दुनिया सुरक्षित घोषित’’

‘‘ओबामा-फौजियों के हाथों ओसामा की हत्या’’


उक्त पंक्तियाँ तथ्य और आधारहीन हैं या नहीं, इसकी पड़ताल आवश्यक है. मशहूर अमरीकी पत्रकार जाॅन रीड की एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है-‘‘दस दिन जब दुनिया हिल उठी.’’ आज तारीख 2 मई; जब जनमाध्यमों ने यह ख़बर देनी शुरू की कि ‘ओसामा बिन लादेन अमरीकी हमले में मारा गया’, तो दुनिया तनिक भी हिली-डुली नहीं. अमरीका को छोड़ दुनिया भर में जश्न का माहौल भी कम ही देखने को मिला. यह जरूर है कि अमरीका से आयातित इन ख़बरों को दुनिया ने बड़े ही चाव से पढ़ा, सुना और घंटों टेलीविज़न पर देखा. पर असर में वह कुछ ज्यादा नवीन प्रभाव नहीं छोड़ सकी हंै. जबकि अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा मान रहे हैं कि दुनिया पिछले कल की तुलना में आज ज्यादा सुकुनबस्त हैं. विशिष्ट अभियान के तहत ओसामा बिन लादेन को किसी दूसरे मुल्क की सरज़मीं पर मार गिराना, अवश्य ही टेढ़ी खीर है जिसे ओबामा अमरीका की एक बड़ी जीत और अपने कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि मान रहे हैं।

ओबामा के सम्बोधन से अमरीकी समाज में जश्न का माहौल तारी है. लोग भारी मात्रा में ‘जीरो ग्राउंड’ के इर्द-गिर्द जुटने लगे हैं. लोगों के जेहन में वह ख़ौफनाक मंजर एक बार फिर से नमूदार हुआ है जिसे अमरीकी मतानुसार ओसामा बिन लादेन के इशारे पर एक दशक पीछे अंजाम दिया गया था. ‘वल्र्ड ट्रेड सेन्टर’ नाम से लोकप्रिय अमरीका की दो बहुमंजिली इमारत 11 सितम्बर 2001 को उस वक्त ध्वस्त हो गईं थी जब आतंकवादियों ने दो विमानों को अपहरण के पश्चात अचानक इन इमारतों से टकरा दिया था. उस घड़ी इस हमले में तकरीबन 3000 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हुई थी.

9/11 की इस ख़ौफनाक घटना के बाद से ही अलकायदा प्रमुख ओसामा अमरीकी सेना के रडार पर था. लेकिन वह अमरीका और गठबंधन सेना को चकमा देने में हमेशा सफल रहा. 2.5 करोड़ डाॅलर का ईनामी ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के निकट ऐबटाबाद में ऐसे समय में मारा गया है जब दुनिया की निगाह में अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा का कद नित घट रहा है और छवि धूमिल हो रही है। लीबिया में अपने युद्धक पंजे से लोकतंत्र-विरोधी कार्रवाईयों को अंजाम दे रहे अमरीका की विश्वभर में जिस ढंग से तीखी आलोचना जारी है; उसके मद्देनज़र यह ख़बर ‘प्लाॅट’ किया जाना इस बात का संकेत है कि अमरीकी इच्छाशक्ति में तेजी से गिरावट होते जा रहे हैं।

माॅस्ट वांटेड आतंकवादी ओसामा से सम्बन्धित सुराग ओबामा-सेना और उसके खुफिया कारिन्दों को पिछले साल अगस्त माह में ही मिल चुके थे. लेकिन अमरीका सीधी कार्रवाई से कतराता रहा. यही नहीं उसने पाक सरकार को भी अपने इस गुप्त अभियान के बारे में भनक नहीं लगने दी. महीनों इन्तजार के पश्चात अमरीका द्वारा अचानक इस सुनियोजित हमले को एक घन्टे के भीतर अंजाम दे डालना, कई तरह के सवालों को जन्म देता है. हाल के दिनों में लीबिया में ओबामा की युद्धक सेना द्वारा ताबड़तोड़ हमला किया जाना अमरीका की लोकतांत्रिक पक्षधरता और वैश्विक जवाबदेही जैसे लोक-अधिकारों को पलीता लगाता है।

अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा यह कहा जाना, तो और भी हैरतअंगेज है कि-‘न्याय हो चुका है(justice has be done).’ सदैव स्वयं को वैश्विक न्यायमूर्ति की भूमिका में रखकर देखने वाला अमरीका अक्सर यह भूल जाता है कि उसके कथित न्याय से दुनिया में आतंक, खौफ और भय का वातावरण ज्यादा गाढ़ा हुआ है. सद्दाम हुसैन को रासायनिक हथियार रखने के आरोप में नेस्तानाबूद कर चुका अमरीका आज वहाँ की जनता से कैसा न्याय और सलूक कर रहा है, यह सचाई पर्दानशीं नहीं है. हाल में लीबिया में उसके ‘हाथी पाँव’ की धमक क्या न्याय कर रही है; इस तथ्य की जानकारी भी सारी दुनिया को लग चुकी है. मानवता का स्वयंघोषित प्रहरी अपने लक्षित प्रयासों से क्या हासिल करने ख़ातिर बेकरार है. इस सचाई को भविष्य में महाशक्तिमान बनने का आकांक्षी भारत भले देर-सवेर स्वीकार करे, किंतु सारी दुनिया अमरीकी मंशा से लगभग-लगभग परिचित हो चुकी है.

खैर, जल्द ही सचाई सबके सामने होगी, क्योंकि हालिया दौर में किसी सूचना को काफी देर तक पचाए रखना अथवा सेंसर करना मुश्किल है. देर-सवेर जब भी इस घटना की असली परत खुलेगी, न केवल अमरीकी सेना और ओबामा शासन बेनकाब होंगे; बल्कि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान भी ओसामा बिन लादेन को अपनी सरज़मी पर पनाह देने सम्बन्धी रहस्यों से पर्दा हटाने वास्ते बाध्य होगा। ऐसे में अमरीकी आतंकवाद निरोध और गृह सुरक्षा मामलों के उपराष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जाॅन ब्रेनन का कहना तर्कसंगत है कि यह नहीं माना जा सकता कि लादेन का पाकिस्तान में कोई सहयोगी तंत्र नहीं था.

कुछ नूर, कुछ कोहिनूर

सिर्फ 72 घंटे और, पापा!

श्रीकांत मनु


आपकी पहली और अंतिम चाहत
जिसके लिए रूकी हैं आपकी सांसे,
आपका लाडला आएगा, पापा!
और 72 घंटों के लिए
रोकनी होगी आपको अपनी सांसें
आपका लाडला आएगा, पापा!

एक बड़ी ‘डील’ करेगा कल
एक बड़ी कम्पनी के साथ
फिर निकल जाएगा, यहाँ के लिए
आपका लाडला आएगा, पापा!


हम सात बहने
सात सौ घंटों से
चिपकी हैं आपसे, पापा!
सभी आयी हैं
किसी न किसी को छोड़कर
कोई बेटे को, तो कोई बेटी को
कोई सास को, तो कोई ससुर को




मैं तो उसे छोड़कर आयी हँू
जिसके साथ जीना था
जीवन भर मुझको
चुनना था, किसी एक को
उनको या आपको।


72 घंटे बाद लाडला आएगा,
आप जाएँगे परलोक
बहने जाएँगी अपने-अपने लोक
पर कहाँ जाऊँगी मैं? पापा!
सातवीं अनचाही बेटी।

आज जब जरूरत थी खून की
तो मेरे खून को ही मिलना था,
शायद आपके खून से
इसीलिए डाॅक्टर ने तब कर दिया था मना
एबार्शन करने से
आॅपरेशन थियेटर में।
मेरे शरीर के खून की
अंतिम बूँद भी आपकी ही है, पापा!


वैसे तो आपके लाडले का भी
खून मिलता है आपसे
पर वह आज टोकियो पहुँचेगा
कल एक बड़ी ‘डील’ करेगा
परसों यहाँ के लिए चल देगा
आपका लाडला आएगा, पाना!
सिर्फ 72 घंटे और, पापा!





(श्रीकांत मनु के नाम से लोकप्रिय श्रीमन्ननारायण शुक्ल सम्प्रति राजकीय इन्टर गोविन्द उच्च विद्यालय, गढ़वा, झारखण्ड में शिक्षक-पद पर कार्यरत हैं। अपनी अंदरूनी संवेदनाओं को शब्दों में बड़ी सूक्ष्मता के साथ पिरो ले जाने वाले श्रीकांत मनु की अनेकों कविताएँ, कहानियाँ और विचारोत्तेजक आलेख कई ख्यातनाम पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।)

Sunday, May 1, 2011

जनता जागे, तो विमुक्त समाज की मुक्ति संभव



दैनिक समाचारपत्र जनसत्ता के रविवारी परिशिष्ट(1 मई,
2011) में पंकज रामेन्दु की आवरण कथा ‘अपने ही मुल्क में बेगाने’ पढ़ते
हुए मन कितनी बार हँसा, थाह नहीं? यह हँसी अपनेआप पर थी जो आँखों में
‘विजन 2020’ का नक्शा लिए घूम रहे हैं। हम देश की बढ़ती आर्थिक ‘ग्रोथ
रेट’ पर अपनी काॅलर सीधी कर रहे हैं या फिर खुद से अपनी पीठ थपथपाने की
फिराक में हैं। हम यह मान चुके हैं कि नई सहस्त्राब्दी में तेजी से उभरता
भारत नित आगे बढ़ रहा है। बहुत-कुछ ‘कदम-कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाए
जा’ जैसी तर्ज़ पर। ऐसे उल्लासित समय में पत्रकार पंकज की सचबयानी रूलाती
नहीं है, हँसने के लिए ‘स्पेस’ देती है। उन्होंने जिस विमुक्त समुदाय की
जीवनचर्या को उघाड़कर हमारे सामने रखा है, उसे पढ़ते हुए एकबारगी
अन्धेरों से घिर जाने का बोध होता है। विमुक्त जाति के लोगों में धन-वैभव
की इच्छा कम अपने जांगर से पैदा की गई करतब और कला को जिंदा रखने की जिद
अधिक है।

उन्हें पारम्परिक ढर्रे पर जरायम जाति से सम्बोधित किया जाना
एक किस्म की ज्यादती है जिसे मीडिया धड़ल्ले से आजमा भर नहीं रही है,
बल्कि इस समाज की आन्तरिक बसावट को झुठलाते हुए इनके छवि का
अपराधीकरण भी कर रही है। लेख में वर्णित सांसद स्टीफन का यह तर्क कि
‘चोर का बेटा चोर होगा’ प्रथम द्रष्टया भले हास्यास्पद लगे, लेकिन आज भी
भारतीय समाज इसी फलसफे को ढो रहा है। प्रगतिशील विचारों की आमद बढ़ने
के बावजूद जातिगत अवधारणा आज भी मनुष्यों के सामाजिक-मूल्य का पहला
निर्धारक है। लिहाजा,इस प्रथा ने उन समुदायों को सर्वाधिक उत्पीडि़त और
उपेक्षित किया है जो बंजारा, घुमन्तु, खानाबदोश हैं। अपनी तादाद में बहुतायत
इस असंगठित समुदाय कि सबसे बड़ी विड़बना यह है कि वे अपना घर कंधे
पर लेकर चलते हैं। स्थायी बन्दोबस्ती के अभाव में उनका ठौर-ठिकाना
पूरे देशभर में पसरा हुआ है।

जिन ‘कलन्दरों’ के करतब देखकर मुझ जैसे तमाशाई मजे लूटते हैं,
ऐसे बेघर विमुक्त समाज की भीतरी सचाईयों को जानने-समझने की कोशिश
शायद! ही की जाती है। मुर्गा-मस्सलम की जगह मुर्गों की आँत, गर्दन और पंजे
नोचते इस बेसहारा एवं अभावग्रस्त समुदाय के लिए हमारी अनिच्छा और
उपेक्षाभाव इस बात की तसदीक है कि समाज से संवेदनाएँ लुप्त हो रहीं हैं
और मानुषिक बेचैनी गायब। ऐसे में पत्रकार पंकज की आवरण कथा जिन बातों को
उद्घाटन करती हैं वे कोई तिलिस्म या रहस्य नहीं है। यह समाज के भीतर
जीवित एक ऐसा सच है जिससे साबका सभी का पड़ता है पर चेहरा कोई नहीं पढ़ता।

आज यह समुदाय 20-50 की दैनिक रुपली पर गुजर-बसर कर लेने
को अभिशप्त बना हुआ है। जनगणना और पहचान-पत्र जैसे नागरिक अधिकार
से वंचित इन खानाबदोश लोगों के लिए संसदीय सरकार द्वारा कुछ नहीं किया
जाना तंत्र की मंशा और विभिन्न पार्टियों की असलियत का खुलासा करती है।
करीब 15 करोड़ की तादाद में पूरे देश में फैले विमुक्त समाज के लिए अभी
तक कुछ न किया जाना, बेहद चिंतनीय और शर्मनाक ही कहा जा सकता है।
सामाजिक उत्पीड़न और जातिगत उपेक्षा की मार से त्रस्त्र इस घुमन्तु समुदाय
के लिए सरकार को तत्काल सोचने की जरूरत है। उनके हितरक्षा के लिए जबतक
कोई सार्थक कदम नहीं उठाए जाते इनके परिवार के लिए आजिवीका का संकट
सदैव बना रहेगा।

अपनी पहचान से महरूम और अजनबी इस विमुक्त समाज की खातिर
सामाजिक संस्थाओं को भी आगे आना चाहिए। जागरूक नागरिक-समाज की
ओर से इनकीबेहतरी की दिशा में ठोस उपाय किए जाना बेहतर कल की प्रत्याशा में
निर्णायक कदम होगा। यानी विमुक्त समाज की मुक्ति तभी संभव है जब जनता
जागेगी और उसकी निगाह में इस समाज की बेहतरी का संकल्प जन-जन में अंकुरित
होगा।

साहित्य अकादेमी का वर्ग-चरित्र और पूर्वोत्तर में हिन्दी की खोज

साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली एवं केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित दो-दिवसीय संगोष्ठी 24-25 सितम्बर, 2018 ...