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Showing posts from May, 2011

गहरे एकांत में आत्मीय मूरत गढ़ता काव्य-संग्रह ‘सीढ़ियों का दुख’

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काव्य-संग्रह ः सीढ़ियों का दुख
कवयित्री ः रश्मिरेखा
प्रकाशक ः प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली-110002
मूल्य ः 150 रुपए

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चुनिन्दा कविताओं के उद्धरित अंश :


कटोरियों की हिकमत में
शामिल है जीने की जिद
त्माम जिल्लतों के बीच भी
वे बना लेती हैं अपनी जगह। (कटोरी/पृ0 14)


शब्दों की दुनिया से मुलाकात
कितना मुश्किल है किसी खास चश्मंे से
चीजों को पहचानने की आदत डालना
भले ही यह चश्मा अपना हो
या कभी मुमकिन है
अपनी नज़र को अपने ही चश्में से देखना। (चश्मा/पृ0 16)


अपनों के लिए कुछ बचाने की खातिर ही
बनी होगी तह-दर-तह
चेहरों पर झुर्रियों की झोली
जिसे बाँट देना चाहता होगा हर शख़्स
जाने से पहले
कि बची रह सके उसकी छाप और परछाई। (झोला/पृ0 17)


अपने अनंत सपनों से दूर भागती
अवहेलना के संगीत सुनती
उपहास के कई दृश्यों में शामिल
कोकिल आत्मा अनुभव करती है
उसका तो कोई समाज नहीं है। (काली लड़की/पृ0 21)


इन दिनों रोशनी के आतंक में
अक्सर तिरोहित हो जाती है
शब्दों की रोशनी
जिसे हम साफ़-साफ़ देखते हैं। (लालटेन/पृ0 22)


मेरी किताब पर
तुम्हारी लिखावट में लिखा मेरा नाम
अभी भी मेरे…

जनोक्ति

जनता के लिए नाक का प्रश्न नहीं है ‘NAC’ बिल

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यह विधेयक सीधे-सीधे तुष्टिकरण की नीति है. वोट-बैंक की राजनीति भी.
साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा की जो परिभाषा विधेयक में वर्णित हैं
जिनका जिक्र सुरेश चिपूलकर जी ने अपने पोस्ट(www.janokti.com)में क्रमवार
ढंग से किया है; वे तर्क-आधारित कम निराधार अधिक हैं. यह समझ से परे है कि
आखिर इस विधेयक को किन तथ्यों, आँकड़ों एवं वस्तुनिष्ठ शोधों के आलोक में तैयार
किया गया है. विधेयक में प्रयुक्त यह कथन कि साम्प्रदायिक हिंसा सदैव बहुसंख्यक
वर्ग के द्वारा चालित होते हैं, नेशनल एडवाइजरी कॉन्सिल की बुद्धिमता पर
सवाल खड़े करते हैं. पक्षपातपूर्ण रवैए या पूर्वग्रह की नीति से देश का
फायदा कम नुकसान ही अधिक है. अतः सम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा विधेयक पर
जोरदार बहस-मुबाहिसे की जरूरत है. विचार कभी व्यक्तिपरक नहीं होने चाहिए.
ध्यान दें कि यह व्यक्ति कोई समुदाय विशेष या सांगठनिक इकाई भी हो सकता
है जिसे हम अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक खाँचों में बाँट सकते हैं.

पीछे मुड़कर देखें तो सन् 2002 में गुजरात में हुए साम्प्रदायिक दंगे ने
अमानवीयता की सारे हद…

हाशिया

कस्‍बा qasba

समाजवादी जनपरिषद

कल्पना

ओम और कमला

ब्लॉग ‘इस बार’ को यह कविता सप्रेम भेंट

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का गुरु, मोटइबऽ कि अइसन के अइसन रहबऽ?

ल सुन एगो कविता जरका
लिखनी हईं टटका-टटका।

जिन्स कमर में आटे ना तोहरा
टी-शर्ट मारे झख।

कोट-पैन्ट के तऽ हाल न पूछऽ,
पहन लऽ त लाग बतख।

48 किलो वजन बाटे अउर
100 ग्राम बाऽ घलुआ।

पढ़े-लिखे में कलम-घसेटू
हँसेला जे पर कलुआ।

प्रथम श्रेणी में पास करिके
आज तक बाड़ऽ फिसड्डी।

नून-तेल के भाव का जानऽ तू,
घर बैइठल मिले गंजी-चड्डी।

छोड़ऽ बबुआ कलम-मास्टरी
अब करऽ जरका काम।

देह-दुबराई से ना देश सुधरी
चाहे बीती जीवन तमाम।

हा....हा....हा....ही....ही....ही....हू....हू....हू
हे......हे......हे......हो.........हौ.....हौ....हौ....!

आज काशी पधारयो युवराज!

सिर्फ शीर्षक......!


18/05

पत्रकारिता के 'रुग्ण' तथा 'रुदन' काल से उबरिए

नोट : इस आलेख को आप पढ़ सकेंगे 'इस बार'
में दो माह बाद.तब तक मनाइये छुट्टी गर्मी की.

चुनावी असर : पश्चिम बंगाल में हरा हुआ लाल झन्डा

हाँ जी, दोस्तों! ममता दीदी ने लाल सिग्नल को किया हरा. ट्रेन खुली तो है,
पर स्पीड कैसी रहती है या फिर किस दिशा में यह आगे बढती है, बस देखते रहिये.




नोट : माफ़ करेंगे, शीर्षक के अलावा कुछ नहीं 'इस बार' में. छुट्टी का आनंद ले.

प्रार्थना : आतंकी साये के बीच नये सुबह की तलाश

सुबह की रोशनी अभी मजे से क्षितिज पर फैली भी नहीं थी कि पाकिस्तान लहूलुहान हो गया. शुरूआती सूचना के मुताबिक फि़दायीन हमले में 70 लोगों की मौत हो गई है, जबकि 40 लोग जख़्मी हैं. मरने वालों में ज्यादातर अर्द्धसैनिक बल हैं. पेशावर से 35 किलोमीटर दूर स्थित चरसद्दा शहर में मामूली अंतराल पर हुए दो आत्मघाती विस्फोटों ने शहर के तापमान को इस लू-तपिश के मौसम में सुबह-सुबह ही अंगार बना दिया. यह आत्मघाती विस्फोट चरसद्दा शहर में अवस्थित एफसी किला जो कि अर्द्धसैनिक बलों का ट्रेनिंग सेन्टर है; के पास उस समय घटित हुई जब अर्द्धसैनिक बल के जवान बस में सवार हो रहे थे. उनकी छुट्टियाँ हो चुकी थीं और वे अपने-अपने घर जाने की मौज में मगन थे.


पाकिस्तान में जो आज अभी-अभी घटा है. यह आखीरी या अंतिम आतंकी कार्रवाई नहीं है. ओसामा को मारकर �न्याय हो चुकने� का ढिंढोरा पिट रहे अमरीका को इस पर गौर फरमाने की जरूरत है. वैश्विक राजनीति की कुत्सित चालें जिसका शिकार आम-आदमी है; उसके जन्मदाता खुद अमरीका और पाकिस्तान ही हैं. जहाँ तक मैं सोच पा रहा हँू, इस घटना से आहत सभी हैं, भारी कोफ्त और आवाज़ में ग्लानि सभी की है. कल की तार…

रंग जिंदगी के

बढि़या लिखले बाड़ऽ तू आपन संस्मरण. गंवउन के लोग के गंवार कहे के चलन भले होखे. जितना प्यार रिश्तन में गांव-ज्वार में बा ओकर रति भर अंश ना मिलिहे शहरवन में. अपनापा जेतना गांव में आजो बाटे. परिवार में रचल-बसल बा मेल-बहोर आजो खूब झोंटा-झोंटी, लड़ाई-तकरार, गाली-गलौज होखै के बादो में. उ देख के गर्व होला कि हम गांव के बिटवा हनी.

न दैन्यम् न पलायनम्

विचार त खूब निक बाटे. बाकिर इ हमनि के मति-बुद्धि में अटे तब न! विवेक के त कोठा-अटारी पर ढांक-तोप के रख देले बानिजा. खैर, जानकारी रउआ बहुत बढि़या दिहली, और जरूरी बात बतइले हनि अपना ब्लाॅग ‘न दैन्यम् न पलायनम्’ के माध्यम से.

असीमा

अइसन पोस्ट लिख दिहलू तू कि मन कुछ सोचे पर विवश हो गइल. हमनि के केतना आपन-आपन रटिलाऽजा. लेकिन दीदी हो तोहार बाबूजी त आपन स्वार्थ के उतारि के आपन जिन्दगी देस खातिर लगा दिहले, तोहनियो जानि आपन पापा के प्यार पाव खातिर तरस गइलूजा. खैर, हमहू खालि दिलासा देवे के और का कहि सकिला.

तितली: आज़ाद बुलबुल

तितली: आज़ाद बुलबुल: "आओ नन्हीं बुलबुल आओ मीठा मीठा गीत सुनाओ पिंजरा सोने का बना दूँ हीरे उसमें लाख जड़ा दूँ फल मीठे दूंगी खाने को ठंडा ठंडा जल पीने ..."


जानताड़ू दीदी, इ कविता जब हम आपन बबुआ देवरंजन के सुनाइब, त उ खूब खुश होई. अइसन कविता एहू से निक लागेला काहे कि एकर तार मन के डोर से जुड़ जाला. चलऽ 2 महीना तक हम देखब का लिखताड़ू तू हमरा देवरंजन के उमिर के लइकन खातिर.

बाल सजग

ए लइकन लोग बढि़या प्रयास करऽताड़जा हो. तोहन जानि के मनवा में आपन देसवा के लेके अभिए से एतना फिकिर बा, इ देखि के मन जुड़ाइ गइल. करीब दू महीना के हमहू छुट्टी पर बानि. ए से तोहन जाना के लिखल हम देखत रहब खलिहल में. हमरा तरफ से मन से निक और अंदर से ठीक बनऽजा. आज देसवा के हमनि के इहे के जरूरत बा हो.

का लिखताड़ जा आपन ब्लाॅग पर, आवतानि देखे...!

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काहे त मन जहुआइल बा. लगऽता बड़ी दिन्हा से घूम-फिर नइखे भइल न! ऐही से मनवा में हमार सब तमाशा हो रहल बा. अपना यूनिवर्सिटी में त पेड़ पर आम के टिकोरा लागल देख मन ईंटा-पत्थर चलावे के करता. कबो अधिया रतिया में पुरवा में लस्सी पीएला मन करे लागता. आईआईटी और मेडिकल के का कहल जाव आर्ट्स और सोशलो साइंस के लइकन सब खूब अंग्रेजी नाम वाला ठंडा पिअताड़न जा. देर राति के सड़क किनारे खड़ा होइके आपन छाति जलाव ताड़न जा सिगरेट पी-पी के.


देखा-देखी ही सही आजतक खूब गिटिर-पिटिर कइनी हमहू बैठी के कंप्यूटर पर. ई-मुआ कंप्यूटर हऽ. आफत के पुडि़या भी हऽ. ना खाली सामने रखल चाय के रंग बदल देवेला, बल्कि हमरा से कोसो दूर रह वाली हमार औरतियो के नराज कर देवेला. उनकर हमार खटर-पटर से नफरत हऽ. अब उनका के हम का बताइ की ज्यादा पढ़निहार भइला के फायदा बा, तो ओकरा से ज्यादा नुकसानो बउये ढेरो.


सो चल भईल छुट्टी. राजू बबुआ के यात्रा शुरू, अब हम न! बताइब कि कहाँ का पक रहल बा? कवन ब्लाॅगवा पर कव चीज रचल जा रहल बा? दिदिया-भैया लोगन के संसार में के-के का महत्त्व और जगह बनवले बा? कइसन-कइसन कमेन्टवा देइके मन जुड़वले बा? अब इ यात्रा में न…

राहुल गाँधी का भट्टा पारसौल आना तय......(x)

ख़बर के नक्शे पर भट्टा पारसौल

ब्लाॅग ‘इस बार’ ने कलम चलानी चाही, तो
एक शुभचिन्तक मित्र ने कहा कि यह ख़बर लिखने के लिए
लिखना है या फिर सोचने के लिए. मैं सोचने लगा.
चिन्तन अभी तक जारी है...!

ये रिश्ता क्या कहलाता है...?

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हम दो थीं
एक-दूजें पर मरने-कूटने वाली
लड़ने-झगड़ने वाली
आपस में अक्सर।

हम दो थीं
चाँद-सितारों की तरह
आसमान में उगने वाली
अल्हड़ और आप ही में मगन।


हम दो थीं
जिनके साथ घूमने-फिरने पर
नहीं थी कोई रोक-टोक
न ही कोई प्रतिबंध।

आज हम दोनों हैं
पर हम पर बंदिशे हजार
शहर से आए शब्दकोश में
क्या तो लिखा है
हम दोनों ‘लेस्बियन’ हैं!

अमरीकी इरादों का डीएनए टेस्ट जरूरी

''पाक में मारा गया ओसामा!’’
‘‘अलकायदा हुआ बिन लादेन!’’
‘‘दुनिया पहले से ज्यादा सुरक्षित!’’
‘‘जस्टिस हैज बीन डन!’’

समाचारपत्र की उक्त पंक्तियाँ ओसामा बिन लादेन के मारे जाने से सम्बन्धित हैं. 1 मई की देर रात पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से सटे ऐबटाबाद में अमरीका ने सीधी कार्रवाई को अंजाम देते हुए ओसामा के अंत की घोषणा की, तो पूरे विश्व में एकबारगी सनसनी फैल गई. आतंकी संगठन अलकायदा का मुखिया 54 वर्षीय लादेन दुनिया का सर्वाधिक वांछित आतंकवादी था जिस पर अमरीका ने 1 अरब रुपए से अधिक का इनाम घोषित कर रखा था. 9/11 की चर्चित घटना के बाद ओसामा के नाम से पूरी ख़ासोआम दुनिया वाकिफ़ हो गई थी और वह विश्व की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘टाइम’ द्वारा इतिहास के 10 सबसे कुख्यात भगोड़े आतंकी की सूची में पहले स्थान पर शामिल किया जा चुका था. उसकी मौत की सूचना क्या मिली, अमरीकी जनता उसी रात सड़कों पर उतर आई. जश्न में डूबे अमरीकी नागरिक व्हाइट हाउस के सामने ‘यूएसए...यूएसए’ चिल्ला रहे थे. इस ख़बर से वे कितने आह्लादित थे, इसका अंदाजा वहाँ खड़े हुजूम को देखकर लगाया जा सकता था.

वास्तव में यह अमरीकी प्रशासन और सीआ…

मम्मी हो आज ‘मदर्स डे’ हऽ

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जानतानी खूब हसबँू तू. हँस लऽ, लेकिन सच कहतानि की आज के तारीख बउये तोहरे नाम. आज मदर्स डे हऽ. दुनिया भर के मम्मी लोगन के आज बच्चवन-बेटवन सब गिफ्ट दिहन जा. हऽ ठीक कहताडू तोहार कन्यो के मिली गिफ्ट. लेकिन ओनि के तऽ अभी नबोज बाड़सन. अधिक से अधिक बिस्कुट आ चाकलेट खिया दिहसन उनका के. और हम...? हाँ, हम तोहरा खातिर कवन गिफ्ट ले सकिला ई तऽ सोचे के पडि़ न हो.
तू ठीक कहताड़ू कि इ सब तारीख विदेशिया प्यार जताव के हऽ. लेकिन हमार-तोहार कोई बात सुनी थोड़े. सब कोई शहरिया वेष धरि लेले बा. उहो आपन अर्जल थोड़े बा. दूसर दुनिया के चाल अउरि रंग-ढंग के नकल करि के हमनि के कबो मदर्स डे मनावतानि जा तऽ कबो फादर्स डे. सचो के मनवा-दिलवा में आदर लोगन के केतना बउये, तू हूं तऽ देख ताड़ू ना. जाये द छोड़. आज तू और कन्या मिली-बहुरि के खुशी-खुशी दिन बितइह जा. कवन बात के ले क तू-तू मैं-मैं ना. आज मदर्स-डे हऽ न! ऐ से हमहूं यहीजे से पैर छू के प्रणाम करऽ तानि.

वृक्ष बनता है बीज एक दिन

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चन्द्रसेनजीत मिश्र


एक बीज को चाहिए
अंकुरित होने के लिए
मिट्टी और पानी।

वह पेड़ों पर लगे रहकर
नहीं बन सकता एक पौधा।

रोका गया उसे यदि
पेड़ से गिरने से
मिट्टी से मिलने से
तो सड़ जाएगा वह।

रोको नहीं उसे
मिट्टी में मिल जाने दो।

पड़ने दो कुछ पानी के छिंटे
टूटने दो जरा उसे
पौधा तो बन जाने दो।

करने दो संघर्ष जरा
मिट्टी-पानी से सनने दो।

जब वह लड़-भिड़ कर बाहर निकलेगा
तो वही बीज एक दिन
विशाल वृक्ष बन कर उभरेगा।

(युवाकवि चन्द्रसेनजीत काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रयोजनमूलक हिन्दी(पत्रकारिता) के स्नातकोत्तर के विद्यार्थी हैं। अंतस की हलचल को अपनी दृष्टि, अनुभव और संवेदना की धरातल पर परखते हुए उसे शब्दों में ढालने का उनका प्रयास अनोखा है, चाहे यदा-कदा ही सही। ब्लाॅग ‘इस बार’ में पढि़ए उनकी कविता ‘वृक्ष बनता है बीज एक दिन’)

पेशा नहीं ‘पैशन’ है पत्रकारिता

समयबद्ध तत्परता एवं सक्रियता पत्रकारिता के बीजगुण हैं. एक पत्रकार की स्थिति उस दोलक की तरह होती है जो तयशुदा अंतराल के बीच हर समय गतिशील रहता है. पत्रकार होने की पहली शर्त है कि आलसपन या सुस्ती से वह कोसो दूर रहे. उसकी निगाह ‘शार्पसूटर’ की भाँति मंजी हुई या पैनी होनी चाहिए. किसी घटना या घटनाक्रम को एक अच्छी ख़बर के रूप मंे ढाल लेने की काबीलियत होना एक दक्ष पत्रकार की प्राथमिक योग्यता है. पत्रकारीय पेशे में ‘न्यूज़ सेंस’ को छठी इन्द्रिय का जाग्रत होना कहा गया है. समाचार-कक्ष में ख़बरों की आवाजाही हमेशा लगी रहती है. किसी ने ठीक ही कहा है कि जब सारी दुनिया सो रही होती है, तो समाचार-कक्ष में दुनिया भर के मसले जाग रहे होते हैं. यहाँ प्रत्येक ख़बर समय की खूंटी से बंधी हुई होती हैं. क्योंकि एक निर्धारित सीमा-रेखा(डेडलाइन) के बाद प्राप्त ख़बरें कटी-पतंग की तरह हवा में हिचकोलें खाती रह जाती हैं. चाहे वे कितनी भी महत्त्वपूर्ण, अप्रत्याशित, नवीन या बहुसंख्यक पाठकों की लोक-अभिरुचि की क्यों न हांे? उन्हें अंततः ‘छपते-छपते’ काॅलम के अन्तर्गत ही संतोष करना पड़ता है या फिर अगले दिन की ‘प्रतीक्षा-सूची…

असमय सयाने होते किशोरों से चकित अभिभावक

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किशोर समझकर उम्र मत पूछिए. कंधे पर स्कूल बैग देख उनकी नादानियत पर हँसना भी मना है. अभिभावक चकित हो सकते हैं, लेकिन ज्यादा देर तक सचाई को अन्धेरे में छुपा रखना भी सही नहीं है. आप विश्वास मानिए कि आपका 12-13 साल का किशोर कण्डोम-प्रयोग से सम्बन्धित सारे विधान जान चुका होगा. विश्वास मानिए, आज के किशोर इतने जानकार हैं कि वात्सायन के ‘कामसूत्र’ पर डाॅक्यूमेन्ट्री फिल्म बना डालें. सहपाठियों का एमएमएस बनाना तो उनके बायें हाथ का खेल है. बालसुलभ मुसकान में कामुकता देख आपको हैरानी हो सकती है और उनकी हरकत के किस्से जान आपके पेशानी पे बल पड़ सकते हैं. पर इन किशोरवय बच्चों के लिए ‘फिकर नाॅट’ शब्द चर्चित अथवा पसंदीदा तकिया कलाम है. माँ भी चोखा ‘आइटम’ है, माल है. वहीं हर जवान लड़की उनकी नज़र में शीला या फिर मुन्नी की किरदार.

किशोर लड़कियाँ भी उतनी ही खुली हुई बिंदास हैं. एक दूसरे के तन-बदन अर्थात फिगर से सम्बन्धित चटपटे जोक्स साथी लड़कों को भेज खुश होती इन लडकियों के लिए आज का ज़माना ‘फुल इन्ज्वाॅयमेन्ट’ का है. इसलिए खुद भी फ्लर्ट करती हैं और दूसरों को फ्लर्ट करने का न्यौता भी देती हैं. इनकी पीड़ा यह…

लाइव हिन्दुस्तान ने लिखा: मारा गया ओबामा

ख़बरों की होड़ में आगे रहने की स्पर्धा में देखिए बलण्डर मिस्टेक-

लाइव हिन्दुस्तान ने लिखा: ''मारा गया ओबामा’’(?)


मारा गया ओसामा बिन लादेन
दुनिया का वांटेड नंबर-1 आतंकवादी एवं अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन मारा गया है और अमेरिकी अधिकारियों ने उसके शव को भी कब्जे में ले लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने इसकी पुष्टि कर दी है। 08:03 PM
मारा गया ओबामा
ओसामा की मौत की खबर कोई चाल तो नहीं!
कौन था ओसामा
लड़ाई इस्लाम के खिलाफ नहीं: ओबामा
http://www.livehindustan.com/home/homepage.php

ओसामा की मौत: रहस्य की पटकथा

‘‘ओबामा-दुनिया सुरक्षित घोषित’’

‘‘ओबामा-फौजियों के हाथों ओसामा की हत्या’’


उक्त पंक्तियाँ तथ्य और आधारहीन हैं या नहीं, इसकी पड़ताल आवश्यक है. मशहूर अमरीकी पत्रकार जाॅन रीड की एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है-‘‘दस दिन जब दुनिया हिल उठी.’’ आज तारीख 2 मई; जब जनमाध्यमों ने यह ख़बर देनी शुरू की कि ‘ओसामा बिन लादेन अमरीकी हमले में मारा गया’, तो दुनिया तनिक भी हिली-डुली नहीं. अमरीका को छोड़ दुनिया भर में जश्न का माहौल भी कम ही देखने को मिला. यह जरूर है कि अमरीका से आयातित इन ख़बरों को दुनिया ने बड़े ही चाव से पढ़ा, सुना और घंटों टेलीविज़न पर देखा. पर असर में वह कुछ ज्यादा नवीन प्रभाव नहीं छोड़ सकी हंै. जबकि अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा मान रहे हैं कि दुनिया पिछले कल की तुलना में आज ज्यादा सुकुनबस्त हैं. विशिष्ट अभियान के तहत ओसामा बिन लादेन को किसी दूसरे मुल्क की सरज़मीं पर मार गिराना, अवश्य ही टेढ़ी खीर है जिसे ओबामा अमरीका की एक बड़ी जीत और अपने कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि मान रहे हैं।

ओबामा के सम्बोधन से अमरीकी समाज में जश्न का माहौल तारी है. लोग भारी मात्रा में ‘जीरो ग्राउंड’ के इर्द-गिर्द जुटने लगे …

कुछ नूर, कुछ कोहिनूर

सिर्फ 72 घंटे और, पापा!

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श्रीकांत मनु


आपकी पहली और अंतिम चाहत
जिसके लिए रूकी हैं आपकी सांसे,
आपका लाडला आएगा, पापा!
और 72 घंटों के लिए
रोकनी होगी आपको अपनी सांसें
आपका लाडला आएगा, पापा!

एक बड़ी ‘डील’ करेगा कल
एक बड़ी कम्पनी के साथ
फिर निकल जाएगा, यहाँ के लिए
आपका लाडला आएगा, पापा!


हम सात बहने
सात सौ घंटों से
चिपकी हैं आपसे, पापा!
सभी आयी हैं
किसी न किसी को छोड़कर
कोई बेटे को, तो कोई बेटी को
कोई सास को, तो कोई ससुर को




मैं तो उसे छोड़कर आयी हँू
जिसके साथ जीना था
जीवन भर मुझको
चुनना था, किसी एक को
उनको या आपको।


72 घंटे बाद लाडला आएगा,
आप जाएँगे परलोक
बहने जाएँगी अपने-अपने लोक
पर कहाँ जाऊँगी मैं? पापा!
सातवीं अनचाही बेटी।

आज जब जरूरत थी खून की
तो मेरे खून को ही मिलना था,
शायद आपके खून से
इसीलिए डाॅक्टर ने तब कर दिया था मना
एबार्शन करने से
आॅपरेशन थियेटर में।
मेरे शरीर के खून की
अंतिम बूँद भी आपकी ही है, पापा!


वैसे तो आपके लाडले का भी
खून मिलता है आपसे
पर वह आज टोकियो पहुँचेगा
कल एक बड़ी ‘डील’ करेगा
परसों यहाँ के लिए चल देगा
आपका लाडला आएगा, पाना!
सिर्फ 72 घंटे और, पापा!





(श्रीकांत मनु के नाम से लोकप्रिय श्रीमन्ननारायण शुक्ल सम्प्रति राजकीय इन्टर गोविन्…

जनता जागे, तो विमुक्त समाज की मुक्ति संभव

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दैनिक समाचारपत्र जनसत्ता के रविवारी परिशिष्ट(1 मई,
2011) में पंकज रामेन्दु की आवरण कथा ‘अपने ही मुल्क में बेगाने’ पढ़ते
हुए मन कितनी बार हँसा, थाह नहीं? यह हँसी अपनेआप पर थी जो आँखों में
‘विजन 2020’ का नक्शा लिए घूम रहे हैं। हम देश की बढ़ती आर्थिक ‘ग्रोथ
रेट’ पर अपनी काॅलर सीधी कर रहे हैं या फिर खुद से अपनी पीठ थपथपाने की
फिराक में हैं। हम यह मान चुके हैं कि नई सहस्त्राब्दी में तेजी से उभरता
भारत नित आगे बढ़ रहा है। बहुत-कुछ ‘कदम-कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाए
जा’ जैसी तर्ज़ पर। ऐसे उल्लासित समय में पत्रकार पंकज की सचबयानी रूलाती
नहीं है, हँसने के लिए ‘स्पेस’ देती है। उन्होंने जिस विमुक्त समुदाय की
जीवनचर्या को उघाड़कर हमारे सामने रखा है, उसे पढ़ते हुए एकबारगी
अन्धेरों से घिर जाने का बोध होता है। विमुक्त जाति के लोगों में धन-वैभव
की इच्छा कम अपने जांगर से पैदा की गई करतब और कला को जिंदा रखने की जिद
अधिक है।

उन्हें पारम्परिक ढर्रे पर जरायम जाति से सम्बोधित किया जाना
एक किस्म की ज्यादती है जिसे मीडिया धड़ल्ले से आजमा भर नहीं रही है,
बल्कि इस समाज की आन्तरिक बसावट को झुठलाते हुए इनके छवि का
अपराधीकरण भी …