जनता के लिए नाक का प्रश्न नहीं है ‘NAC’ बिल


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यह विधेयक सीधे-सीधे तुष्टिकरण की नीति है. वोट-बैंक की राजनीति भी.
साम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा की जो परिभाषा विधेयक में वर्णित हैं
जिनका जिक्र सुरेश चिपूलकर जी ने अपने पोस्ट(www.janokti.com)में क्रमवार
ढंग से किया है; वे तर्क-आधारित कम निराधार अधिक हैं. यह समझ से परे है कि
आखिर इस विधेयक को किन तथ्यों, आँकड़ों एवं वस्तुनिष्ठ शोधों के आलोक में तैयार
किया गया है. विधेयक में प्रयुक्त यह कथन कि साम्प्रदायिक हिंसा सदैव बहुसंख्यक
वर्ग के द्वारा चालित होते हैं, नेशनल एडवाइजरी कॉन्सिल की बुद्धिमता पर
सवाल खड़े करते हैं. पक्षपातपूर्ण रवैए या पूर्वग्रह की नीति से देश का
फायदा कम नुकसान ही अधिक है. अतः सम्प्रदायिक एवं लक्षित हिंसा विधेयक पर
जोरदार बहस-मुबाहिसे की जरूरत है. विचार कभी व्यक्तिपरक नहीं होने चाहिए.
ध्यान दें कि यह व्यक्ति कोई समुदाय विशेष या सांगठनिक इकाई भी हो सकता
है जिसे हम अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक खाँचों में बाँट सकते हैं.

पीछे मुड़कर देखें तो सन् 2002 में गुजरात में हुए साम्प्रदायिक दंगे ने
अमानवीयता की सारे हदें तोड़ दी. सर्वधर्मप्रिय गुजराती समुदाय जिन
सत्ता-प्रतिष्ठानों के परोक्ष षड़यंत्रों का शिकार हुई उससे आज की तारीख
में वहाँ की जनता काफी हद तक उबर चुकी है. लेकिन उन काली तारीखों में
आमआदमी ने जलालत और वहशी कुकृत्य के जो अंजाम भुगते; उनका
आकलन-समाकलन लिंग, वर्ग, वय, जाति, धर्म या सम्प्रदाय विशेष के रूप में कर
पाना असंभव है. बहुसंख्यक समाज के ऊपर तोहमत मढ़कर अल्पसंख्यक जमात को
बहला-फुसला लेने की यह कुत्सित चाल ‘पब्लिक’ जान चुकी है. जनता यह भी जान
चुकी है कि सामंती ध्येय वाली केन्द्र सरकार की इस विधेयक को लाने के पीछे असली मंशा
क्या है? मित्रों, प्रायश्चित के प्याले में गंगाजल पी लेने से अगर
मोदी-सरकार के पाप नहीं धुल सकते हैं, तो गारंटी कि प्रायोजित ढंग से
दलित-बस्ती में जाकर एकदिनी प्रवास करने से दलित-उत्थान भी नहीं संभव है.
और नहीं नेशनल एडवाइजरी कॉन्सिल की ओर से प्रस्तावित साम्प्रदायिक एवं
लक्षित हिंसा विधेयक से दूरगामी परिणाम ही देखने को मिलेंगे. वैसे भी यह
विधेयक नैक(NAC) के लिए नाक का प्रश्न भले हो, आमआदमी के लिए तो यह महज
वोट-बैंक हथियाने का जरिया भर है.
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