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Showing posts from February, 2013

पुनर्रचना के निकष पर एक लड़की

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‘‘समाज उसके लिए रंगमंच है
 और कला उसकी मेधा की क्रीड़ा है
 वह कलाकार होने के साथ मनुष्य भी है
 कहना कितनी बड़ी पीड़ा है।’’
            -डाॅ. रामदरश मिश्र

एक लड़की का अभिनयकुशल होना; कला में निष्णात होना; उसके मनुष्य होने की निशानी नहीं है। तो फिर उसके होने सम्बन्धी निशान या तारक-बिन्दु क्या है? पहचान की हाँडी में सीझती ऐसी ही लड़कियों के बारे में प्रो. कृष्ण कुमार बड़ी शिद्दत से विचार करते दिखाई देते हैं। ‘लड़की की पुनर्रचना’(hindisamay.com) नामक अपने लेख में वे एक लड़की की आत्मा, मस्तिष्क, मन और देह सबकी आपबीती अपनी कानों से सुनते हैं; तब जा कर उसे व्यक्तिगत विचार-सरणि में ढालते हैं, उसे एक मेखमाला का रूप, आकार या कि कोई ‘नज़रिया’ नाम देते हैं। उनका खुद का यह मानना है कि अध्यापकीय पेशे से जुड़े होने के कारण वे कई लड़कियों को काफी करीब से देखते रहे हैं जो सयाने होने की दहलीज पर होती हैं; जिन्हें समाज रच रहा होता है क्षण-प्रतिक्षण। बकौल प्रो. कृष्ण, ‘‘मैंने अपने अध्यापक जीवन में हजारों लड़कियों को पढ़ाया है; उनमें से ऐसी बहुत कम देखी हैं जिन पर किशोरावस्था के नाटकीय म…

हिम्मत

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यदि किसी दिन
आसमान टंगा मिले
छत की तरह
तुम्हें अपने ही घर में

तो राजीव!
तुममें इतनी हिम्मत होनी चाहिए
कि कहो आसमान से
जाओ अपनी जगह जाओ
और मेरे बच्चों को
आँगन में खेलने दो

वे मेरे प्यासे होने पर
दो अँजुरी जल काढ़ लेंगे
तुममें से ही

यार! उसके लिए तुम्हें मेरे पाॅकेट में समाने की जरूरत नहीं है।

भारतीय युवा और समाज:

भारतीय सन्दर्भ में यह विविधता या कि विभिन्नता सर्वाधिक बहुआयामी अथवा बहुपक्षीय है। विस्तृत सामाजिक एवं राजनीतिक रंगपटल के बावजूद सब में एक समानधर्मा अभिलक्षण विद्यमान है-लोकतांत्रिक विचारों, विशेषतः वैज्ञानिक समाजवाद, धर्मनिरपेक्ष गणराज्य, प्रगतिशील मूल्य, गुटनिरपेक्ष आन्दोलन; संभाव्य चेतना, विद्रोह की संस्कृति, नेतृत्व, अभिव्यक्ति के नैसर्गिक गुणधर्म तथा राष्ट्रों के बीच मैत्री व शान्ति के लिए संघर्ष इत्यादि। उपर्युक्त बिन्दु अहम और महŸवपूर्ण कहे जा सकते हैं क्योंकि भारत में युवा राजनीति का फलक काफी विस्तृत और व्यापक है। कई अर्थों में भिन्न तथा विशिष्ट भी। राजनीतिक स्तर पर प्रदर्शित इस भिन्नता एवं विशिष्टता के लिए सामाजिक स्तरण काफी हद तक जिम्मेदार है। यह स्तरण लिंग, वयस्, वर्ग, जाति इत्यादि स्थूल-सूक्ष्म विभेदक इकाईयों में बँटी हुई है। देखना होगा कि सामाजिक स्तरण की दृष्टि से किसी युवक का वर्गीय उद्गम एवं समाज की सामाजिक संरचना में स्थान प्रमुख विभेदकारी कारक है। विरोधी वर्गों और स्तरों में विभाजित समाज में ये भेद सर्वाधिक मुखर होते हैं। परिणामस्वरूप सामाजिक-मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ,…

स्वाधीन, चेतस और बहुरंगा युवजन

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अस्सी के दशक में संयुक्त राष्ट्र संघ ने सन् 1985 को ‘अन्तरराष्ट्रीय युवजन वर्ष’ के रूप में मनाने की घोषणा की थी। 12 अगस्त संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अन्तरराष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में घोषित है। इस घोषाणा के पीछे मूल उद्देश्य बीसवीं शताब्दी के युवकों की अत्यन्त विविधतापूर्ण और परस्पर विरोधी सामाजिक गतिविधियों को लक्षित करना था। साथ ही, सामाजिक परिवर्तन में युवाओं की उस भूमिका को चिह्नित करना था जिसके बगैर यह पटकथा पूरी ही नहीं की जा सकती है। युवावस्था गहन समाजीकरण की अवधि है। आधुनिक विज्ञान समाजीकरण को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में परिभाषित करता है जिसके दौरान व्यक्ति समाज के एक पूर्ण और समान सदस्य के रूप में कार्य करने हेतु अपनी भूमिका निर्धारित करता है और ज्ञान सन्दर्भित आवश्यक मानकों और मूल्यों की सुनिश्चित एवं सुस्पष्ट पद्धति ग्रहण करता है।
    इस सन्दर्भ में जवरीमल्ल पारख का यह कहना समीचीन प्रतीत होता है कि युवावस्था कर्म की अवस्था है; लेकिन, यह अवस्था विवेक और विश्वास की भी अवस्था है। यह दुनिया को एक बेहतर दुनिया बनाने के संघर्ष में शामिल होने की अवस्था भी…

मरम्मत

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‘दिमाग मरम्मत पर है...शान्ति बनाएँ रखें’
असुविधा के लिए खेद है!


काशी की अस्सी

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अस्सी घाट
तीनों लोक से प्यारी काशी में है
जो वहाँ सिगरेट पीते हैं
तीनों लोक का मजा लेते हैं
जो वहाँ गाली देते हैं
तीनों लोक से प्यारी गाली देते हैं
जो वहाँ बोलते हैं
तीनों लोक से दमदार बोलते हैं
क्या आपने देखी है, काशी की अस्सी
जो तीनों लोक से प्यारी काशी में है।

नदी

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प्यास लगी
तो बचे-खुचे धैर्य के साथ
पसरी रेत पर
जरूरतमंद रेत ने
नदी के प्यास को
अपनी प्यास की भूख समझ
खा लिया
नदी ने उफ! तक नहीं की
अंतिम क्षण तक
नदी कहती रही थी
‘मैं सिर्फ नदी नहीं हँू
हँू रेत की माँ’

घर के आँगन में
एक बेटी जन्मी है
सुना है
उसका भी नाम है-‘नदी’ 

जब तक नदी है
संभावनाएँ अनन्त हैं
और रेत के पास मौके अनगिनत।

निजी रियासत बनते विश्वविद्यालय

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अध्यापकीय पेशे से जुड़े ज्ञानावलम्बियों का धुर्त होना अक्षम्य है। लेकिन, वे आज निरपराध घोषित हैं। गुणवत्ता के मानक पर फिसड्डी साबित हो रहे विश्वविद्यालयों के बारे में जताई जा रही चिन्ता फिजू़ल नहीं है। राष्ट्रपति भवन में हाल ही में आयोजित केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के सम्मेलन में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने इस बाबत बेहद अफसोस जताया है। उनकी मुख्य चिन्ता यह है कि हालिया सर्वेक्षण से उजागर तथ्य में यह कहा जा रहा है कि विश्व के टाॅप 200 विश्वविद्यालयों की सूची में भारत का एक भी विश्वविद्यालय शामिल नहीं है। प्रश्न है कि जब उच्च शिक्षा में अध्यापकों की नियुक्ति में ही बड़ी धांधली हो रही है, तो फिर अन्य सम्बन्धित चीजों के अप्रभावित रहने की गुंजाइश ही क्या बचती है? उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्यापक के रूप में नियुक्त हो रहे अधिसंख्य अभ्यर्थी साँठ-गाँठ और जुगाड़-पैरवी में उस्ताद हैं। उनकी ‘मास्टरी’ सम्बन्धित विषय या अनुशासन में नगण्य है। लेकिन, उनके चयन के पीछे जो गणित या समीकरण है; वह नेटवर्क बेहद प्रभावशाली और ऊपरी पहुँच का है।    

पिछले दिन…

अभ्युत्तथान: फिल्म स्क्रिप्ट का आॅउटनोट्स

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नयनतारा उन भारतीय महिलाओं में से है जो अपने बच्चों के सुरक्षित भविष्य को लेकर फिक्रमंद रहती है। अस्थायी नौकरी के बीच नयनतारा तलाकशुदा ज़िन्दगी जी रही है। रोहन उसका बेटा है और रोहिणी बेटी। नयनतारा काॅलोनी के मानिंद लोगों से बहुत कम कमाती है, लेकिन रोजमर्रा के खर्च में कटौती बेहिसाब करती है।

उसका सपना है कि रोहन और रोहिणी सोसाइटी के पब्लिक स्कूल में पढ़े। लेकिन वहाँ दाखिला नहीं मिलती है। स्कूल से निराश हो कर लौट रही नयनतारा की मुलाकात वार्डेन कालिन्दी से संयोगवश तब होती है जब उसका पति उसे स्कूल छोड़ने या तलाक देने के लिए कह रहा होता है।

खुद तलाकशुदा नयनतारा परेशानहाल कालिन्दी से अपना जीवनगाथा शेयर करती है। वह बताती है कि वह पहले से कितना बेहतर और मानसिक रूप से खुद को संतुष्ट एवं सुरक्षित महसूस कर रही है। कालिन्दी जिसकी अर्सी नाम की 6 साल की बेटी है; वह नयनतारा के हौसले और साहस को देखकर उसी समय अपने पति को स्पष्ट शब्दों में तलाक के लिए हाँ कह देती है।

नयनतारा जो निम्न मध्यवर्गीय परिवार से है जब उच्च मध्यवर्गीय परिवार …

कविता पर कहानी

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बनारस शहर कवियों का गढ़ है। आभावान कवियों को देखकर कई जन कवि हो जाते हैं। संगत से गुण होत है, संगत से गुण जात वाली कहावत। या कहें संगत का रंगत।

दरअसल, मेंहदी जिसकी हथेली पर रची जाती है उसी पर अपना रंग नहीं छोड़ती, बल्कि मेंहदी लगाने वाले हाथ को भी रंगीन कर देती है, जरा-मर्रा। और यह किसी तरह का चोरकटई भी नहीं है।

एक दिन इस गढ़ में कविता-प्रतियोगिता का आयोजन हुआ। सभी से प्रविष्टियाँ माँगी गई। मैं ठहरा हिन्दी पत्रकार। कविता देख-पढ़ लेता हँू। सूझती कतई नहीं। और कविता वैसे भी हृदय का मामला है। मस्तिष्क का खेल नहीं।

खैर, सोचा कि कविता के लिए क्या कोई नियम-कानून है। मालूम नहीं। सो, लिखा और भेज दी। कविताएँ एक की जगह तीन थीं।

1.
उनकी तनख़्वाह
चालीस हजार है
लेकिन, जब भी वे चाय पीते हैं
पैसा मुझे देनी पड़ती है
वे सिर्फ कहते हैं, गुरु! महंगाई डायन खाए जात है।

2.
अस्सी घाट
तीनों लोक से प्यारी काशी में है
जो वहाँ सिगरेट पीते हैं
तीनों लोक का मजा लेते हैं
जो वहाँ गाली देते हैं
तीनों लोक से प्यारी गाली देते हैं
जो वहाँ बोलते हैं
तीनों लोक से दमदार बोलते हैं

क्या आपने द…

जंगल के बारे में

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सच पूछिए
जिस जंगल से
मेरा कोई दरकार नहीं है

उस जंगल के बारे में
मैंने पढ़ा है
यह जाना है
कि वहाँ कोई भव्य शादी नहीं करता
कि वहाँ कोई दिव्य दावत नहीं देता
कि वहाँ कोई एम्स या आईआईटी संस्थान नहीं खुलता
कि वहाँ कोई बिड़ला अपनी मन्दिर नहीं बनाता
कि वहाँ कोई फिल्म समारोह आयोजित नहीं होता
कि वहाँ कोई सूचना-राजमार्ग नहीं पहुँचता
कि वहाँ वैसा कुछ भी नहीं होता
...जो आज के कथित उत्तर आधुनिक समाज में होता है

जबकि वहाँ लोग रहते हैं
जबकि वहाँ जीवन का संकट है
जबकि वहाँ परिस्थितियाँ विकट है

तब भी जंगल में बसे लोग जंगल को प्यार करते है जबर्दस्त

सच पूछिए
जिस जंगल से
मेरा कोई दरकार नहीं है

उस जंगल के बारे में
मैंने पढ़ा है
यह जाना है
कि उनका सीधा सम्बन्ध हमारे मौलिक अधिकार से नहीं है
कि उनका सीधा सम्बन्ध हमारे देश के संविधान और सरकार से नहीं है
कि उनका सीधा सम्बन्ध हमारे विकसित होते शहर से नहीं है
कि उनका सीधा सम्बन्ध हमारे कला, साहित्य, संस्कृति व शिक्षा से नहीं है
कि उनका सीधा सम्बन्ध हमारे अर्थ-व्यापार, शेयर, बीमा व बैंकिंग से नहीं है

जबकि वहाँ लोग रहते हैं
जबकि वहाँ जीवन का सं…