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सीने पर तेरी कील ठोकूंगा, आत्महत्या नहीं करूंगा

.........................  रजीबाकीराय
मैंआत्महत्याकेविरूद्धहूँ।मनस्वीसाहित्यकाररघुवीरसहायकीकविता ‘आत्महत्याकेेविरूद्ध’ कीतरह।मैंसदागीतनयागानेऔरसिरजनेकोतैयारहूँ।ध्यानदेनाहोगाकिहममनुष्यकालचक्रकाकीलहैं, तोइतिहासचक्रकीधुरी।हमविज्ञानकेप्रमाणहैं, तोजीवन-प्रयोगकेखुलेनेत्र।हमसबदिशा-बोधकाविवेकहैं, तोसंज्ञानात्मकविचारोंकेप्रकाशपुंज।हममनुष्यअभिशप्तनहींहैंऔरयथास्थितिवादीहोनाहमेंस्वीकार्यबिल्कुलनहीं।यानीप्रकृति-पर्यावरणमेंहमारीजीवितसत्ताबरकरारहै, तोप्रलय-विनाशसेभयातुरहोनेकीजरूरतकिसीकोक्योंहो? अतएव, मेराआत्महत्याकेविरूद्धहोनाजायज़