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Showing posts from February, 2014

मैं, विक्रम और अजीरा माँ

‘तोड़ती पत्थर’: संवेदन, संघात एवं सम्प्रेषण

तोड़ती पत्थर
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वह तोड़ती पत्थर;
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर-
            वह तोड़ती पत्थर
कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बँधा यौवन,
नत नयन, प्रिय कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार-
सामने तरुमालिका, अट्टालिका, प्राकार।

चढ़ रही थी धूप;
गमिर्यों के दिन,
दिवा का तमतमाता रूप;
उठी झुलसाती हुई लू,
रुई ज्यों जलती हुई भू,
गर्द चिनगीं छा गईं;
          प्रायः हुई दुपहर-
            वह तोड़ती पत्थर।

देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार;
देखकर कोई नहीं
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खाई रोई नहीं;
सजा सहज सितार,
सुनो मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार।

एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर;
ढुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा-
            ‘‘मैं तोड़ती पत्थर।’’
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कविता ‘तोड़ती पत्थर’ सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने लिखी है। इस कविता का रचना-काल सन् 1935 ई0 बताया जाता है। यह वह समय है, जब देश गुलाम था। सनद रहे कि इस परतंत्र ज़माने में स्वाधीन-अधिकारों का प्रयोग-प्रदर्शन आज की तरह खुलेआम कर …

डायरी-अंश : 26 जनवरी की पूर्व संध्या पर पिता का सम्बोधन अपने बेटों के नाम

प्रिय देव-दीप, 

हम एक गणतन्त्र राष्ट्र के नागरिक हैं। उस बृहद गणतन्त्र के नागरिक जिसकी आबादी सवा अरब का आँकड़ा पार कर चुकी है। आज जिस भारत को हम अंधाधुंध शहरीकरण, मशीनीकरण, आधुनिकीकरण के दौड़ में बेतहाशा भागते देख रहे हैं; वह मुल्क आज से 66 साल पूर्व स्वाधीन भी नहीं था; हमने इसे हासिल किया। ‘टच स्क्रीन’ और ‘वेराइटी-वेराइटी चाॅकलेट फ्लेवर’ के इस ज़माने में यह अनुमान कर पाना भी कठिन हो सकता है कि काले पानी की सजा पाने वाले हिन्दुस्तानियों के लिए पानी के काले होने का अर्थ उस वक्त क्या हुआ करता था? महात्मा गाँधी जैसे एक वृद्ध व्यक्ति के व्यक्तित्व में ऐसा क्या कुछ जादू था कि आमोखास सभी उनकी पगडंडियों को समीप से गुजरते ही चूम लेने को बेचैन...व्याकुल हो उठते थे। भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन, इतिहास की एक ऐसी सचाई है जिसे जाने बगैर भारत के अंतरिक्ष में जाने, उपग्रह संचार व्यवस्था हासिल करने तथा आधुनिक से उत्तर आधुनिक समाज बनने तक की कहानी को जी पाना नामुमकिन है। जीने के लिए हमारे भीतर भारतीय मन, मस्तिष्क, संस्कार और देशप्रेम का जज़्बा चाहिए।
देव-दीप, हमें उन भारतीयों के बारे में जानना ही चाहिए जि…

इस बार 'आप' से शुरू

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आम-आदमी पार्टी : जनान्दोलन से जिन-जिन तक ---------------------------------------------------
दशक पहले एक फिल्म आई थी। उन दिनों हमारे वय-उम्र के लड़के बड़े गुमान से पूछते फिरते थे-‘हम आप के हैं कौन?’ रेडिमेड जवाब लड़कों के पास ही तैयार रहता था-‘सलमान खान!’ आज देश की जनता ‘आप’(आम-आदमी पार्टी) से यही सवाल पूछ रही है; लेकिन-गंभीरतापूर्वक, संजीदगी के साथ और पूरे आत्मविशास से। इसका जवाब(अरविन्द केजरीवाल) छिछरोई भरे लहजे में मजाकिया ढंग से देना ‘आप’ को महंगा पड़ सकता है। खुदा-न-ख़ास्ते ऐसा हुआ, तो समझिए-‘आप स्वाहा आप’। देखना होगा कि यह पार्टी अपनी कई अंदरूनी विसंगतियों का शिकार है। हिन्दी भाषा में नामकृत आम-आदमी पार्टी का अभी तक हिन्दी में कोई वेबासाइट नहीं है। उल्टे ‘आप’ लोकसभा चुनाव की उम्मीदवारी के लिए आम-आदमी को उसी वेबसाइट पर भेज रही है जहाँ उसकी संस्कृति, समाज, दर्शन, चिन्तन और साहित्य की अभिव्यक्ति का मुख्य औज़ार अपनी भाषा का रूप-रंग-चेहरा ही नहीं है। यहाँ अंग्रेजी में जानने के लिए उद्देश्य और विचारधारा के नाम पर ढोल का खोल है-‘जनलोकपाल बिल’ या ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’; सफलता का केजरीवाल-…