इस बार 'आप' से शुरू

आम-आदमी पार्टी : जनान्दोलन से जिन-जिन तक
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दशक पहले एक फिल्म आई थी। उन दिनों हमारे वय-उम्र के लड़के बड़े गुमान से पूछते फिरते थे-‘हम आप के हैं कौन?’ रेडिमेड जवाब लड़कों के पास ही तैयार रहता था-‘सलमान खान!’ आज देश की जनता ‘आप’(आम-आदमी पार्टी) से यही सवाल पूछ रही है; लेकिन-गंभीरतापूर्वक, संजीदगी के साथ और पूरे आत्मविशास से। इसका जवाब(अरविन्द केजरीवाल) छिछरोई भरे लहजे में मजाकिया ढंग से देना ‘आप’ को महंगा पड़ सकता है। खुदा-न-ख़ास्ते ऐसा हुआ, तो समझिए-‘आप स्वाहा आप’। देखना होगा कि यह पार्टी अपनी कई अंदरूनी विसंगतियों का शिकार है। हिन्दी भाषा में नामकृत आम-आदमी पार्टी का अभी तक हिन्दी में कोई वेबासाइट नहीं है। उल्टे ‘आप’ लोकसभा चुनाव की उम्मीदवारी के लिए आम-आदमी को उसी वेबसाइट पर भेज रही है जहाँ उसकी संस्कृति, समाज, दर्शन, चिन्तन और साहित्य की अभिव्यक्ति का मुख्य औज़ार अपनी भाषा का रूप-रंग-चेहरा ही नहीं है। यहाँ अंग्रेजी में जानने के लिए उद्देश्य और विचारधारा के नाम पर ढोल का खोल है-‘जनलोकपाल बिल’ या ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’; सफलता का केजरीवाल-सूत्र; तस्वीरों में ‘आप’ सरकार के नेताओं के करारे-फोटोग्राफ; और सोशल मीडिया के फटाफट टाँके जाने वाले अपडेट्स। आम-आदमी का उसमें नाम मुद्रित है, लेकिन वह किसी भावमुद्रा में कहीं नहीं है।

सूझ और समझ की ऐसी कमी खतरनाक तो है ही, भरभराकर गिरने और ढूह में तब्दील होने को न्योंतती भी हैं। मीडियावी प्रचार को आम-आदमी पार्टी जिस तरह विशेष महत्त्व दे रही है; या जनमाध्यमों के रंगारंग-विस्तार(न्यू मीडिया, सोशल मीडिया इत्यादि) को गले लगा रही है; वह प्रलोभन मात्र है। ‘आप’ का यह आभासी छल और छद्म तकनीकी-प्रौद्योगिकी का प्रपंच-मात्र है जो निजता का ख्याल कम अंतर्निजता का अतिक्रमण और अपहरण अधिक करती है। इन आधुनिक जनमाध्यमों में आमजन के बारे में ‘थेसिस व एंटी-थेसिस’ पर्याप्त मात्रा में मिल जाएँगे; लेकिन उनकी मुश्किलातों, दुःख-तकलीफों, शोषण, उत्पीड़न इत्यादि का समाधान-निवारण करने में ये नवमाध्यम सक्षम कम और निरुपाय अधिक हैं। अरविन्द केजरीवाल को वस्तुतः यह जानकारी अवश्य होनी चाहिए कि भावनात्मक-सम्मोहन का राजनीतिक काव्य-शास्त्र रचकर दिल्ली में सरकार बनाई जा सकती है; लेकिन दिल्ली के आम-आदमी को अपनाने या सही अर्थों में उसके भीतर पैठने का सही तरीका यह नहीं है। ‘आप’ को अभी ज़मीनी स्तर पर और कड़ी मेहनत और लम्बी लड़ाई लडे जाने की जरूरत है। भाषा और आँकड़े में खेल करना जिन पार्टियों को आता है; उन्हें ही पराजित कर ‘आप’ की पार्टी दिल्ली में सत्तासीन हुई है। आम-आदमी पार्टी’ की यह ऐलानिया घोषणा कि वह देश भर में 300 लोकसभा सीटों के लिए अपने जनप्रतिनिधियों को खड़ा करेगी; अन्य पारम्परिक पार्टियों के ऐंठ और एकाधिकार की प्रवृत्ति पर सीधा प्रहार है। यह खुद आम-आदमी पार्टी के लिए भी बड़ी चुनौती है। अतः आम-आदमी पार्टी को अपने समस्त दरारों को समय रहते पाटने/दुरुस्त करने होंगे; अपने बड़बोलेपन या फौरी हाजिरजवाबी की आदत से परहेज करना सीखना होगा। अरविन्द केजरीवाल को इन सब बातों का पूर्णरूपेण भान है। वे स्वीकार करते हैं-‘‘अगर हमसे कुछ भूल हुई, तो जनता हमें कभी माफ नहीं करेगी।’’
 
अतः आज अधिक जरूरी है-आम-आदमी की मूलभूत जरूरतों की पहचान, उन तक सुविधाओं को हर हाल में सीधे पहुँचाने की जिद्दी धुन और त्वरित पहलकदमी; लोगों के मन-दिल पर जमे उस गाद-गंदगी को साफ-सुथरा करने की तबीयत/नियत जिन्हें पिछली सरकार ने चमकाऊ सड़क और हाथीपाँव वाले फ्लाई-ओवरों की ओट में ढाँक-तोप दिया है। यह सही है कि ‘आप’ सरकार के सामने चुनौतियों एवं संघर्षों का पहाड़ खड़ा है जिसे तोड़कर समतल-सपाट बनाने है। इसके अतिरिक्त नई संभावना और उम्मीद को भी तलाशने-तराशने होंगे; ताकि आम-आदमी अपनी साधारण खोली में असाधारण बनते कठिनाइयों(नाम लेने की जरूरत नहीं है!) को साध सके। आम-आदमी पार्टी को वादों का पुलिन्दा दिखाने अथवा दिखावे का रिपोर्ट-कार्ड पेश करने की जरूरत नहीं है। आज जरूरत है, तो काम-दर-काम किये जाने की। आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर पार्टी के सांगठनिक ढाँचे को विवेकसम्मत ढंग से खड़ा/तैयार करने की अनिवार्यता है। इसके अतिरिक्त अपने कार्यपद्धति में ईमानदारी, शुचिता, पारदर्शिता और निष्पक्षता का समावेशन आवश्यक है; ताकि यह पार्टी अपनी सत्ता-शक्ति में गिने-चुने लोगों का मुखापेक्षी या समर्थक पार्टी बनकर न रह जाए। सामान्यतः मुँहामुँही(फेस टू फेस) यह पार्टी जनान्दोलन से जन्मी हुई पार्टी कही जाती है; जबकि सचाई यह है कि यह पार्टी जनान्दोलन की भावना से उत्प्रेरित(पैशनेट) मात्र है; उसकी पैदाइश हरग़िज नहीं है। इसका गठन मूलतः दिल्ली-केन्द्रीत बौद्धिक-विमर्श से संभव हुआ है जो अपने सिद्धान्त और विचारधारा में देश की सांविधानिक राजनीति को ‘वैकल्पिक एवं जनपक्षीय’ बनाने पर सहमत एवं एकमत है। यूँ तो दिल्ली की कोठी में बैठकर वैचारिक मुआयना कर लेने से देश की राजनीति का सर्वहाराकरण अथवा केन्द्रीय सत्ता का विकेन्द्रीकरण हो जाना संभव नहीं है। लेकिन, इस दिशा में सोचा जाना परिवर्तनकामी राजनीति के लिए नींव में ईंट के पत्थर रखने से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है।
 
आधुनिक शासन प्रणाली में शासन, परिवर्तन और नवीनीकरण की योजना को महत्त्व प्राप्त है। उसमें यह भी जुड़ा हुआ है कि नई राजनीतिक संस्कृति की रूपरेखा तबतक तैयार नहीं की जा सकती है, जबतक कि उस पार्टी की प्रतिबद्धता सार्वभौमिक, संपोषणीय और जनपक्षधर न हो। राजनीतिक शब्दावली में प्रतिबद्धता विचारधारा और जीवन-दृष्टि के सहमेल से बनता है। इसे आपसी साझेदारी से निष्पन्न एक आंतरिक उद्भावना भी कह सकते हैं। यथा-भावना, संवेदना, चेतना, अनुभूति, विचार आदि। इन सबों का राजनीति में अर्थपूर्ण, सक्रिय एवं प्रयोगशील होना वास्तव में ‘राजनीति का मानवीकरण’ होना है। ये राजनीतिक आचरण, अभिव्यक्ति और व्यवहार को नियंत्रित करते हैं और उसे निर्धारित भी। अतः आम-आदमी की अपेक्षाओं-आकांक्षाओं का बारात लेकर निकले अरविन्द केजरीवाल को भाग्यवादी(मैं अब भगवान में विश्वास करने लगा हूँ) होने के बरअक़्स यथार्थ दृष्टिकोण और ठोस वैचारिकी आधारित ‘माॅडल’ अपनाने की जरूरत है। देसी भाषा या शब्दावली में उन्हें ऐसी दीर्घकालिक योजनाओं के क्रियान्वयन पर मुहर लगाने होंगे जो आम-आदमी की जीवन-रक्षा और जीवन-मूल्य से जुड़े बुनियादी प्रश्नों को हल करता हो; मेहनतकश जनता की सांस्कृतिक चेतना का उन्नयन और उनके बुद्धि-विवेक को माँजता हो; अकंुठित और तेजवान ‘युवा पीढ़ी’ का निर्माण करता हो।
 
उपर्युक्त पक्षों पर विचार करने के लिए आम-आदमी पार्टी को सर्वप्रथम आमजन के हृदय को आलोड़ित करना होगा; मस्तिष्क में संवेदनशीलता और ज्ञानात्मक आन्दोलन के बीज बोने होंगे। दरअसल, भौतिक विकास से पूर्व आम-आदमी के मानस का विकास राजनीतिक परिकल्पना को सम्पूर्ण और समग्र बनाने की मूल कुंजी है। इस परिप्रेक्ष्य पर सुचिंतित विचार और जन-संवाद की स्वस्थ प्रक्रिया अपनाया जाना आवश्यक है। ‘आप’ के लिए यह कार्य आसान नहीं है। यह मुश्किल तब और बढ़ जाती है जब कोई व्यक्ति इस तरह के चुनौतीपूर्ण राजनीतिक नेतृत्व की शुरूआत अपेक्षाओं-आकाक्षाओं के जनबहुल समर्थन को लक्ष्य करते हुए आरंभ करता है। इस घड़ी भारतीय राजनीतिक दलों के पास विचारधारा के नाम पर ‘रेकची’(खुदरा पैसा) तक नहीं बचे हैं। लगभग सभी पार्टियाँ चुनावी घोषणापत्र में जो तमाम लोकलुभावन वादें करती हैं; उनके बारे में उनका अपना ही कोई साफ नज़रिया, निजी राय अथवा स्पष्ट नीति नहीं है। यह बात यहाँ इसलिए कही जा रही है कि ‘आम-आदमी पार्टी’ के कार्यनीति में भी समन्वय-संतुलन का अभाव साफ दिखाई दे रहा है। उसके ‘रोडमैप’ में दूरदर्शिता और सर्वग्राही सोच की कड़ी नदारद है; नेतृत्व-क्षमता सुगठित योजना के अभाव में तात्कालिक निर्णय करने को बाध्य दिखाई दे रही है। यह दशा सिर्फ पार्टी के लिए ही नहीं पूरे देश के लिए किसी अपशकुन से कम नहीं है। आम-आदमी पार्टी के राजनीतिज्ञों को यह समझना होगा कि बड़े सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन के लिए बड़ा पराक्रम किया जाना जरूरी नहीं है। इस घड़ी जरूरत है-सयंम और धीरज के साथ आम-आदमी की मनस्वी-भूमि को सींचने की, उसमें आवश्यकतानुसार चेतनशील विचारों-भावनाओं का खाद-पानी देने की, सजग भाव के साथ देख-ताक करते हुए उनकी कठिनाई-समस्या को पूरी संवेदनशीलता के साथ समझने की। इस तरह के साधनों पर यत्नपूर्वक विचार करने से ही आम-आदमी पार्टी उस लक्ष्य को हासिल कर सकती है जो आम-आदमी पार्टी के ‘मेनिफेस्टो’ में शामिल है या उन्हें शामिल किए जाने की जरूरत है।
 
‘आप’ की सीमाओं को रेखांकित करते हुए समाज-चिन्तक बद्री नारायण ने जो विश्लेषण प्रस्तुत किया है, वाजिब है-‘‘आम आदमी पार्टी में एक तो मध्य वर्ग का वह युवा शामिल है जो या तो बेकार है या नौकरी के लिए प्रतियोगिता देते-देते थक गया है, रोजी-रोटी के लिए एनजीओ वगैरह बनाकर रोजी भी कमा रहा है, एक्टिविज़्म भी कर रहा है; ‘आदर्श’ स्थापित करने में आत्मसुख से भी आह्लादित है। दूसरा है, 1990 के दशक के बाद की उदारवादी व्यवस्था में पैदा हुआ युवा जो चाहता है कि जीवन में न कोई जद्दोजहद हो और न कोई जिम्मेदारी, सब कुछ कंप्यूटर और एसएमएस से ही हो जाए। फिर वे रिटायर्ड लोग हैं जो खुद भले ही नैतिक रहे हों या नहीं, पर हमेशा नैतिकता के मुल्लमें में जीते हैं जो ‘माॅर्निंग वाॅकर एसोसिएशन’ के सदस्य भी हैं। इन सबको आम आदमी पार्टी जैसी राजनीति में अपने लिए जगह दिख रही है। इस नए ‘आम-आदमी’ के अर्थ में वे किसान, खेत, मजदूर, गँवई गरीब, दलित वगैरह नहीं हैं जिन्हें पारम्परिक रूप से जनता माना जाता है। इस आम-आदमी में वह तबका नहीं है जिसकी राजनीति सिर्फ आर्थिक जरूरतों से नहीं, बल्कि अपने सम्मान की चाह से भी संचालित होती है।’’
 
अपेक्षा की जानी चाहिए कि ‘आप’ पार्टी इस कहे का मूल भावार्थ समझेगी और वह सघन विचार-विमर्श, खुले संवाद एवं व्यावहारिक आलोचनाओं से पीछे नहीं हटेगी। बदलाव की राजनीति के लिए ‘सोच की ज़मीन’ पर महंगेदार दिखावटी ‘टाइल्स’ बिठाने की जरूरत नहीं होती है; अपितु जरूरत होती है, वैचारिक एवं संवाद-प्रधान राजनीतिक-संस्कृति को फलने-फूलने और उसे विकसित होने देने की। दरअसल, विभिन्न विचारधारात्मक आधार को सर्वग्राही और समावेशी रूप देना वास्तव में पार्टी का सोद्देश्य एजेंडा होना चाहिए; ताकि धर्म, जाति, भाषा, समुदाय, क्षेत्र, लिंग, वर्ग, वय इत्यादि में बँटी जनता को ‘एक सोच के नींव तले’ खड़ा किया जा सके। पिछले सात दशकों से जनतंत्र के भुलावे में पिसते आम-आदमी की ज़िन्दगी में क्रान्तिक बदलाव दीर्घकालीन आयोजनों द्वारा ही संभव है। ये आयोजन वस्तुस्थिति एवं वस्तुदृष्टि दोनों में क्रमिक/विकसनशील बदलाव लाने का हरसंभव प्रयत्न करते हैं; यथास्थिति की हर स्थिति को ऐसे व्यवस्थित करते हैं कि वस्तु नया रूप धारण कर ले, पुरानी अवस्था की हर स्थिति नया अनुभव दे; ताकि हमारी ग्लानि और गन्दगी से भरी ज़िन्दगी एक न्यायपूर्ण, शुद्ध और सुन्दर ज़िन्दगी जी सके। इस घड़ी आम आदमी पार्टी को चाहिए कि वह अपने नपे-तुले घोषणापत्र या पार्टी एजेण्डे को जनतांत्रिक विचारों एवं विश्वदृष्टि आधारित मूल्यों की संजीवीनी पिलाए। राजनीतिक विश्लेषक पवन कुमार गुप्त सही संकेत करते हैं-‘‘केजरीवाल की राजनीति तभी अलग होगी जब वे सिर्फ तत्कालिक मामलों में न उलझें और दीर्घकालीन राजनीति और मुद्दों पर भी उनकी नज़र बराबर रहे। आज परिस्थिति और चारों तरफ के दबाव ही ऐसे हैं कि हर वक्त तात्कालिकता हावी हो जाती है।’’ 
 
विशेषतया राष्ट्रीय-राजनीति में मजबूत पैठ बनाने के लिए ‘आम आदमी पार्टी’ को अपनी कार्य-योजना को ठीक-ठीक क्रियान्वित किए जाने की जरूरत है। इसके लिए ‘पोपुलरिज्म’ की सतही मानसिकता से उबरना भी एक शर्त है। ख़ासकर इस तरह के टें-टें-ट्विट करने की कोई जरूरत ही नहीं है-‘‘पार्टी बना के बता, कैंडीडेट ढँूढ के बता, पैसा ला के बता, जीत के बता, सरकार बना के बता, कानून ला के बता....ओये तुम सिर्फ चैलेंज करते जाओ और हम करते जाएँ।’(कुमार विश्वास)’ दरअसल, चंद मिनटों-घंटों में आम आदमी को लखपति-करोड़पति बनाने का हुनर ‘केबीसी ब्रांड’ अमिताभ बच्चन के पास है। इसे अपनाने की जरूरत ‘आप’ को नहीं है। आरोप-प्रत्यारोप, आलोचना-आक्षेप की भौड़ी संस्कृति वर्तमान राजनीतिक दलों के रोजमर्रा का हुक्का-पानी बन चुके हंै; फिलहाल यह उन्हें ही गुड़गुड़ाने दीजिए। इस वक़्त ‘आप’ को अपने बारे में जनसमाज द्वारा किए जा रहे आकलन-मूल्यांकन पर सोचने-विचारने की जरूरत है; उस आम-आदमी से सीधे संवाद और बातचीत करने की आवश्यकता है जिसने आपको अपना ‘नेतृत्व’ सौंप दिल्ली में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया है। श्रेष्ठताग्रंथि की शिकार अन्य सनातनी पार्टियों की तरह ‘आप’ भी भंजौटी भाँजने लगे, तो फिर आपका भी वही हश्र होगा जैसा दूसरों की हम देख रहे हैं।
 
बहरहाल, आगामी लोकसभा चुनाव की दृष्टि से बेहद कम दिखते इस समय में आम-आदमी पार्टी को भारत की राजनीतिक-संस्कृति को सर्वप्रथम भली-भाँति जानना-समझना होगा। यह कार्य उसे कुछ वैसे ही बड़ी बारीकी/महीनी से करना होगा जैसे हमारे घरों में स्त्रियाँ ऊनी पोशाक या ‘स्वेटर’ घर-दर-घर बुनती-बनाती हैं। क्या हम नहीं जानते हैं कि इस घरेलु बनाव-बुनाव में फौरी आवश्यकता-पूर्ति से अधिक ‘आत्मीयता’(परिश्रम यहाँ गौण मान लिए जाते हैं) और ‘अपनापन’ का उजास और संस्पर्श अधिक घुलामिला होता है। ‘आप’ से इस तरह की भावनात्मक/मानवीय उम्मीद किए जाने के पीछे का तर्क यह है कि भारतवर्ष में अधिसंख्य आम-आदमी देश का मतदाता है; लेकिन, वह अपने वाज़िब हक से बेदख़ल है। देश की बड़ी आबादी सड़कछाप दिलेर(?) है; जो सरकारी बहीखाते के अनुसार चंद रुपल्ली के भरोसे हर रोज ज़िन्दा रहने का उपक्रम करती है। यह वही आम-आदमी है जो घर से दूर महानगरीय ‘रैन बसेरा’ में कैद है, लेकिन आजिविका की विवशता की वजह से वह अपने बेघर होने की सचाई को भी बिसार चंुका है। देश में अनगिनत ऐसे लोग हैं जिन्हें ‘नीलकेणी आधारकार्ड’ हासिल हो गया है, जिसमंे उनके हस्ताक्षर ‘हाशिए का व्यक्ति’ मानकर ही दर्ज किया गया है। ‘आप’ ने आम-आदमी के ऐसे ही टीस, कसक, दुःख और संत्रास को गहराई से समझने का विश्वासोत्पादक ‘प्रचार किया है।
 
ध्यातव्य है कि नेहरू-इंदिरा की सनातनी/विरासती पार्टी कही जाने वाली कांग्रेस को अरविन्द केजरीवाल की पार्टी ‘आप’ ने नहीं; दिल्लीवासियों के आत्मबल, मनोबल, साहस और दृढ़इच्छाशक्ति ने हराया है। दिल्ली गैंगरेप की शिकार हुई युवती ‘निर्भया’ के समर्थन में दिल्ली की युवा पीढ़ी जब सड़क पर जनसैलाब बन उमड़ी, तो कांग्रेस के कद्दावर(?) नेता पी. चिदम्बरम ने इसे ‘फ्लैश मोब’ कहा था। आज उसी ‘फ्लैश मोब’ ने कांग्रेस की खटिया खड़ी और बिस्तर गोल कर दी है। कांग्रेसी नेता राहुल गाँधी आम-आदमी पार्टी से मिले इस सबक को कितने दिन तक याद रख पाते हैं; यह तो उनकी यादास्त और समझ पर निर्भर करता है; लेकिन, इतना तय है कि यह असफलता कांग्रेस को अपने दाँव और मोहरे दोनों बदलने का ‘अल्टीमेटम’ दे चुकी है। विश्लेषण यह बताते हैं कि कांग्रेस आम-आदमी की निगाह में सिर्फ राजनीतिक नारा और मुहावरा गढ़ने वाली पार्टी बनकर रह गई है। ऐसा क्यों और कैसे हुआ? यहाँ इसका पूरा इतिहास बाँचने की जरूरत नहीं है। दरअसल, कांग्रेस दल की सर्वोपरिता ने इस देश का खासा नुकसान किया है। भूमंडलीकरण और नव-उदारवाद की ओट में कांग्रेस ने भारतीय शासन प्रणाली को केन्द्रीकरण की दिशा में तो मोड़ा ही है; इसके अतिरिक्त इस प्रवृत्ति ने प्रान्तीय और केन्द्रीय स्तर पर नौकरशाही, राजनीतिक दल और पूँजीपति/धनाढ्य वर्ग को बड़ी मात्रा में वेतनों, रिश्वतों और मुनाफों के रूप में बड़ी कमाई अथवा राष्ट्रीय धन के अपहरण की छूट तक प्रदान की है।
 
यह एक गौरतलब पक्ष है कि पिछले 66 सालों से शोषण के बहुविध तरीके आजमाती आ रही केन्द्रीय/प्रान्तीय सरकारों ने सेना तक का प्रयोग गैर-जरूरी तरीके से किया है। भारत का पूँजीपति वर्ग इस तथ्य से भली-भाँति परिचित है कि शोषक वर्ग के हाथ में तोपें और टैंक शोषित वर्ग की सभी युक्तियों का आखिरी जवाब है। पिछले एक दशक से इरोम-शर्मिला अनशन पर इन्हीं कारणों से बैठी हैं; लेकिन सत्ता के पहरुओं ने इरोम की मुश्किलों को बढ़ाया ही है सिवाए कम करने के। स्त्री-अस्मिता सम्बन्धी आधी-आबादी के मसले को सदैव केन्द्रीय-मुद्दे से निकाल-बाहर किया जाता रहा है। इसी तरह आदिवासियों, दलितों एवं पिछड़ेपन के मुद्दे पर सभी राजनीतिक पार्टियाँ राजनीतिक घोषणापत्र पढ़ती जरूर हैं, लेकिन, वे इनके बारे में संवेदनशील हरग़िज नहीं है। इसी तरह भूमिहीन और मजदूर बनते भारतीय किसानों की स्थिति-अवस्थिति दूरगामी निर्णय और ठोस पहलकदमी की मोहताज़ है। लेकिन, देश की बेईमान होती जा रही सत्ता-सियासत के लिए यह गंभीरतम विचारणीय मुद्दा आज भी नहीं है। जबकि रक्षा मामले, सीमा सुरक्षा, विदेश नीति, कूटनीतिक पहलकदमी, औद्योगिक विकास, अंतरिक्ष सशक्तिकरण, तकनीकी-प्रौद्योगिकी आधारित विकासमूलक नवाचार, अत्याधुनिक माँगों के अनुरूप सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी भाषा में दक्षता-निर्माण के नाम पर गठित होते संस्थान/कमेटियों इत्यादि से ये ज़मीनी मुद्दे कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। भारतीय राजनीति के इसी अंतर्विरोध को जवाहरलाल नेहरू ने लक्ष्य कर बिल्कुल ही मुनासिब कहा था-‘‘मेरे लिए जो सबसे आश्चर्यजनक था वह यह कि शहरों में इस महान किसान आन्दोलन के प्रति कोई जानकारी नहीं थी। किसी भी अख़बार में इसके बारे में एक भी वाक्य नहीं था। उनकी ग्रामीण क्षेत्रों में कोई रुचि नहीं थी। मैंने पहली बार महसूस किया कि हम अपने लोगों से कितना कटे हुए थे और हम कितनी छोटी-सी दुनिया में उन सबसे अलग रहते, काम करते और आन्दोलन करते थे।’’
 
आज इन्हीं सब सचाईयों को राजनीतिक मुद्दा बनाकर आम-आदमी पार्टी ने पारम्परिक राजनीतिक पार्टियों को चुनौती दिया है। साथ ही, भारतीय जनतांत्रिक प्रणाली में नई संभावना एवं उम्मीद को भी पैदा किया है। आश्चर्य नहीं है कि एक साल के अन्दर बनी आम-आदमी पार्टी ने जिस तरह राजनीति के केन्द्र में काबिज अयोग्य राजनीतिज्ञों को बहिष्कृत कर दिखाया है; वह अपनेआप में बेमिसाल है। यह भारतीय मतदाता के निर्णय और सोच की दृष्टि में आते तेज-क्रमिक किन्तु आक्रामक बदलाव का सूचक है। यह लगभग ध्रुव सत्य है कि सब लोगों को कुछ दिनों के लिए, कुछ लोगों को हमेशा के लिए ठगा जा सकता है, पर सब लोगों को हमेशा के लिए ठगना असंभव है। यानी राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बन रहे आम-आदमी पार्टी को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में जन-सरोकार से सम्बन्धित सभी प्रश्नों से सीधे टकराना होगा। पुनश्चः इस बारे में ‘आप’ को राजनीतिक विचारधारात्मक दृष्टि और बहुआयामी चिन्तन विकसित करने की जरूरत है; क्योंकि इन सबसे निपटे बिना भारत में राजनीतिक बदलाव का आम-आदमीनुमा विचारदृष्टि गढ़ पाना संभव नहीं है।
(यह आलेख 25 दिन पूर्व कहीं भेजने के लिए लिखा था; आज इस अ-छपे को यहां दे रहा हंू. )
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