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Showing posts from January, 2015

इस बार 'पीके' का दिमाग मरम्मत पर है...तनका ढेरका लम्बइया वाला wait pls

-------------- इस गणतंत्र के आधे उम्र के लगभग हो चले हैं; लेकिन ससूरी कोई काम नहीं मिला।  बेगारी में लिख-पढ़ के आप सबन के कपार दुखाई दिए; अब आप भी  राहत चाहत हौ, तो हम कही देत हैं कि हमके इरादा भी तोहन के माथा चाटे के नाई है। असल में ई गोला पर जो आदमी है न सब रंग देखत है; लेकिन जब माने के कहौ, तो अपनी दूजी रंग दिखावे लागत हौ....तो फाइनली हम डिसाइड किया कि अपन लोगन के अपनही रंग में रंगे देवे के और खुश होवे देवे के,  तो भारत मइया की जय!!! जरका चिचियाई के कहो...का रजीबा जैसा मरियल बोलत हौ? -------------------------------
अपने देव-दीप के लिए यह कविता
इन ढलानों पर वसंत आएगा
- मंगलेश डबराल

इन ढलानों पर वसंत आएगा
हमारी स्मृति में
ठंड से मरी हुई इच्छाओं को
फिर से जीवित करता
धीमे-धीमे धुँधुवाता खाली कोटरों में
घाटी की घास फैलती रहेगी रात को
ढलानों से मुसाफिर की तरह
गुजरता रहेगा अँधकार

चारों ओर पत्थरों में दबा हुआ मुख
फिर से उभरेगा झाँकेगा कभी
किसी दरार से अचानक
पिघल जाएगा जैसे बीते साल की बर्फ
शिखरों से टूटते आएँगे फूल
अंतहीन आलिंगनों के बीच एक आवाज
छटपटाती रहेगी
चिड़िया की तरह लहूलुहान
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भारतीय नेता प्रधानमंत्री हैं, ओबामा हमारे ‘गाॅडफादर’ नहीं हो सकते!

-------------- अकूत पैसे और सुविधाएं मिलने पर भी बुद्धिजीवियों के लिए वैचारिक नंगापन नामुमकिन है!
यह अलग बात है कि हमारे पास बुद्धिजीवी हैं कितने?
 ------- राजीव रंजन प्रसाद 
लेफ्टिनेंट हडसन फिरंगी था। यह वही शख़्स था जिसने बहादुर शाह जफ़र के दोनों पुत्रों को मौत के घाट उतार दिया था। सन् सनतावन की पराजय ने मुगल बादशाहियत के अंतिम नायक बहादुर शाह जफ़र को लगभग निहत्था कर दिया था। शासक की इस स्थिति पर हडसन ने उसका माखौल उड़ाते हुए कहा था- ‘दमदमे में दम नहीं, अब खैर मांगो जान की/ ऐ जफ़र ठंडी हुई शमशीर हिन्दुस्तान की।’  जफ़र का उस समय कहा बड़बोलेपन और झूठी शान की निशानी मानी गई थी, जफ़र का जवाब था- ‘गाजियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की/तख़्ते लंदन तक चलेगी तेग हिन्दुस्तान की।’ विश्व-भूगोल में इन दिनों लंदन की हैसियत अमेरिकी ताकत के आगे बौनी है, तो क्या यह मानें की आज भारतीय बुलंदी की गूंज अमेरिका पूरे धैर्य के साथ सुन रहा है और उसका सर्वशक्तिमान राष्ट्राध्यक्ष भारतीय प्रधानमंत्री के साथ कहकहे लगाने में मशरूफ़ है। आज मोदी बराक ओबामा के संग-साथ गलबहियां करते दिखाई दे रहे हैं। ...तो क्या भारतीय ज…

पुनर्रचना के निकष पर एक लड़की

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लड़की कुदरती तौर पर लड़कों के समान ही प्रसव-वेदना देते हुए स्त्री-कोख़ से जन्मती  हैं। लेकिन लड़की अपने जन्म के बाद बार-बार रची-बुनी जाती हैं; जबकि लड़कों को जिलाया-बढ़ाया जाता है। स्त्रियों के लिए समाज की आंखों में रंगीनियत के चादर बहुपाट में फैले दिखाई देते हैं जिनके लिए खुद उसका मापदंड और निकष बेहद भेदभावपूर्ण, विषमताजनक और लिंगभेद पर आधारित है। भारतीय समाज आधुनिक इस मामले में है कि भारतीय मर्द पहले से अब अधिक उच्छश्रृंख्ल और असभ्य आचरण वाले हो गए हैं; जबकि स्त्रियों के लिए हमारे सोच का पारा/तापमन अभी भी मध्ययुगीन ज़माने की है। हम उन्हें बोलने देना नहीं चाहते, क्योंकि उनके बोलते ही हमसब मर्दों की कलई खुल जानी तय है। लेकिन अब यह जोर-दबाव एकतरफा नहीं रह गया है। औरतों ने अपना मोर्चा खोल दिया है। वह बाज़ार में घुसने लगी हैं; बाज़ार पर अधिकार ज़माने लगी और बाज़ार को अपनी इच्छानुसार अपने इशारे पर सम्बोधित भी करने लगी हैं। संभव है, मर्दों की ज़मात के इंसानी खोल में भेड़िए जो अपने खुंखार रवैए और हिंसक वारदातों के लिए जाने जाते हैं; इन स्त्रियों पर टूट पड़े; लेकिन पानी सर के …

गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य पर व्यावहारिक सुभाषितानी

------------- कहा गया है-‘विद्या सर्वाथ साधनम्’’।  यह भी कहा गया है कि विद्या वही है जो हमें बंधन से मुक्त करती है।  यह भी कि ‘Learn for Live’। -------------- लेकिन इन सद्विचारों का अवगाहन, पालन और अनुसरण करने के लिए पेट में दाना चाहिए। चिड़ियां या पंक्षी भी भोजन की खोज-तलाश में आसमान-जमीन, डाल और पेड़ बदल देते हैं या बदल देने के लिए विवश होते हैं। किसी भी मनुष्य के लिए ज़िदा होने का प्रश्न तथाकथित सुसभ्य और सुसंस्कृत मनुष्य होने से अधिक महत्त्वपूर्ण है। अतः अपनी जहां कीमत मिले काम करो और न मिले तो कहो ब...ब्बाय इंस्टिट्युशन! चाहे वह गुरुकुल ही क्यों न हो? Happy RepublicDay


ओ रजीबा!

हाइवे फिल्म का गाना सुन!

‘आली...आली...आली...ओ....,
जुगनी ओ...’

Mathematical Communication : Formulation & Ethnical entity of Universe

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New Approach of Natural Science  By  राजीव रंजन प्रसाद  गणित हमारे लिए कठिन है, और जटिल भी।

हममें से कितने हैं जो 5 को बाइनरी में बदलना जानते हैं या कि बाइनरी से अंक में बदलने के सूत्र से अवगत हैं; लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि आप कंप्यूटर ही नहीं चला सकते या स्मार्ट फोन पर ‘मैसेजिंग’ नहीं कर सकते। यह एक-दूसरे से अभिन्न होते हुए भी व्यावहारिक स्तर पर उपयोगितावादी तरजीह के हिसाब से हमारे दिमाग द्वारा नोटिस में लिए जाते हैं। मतलब कोई चीज जिस सिद्धान्त पर टिकी हुई है, उसे जाने बगैर भी आप उठ सकते हैं; चल सकते हैं, दौड़-भाग सकते हैं; यहां तक कि सो यानी आराम भी फरमा सकते हैं। दरअसल, गणित को हमेशा हमारे समाज ने चलता ढंग से लिया है। वे(हम आधुनिक मनुष्य) यह जान पाने की ओर कभी प्रवृत्त नहीं होते कि गणित ही सभी विधाओं का मूलाधार है और मानवजातीय विकास की सारी रूपरेखा एवं जटिल संरचनाएं इसी बीजक में कैद हैं। ज्योतिष जो आजकल अपने दंभ और अहमन्यतावादी दृष्टिकोण के कारण मनुष्यों का भाग्यफल बांचने तक सीमित है; वास्तविक अर्थों में दुनिया की निर्मिति के बारे में सबसे सही और उपयुक्त जा…

दृश्य में भाव, शब्द और अर्थ => Visual Analysis : Obama vs Modi

राजीव रंजन प्रसाद
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दूरमनोभाषावैज्ञानिक रिपोर्ट
धीमे कदमों के साथ सयंत बर्ताव बरतते हुए दोनों अचानक कैमरे के विजुअल में उभर आते हैं।
बराक ओबामा और नरेन्द्र मोदी।

हैदराबाद हाउस के बाहर का यह खूबसूरत नज़ारा दोनों की आगवानी में सजीले पौधों और चित्ताकर्षक वातावरण से भरा-पूरा है। दोनों नेता इस बीच अनौपचारिक बातचीत करने में जुट गए हैं। बात की शुरुआत इर्द-गिर्द के दृश्यों के मुआयना करने से होती है। फिर बातचीज चीजों को देखने और उनके बारे में धारणा बनाने के सांस्कृतिक स्वभाव और प्रकृति पर केन्द्रित हो जाती है। नरेन्द्र मोदी अपनी मिथकों और प्रतीकों के बारे में उनके जबर्दस्त संदेशवाहक होने की बात कहते हैं। फिर व्यक्तिगत पसंद-नापसंद पर बात उतर आती है। यह सबकुछ बड़े ही सहज ढंग से दृश्य में घटित हो रहा है। सयंत, सन्तुलित और सतर्क निगााहों के साथ नरेन्द्र मोदी अपने हाव-भाव, देहभाषा, बोल-वचन कह रहे हैं। उन्हें पता है कि वह इस घड़ी पूरी दुनिया की निगाहबानी में अपने को रख पाने में सफल हो गए हैं। पत्रकारों का हुजूम दूर-दूर तक नज़र न आने के बावजूद उनकी बराक ओबामा के साथ मौजूदगी को…

स्मृति ईरानी: एक आदर्श बहू का राष्ट्रीय आदर्श और राजनीतिक गुरु बनने का सफ़रनामा

---------------- मैंने कहा-‘अमेरिकन राष्ट्रपति पर एक गरीब मुल्क को इतना रुपया सिर्फ आगवानी और आतिथ्य में खर्च नहीं करना चाहिए!’
उन्होंने कहा-इसी सोच के कारण आप जैसे लोग हमेशा परेशान-सा दिखते हैं। देश की जनता को दुःख-तकलीफ हो नहीं रही; बस आप ही को खूब चिचियाहट है।’’
बनारसी स्टाइल में गरियाए, तो चूतिए सब ऐसे बोलते हैं जैसे खुद कल ही देश का गवर्नर बनने वाले हैं या उन्हें मि. बराक ओबामा के साथ मैत्री-भोज में बुलाहट आने वाला है। छोड़ो गुरु, पढ़ो आप स्मृति ईरानी के बारे में। -----------------------

नोट:राजनीति के अपने सार्वजनिक कैरियर की दृष्टि से बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित स्मृति ईरानी के जीवन एवं व्यक्तित्व से सम्बन्धित बातें महत्त्वपूर्ण हैं। खासतौर से युवा राजनीतिज्ञ संचारकों के व्यक्तित्व, व्यवहार तथा नेतृत्व के सन्दर्भ में यह रिपोर्ट खुद मेरे लिए बेहद जरूरी एवं उपयोगी है। पत्रकार वीनू संधू और कविता चैधरी की यह रिपोर्ट स्मृति ईरानी की परवरिश, शिक्षा-दीक्षा, टेलीविज़न की दुनिया में सफल अदाकारी तथा उससे मिली अथवा अर्जित की गई लोकप्रियता आदि की ऐसी ही गंभीर पड़ताल करती हैं। यही न…

मि. बराक ओबामा से 'मन की बात'

------------- ‘भारत में कैसी सरकारी शिक्षा, किसके लिए सरकारी शिक्षा और क्यों दी जा रही है सरकारी शिक्षा?’  शीर्षक से अपने अतिथि और विश्व के सबसे ताकतवर राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष मि. बराक ओबामा को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के शोधार्थी राजीव रंजन प्रसाद द्वारा प्रस्तुत की गई रिपोर्ट ---------------  विषेष सन्दर्भ: भारतीय सरकारी शिक्षा-तंत्र और सरकारी शैक्षणिक-क्रियाकलाप --------------  (अमेरिकी भाषा-तंत्र इतना विकसित है कि वह गुजराती तक समझ लेता है, तो फिर हिंदी से क्या गुरेज !)

‘‘भारत में शिक्षा के स्तर में लगातार सुधार हो रहा है जो भविष्य के बेहतर होने की उम्मीद जगाता है। अब ज्यादा बच्चे स्कूल जाने लगे हैं। जल्दी ही फ्री एजुकेशन का बिल पास होने की उम्मीद है और इससे हर बच्चे तक शिक्षा को पहुँचाया जा सकेगा। शिक्षा क्षेत्र में भविष्य को ध्यान में रखकर ही कई अहम बदलाव किए गए हैं। आईआईटी को यूनिवर्सिटी बनाने पर विचार चल रहा है। कई और आईआईटी खुल रहे हैं। शिक्षा में सुधार के लिए कई अहम कदम उठाए जाने हैं। हम जल्द ही इस पर एक रिपोर्ट देने जा रहे हैं।’’ जाने-माने भारतीय शिक्षाविद् प्रो. य…

फर्जी नेता नहीं हैं सुब्रह्मण्यम स्वामी

सुब्रह्मण्यम ने किया खुलासा, नेहरू ने करवायी सुभाषचंद्र बोस की हत्याhttp://www.prabhatkhabar.com/news/national/subramanian-swamy-jawaharlal-nehru-subhash-chandra-bose-murder-stalin-conspiracy/292848.html

------------------------  राजीव रंजन प्रसाद
मेरी दृष्टि में फर्जी नेता नहीं हैं सुब्रह्मण्यम स्वामी । अंतः जो कहा होगा बासबूत कहा होगा।  प्रभात ख़बर(यह अख़बार नवभारत टाइम्स से अधिक विश्वसनीय है) में प्रकाशित समाचार के मुताबिक-'सुभाषचंद्र बोस की हत्या नेहरू ने करवायी'।  दरअसल, हमेशा स्वदेशी का राग जपने वाली भारतीय जनता पार्टी  फिरंगी सोच की नहीं है!  वह सुभाष जी को आजादी का सच्चा नायक मानती है। वह मानती है कि सुभाष चन्द्र बोस गरीबों के समर्थक थे। वे भारतीय स्वतन्त्रता में आमजन की भूमिका को महत्त्वपूर्ण मानते थे, न कि कोट में फूल लटकाने वाले चोचलेदार नेताओं को। वह नेहरू की तरह अभिजात्य और गुलामी के दिनों में भी सम्पन्न कतई न थे।

देश की जनता को हमेशा बड़ी जाति के नेताओं ने और तथाकथित झंडाबदार स्वतन्त्रता सेनानियो ने ठगा है। इन्होंने देशवासियों में जातिगत वैमनश्यता और धार्मिक अलगाव ज…

भाषा के हलवाई

--------- माफ करना डियर, जरूरत पड़ने पर सम्पर्क की जाएगी। --------------- ''हमारे लिए जनता गौण नहीं, बल्कि वह गण है, समस्त सांविधानिक अधिकार दिए जाने के लिए वह हमारी गणना में भी है....और देवताओं का देवता वह गणपति है....; ऐसा मैं हमेशा कहता रहा हूं...और आज भी खुलेआम कह रहा हूं।''
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जिस शख्स ने यह कहा था। वह जनप्रतिनिधि हैं। लेकिन उसने जो कहकर वाहवाही बटोरी थी वह उस काबिल नौज़वान के दिमाग की उपज थी जिसने हिन्दी में पत्रकारिता की है, अध्यापकी का परीक्षा उत्तीर्ण किया है। लेकिन आजकल बेरोजगार है। इन दिनों इस-उस की बेगारी खट रहा है। सब उससे कहते हैं कि समझौता करो, झूठ एक सफल कार्रवाई है। अहंकारी इस लड़के ने दरेरा देकर अपनी बात मनवानी चाहिए, उसे सबने अपनी ज़मात और महफ़िल से बाहर कर दिया। आज वह सड़क का आदमी है। आम-आदमी पार्टी का आम-आदमी नहीं जो चाहे जितना सच बोले; लेकिन है तो करोड़पति ही न!

खैर! मरता क्या न करता वाली तर्ज़ पर दिल्ली में रहने का जुगाड़ खोजते हुए; उसे यही काम मिला है। उससे धांसू संवाद लिखने को कहे जाते हैं। प्रति शब्द 10 रुपए का भुगतान किया जाता है।

दो दिन पह…

स्कूल चलें हम

प्रिय देव-दीप,

बेतरह ख़राब मौसम है। ठिठुरन और गलन भी। लेकिन जगना और स्कूल के लिए तैयार तो होना ही है। आपदोनों को बाहरी वातावरण को देखकर दिली इच्छा नहीं हो रही है कि जगाएं; लेकिन नींद से जगना और सक्रिय होना जरूरी है। क्योंकि आराम की स्थिति आवश्यकता से अधिक होने पर जिंदगी को नीरस यानी बोरिंग बना देती हैं। अतः सुबह-सुबह उठना और फ्रेश हवा में सांस लेने के लिए बिस्तर से बाहर आना हुआ न वाजिब!

देव-दीप, घर से बाहर निकलेंगे, तो ही न यह जान पाएंगे कि बाहर में लोगों की हाल-दशा क्या है? वे ठंड से बचने का क्या और किस तरह उपाय कर रहे हैं? उनके पास उपाय के पर्याप्त साधन मौजूद हैं भी या नहीं। यह सही नहीं है न कि हम रजाई में दुबके रहे और बाहर में लोग ठंड में ठिठुरते हुए अपने काम-धंधे में लगे-जुटे रहे। सामाजिकता दूसरों से जुड़ने के लिए प्रेरित करती है; औरों के गम-दुःख, हंसी और खुशी में शरीक होने का आमंत्रण देती है।

देव-दीप, मनुष्य पैसे से नहीं बन सकता है। यदि ऐसा होता, तो गरीबों-बेसहारों के घर में किलकारी क्यों गूंजती? क्यों उनका घर-आंगन भी बच्चों से हरदम गुलजार हुआ करता। दरअसल, प्रकृति ने सब इंतजाम एकसमा…

जन-प्रतिनिधि

-------------------- मैं ही गांधी, मैं ही भगत...और मैं ही सुभाष चन्द्र बोस ---------
जो भूखा है
जो नंगा है
जो गरीब है
जो जरूरतमंद है

वह कहां जन-प्रतिनिधि है?

अतः मतदान से पहले
अपने नाम का परचे भरो
चुनाव लड़ो

देशवासियों, मुल्क आजाद है
अपने किस्मत का मालिक खुद बनो!!!

भारतवंशी-अमेरिकी जो अमेरिका को ‘सुपर हीरो’ बनाने में रात-दिन जुटे हैं!!!

---------------- दिक्कत/विडम्बना यह है कि हमारी काबिलियत को दूसरी जगह पहले पहचान और इज्ज़त मिलती है, अपने यहां जिसे जानबूझकर हाशिए पर रखा जाता है। ---------------------------------------- राजीव रंजन प्रसाद --- भारतवासी अमेरिका जाते ही भारतवंशी-अमेरिकी हो जाता हैं। यह होना अपनेआप में गर्व और गौरव का विषय है; भारत और अमेरिका दोनों के लिए। यह अन्तर-सांस्कृतिक मोर्चे पर साझा नेतृत्व है, संयुक्त प्रगतिशीलता का सबूत है।। हाल ही में अमेरिकी नेता बाॅबी जिंदल ने एक अफसोसजनक बयान दिया है जिसे भारतीय समाचारपत्रों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया है। वह यह कि वे खुद को अमेरिकी नेता कहे जाने का ही समर्थक हैं; उन्हें भारतवंशी-अमेरिकी कहलाना पसंद नहीं है। पश्चिमी ज्ञान-तबेले और सूचना-संदेशों को हमेशा वरीयता देने वाले भारत के नामचीन किन्तु व्यक्तित्वहीन अख़बारों को खुद भारतीय अख़बार कहलाने में कहां गर्व और गौरव महसूस होता है। सो यह बात बस आई-गई हो गई। खैर! 

हम भारतीय अमेरिका को हमेशा एक अलग निगाह से देखते हैं। उसका सर्वशक्तिमान चेहरा हमें बेहद लुभाता है और यह सम्मोहन हमें मोहग्रस्त भी बनाए रखता है।…