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Showing posts from May, 2013

मेहरारू की पाती

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प्रिय राजीव,

हमारे समय के सूरमा बुद्धिजीवी अकर्मण्य हैं। अव्वल दरजे के कायर। वे सिर्फ शब्दों के उपले बनाते हैं। यह एक तरह से भाषा में गढ़ी गई चैथी दुनिया है जिनमें सिर्फ और सिर्फ वंचितों/शोषितों/पीड़ितों के बारे में बात-विमर्श या बहस की जाती है; लेकिन इससे उनका उद्धार कतई नहीं होता है। अपने मौत तक को अंजाम देने के लिए इन बेचारों को अपनी ही देह-भुजा और जांगर जलानी पड़ती है। यह मार दोहरी-तिहरी....है।

कहूँगी, तो हँसोगे....इन बुद्धिजीवियों(जिसमें तुम भी शामिल हो) को ब्लेड से अपना नाखून काटने तक में डर लगता है जबकि वे ‘खून का बदला खून’ का नारा लिखते(कोल्डनुमा पानी से गला तर करते हुए) हैं। ये बुद्धिजीवी जिस बदलाव के वाहक या खुद को उनका समर्थक कहते हैं, उससे कहीं ज्यादा वे स्वयं के ‘प्रमोटर’ होते हैं। ऐसे लोगों का आलीशान बंगला/मकान एसी, कुलर, फ्रीज, टीवी, सोफा और महंगे अलंग-पलंग जैसे वाहियात साजोसामान से भरा होता है। ये जिन पदों पर शासित होते हैं और जितनी भारी-भरकम तनख़्वाह पाते हैं; यदि वे इसका आधा हिस्सा भी बाँट दें, तो भी उनके बच्चे चाँदी के चमच्च से ही …

शीर्ष कांग्रेसी नेता बीजापुर को नहीं जानते

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बस्तर में कल जो हुआ, बिल्कुल ग़लत हुआ। लेकिन, इससे पहले जो बीजापुर में हुआ, वह तो और भी अक्षम्य और बर्बर था। लेकिन, उसे न तो पूरा देश जान पाया और न ही सरकार के शीर्ष नेताओं ने इसकी सुध ली। जबकि आज कोहराम, विलाप और झूठी मातमी हो-हो का दौर शुरू हो चुका है। बस्तर की खूनी-साँझ ने पूरे देश की राजनीति में बवण्डर खड़ा कर दिया है। यह घटना क्योंकर हुई....? इन नेताओं को नक्सलियों ने किस कारण से निशाने पर लिया? यह देखा जाना आवश्यक है।

बीते दिनों बीजापुर में नरसंहार हुआ; लेकिन, देश में इस घटना को लेकर न तो कोई अफरातफरी मची और न ही खा़सोआम के जे़हन में संवेदनशील आह! ही उपजी। वजह साफ है। एकदम साधारण जनों की मौत पर देश की चैन को आग नहीं लगती। शान्ति में हाहाकार नहीं मचता है। आज की तारीख़ में शीर्ष कांग्रेसी नेताओं में शुमार राहुल गाँधी रायपुर पहुँच चुके हैं। सोनिया गाँधी के आगमन का संकेत मिल चुका है। इन नेताओं को बीती तारीख में घटी घटना की परवाह होती और वे इसी संवेदनशीलता के साथ वहाँ पहुँच गए होते, तो आज इस जवाबी हिंसक-दौर की नौब…

पत्रिका

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किसी पत्रिका के प्रकाशन का कार्यभार बतौर सम्पादक संभालना आसान काम नहीं है। पत्रिका सम्पादक के लिए अपनी बेटी की मानिन्द है। और यह काम जैसे हर हफ्ते या पखवाडे या महीने में अपनी बेटी की शादी करने माफ़िक ही दुःसाध्य कार्य है। सम्पादक पाठकों को पत्रिका ऐसे सौंपता है मानों वे लड़की के देखनहार हों। यहाँ मर्जी पाठक की चलती है। कोई उसके नाक-नक़्श(पृष्ठीय साज-सज्जा: लेआउट) पर लहुलोट हो सकता है, तो कोई उसके सुर-राग(अन्तर्वस्तु-विधान: कंटेंट) में माधुर्य की थोड़ी कमी होने का उलाहना दे सकता है। यानी कोई कुछ तो कोई कुछ। बेचारी पत्रिका शब्दों में चाहे जितना भी चेतस हो; ऐसे पाठकों के कहे का प्रतिकार नहीं कर सकती; अपने पीछे लगे श्रमसाध्य भागदौड़, बनाव-रचाव में आई दिक्कतदारियों या और भी अन्यान्य परेशानियों के बाबत कुछ नहीं कह सकती है।

यह कठिनाई तब और पर्वत-पीर-सी हो जाती है जब एक सम्पादक आज के भयानक प्रतिस्पर्धा के बावजूद पूँजी-जलावर्त से गठजोड़-गठबन्धन नहीं करता है। आत्मबल की हेकड़ी पर जागरण-गीत गाते ऐसे सम्पादकों ने अब धीरे-धीरे इस दुनिया से विदा ले लिया है जो बचे हैं उनमें से अ…

काशी: बाबा मन की आँखे खोल

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यह रेट/रट काशी के कबीर की थी। वे ताउम्र इसी साध/धुन में रमे रहे। अपने बाबा(निराकार ब्रंह्म) से मन की आँखे खोलने के लिए आरजू-मिन्नत करते रहे। कबीर आज की जातीय-भाषा में सभी सम्प्रदायों के ‘बाप’ थे। वे आज की हमारी पीढ़ी की तरह ‘देखा, भोगा; और छोड़ दिया’ पद्धति पर विश्वास नहीं करते थे। उनकी रागावली का तान दूसरा था-‘दास कबीर जतन करि ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया’। आज हम ऐसा नहीं कर पाते। हमारी नरेटी में वो दम-दिलास नहीं है; और जो है अपनी ही बखान में ख़त्म हो जाता है। हम अव्वल दरजे के काहिली के शिकार हैं। रोगग्रस्त। इडिक्ट। माइनियास्टिक लक्षण/अभिलक्षण से संक्रमित।

कबीर को पता था। वे जानते थे कि काशी त्राण-परित्राण की नगरी हैं। स्वयं को विलगित नहीं संलगित करने की भूमि है। यहाँ धर्म जीवन को धारण करने की चेतना से सम्पन्न है। काशी में रोशनाई की आवाज़ बजती है। घंट-घड़ियाल नृत्य करते हैं। काशी की संध्या इस क्षण बावरी हो उठती है। आपको हर रोज लोग गंगा-आरती के बहाने सदानीरा नदी गंगा की बलैया लेते मिल जाएंगे। कला के रंगरेजों(दृश्य-कला के विद्यार…

पोर्न-संस्कृति: ‘बैन्ड’, ‘ब्लाॅकड’ एण्ड ‘सेन्सरड’ की जरूरत क्योंकर?

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(एक विस्तृत रिपोर्ट जल्द ही)

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चलो थोड़ा फिल्मी हो लें

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सिनेमा-निर्माण की प्रक्रिया बेहद जटिल है। यह एक टीम-वर्क है जिसमें कई लोगों का दिमाग एक ही दिशा में कार्य करता है। सुचारू ढंग से किन्तु नियमित। कई-कई विधाओं और मानव-कौशलों का खूबसूरत सम्मिलन होने के कारण मैं इसे ‘दिमागी-टोली’(ब्रेन सेट्स) कहता हँू। यथा-पटकथा, निर्देशन, अभिनय, दृश्य, गीत-संगीत, मेकअप, सिनेमेटोग्राफी, कोरियोग्राफी, कास्ट्यूम डिजाइनिंग, लाइट, एडिटिंग वगैरह सब के सब किसी निर्माणाधीन फिल्म के ऐसे कल-पूर्जे हैं जिनको परस्पर जोड़कर एकाग्र प्रभाव उत्पन्न करने की चेष्टा की जाती है। रोचक संवाद और सुपरहिट गाने की उपस्थिति मात्र से ही कोई फिल्म महत्त्वपूर्ण बन जाए; ऐसा सोचना एक बेहतरीन गल्प हो सकता है, किन्तु सचाई हरगिज़ नहीं। कथावस्तु के हिसाब से पात्रों के सशक्त अभिव्यक्तिकरण अथवा फिल्मांकन की चुनौती अच्छे से अच्छे निर्देशक को चकराए रखता है। इंसानी मनोभाव, स्वाभाविक मनोवृत्ति, दैहिक चेष्टाओं और अंदरूनी हलचल से उपजे शारीरिक-मानसिक संप्रत्ययों को कैमरे की आँख में कैद करा ले जाने की बहादुरी दिखाना फिल्मकारों के लिए सचमुच लोहे के चना चबाने…

सलाह/सुझाव/आदेश

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राष्ट्रीय मुद्दों पर,
राजनीतिक घटनाक्रमों पर,
सामाजिक-आर्थिक चिन्ताओं के मोर्चे पर,
कला, साहित्य और संस्कृति की स्थितियों पर,
धर्म, दर्शन और ज्ञान की अधुनातन प्रवृत्तियों पर,
क्षेत्रीय भूगोल, राष्ट्रीय संचेतना और अन्तरराष्ट्रीय प्रभुत्वों के ऊपर

रजीबा तुम ही लिखोगे

तो देश के
इतने स्कूलों
इतने महाविद्यालयों
इतने विश्वविद्यालयों
इतने सरकारी-गैरसरकारी संस्थानों, नामी-गिरामी जनमाध्यमों
संगोष्ठी, सेमिनार, संवाद-विमर्श स्थलों
रैली, चिन्तन-शिविरों, पीठ-महापीठों
ख्यातनाम सम्पादकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, वैज्ञानिकों, ब्लाॅगिस्टो, एक्टीविस्टों,
अन्यन्य राजनेताओं, अभिनेता-अभिनेत्रियों, खेल-खिलाड़ियों, सुपर माॅडलों, डूपर बिजनेसमैंनों आदि कि

फिर सुनेगा कौन.....?

उम्र है
थोड़ा लव-सव करो
प्यार-तकरार की बातें
जरा इमोशनल, हल्का रोमान्टीक हो लो
चहक की चाँदनी को करो स्पर्श
मन की तरंगों को न करो नियन्त्रित
अपने को बह जाने दो मौके की रौ में
न सुनो आज कल क्या हुआ?
आगामी कल की चिन्ता से पा लो मुक्ति

अरे! रजीबा!
‘एक कमजोर की थाली में दूसरे…

सुनो पार्टनर!!!

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पार्टनर, तुम कह सकते हो
मुझे ‘सेक्सी’
या इसी तरह का कुछ

पार्टनर, तुम कर सकते हो
मुझे ज़लील
नाॅनवेज जोक सुनाकर

पार्टनर, तुम दे सकते हो
मुझे गालियाँ
यूँ सटकर या सीटी बजाकर

पार्टनर, तुम काट सकते हो
मुझे चिकोटी
ताकि अपनी हँसी को राग दे सको

पार्टनर, तुम फेंक सकते हो
मुझ-पे तेजाब
अपनी कुण्ठा को विसर्जित करने के लिए

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लेकिन, यह मत भूलो पार्टनर!
जो-जो तुम कर सकते हो
वह सब मेरी ही पैदाइश है!

सिनेमा के सौ बरस

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आज मैंने पान खाकर
होंठ किया लाल है
आज मेरे चेहरे पर
लगा गुलाल है

आज मेरे जिया का
रंग शरबती है
आज मेरे शब्दों का
अर्थ पार्वती है

आज मेरे दृश्यों का
रूप मनभावन हैं
भींगे हैं वस्त्र मेरे
आँखों में सावन है

आज मेरे हिस्से में
पटकथा ज्यादा है
आज मेरे गीतों में
मचलन का इरादा है

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आज अपनी उमरिया का
हुआ सौ साल है....,
यह साल लाजवाब है
यह साल बेमिसाल है।

भारतीय सिनेमा: मैं हूँ खुशरंग हिना.....!

1.

आप मिक्चर-बिस्कीट खाना पसन्द करते हैं?
या चाॅकलेट? मैगी? पाॅपकोर्न? पिज्जा?

क्या आपको छाछ-मट्ठा-शरबत पीना पसन्द है?
या पेप्सी? कोक? स्लाइस? मजा?

हो सकता है, किसी को हो और किसी को न हो। इनमें से किसी को एक पसन्द हो, तो दूसरी नहीं। दूसरी और तीसरी हो तो पहली और आखिरी नहीं। यह भी हो सकता है कि आप कोई चीज इसलिए नहीं पसन्द करते हों कि वह भारतीय नहीं है? कई बार ट्राई मार के भी देख लेते हैं...लेकिन आपको जमती ही नहीं। ऐसा भी हो सकता है कि कुछ लोगों को पश्चिमी ‘फ्लेवर’ ही पसन्द आये।

कुल मिलाकर यह मामला आपके भीतरी मनोविज्ञान से जुड़ा है। जो चीज आपको रुचती है, उसके प्रति आप अपनी अभिरुचि दर्शाते हैं। संभावित अनुक्रिया करते हैं। और जो नहीं पसन्द है, उसके प्रति आपकी प्रतिक्रिया होती है-‘बाज़ार में खड़ा हँू लेकिन खरीदार नहीं हँू’। कुछ इसी टाइप।

मित्रो, मुझे पसन्द है....पिक्चर। पिक्चर की दुनिया। पिक्चर की बातें। पिक्चर के लोग। तकनीक। कला। अभिनय। संवाद। पटकथा.....और निर्देशन। मेरे इस ‘पैशन’ का कोई कार्य-कारण सम्बन्ध नहीं है; और न ही मेरा भारतीय फ़िल्मों पर शोध-कार्य ही है। तब भी पसन्द है…