भारतीय सिनेमा: मैं हूँ खुशरंग हिना.....!


1.

आप मिक्चर-बिस्कीट खाना पसन्द करते हैं?
या चाॅकलेट? मैगी? पाॅपकोर्न? पिज्जा?

क्या आपको छाछ-मट्ठा-शरबत पीना पसन्द है?
या पेप्सी? कोक? स्लाइस? मजा?

हो सकता है, किसी को हो और किसी को न हो। इनमें से किसी को एक पसन्द हो, तो दूसरी नहीं। दूसरी और तीसरी हो तो पहली और आखिरी नहीं। यह भी हो सकता है कि आप कोई चीज इसलिए नहीं पसन्द करते हों कि वह भारतीय नहीं है? कई बार ट्राई मार के भी देख लेते हैं...लेकिन आपको जमती ही नहीं। ऐसा भी हो सकता है कि कुछ लोगों को पश्चिमी ‘फ्लेवर’ ही पसन्द आये।

कुल मिलाकर यह मामला आपके भीतरी मनोविज्ञान से जुड़ा है। जो चीज आपको रुचती है, उसके प्रति आप अपनी अभिरुचि दर्शाते हैं। संभावित अनुक्रिया करते हैं। और जो नहीं पसन्द है, उसके प्रति आपकी प्रतिक्रिया होती है-‘बाज़ार में खड़ा हँू लेकिन खरीदार नहीं हँू’। कुछ इसी टाइप।

मित्रो, मुझे पसन्द है....पिक्चर। पिक्चर की दुनिया। पिक्चर की बातें। पिक्चर के लोग। तकनीक। कला। अभिनय। संवाद। पटकथा.....और निर्देशन। मेरे इस ‘पैशन’ का कोई कार्य-कारण सम्बन्ध नहीं है; और न ही मेरा भारतीय फ़िल्मों पर शोध-कार्य ही है। तब भी पसन्द है मुझे सिनेमा...जुनून की हद तक। बेइंतहा प्यार। बेशुमार लाड़।

‘लार्जर दैन लाइफ’ के इस खूबसूरत कैनवास पर दृश्यों की क्रमिक अन्वीति मुझे मेरे होने का प्रमाण देती है। मुझे लगता है जैसे सिनेमा पृथ्वी के घूर्णन गति के माफिक इतिहास-चक्र में घूमती है, निर्बाध....निरन्तर। सिनेमा, 70 एम.एम. के स्क्रीन पर भविष्य की यात्रा तक संभव बनाती है.....क्या यह हमें नहीं पता?

सिनेमा अपने शिल्प में गल्प तक को यथार्थ रूप, आकृति, वेश और यौवन प्रदान करती है। यह समय के दुःख-तकलीफ की मुनादी सिर्फ बाहर नहीं करती है, अपितु हमारे भीतर भी रुदाली की तरह रोती है हीक भर। हम चकित होते हैं कई मर्तबा कि सिनेमा हमारे भोगे-देखे सच को ऐसे कैसे बयां कर ले जाती है। हमारी अपनी आँख से हर-हर लोर भी गिर जाएँ और हम उसे संभाल भी न सके।

मित्रो, सिनेमा ने बीते दशकों में काफी कुछ बदला है हमारे भीतर। भारतीय फिल्में अपने कायदे की तहज़ीब में वह सबकुछ संभव कर दिखाती थी जिस बारे में और जनमाध्यमों के लिए सोच पाना तक दूभर था। वह उस जमाने में सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वासों, रूढ़ियों, मर्दवादी मानसिकताओं, लैंगिक भेदभावों, जातवादी धारणाओं इत्यादि से लोहा लेती थीं जब उनके मुँह में जबरन लोहे के नाल ठूँसे होते थे।पहले फिल्में पैसे से बनती थी....अब पैसा बनाने के लिए बनती हैं। पहले वे कहानी में अपने समय-समाज, देशकाल-परिवेश को जगह देती थीं....आज ‘इनकार’(मेट्रो लाइफ, सेक्सुअल हरासमेन्ट) को जगह मिलती है। पहले राह चलते निर्देशकों को देवानन्द जैसे कलाकार मिल जाते थे, और आज ‘तन समर्पित, मन समर्पित और यह जीवन समर्पित’ के बाद भी कुछ भी मिल सकने की शुद्ध गारंटी नहीं है।

आज सिनेमा इकाई के करोड़ में बन रही है और दहाई के करोड़ में धड़ल्ले से बिक रही है। इस सिनेमा में शामिल नंगेपन की भाषा अपनी पल्लू गिराकर अपना मोल बढ़ाती है...क्योंकि खरीदारों को यही देखना गँवारा लगता है। सबसे बुरी गत स्त्रियों की है। वजह कि स्त्रियाँ स्वयं माॅडरेटर नहीं हैं या हैं भी तो न्यूनांश। ऐसे में मर्दवादी ‘फेविकोलो’ की जबरदस्त जबरदस्ती उनके साथ कई रूपों में देखने-सुनने को मिल जाती है।
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