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Showing posts from 2012

फ़र्क

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यदि मैं आपसे मिलता हँू
आधे-अधूरे मन से
पूछता हँू हालचाल
चलते भाव से
लेता हँू आपमें या आपके कहे में
दिलचस्पी अनमने तरीके से
या कि
कुछ भिन्न स्थितियाँ हो
तो आप ही कहिए ज़नाब!
मेरी ऐसी बेज़ा हरकतों के बीच
आपको यह बताया जाना कि
राजीव रंजन प्रसाद के बैंक अकांउट में
चार या चौदह सौ रुपइया नहीं चार लाख है
क्या फ़र्क पड़ता है?

ख़बर में आग है कि झाग है

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कुछ वर्ष पूर्व भारत का सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय घोषित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए यह एक बुरी ख़बर है कि उसका नाम विश्व के सर्वश्रेष्ठ 200 विश्वविद्यालयों में कहीं नहीं है। इस ख़बर से विश्वविद्यालय परिसर में हड़कम्प या किसी किस्म का बवेला मचे, यह सोचना ही फिजूल है। इस बाबत सामान्य चर्चाएं/बहसें भी प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों के आपसी आत्मचिन्तन और मंथन का विषय शायद ही हो; क्योंकि इस घोषणा/उद्घोषणा से उनका बाल भी बाँका नहीं होना है। वैसे समय में जब पूरी दुनिया अपनी शिक्षा-पद्धति और शैक्षणिक-प्रक्रिया को लेकर बेहद संवेदनशील और चेतस है; भारत आज भी अपने शिक्षा-प्रारूपों मंे मौलिक अथवा आमूल बदलाव लाने का पक्षधर नहीं है। सामान्य जानकारी के लिए यह जिक्र आवश्यक है कि इस रिपोर्ट को विश्वविद्यालयों की रैंकिंग की सूची निकालने वाली वेबसाइट क्युएस टाॅपयुनिवर्सिटिज डाॅट काॅम ने लांच किया है। इस सूची में आईआईटी दिल्ली को जहाँ 212वीं रैंकिंग प्राप्त हुई है, वहीं आईआईटी मुम्बई को 227वीं। यह रैंकिंग विश्वविद्यालयी गुणवत्ता सम्बन्धी कई निर्धारित मानकों के आधार पर जार…

अखिलेश ने कितना बदला उत्तर प्रदेश

इत्ती जल्दी यह मूल्यांकन जल्दबाजी साबित होगी। कुल जमा छह महीने बीते हैं मुश्किल से। कोई विशेष पराक्रम या उपक्रम नहीं किया अखिलेश ने की शब्दों की गलबहियाँ की जाएं या कि हर्षोचित उल्लेख। बेरोजगरी भत्ते जैसे अपर्याप्त कार्यक्रम से पढ़े-लिखे जमात का भरण-पोषण हो पाएगा; यह बहसतलब है। राजनीति का कुरुक्षेत्र कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश में राजनीति कभी समरस नहीं रही। शासकीय उठापटक और फेरबदल इस प्रदेश की ऐतिहासिक विशिष्टता है। इसी वर्ष हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा सरकार यदि अपनी कारगुजारियों की वजह से गई, तो सपा शासन अपनी करतब की बजाय जन-विवेक की वजह से सत्ता पर पुनः काबिज होने में सफल रही है। समाजवादी पार्टी के झण्डाबदारों ने जितनी दगाबाजियां आमजन से अपने शासनकाल में की है; उसका रिपोर्ट कार्ड युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को अवश्य पढ़ना चाहिए। सपा शासन में हिंसा, अपराध और खून-खराबे का जबर्दस्त बोलबाला और लोकराज रहा है। स्वभाव से थिर-गम्भीर पार्टी आलाकमान मुलायम सिंह यादव ने भी इस प्रवृत्ति को खूब सराहा है और आवश्यकतानुसार राजनीतिक इस्तेमाल भी किया है। आज अखिलेश यादव उसी पार्टी के मु…

लोरी, गीत और कविताएँ

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(घर से आज ही लौटा, अंजुरी भर कविताओं के साथ जो मेरी मम्मी देव-दीप को रोज सुनाती है। ये दोनों भी मगन होकर सुनते हैं, खिलखिलाते हैं और आगे सुनाने की दरख़्वास्त भी करते हैं-‘दादी अउर, दादी अउरी’)

1.    
चउक-चउक चलनी
पानी भरे महजनी
पनिया पाताल के
उहो जीवा काल के
मार गुलेला गाल पर
रोक लिया रुमाल पर

2.    
अटकन-मटकन दे दे मटकन
खैरा-गोटी रस-रस डोले
मस-मास करेला फूले
नम बताओ अमुआ गोटी, जमुआ गोटी
तेतरी सोहाग गोटी
आग लगाई खीर पकाई
मीठी खीर कवन खए
भैया खाए बहिनी खाए
कान पकड़कर ले जा महुआ डाल
तब जाओगी गंगा पार

3.    
तकली रानी तकली रानी
कैसी नाच रही मनमानी
गुनगुन-गुनगुन गीत सुनाती
सूतों का ये ढेर लगाती
सूतो से यह कपड़े बनते
जे पहन से बाबू बनते

4.    
चन्दा मामा चन्दा मामा
लगते कितने प्यारे हो
जगमग जगमग सदा चमकते
तुम आँखों के तारे हो

5.    
रेल हमारी लिए सवारी
काशी जी से आई है
उत्तम चावल और मिठाई
लाद वहां से लाई है

6.    
हुआ सवेरा हुआ सवेरा
अब तो भागा दूर अन्धेरा
छोड़ घोंसला पंक्षी भागे
जो सोवे थे वो भी जागे
आसमान में लाली छाई
धरती पर उजलाई फैली
चहचह-चहचह
चिडि़…

संचार की मनोभाषिकी और उत्तर संस्कृति

वैश्वीकरण की लोकवृत्त में व्यापक परिव्याप्ति है; लेकिन यह जन-समूहीकरण या जन-एकीकरण का पक्षधर नहीं है। समकालीन सन्दर्भों में वैश्वीकरण का अपनी प्रकृति, आचरण और व्यवहार में लोकोन्मुखता और सामाजिकता से दूरस्थ होना एक कटु सचाई है। आधिपत्य और अधिग्रहण की शर्त पर यह जिन प्रवृत्तियों को बढ़ावा देता है, वे समरूपीकरण की संस्कृति को थोपने के अतिरिक्त व्यक्ति या कि समाज-विशेष की भाषा, शिक्षा, संस्कृति एवं साहित्य को भी अपने प्रभुत्ववादी वर्चस्व के घेरे में खींच लेते हैं। लोकतांत्रिक-मूल्यों के हरण का यह प्रपंच प्रायः नई आर्थिक नीति, मुक्त सूचना प्रवाह और उदारशील पूँजी-निवेश के गणवेष में रचा-बुना जाता है। अतः  वैश्वीकरण जिस सार्वभौमिक दुनिया को बनाता या फिर गढ़ता है, उसमें भाषा, शिक्षा, संस्कृति एवं साहित्य का जिक्र अथवा विवरण भले हांे; लेकिन उसमें भाषिक-चेतना, जातीय-स्मृति, इतिहास-बोध, राष्ट्रीय अस्मिता और पारम्परिक-मूल्यों की सारतः या पूर्णतः अभिव्यक्ति का निषेध(गेटकीपिंग) जैसे प्राथमिक शर्त है।

नव उपनिवेशवाद और नव साम्राज्यवाद ने समकालीन चुनौतियों को और गाढ़ा किया है। समकालीनता का सीधा और स्पष्…

घोषणा

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चिनगारियाँ फूटीं
लगी आग
धुँआ, गुब्बार, लावा, मलवा
कोहराम, क्रन्दन, त्राहिमाम्
जल्द ही सब थिर, सब शान्त

सहस्राब्दियों बाद
मंगल से पृथ्वी पर आया है अन्तरिक्ष यान
जीवन की तलाश में
शोध, अनुसन्धान, अन्वेषण के क्रम में
नमूने लेगा वह 

निष्कर्षतः घोषणा होगी मंगल पर
पृथ्वी पर थी
भरी-पूरी जिन्दगी किसी समय
जो काल का ग्रास बना
अपने ही हथियारों से
विस्फोटक साज-सामानों से
एटम बम और अणु बमों से

सही है, माथा गर्म होने पर
दिमाग फटता है
और, पृथ्वी के गर्म होने पर
फटता  है, बम....व्योम में।

अमूल को जिसने बनाया अमूल्य

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बीते रविवार को श्वेत-क्रान्ति के पुरोधा डाॅ0 वर्गीज कुरियन नहीं रहे। यह हम भारतीयों के लिए अपूर्णीय क्षति है। डाॅ0 कुरियन राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड(एनडीडीबी) के संस्थापक अध्यक्ष थे जिन्होंने अमूल डेयरी को अमूल्य बनाया; एक अलग पहचान दी। उन्होंने डेयरी सहकारी आन्दोलन को जो ऊँचाई दी, वह श्लाघ्य है। 90 वर्षीय डाॅ0 कुरियन सही मायने में जननायक थे, कोई सुपरमैन या स्पाइडरमैन नहीं। भारतीय ग्रामीणों से गहरा जुड़ाव महसूस करने वाले डाॅ0 कुरियन गला गाढ़ा करने वाले कागज़ी बौद्धिक नहीं थे। वे लोकअनुभव से अर्जित संस्कारों के लिए लड़ने-भिड़ने वाले योद्धा थे। डाॅ0 कुरियन को वर्तमान पीढ़ी चाहे जैसे भी या जिस रूप में भी याद रखे, लेकिन पुरानी पीढि़यों की स्मृति में उनका नाम स्वर्णीम अक्षरों में टंका हैं। डाॅ कुरियन अपने जीते-जी जो अरज गए हैं, उसे बिसार देना इसलिए भी आसान नहीं है; क्योंकि उसका सामाजिक महत्त्व अतुलनीय है। जैसा कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भी कहते हैं-‘सामाजिक महत्त्व के लिए आवश्यक है कि या तो आकर्षित करो या तो आकर्षित हो।’

डाॅ0 कुरियन ने भारतीय किसानों और पशुपालकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। उन…

जि़न्दगी

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आकाश में
बादलों का आना
और फिर
मेघ बन बरसना

नदी में
जल का जुमना
और फिर
धार बन बहना

आओ तुम भी
जरा समीप मेरे
हम कल के लिए
मेघों से अंजुरी भर जल लेंगे
और नदियों से
अंजुरी भर धार

मुझे पता है
इस अंजुरी भर मात्रा में
जीवन का संपूर्ण द्रव्यमान होगा
पूरी गति
विश्वास करो मेरा
मैंने पढ़ा है
‘जल ही जीवन है’
और जीवन से इतर
हमें चाहिए भी तो नहीं कुछ!

युवा जनतंत्र : परिधि के भीतर और परिधि के बाहर

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जन-शोध का नव-स्तम्भ 'जन मीडिया/मास मीडिया'

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वर्तमान में दुनिया वेब-जगत के घेरे में है। जरूरी जानकारियाँ,
महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ और घटनाओं के त्वरित सन्देश तेजी से भौगोलिक सीमाओं
का अतिक्रमण कर रहे हैं। आज वेबपसंदी लोगों का अन्र्तजाल से याराना है।
टेक्सट, इमेज, ग्राफिक्स, एनिमेशन, आॅडियो, विडियो इत्यादि के साथ रोज का
उठना-बैठना है। समाचारपत्र और टेलीविज़न चैनल भी इसी होड़ में शामिल हैं।
उनका या तो नेट-संस्करण उपलब्ध है या फिर इसकी तैयारी में वे जीजान से
जुटे हैं। इस अहम बदलाव के बीच कुछ ऐसे जरूरी सवाल हैं जिनसे हमारा
समय-समाज सीधे मुठभेड़ करना नहीं चाहता है। टिककर सोचना उसकी भाषा में
समय की फिजूलखर्ची है। इसीलिए आज की वैचारिकी में सघनता और सुघड़ता नहीं
है सिवाए लिपापोती के। सामयिक पड़ताल और मूल्यांकन सूचनाक्रांत और सतही
हैं; किन्तु उनमें अन्तर्वस्तु विश्लेषण का वो दमखम नहीं है जिसका हम और
हमारा समाज दस्तावेजीकरण कर सके; आने वाली पीढ़ी के लिए
संरक्षित-सुरक्षित रख सके। जनपक्षधर मुद्दों का अवलम्बन न होने से
मीडिया-शोध की स्थिति उत्तरोत्तर चैपट हुई हैं। इस क्षेत्र में निजी या
संस्थ…