अमूल को जिसने बनाया अमूल्य


बीते रविवार को श्वेत-क्रान्ति के पुरोधा डाॅ0 वर्गीज कुरियन नहीं रहे। यह हम भारतीयों के लिए अपूर्णीय क्षति है। डाॅ0 कुरियन राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड(एनडीडीबी) के संस्थापक अध्यक्ष थे जिन्होंने अमूल डेयरी को अमूल्य बनाया; एक अलग पहचान दी। उन्होंने डेयरी सहकारी आन्दोलन को जो ऊँचाई दी, वह श्लाघ्य है। 90 वर्षीय डाॅ0 कुरियन सही मायने में जननायक थे, कोई सुपरमैन या स्पाइडरमैन नहीं। भारतीय ग्रामीणों से गहरा जुड़ाव महसूस करने वाले डाॅ0 कुरियन गला गाढ़ा करने वाले कागज़ी बौद्धिक नहीं थे। वे लोकअनुभव से अर्जित संस्कारों के लिए लड़ने-भिड़ने वाले योद्धा थे। डाॅ0 कुरियन को वर्तमान पीढ़ी चाहे जैसे भी या जिस रूप में भी याद रखे, लेकिन पुरानी पीढि़यों की स्मृति में उनका नाम स्वर्णीम अक्षरों में टंका हैं। डाॅ कुरियन अपने जीते-जी जो अरज गए हैं, उसे बिसार देना इसलिए भी आसान नहीं है; क्योंकि उसका सामाजिक महत्त्व अतुलनीय है। जैसा कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भी कहते हैं-‘सामाजिक महत्त्व के लिए आवश्यक है कि या तो आकर्षित करो या तो आकर्षित हो।’

डाॅ0 कुरियन ने भारतीय किसानों और पशुपालकों का ध्यान अपनी ओर खींचा। उन्होंने अपने नेतृत्व में दुग्ध विपणन संघ की स्थापना कर दुग्ध-उत्पादन में अन्तरराष्ट्रीय व्यापार को प्रोत्साहित किया। अपने अंतःकरण को वरीयता देने वाले डाॅ0 कुरियन समझौतापरस्त व्यक्ति नहीं थे। 2006 में जीसीएमएमएफ के प्रबन्धन तन्त्र से मतभेद के चलते उन्होंने अपने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना अपने गरिमा के अनुरूप समझा। उसके बाद वे शिक्षा के क्षेत्र में अपने अनुभव और नेतृत्व का सदुपयोग करने में जुट गए। किसानों और पशुपालकों में आत्मगौरव का संस्कार भरने वाले डाॅ0 कुरियन की सीख है-कर्तव्यबोध और कर्तव्यनिष्ठता; मौके की पहचान और चुनौतियों से सामना करने का जज़्बा; समय का सम्मान और उनका रचनात्मक उपयोग; पैसे की अहमियत और लोक-अभियान में उसे होम कर देने का उत्साह आदि। आज के भौतिकवादी युग में जब अपसंस्कृतियों के अभिलक्षण प्रकट या अप्रकट रूप में हमारे भीतर जगह छेंक रही है, इनसे निवृत्त होना आवश्यक है। डाॅ0 कुरियन इस दृष्टि से हमारे प्रेरणास्रोत हैं जो व्यक्ति के मन, चित्त और अंतःकरण को न सिर्फ सर्वश्रेष्ठ मानते हैं; बल्कि तमाम कुप्रवृत्तियों और मनोविकारों से छुटकारा पाने का संकल्प-विकल्प भी इसी में तलाशते हैं।
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